बाबू यदुनंदन सिंह सरीखे पुरखों के त्याग व संघर्ष की कहानी कहता आदर्श गांव गोराईंपुर

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1838
शान्तनु सिंह – बीटेक व एमबीए (यूएसए)

आज हमारा गांव गोराईपुर छपरा-सोनपुर- पटना मुख्य हाईवे सड़क के उत्तर दिशा में स्थित है लेकिन वर्ष 1930 के पहले गांव गोराईंपुर सड़क के दक्षिण दिशा में गंगा नदी के कछार पर बसा हुआ था। वर्ष 1930 में आये कटाव की वजह से ग्रामीणों को सड़क के उत्तर दिशा में बसना पड़ा।

यदि अपने पुरखों की बात की जाए तो हमारा गांव गोराईंपुर दो भाईयों का वंशज है जिनका नाम हेला राय और हरिदास राय था। यहीं से गांव की कहानी शुरू होती है। कहा जा सकता है कि यह बहुत कठिन समय था। जहां एक तरफ कृषि प्रधान गांव के ज्यादातर खेत गंगा में समाहित हो गया और जो बचा वो बालू के रेत में तब्दील हो गया। लेकिन हमारे पुरखे हार मानने को तैयार नहीं थे।
खेती खत्म,रोजगार का कोई साधन नहीं। ऐसे में एक आर्थिक परेशानियों से बचने का एक ही रास्ता बचता था वो था अर्थोपार्जन की लालसा लिए गांव से बाहर पलायन। गांव के कुछ परिवारों मसलन पंचदेव नारायण सिंह और कामेश्वर सिंह के पूर्वज भागलपुर की ओर चले गए और वहां खेती बाड़ी शुरू हुई। इसी क्रम में हमारे परबाबा बाबू रामअवतार सिंह बर्मा की लड़ाई ​के दौरान सेना में भर्ती हो गयें और बर्मा की तरफ़ चले गये। लड़ाई ख़त्म होने के बाद वो कोलकाता के तरफ़ आ गये। तब उनकी मुलाक़ात बंगाल के मशहूर ज़मींदार श्री भावनाथ सेन से होती है। श्री भावनाथ सेन कोलकाता कॉरपोरेशन के लेसी(लीज) थे। उन्होंने बाबू रामअवतार सिंह के पुत्र बाबू यदुनन्दन सिंह की योग्यता देखकर उनको धापा का राजकाज सम्भालने को दे दिया। धापा को सम्भालने हेतु उन्हें अपने लोगों की ज़रूरत थी सो उन्होंने गोराईंपूर से सरजुग प्रसाद सिंह को अपने यहाँ बुला लिया। अपने समय में धापा में बाबू यदुनन्दन सिंह ने गोराईंपुर और बोधाछपरा के कई लोगों के नाम से ज़मीन बंदोबस्ती में दी। इस मौक़े का लाभ पूरे गोराईंपुर गाँव को मिला और गाँव के लोग कोलकाता की ओर पलायन करने लगें। यहीं से शुरू होती है गांव गोराईंपुर के विकास की कहानी। यह वो दौर था जब धापा की कमाई की वजह से पूरे गोराईंपुर का घर चलता था। इसे देखकर जिन परिवारों ने 1930 में भागलपुर का रूख कर लिया था, वे भी कोलकाता की ओर चले आए।

                                    बाबू रामअवतार सिंह

वैसे तो सुनने में ये सामान्य घटना प्रतीत हो सकती है लेकिन यहीं से शुरू होती है गोराईंपुर के बदलाव की कथा। संख्या की दृष्टि से बहुत ही कम घरों की आबादी वाले गोराईंपुर गांव के आदर्श गांव बनने की कथा। ये कथा उन गांवो के लिए भी प्रेरक है जो सरकारी योजनाओं के तहत प्रधानमंत्री सांसद आदर्श ग्राम के रूप में गोद लिये जाने के बावजूद सही अर्थों में आदर्श ग्राम बनने की बाट जोह रहे हैं। गोराईंपुर गांव के आदर्श गांव के रूप में परिवर्तित होने की कथा उन नीति नियंताओं और निर्माताओं के लिए भी प्रेरक साबित हो सकती है जो सरकारी योजनाओं के भरोसे गांव के बदलाव का खाका खीचते हैं लेकिन जमीन पर कुछ भी सकारात्मक होता नहीं दिखाई देता और जो रिपोर्ट सामने आती है वो पूरे आदर्श ग्राम योजना के विफलता की कहानी कहने के लिए पर्याप्त है।
महात्मा गांधी ने कहा था, ” मैं जानता हूं कि एक आदर्श गांव को आकार देना ठीक उतना ही मुश्किल है जितना एक आदर्श देश को आकार देना है। लेकिन अगर कोई एक आदर्श गांव स्थापित करता है तो वह न सिर्फ पूरे देश के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए उदाहरण पेश कर रहा होगा। ”

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ये तो पुख्ता तरीके से नहीं कहा जा सकता कि गांव गोराईंपुर गांधी के सपनों का आदर्श गांव है लेकिन जिस एक व्यक्ति की तलाश महात्मा गांधी को आदर्श ग्राम स्थापित करने के लिए थी,छोटे से गांव गोराईंपुर के लिए वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि बाबू यदुनन्दन सिंह थे जिन्होंने न सिर्फ इस गांव के बल्कि आसपास के गांवो के बदलाव की नीव आजादी के लगभग एक दशक पूर्व ही रखनी शुरू कर दी थी और आजादी के पश्चात चौथे दशक आने तक गोराईंपुर गांव भले ही सरकारी दस्तावेज में आदर्श ग्राम के रूप में न दर्ज किया गया हो लेकिन सारण जिले के इस छोटे से गांव गोराईंपुर में आजादी के तुरंत बाद से ही बदलाव की जो नींव बाबू यदुनन्दन सिंह ने डाली उसके परिणाम स्वरूप इस गांव में प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रेल परिवहन और सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से उच्च मानक प्राप्त करने का गौरव हासिल था और गोराईंपुर गांव न सिर्फ सारण जिले में ​बल्कि बिहार के किसी भी आदर्श गांव से किसी भी मायने में पीछे नहीं था। इन सारे बदलाव के वाहक बने थे बाबू यदुनन्दन सिंह। ऐसा भी नहीं था कि वे कोई राजनेता थे या ​उन्होंने ये सारे बदलाव नेता बनने या सरकारी योजनाओं के जरिए लाई हो। बाबू यदुनन्दन सिंह समाज से सरोकार रखने वाले, अपने गांव में बदलाव के लिए पूरे समाज को साथ लेकर चलने वाले एक मनीषी थे, जो निस्वार्थ अपने निजी कोष से गांव के बदलाव की पटकथा लिख रहे थे। तो आईए कहानी के इस पड़ाव पर ठहर के बाबू यदुनन्दन सिंह के पूरे जीवन को शब्दों के आईने में देखने समझने का प्रयास करते हैं जिन्होंने न सिर्फ गोराईंपुर को बल्कि इस पूरे इलाके के आम जन के जीवन को आसान बनाने के लिए जीवन पर्यंत कोई कसर नहीं छोड़ी। बाबू यदुनन्दन सिंह की जीवन यात्रा को समझे बिना गोराईंपुर के बदलाव की कथा को नहीं समझा जा सकता।

बाबू यदुनन्दन सिंह

बाबू यदुनन्दन सिंह
स्वर्गीय बाबू यदुनन्दन सिंह का जीवन सदैव समाज की निष्काम सेवा में लीन रहा। उनका स्वभाव सहज एवं सरल था। समाज सेवा तथा शिक्षा से अनन्य प्रेम उनके जीवन का मूल मंत्र था।
महान संत तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है:—
”करन चहउं रघुपति गुन गाहा। लघुमति मोर चरित अवगाहा।।
सूझ न एकउ अंग उपाउ। लघु मति मोर मनोरथ राउ।।”
प्रारंभिक जीवन काल
स्व: बाबू यदुनन्दन सिंह का जन्म 19 जनवरी 1900 ईस्वी में ग्राम गोराईंपुर, जिला सारण बिहार में हुआ था। उनके पिता का नाम रामअवतार सिंह तथा माता पुण्या देवी थीं। वे क्षत्रिय कुल पराशर गोत्र के थे। राशि का नाम टेक बहादुर थाा तथा राशि नाम के अनुरूप वे जीवन में किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति दृढ़ संकल्पित होकर करते थे। वे अपने माता पिता के अनन्य भक्त थे।
बाबू रामअवतार सिंह ने अपने चचेरे भाई स्व. देवनारायण सिंह के पुत्र दीनानाथ सिंह को गोद लिया था। स्व.दीनानाथ सिंह के मां बाप जब उनकी आयु सात वर्ष की थी, चल बसे थे। बाबू यदुनन्दन सिंह सहोदर भाई से भी अधिक दीनानाथ सिंह को मानते थे।
शिक्षा: गांव में शिक्षा की घोर कमी थी। अत: इनके पिता राम अवतार सिंह इन्हें सात वर्ष की अवस्था में कलकत्ता लेकर चले आये। इनका दाखिला महामाया हाई स्कूल में हुआ। यह आज भी प्रतिष्ठित है। यहां से इन्होंने मैट्रि​कुलेशन की परीक्षा पास की। इसके बाद एमए करने के लिए कलकत्ता के ही फोर्ट विलियम कॉलेज जो आज नहीं है में दाखिला लिया, पर पूरा नहीं कर पाये। वे अंग्रेजी, बांग्ला, हिन्दी तथा भोजपुरी में अनायास अपनी भावनाओं को व्यक्त करते थे।
बाबू यदुनन्दन सिंह कलकत्ता में धापा में रहते थे। यह कलकत्ता शहर के दक्षिण में पड़ता है। यह चार हजार एकड़ में फैला है। कलकत्ता शहर का कूड़ा यहां खलास होता है। इस कार्य हेतु बंगाल राज्य सरकार ने कलकत्ता कॉरपोरेशन इसे लीज पर किसी व्यक्ति को देता था, जो लिसी कहलाता था। लिसी का काम कूड़ा खलास करवाना था तथा इससे तैयार हुए जमीन की बन्दोबस्ती करवानी थी। इस जमीन में सब्जियों की खेती तथा मकई उपजाये जाते हैं।
वे जब एफ ए में थे, उस समय धापा का लीज श्री भवनाथ सेन को मिला था। उन्हें धापा का काम संभालने के लिए शिक्षित तथा समझदार व्यक्ति की आवश्यकता थी। उन्होंने इस कार्य के ​संचालन के लिए बाबू यदुनंदन सिंह जी को चुना। इसलिए उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी, धापा उनका कार्यक्षेत्र बन गया।

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स्थानीय राजनीति में भी बनाई पहचान
बाबू यदुनन्दन सिंह जी ने महसूस किया समाज में जनजीवन की कठिनाईयों को दूर करने के लिए राजनैतिक शक्ति आवश्यक है। धापा पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगणा जिले में स्थित है। आजादी के पहले 1946 में बंगाल ‘पश्चिम बंगाल और बंग्लादेश’ में हिंदू मुस्लिम दंगा हुआ। उस समय बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी थे। इस दौरान बाबू यदुनन्दन सिंह जिला कमिटी के सदस्य बनाये गये और शांति कायम करने में वे अग्रणी रहे।
देश आजाद होने के बाद जिला में वोयाचल्ला यूनियन बोर्ड बना। वे इसके सभापति चुने गये। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने गांव में पानी की व्यवस्था के लिए हैंड पंप लगवाया, बच्चों की शिक्षा के लिए प्राइमरी स्कूल बनवाये। वहां के गांवों में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र बनवाये। अपने क्षेत्र के उद्यमियों को कारखाना लगाने के लिए तथा लोगों को काम मिले इसके लिए मंजूदी दी। धापा क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने हेतु बाबू यदुनन्दन सिंह ने टायर कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया को जमीन मुहैया करवाया। इसके साथ ही बंगाल पोटरीज को उस क्षेत्र में कंपनी लगाने की मंजूरी भी दी। इस कंपनी में तीन शिफ्ट में एक हजार मजदूर काम करते थे। आज यह कारखाना बंद हो चुका है। इसी तरह अपने क्षेत्र में छोटे और मझोले कई उद्योग लगवाया। इसके साथ ही उन्होंने जनकल्याण के कार्यों को बढ़ावा देने के लिए जनकल्याण स्कूल के भवन निर्माण में काफी धन-राशि खर्च किया। इनके कार्यों से प्रभावित होकर राज्य सरकार ने इन्हें फस्र्ट क्लास सर्टीफिकेट भी दिया।

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक, सामाजिक जीवन में सक्रिय और जनकल्याण के कार्यो में प्रभावी उपस्थिती दर्ज कराने के बाद इन्होंने बिहार में स्थित अपने गांव गोराईंपुर और आस पास के इलाके में जनकल्याण के कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया और गांव और इस पूरे इलाके के बदलाव में महत्ती भूमिका अदा की।

1.रामावतार उच्च विद्यालय, गोराईपुर:— सबसे पहले इन्होंने गांव में प्राथमिक विद्यालय का निर्माण करवाया था। आगे चलकर इन्होंने मिडिल स्कूल तथा हाई स्कूल 1955—56 में अपने पिताजी के नाम से बनवाया। स्कूल के भवन के लिए जमीन खरीदा तथा वि​द्यार्थियों के खेलने के लिए भी जमीन खरीदा ताकी खेल का मैदान बन सके। उस समय फिजिक्स प्रैक्टिकल लेबोरेट्री,केमिस्ट्री प्रैक्टिकल लेबोरेट्री के लिए सामान खरीद कर स्कूल को दिया। बॉयालॉजी लैब के लिए माइक्रोस्कोप खरीदा। स्कूल भवन बनवाने में इनके अनुज दीनानाथ सिंह तथा गांव के सभापति सिंह का नाम उल्लेखनीय है। इस स्कूल के प्रथम सेक्रेटरी बोधाछपरा गांव के बाबू कैलाशपति सिंह थे। इस स्कूल के प्रथम प्रधानाध्यापक रहे स्व. रामाज्ञा पांडे तथा सह प्रधानाध्याापक गांव के ही निवासी स्व. पंचदेव नारायण सिंह का नाम उल्लेखनीय है।
2. सर्वोदय विद्यालय भगवानपुर: वर्ष 1956 में इस विद्यालय को दस हजार रूपये दान दिये। यह विद्यालय भगवानपुर रेलवे लाईन के उत्तर में स्थित है।


3. अवतार नगर रेलवे स्टेशन:— यह स्टेशन 1955 में नार्थ इस्टर्न रेलवे के दिघवारा तथा बड़ा गोपाल स्टेशनों के बीच बना। स्टेशन स्थापित होने के आसपास के लगभग 10 से ज्यादा गांव के लोगों को अपने गन्तव्य स्थानों में जाने तथा लौटने में अनेक कठिनाईयां झेलनी पड़ती थी। अपने पिता के नाम पर स्टेशन को करवाने के लिए बाबू यदुनन्दन सिंह ने अथक परिक्षम किया। एक समय इस स्टेशन पर टिकट की बिक्री दिघवारा स्टेशन से अधिक थी।
4. पुण्या देवी रेफरल अस्पताल: स्थानीय ग्रामीणों को चिकित्सा सुविधा हेतु दिघवारा या छपरा जाना पड़ता था। उनकी परेशानियों को ध्यान में रखते हुए बाबू यदुनन्दन सिंह ने जमीन खरीदकर तीन रूम का अस्पताल बनवाया एवं नर्स व कम्पाउण्डर के रहने हेतु क्चार्टर बनवाये। इस अस्पताल का नाम अपनी मां पुण्या देवी के नाम पर रखा। इस अस्पताल का निर्माण 1958 में हुआ था।
5. पशु चिकित्सालय का निर्माण: 1958 में ही रेफरल अस्पताल से सटे पशु चिकित्सालय के निर्माण के लिए भी जमीन खरीदा। यहां भी दो रूम का अस्पताल तथा एक कंपाउण्डर क्वार्टर बनवाया। दोनों चिकित्सालयों में डॉक्टर दिघवारा से आते थे, तथा बिहार सरकार से निशुल्क सेवा होती एवं दवा भी मुफ्त में मिलता था।

6. यदुनन्दन महाविद्यालय दिघवारा: इस महाविद्यालय की कल्पना सर्वप्रथम दिघवारा के डॉ विधु भूषण राय ने की। मैट्रिक पास करने के बाद इस इलाके के विद्यार्थियों को इन्टरमीडिएट तथ बीए की पढ़ाई करने के लिए छपरा, मुजफ्फरपुर या अन्य शहरों में जाना पड़ता था। डॉ राय ने बाबू यदुनन्दन सिंह को इस स्थिति से अवगत कराया तथा योगदान की अपेक्षा की। गांव के सामाजिक शैक्षणिक उत्थान को सदैव तत्पर रहने वाले बाबू यदुनन्दन सिंह इस कार्य के लिए सहर्ष तैयार हो गए तथा बिहार विश्वविद्यालय में इस महाविद्यालय के एफलियेशन हेतु अपार धनराशि खर्च की। शुरूआत में इस महाविद्यालय का नाम प्रभुनाथ यदुनन्दन महाविद्यालय रखा गया। तत्कालिन बिहार के मुख्यमंत्री स्व. दारोगा प्रसाद राय ने परसा में प्रभुनाथ कॉलेज की स्थापना करवाई। तब ये महाविद्यालय यदुनन्दन महाविद्यालय हो गया। महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य सतीश सिंह जोकी बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामसुंदर दास जी के सेक्रेटरी थे, उनके अथक प्रयास से यह महाविद्यालय 1980 में बिहार विश्वविद्यालय में अंगीभूत ​हो गया। आज यह महाविद्यालय जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा का अंगीभूत महाविद्यालय है तथा शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी स्थान रखता है। आज यदि बाबू यदुनन्दन सिंह जीवित रहते तो महाविद्यालय की वर्तमान स्थिती देखकर जरूर ह​र्षित होते। इस महाविद्यालय के कार्य हेतु ही 1975 में धापा से गोराईपुर आये थे और इसी दौरान 24 मार्च 1975 को चल बसे।

7. अवतार नगर थाना: गांव गोराईंपुर से लगभग 5 किलोमीटर दूर मूसेपुर के नजदीक अवतार नगर थाना का भी निर्माण कराया गया जिससे इलाके में सुरक्षा की भावना बनी रहे।

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परिवार को संवारा..गांव को साथ ले बने बदलाव के निमित्त

साधु स्वभाव के संत पुरूष बाबू यदुनन्दन सिंह की कीर्ति के बखान के लिए गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस की यह चौपाई काफी सटीक बैठती है:—
”साधु चरित सुम चरित कपासू। निरस विसद गुनमय फल जासू।।
जो सहि दुख परछिद्र दुसावा। बंदनीय जेहिं इति जग जस पाना।।”

बाबू यदुनन्दन सिंह समाज के प्रति समर्पित थे ही परिवार के प्रति अपने दायित्व को भी बढ़चढ़कर निभाया। यही कारण है कि अपने अनुज स्व. दीनानाथ सिंह को कलकत्ता से मैट्रिक करवाया और उन्होंने वहीं सुरेंद्रनाथ महाविद्यालय से इंटरमीडिएट करने के पश्चात गोराईपुर तथा मधुबनी जिला में जयनगर के नजदीक स्थित खेती संभालते थे। उनके पुत्र उमेश प्रसाद सिंह, काशी हिन्दु महाविद्यालय से बीए करने के बाद व्यवसाय में तल्लीन है।

जहां तक यदुनन्दन बाबू के पुत्रों का सवाल है तो उनके ज्येष्ट पुत्र शत्रुघ्न प्रसाद सिंह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज से सन् 1966 में बीटेक कर अमेरिका में एमएस किया तथा वहीं सपरिवार रहते थे। लेकिन 24 मार्च, 1975 को पिता की मृत्यु के पश्चात वे सपरिवार भारत लौट आये।  बाबू यदुनन्दन सिंह के छोटे पुत्र अवधेश कुमार सिंह हड्डी रोग विशेषज्ञ के रूप में भारत में प्रसिद्ध है। कलकत्ता से एमबीबीएस करने के ​बाद कानपुर से एमएस आर्थोपेडिक भी किया और नयी दिल्ली में सफदर जंग अस्पताल के निदेशक भी रहे। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मैंने भी अमेरिका में ही बी टेक तथा एमबीए करने के पश्चात देश लौट आया हूं और ​पुरखों की कीर्ति को सहेजने के प्रयास में जुटा हुआ हूं।

डॉ अवधेश कुमार सिंह के पुत्र और हमारे बड़े भाई आलोक सिंह जो दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद फ्रीलांस एडिटर के रूप में पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं।

लेकिन जैसा कि पहले ही कहा गया है कि बाबू यदुनन्दन सिंह परिवार और समाज के प्रति समर्पित थे और गांव गोराईंपुर के बदलाव से इत्तर उनका कोई सरोकार नहीं था और इस पूरी प्रक्रिया में कोई निजी स्वार्थ नहीं था यही कारण है कि जब उनके पास संपदा आई तो उन्होंने इसे अपना न मानते हुए पूरे समाज का माना। यही कारण है कि उनके हर कार्य में पूरे समाज की सहभागिता रही और बंधु-बांधवों और पूरे ग्राम समाज ने बढ़ चढ़कर गांव के बदलाव में योगदान दिया। ये प्रक्रिया इसलिए ​भी आसान रही क्योंकि पूरा गांव एक ही पूर्वज का विस्तृत परिवार था इस​ लिहाज से बाबू यदुनन्दन सिंह का जीवन और उनका गांव ही उनका परिवार था। वे जिस बदलाव के निमित्त बने थे,उसमें उन्हें पूरे गांव का साथ मिला उनमें कुछ नाम उल्लेखनीय हैं और इस लिहाज से पूरा गांव इन पुरखों का आभारी है।

गांव के पहले मुखिया बाबू रामलखन सिंह

गोराईंपुर गांव के पहले मुखिया
बाबू रामलखन सिंह गोराईंपुर गांव के पहले मुखिया थे। गांव गोराईपुर को सामाजिक स्तर से जोड़ने का काम इन्होंने किया। जहां एक तरफ़ बाबू यदुनंदन सिंह गांव की तरक़्क़ी के लिए स्कूल और हॉस्पिटल की स्थापना के लिए वित्तिय सहायता निजी कोष से भेजते थे, वहीं इस कार्य को जमीन पर गांव के हित में सुचारू ढ़ंग से व्यवस्थित करने में इनका अहम योगदान था। इसके साथ ही गांव के बदलाव में बाबू रामबहादुर सिंह, सरयू प्रसाद सिंह,बाबू अमीर सिंह,बाबू सकल सिंह, कंचन सिंह (पूर्व मुखिया), तेज नारायण सिंह,सत्य नारायण सिंह सरीखे पूर्वजों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इसके आगे की पीढ़ी ने भी गांव का नाम रोशन किया। बाबू राम बिनोद सिंह— अपने गाँव से अमेरिका जाने वाले पहले व्यक्ति थे उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से वेटनरी साईंस में एमए और पीएचडी किया। तब हम लोग छोटे थे। आगे चलकर वे अमेरिका के केंद्रीय सरकार में फूड एवं एडल्टरेशन के निदेशक के पद से सेवानिवृत हुए। बाबू रामसुहाग सिंह के सुपुत्र सुरेंद्र प्रसाद सिंह – गांव के पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बने।

पूर्व मुखिया स्व. कंचन सिंह के सुपुत्र दिवंगत डॉ अरूण कुमार सिंह तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में में बॉटनी के विभागाध्यक्ष रहे। उनके छोटे सुपुत्र प्रमोद कुमार सिंह जयप्रकाश विश्वविद्यालय में अभियंता हैं।

गांव गोराईपुर की नयी पीढ़ी भी पुरखों द्वारा संवारे गए गांव को गढ़ने और अपना भविष्य रचने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। बाबू यदुनन्दन सिंह व गांव के अन्य पुरखों के द्वारा लगाये गये बाग को और हरा भरा करने के लिए सब अपने स्तर पर योगदान दे रहे हैं। चाहे गांव का स्कूल हो या फिर उनके द्वारा स्थापित कॉलेज सबमें पुरखों का नाम अमर रहे इसलिए समय-समय पर अपने स्तर पर भी कुछ नया जोड़ने का कार्य नई पीढ़ी कर रही है। बाबू यदुनन्दन सिंह का पोता और उस महान विरासत का हिस्सा होने और गोराईंपुर के बासिंदा होने के नाते मुझे जब भी मौका मिलता है अपने गांव की ओर भागता हूं। वहां के बदलाव का सूत्रधार बनने,ग्रामीणों के साथ संवाद करने,नयी पीढ़ी के साथ जुड़ने का अपना अलग ही आनंद है। उसी माटी ने हमारे पुरखों को भी रचा है और उन्हीं की बदौलत हम यहां तक पहुंचे हैं।

विगत कुछ वर्षों में मेरा गांव आना जाना बढ़ा है। गोराईंपुर स्कूल में बाबू रामावतार सिंह के प्रतिमा का अनावरण हो या फिर दिघवारा स्थित यदुनन्दन महाविद्यालय में बाबू यदुनन्दन सिंह के प्रतिमा का अनावरण इन सब मौकों पर गांव में उपस्थित रहा हूं और जिस तरह का सम्मान अपने पुरखों के लिए गांव और आस पास के इलाके के गांव के लोगों की नजरों में देखता हूं उससे उस महान विरासत का हिस्सा होने का गौरव बोध तो होता ही है साथ ही कर्तव्य बोध से भी बंधता ही चला जा रहा हूं।

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आज जब दिल्ली में रहने वाले हमारे ग्रामीण संतोष कुमार सिंह के आग्रह पर गांधी 150 और देश के 150 गांव की कहानियों के कारवां और आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में देश के 75 गांव की कहानियों के कारवां का हिस्सा बनते जब अपने गांव गोराईंपुर की कहानी लिख रहा हूं तो यह महसूस हो रहा है कि यह मेरे लिए सिर्फ कहानी मात्र नहीं है। बल्कि इस मौके पर मैं अपने गांव गोराईंपुर में ही उपस्थित हूं और दिघवारा स्थित यदुनन्दन ​महाविद्यालय में अपने निजी कोष से मैं और मेरी पत्नी पल्ल्वी सिंह ने सेमिनार हॉल का निर्माण कराया है, और उसी के उद्घाटन के मौके पर गांव आना हुआ है। आगे भी जब भी मौका मिलेगा गांव को संवारने में अपने हिस्से का योगदान देता रहूंगा,यही पुरखों के प्रति,इस गांव के प्रति भावी पीढ़ी होने के नाते हमारा दायित्व भी है और कर्तव्य भी। 

गांव गोराईपुर की हमारी पीढ़ी के कुछ अन्य लोग गांव के उत्थान और सामाजिक, सांस्कृतिक व खेल कूद से जुड़ी गतिविधियों को लेकर विशेष रूप से सक्रिय नजर आते है। इसमें जयप्रकाश विश्वविद्यालय में अभियंता और पूर्व मुखिया स्वर्गीय कंचन सिंह के सुपुत्र प्रमोद कुमार सिंह का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिन्होंने अपने पिता की स्मृति में विगत कुछ वर्षों से क्रिकेट टूर्नामेंट के आयोजन की शुरूआत की है जो सतत रूप से जारी है।

 

 

गांव गोराईपुर की बेटियों ने भी गांव का नाम रौशन किया है। अभी हाल ही में आये बिहार दारोगा परीक्षा के परिणाम के जरिए दिवंगत  शंभू दयाल सिंह की पोती और पूर्व सैनिक मुकंज िंसंह उर्फ डब्लू सिंह की बेटी अंशू प्रिया का दारोगा के रूप में चयन हुआ है। यह गांव के लिए काफी हर्ष का विषय है।

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