बदलते समय के साथ पीछे छूटती परंपरायें, लेकिन बरकरार है बोधा छपरा के ग्रामीणों में अपनत्व

डॉ रामअयोध्या सिंह, सेवानिवृत प्राचार्य, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान

बिहार के सारण जिले ​में दिघवारा प्रखंड के अंतर्गत अवस्थित ग्राम बोधा छपरा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। शक्ति् पीठ अंबिका स्थान इस गांव की सीमा में पूर्वी छोड़ पर विद्यमान है। गांव का नाम यहां के ही एक ग्रामीण श्री बोधा सिंह के नाम पर पड़ा है। बोधा सिंह दो भाई थे। बड़े भाई का नाम बोधा सिंह और छोटे भाई का नाम धर्मनारायण सिंह था।
यदि गांव के एतिहासिकता की बात की जाये हमारे पूर्वज अपने को कुशवंशी राजपुत्र कहते आये हैं। ऐसा माना जाता है राजा श्री राम के पुत्र कुश गोमती नदी के किनारे उत्तर प्रदेश के जिला सुल्तानपुर में एक नगर जिसे कुशपुर या कुश भवन पुर कहते हैं। वहां बाल्मीकि आश्रम है। इसकी चर्चा ईश्वर सिंह मडाढ़ के राजपूत वंशावली में भी है। ग्रामीण अपना गोत्र पराशर बताते हैं। कुल देवी बंदी है जो वनदेवी का अपभ्रंश प्रतीत होता है। बाल्मीकि सीताजी को अपने आश्रम में वनदेवी के नाम से पुकारते थे।

हमारे गांव से सटे पश्चिम गोराईंपुर गांव है। उस गांव के राजपूत भी कुशवंशी राजपूत हैं और उनका गोत्र भी पराशर है। इसके साथ एक तीसरा गांव बलुआं त्रिलोकचक भी है जो दिघवारा प्रखंड के पूरब में स्थित है। यहां भी हमारे सगोत्रिय हैं और ये भी कुशवंशी राजपूत हैं। पूर्वज बताते हैं हमारे पूर्वजों में बैजू बाबा नाम के एक सगोत्र थे। वे अंग्रेजी शासन में पलटन में काम कर देश विदेश गये हुए थे। सेवा निवृत्त होने पर उन्हें पेंशन में कुछ जमींदारी मिली थी। वे हमारे गांव में बसने आये लेकिन उनके देश विदेश में जाने, रहने के कारण उन्हें इस गांव में स्वीकार नहीं किया गया। इसके कारण वे बलुआं त्रिलोकचक में बस गये और वे लोग जमींदार कहलाये। हालांकि कुछ वर्ष पहले तक इस गांव के राजपूत परिवारों से भोज भात चलता था। उन्हें विशेष अपनत्व के साथ आमंत्रित किया जाता और वे बड़े अपनत्व के साथ शामिल होते। हालाकि समय के साथ ये परंपरायें पीछे छूट गयी हैं लेकिन उस गांव से अभी भी अपनत्व है।

गंगा किनारे बसे बोधा छपरा गांव के पुराने बस्ती की चर्चा की जाये 1931 के पहले पुराना बोधा छपरा बस्ती बी एन आर रेलवे लाईन से एक किलोमीटर दक्षिण में बसा हुआ था। बस्ती से सटे उत्तर जिला परिषद की सड़क थी जो सोनपुर से छपरा तक जाती थी। गांव के पूरब एक पीपल का वृक्ष था जहां अखारा था और गांव के नवयुवक कुश्ती लड़ते थे। गांव के पूरब में आम का बगीचा था, जिसकी देखभाल गांव के बड़े बुजुर्ग किया करते। गांव के दक्षिण थोड़ी ही दूरी पर गंगा नदी की धारा थी। वर्ष 1930 से 34 के बीच गंगा का कटाव जोरों से हुआ और पूरा गांव नदी के पेट में चला गया। 1934 से हमारे पूर्वज वर्तमान बोधाछपरा जो वी एन आर रेलवे लाईन के सटे उत्तर में स्थित है, वहां फूस की झोपड़ी बना कर बसना शुरू किये।

 

वर्तमान बोधा छपरा गांव के उत्तर गंगा का बहुत पुराना छाड़न था, जहां से गंगा नदी कभी छोड़ कर पुराने गांव के दक्षिण में चली गई थी। यानी वर्षों पहले गंगा नदी वर्तमान छाड़न गरैंया तक थी तथा उसके उत्तरी किनारे हमारे पुरखे बसे थे। उसी किनारे पर सतिवारा स्थान है। यह सतिवारा स्थान बाबू शिवशंकर सिंह की पत्नी का स्मारक रूप है जो पति के निधन पर ‘नुनुआ देवी’ सति हो गयी थीं, जहां आज भी हमारे गांव के लोग पूजा पाठ करने जाते हैं। बुर्जुगों का मानना है कि एक हजार वर्ष पहले गंगा नदी सतिवारा स्थान के दक्षिण में बहती हुई वर्तमान आमी गांव में मिलती थी।

 

 

यदि वर्तमान गांव की बात की जाये तो बोधा छपरा गांव के एक किलोमीटर उत्तर अवतार नगर स्टेशन है, जिसे गोराईंपुर गांव के निवासी बाबू यदुनंदन सिंह ने अपने पिता के नाम पर बनवाया था और 1952 से यहां गाड़ी रूकना प्रारंभ हुआ। पुरानी बी एन आर रेलवे अब पक्की सड़क के रूप में सोनपुर छपरा होते हुए गुजरती है, जिसे यह छपरा—सोनपुर राजमार्ग 19 कहा जाता है। यह सड़क हमारे गांव के बीचोबीच होकर गुजरती है और छपरा—सोनपुर की दूरी गांव से लगभग समान है।

खेलकूद और अन्य सांस्कृतिक, सामाजिक ग​तिविधियों के प्रति गांव के नवयुवकों का रूझान शुरू से रहा है। 1960 के दशक में गांव वासियों के सहयोग से एक टूर्नामेंट संचालित था, जिसमें छपरा से सोनपुर तक की टीमें भाग लेती थीं। विजयी टीम को चांदी जड़ित एक शिल्ड प्रदान किया जाता था, जिसपर लिखा होता था, ” बोधा-धर्मनारायण शिल्ड, बोधा छपरा। आगे चलकर कुछ दिनों तक वॉलीबॉल टूर्नामेंट भी कराया जाता रहा, जिसके संचालक स्वर्गीय हरिहर प्रसाद सिंह थे। इस टूर्नामेंट का नाम दिया गया था, श्री हरिगोविन्द सिंह वॉलीबॉल टूर्नामेंट। अंतिम प्रतियोगिता में जीतने वालों को एक चांदी जड़ित कप प्रदान किया जाता था। इस टूर्नामेंट में छपरा से सोनपुर तक की सभी महत्वपूर्ण टीमें भाग लेतीं।

इतना ही नहीं बोधा छपरा में खेलकूद को बढ़ावा देने हेतु एक संस्था स्थापित की गई थी, जिसका नाम था,’बी जी पी किशोर दल।’ बी जी पी का अर्थ था बोधा छपरा, गोराईंपुर, पकवलिया। इन तीनों गांव के खिलाड़ी इस टीम के सक्रिय सदस्य थे। कुछ वर्षों तक खेलने के बाद ये खिलाड़ी जीवन निर्वाह के हेतु नौकरी पेशे मे चले गए। जैसे पंचानंद सिंह – रेल सेवा में, शुभ नारायण सिंह-सैन्य सेवा में, रामसूरत राय- पशुपालन सेवा में डॉक्टर बने, छठीलाल राय रेल सेवा में ड्राईवर बने, राम जनम राय स्वास्थ्य सेवा में कंपाउंडर बने एवं गोराईपुर उप स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थापित रहे। आशय यह है कि गांव के नौजवान जिसे जहां जगह मिला नौकरी में लगे।

गांव के सबसे बुजुर्ग—आर्मी से सेवानिवृत्त 90 वर्षीय रामगोविंद सिंह

 

सेना के आनरेरी कैप्टन शुभनारायण सिंह

…ये हैं पूर्व सैनिक …राष्ट्रपति से प्रशस्ति प्राप्त आॅनरेरी कैप्टन से सेवानिवृत्त हमारे ग्रामीण शुभनारायण सिंह। 15—16 वर्ष की अवस्था में गांव के फुटबॉल मैदान से प्राप्त अपनी प्रतिभा समेटे देश की सेवा के लिए निकल पड़े। 1971 का युद्ध भी लड़े लेकिन गांव के फुटबॉल को नहीं भूले। वही फुटबॉल इन्हें उस मुकाम तक ले गया कि एक साधारण सैनिक के रूप में भर्ती हुए शुभनारायण सिंह सेना के लिए डी आई वी टूर्नामेंट भी खेले, ब्रिगेड भी खेले और कोर टूर्नामेंट का हिस्सा भी रहे। यहां तक की 1995 में कमांड के लिए भी चयनित हुए थे लेकिन रिटायरमेंट करीब था इसलिए उसमें भाग नहीं लिया और आॅनरेरी कैप्टन से सेवानिवृत हो गए। ये सब उसी किशोर दल की बदौलत संभव हुआ जिसने छपरा से सोनपुर तक न जाने कितने फुटबॉल के मैच आयोजित किये होंगे। जी हां बात हो रही बोधा छपरा, गोराईंपुर, पकौलिया यानी बीजीपी किशोर दल की।

आज शुभनारायण सिंह भले ही गांव से दूर हों,मेरठ में रह रहे हों लेकिन बीजीपी किशोर दल और बोधाछपरा गांव आज भी उनके दिल में धड़कता है। अपने जमाने के फुटबॉल के साथियों और और क्लब के विषय में शुभनारायण सिंह इन शब्दों में साझा करते हैं। वे कहते हैं कि, 17 अगस्त,1965 को सेना में भर्ती होने के लिए गांव से निकला। खुशी इस बात की थी कि नौकरी मिल रही है, लेकिन दुख इस बात का था कि संगी-समाजी छूट रह हैं। किशोर दल की चर्चा करते हुए शुभ नारायण सिंह कहते हैं कि किशोर दल (ए और बी) दो किशोर दल था। मैं किशोर दल (बी) में था। किशोर दल (ए) में हमसे  बड़ी उम्र के लोग जैसे सामबहादुर सिंह, अवधेश सिंह, पंचानंद सिंह, ब्रजभूषण सिंह, रामसूरत राया, छठीलाल राय, सामरथ राम आदि प्लेयर खेलते थे। तीनों गांव के लोग किशोर दल ए में भी थे और बी में भी। मैं किशोर दल बी टीम के लिए खेलता था। हमारे टीम में मेरे अलावा रामनारायण सिंह, मुद्रिका सिंह, स्वर्गीय सूरज सिंह, श्रवण कुमार सिंह उर्फ चौबे सिंह, त्रिभुवन सिंह, सुशील सिंह, वीरेंद्र सिंह, त्रिभुवनजीत सिंह, वृजानंद सिंह, ब्रम्हदेव राय दोनो भाई के साथ अन्य ग्रामीण भी खेलते थे। वे कहते हैं कि आर्मी में भी मेरा चयन फुटबॉल की बदौलत ही हुआ था। बहुत कम उम्र में भर्ती हुआ था और जब आॅनरेरी लेफ्टिनेंट और आॅनरेरी कैप्टन बनने की सूचना राष्ट्रपति की तरफ से आया और प्रशस्ति पत्र मिला उस वक्त गांव ही याद आ रहा था, क्योंकि मेरे पते में गांव का नाम दर्ज था।

आगे की पीढी में ब्रह्मा सिंह, त्रिलोकी सिंह, अनिल सिंह उर्फ फतेह बहादुर, त्रिलोकी सिंह,काशीनाथ सिंह, राम नरेश सिंह, जय प्रकाश सिंह, अशोक सिंह, राम विनोद सिंह ,मुन्नू सिंह, डब्लू सिंह, त्रिपुरारी सिंह, कमल किशोर सिंह आदि युवा गंवई फूटबॉल की परंपरा को आगे ले गये। आज भले ही ​किशोर दल खत्म हो गया है लेकिन फुटबॉल, क्रिकेट आदि खेलों का रियाज करते गांव में युवा मिल जायेंगे। हालाकि युवाओं का जुड़ाव खेल के प्रति और उससे उपजी समाजिकता के प्रति कम हुआ है।

 

गांव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में होली का विशेष महत्व रहा है। बोधा छपरा और गोराईंपुर दोनों गांव में होली एक ही तर्ज पर गायी जाती है। होलिका दहन के एक दिन बाद होली की शुरूआत मां अंबिका भवानी के वंदना से शुरू होती। शुरूआती दौर में होली बोधा बाबा के वंशज श्री जगदेव सिंह के दरवाजे पर शुरू होती थी। बाद में धर्मनारायण बाबा के वंशज श्री दुन्य बहादुर सिंह से होली की शुरूआत होने लगी जो परंपरा अभी तक चली आ रही है। सभी ग्रामीण होली में ढोलक,झाल, मृदंग के साथ एक एकत्रित होते। गवैये दो दलों में बंट जाते थे। दो दो ढ़ोलक लेकर दो दल। पुराने लोगों में जगदेव सिंह एवं कंचन सिंह, सुरेंद्र बहादुर सिंह,विन्देश्वरी सिंह, नौबत सिंह, परशुराम सिंह, ​द्वारिका सिंह एवं वीरेंद्र सिंह ढ़ोलक का कमान संभालते। नये लोगों में रामनरेश सिंह,विनोद सिंह,किशोर सिंह आदि ढ़ोलक बजाते हैं। पूरा गांव मिल जुलकर होली गाता और गांव के प्रत्येक व्यक्ति सभी दरवाजे पर जाते और आधी रात के बाद अंतिम दरवाजे से चैता गाकर ही वापस लौटते हैं। इस क्रम में हर दरवाजे पर लोग प्रसाद ग्रहण भी करते हैं।


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शिक्षा के क्षेत्र में प्रकाश स्तंभ के रूप में ‘राष्ट्रीय पुस्तकालय’ के रूप में एक लाईब्रेरी स्थापित थी। इसका भवन स्वर्गीय जयकिशोर सिंह के प्रयास से निर्मित की गई थी जो उन्होंने अपने पैतृक भूमि के एक कट्ठा जमीन दान कर बनवाया था। आगे चलकर पुस्तकालय के विकास के लिए ग्रामीण श्री विश्वनाथ सिंह ने अपने पैतृक भूमि से एक कट्ठा जमीन दान स्वरूप प्रदान किया। पुस्तकालय के विकास में सहयोग और परामर्श देने वालों में गांव के बजुर्ग से लेकर नवयुवक तक सभी शामिल थे।

गांव के नवयुवकों ने दान स्वरूप बहुत सारी पुस्तकें प्रदान की थीं। कुछ स्कूली कक्षा की पुस्तकें भी दान स्वरूप प्राप्त की जाती थीं जिन्हें निर्धन और मेधावी बच्चों को विशेष रूप से हरिजन टोली के बच्चों में वितरित की जाती थीं। इस पुस्तकालय द्वारा समय—समय पर स्कूली बच्चों के बीच संगीत प्रतियोगिता, कविता वाचन, नाटक प्रतियोगिता, वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था, जिसके निर्णायक मंडल में अंबिका उच्च विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री नव​ल किशोर सिंह एवं स्थानीय विद्यालय ​के शिक्षक श्री रामदेव सिंह एवं गोराईंपुर के निवासी कमलेश्वर सिंह अपना बहुमूल्य समय दिया करते थे।

पुस्तकालय के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि यह पुस्तकालय न सिर्फ बोधा छपरा गांव के बल्कि आसपास के गावों के छात्रों का आकर्षण का, उनके बौद्धिक विकास का, सामाजिक चेतना का, एकजुटता का केंद्र हुआ करता था। गणितज्ञ बसिष्ठ नारायण सिंह जिनके बहन की शादी बोधा छपरा गांव में हुई थी और वे जब अमेरिका से वापस आते हैं अपने हम उम्र साथियों के कहने पर गांव के स्कूल में जाते है, लाइब्रेरी में जाते हैं, ओर पुस्तकालय के विजिटर डायरी में लिखते हैं, I visited library and found it in a good shape.

गांव के शैक्षणिक संस्था के रूप में प्राथमिक विद्यालय का विशेष महत्व है। इस प्राथमिक विद्यालय के भवन निर्माण का मार्ग श्री रामसुंदर सिंह एवं श्री रघुवंश सिंह ने जमीन दान देकर प्रशस्त किया। गांव में प्राथमिक विद्यालय का निर्माण 1956 में हुआ था। पड़ोसी गांव गोराईंपुर में बाबू यदुनंदन सिंह ने अपनी जमीन दान देकर प्राथमिक,माध्यमिक एवं उच्च विद्यालय खुलवाया। इतना ही नहीं उन्होंने प्रखंड मुख्यालय दिघवारा में एक लाख रूपये दान देकर वाई एन कॉलेज भी खुलवाया। इस लिहाज से देखें तो गांव व आसपास शिक्षा की बेहतर व्यवस्था रही है।

गांव के पहले स्नातक होने का गौरव स्वर्गीय शंकर दयाल सिंह के नाम दर्ज है। उन्होंने अपनी सभी लड़कियों के पढ़ाई को विशेष तवज्जो दी। उनकी चारों लड़कियां क्रमश: कमल सिंह, भगवती सिंह, पुष्पा सिंह और कुमुद सिंह ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और नारी शिक्षा के अलख को गांव में जलाये रखा।  सभी लड़कियों ने न्यनूतम स्नातक की ​डिग्रियां तो प्राप्त की ही थीं।

ग्रामीणों में सहयोग एवं अर्थलाभ के लिए कुछ चंदे की रकम जुटाकर स्थानीय प्रखंड दिघवारा के प्रखंड विकास पदाधिकारी से सहयोग लेकर एक सहयोगी सिंचाई नलकूप गाड़ने का प्रबंध किया गया। इसके लिए भूमि श्री जगत नारायण सिंह ने दान स्वरूप प्रदान किया। इससे गांव वालों की भूमि की सिंचाई होने लगी और अधिक अन्न उत्पादन होने लगा। इस योजना को सफल बनाने में प्रखंड कार्यालय से संपर्क करने वालों श्री रामअयोध्या सिंह एवं श्याम बहादुर सिंह प्रमुख थे। नलकूप की देखभाल करने हेतु एक समिति बनाई गई थी जिसके प्रथम अध्यक्ष सेवा निवृत पुलिस निरीक्षक श्री रघुवंश प्रसाद सिंह बनाये गये। कुछ वर्षों बाद उनके शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाने पर अवकाश प्राप्त पुलिस दारोगा श्री रामनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाया गया। इस प्रकार नलकूप यानी बोरिंग के महत्व को ग्रामीणों ने समझा और आगे चलकर कई लोगों ने अपना व्यक्तिगत नलकूप लगाने का कार्य किया। तब से अब तक यह गांव उत्तरोतर विकास के पथ पर अग्रसर हो रहा है।

शुरूआती दौर से गांव के बुर्जुगों में आपसी सौहार्द था। कुजन सिंह उर्फ कुजन बाबा की निश्चल हृदय और उसकी पवित्रता की मिसाल दी जा सकती है। इतना ही नहीं कंचन सिंह और दुन बहादुर सिंह में भले ही आपस में मुकद्दमा बाजी थी लेकिन दोनो भाई एक ही हाथी पर बैठ कर अदालत जाते। देवलाल सिंह और गणेश सिंह का भोजन के प्रति लगाव भी खूब प्रचलित रहा है।
कभी-कभार के तनाव को छोड़ दें आज की युवा पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों के पद चिन्हों पर चलते हुए पूरे सौहार्द के साथ गांव को आगे बढ़ाने का हर संभव प्रयास कर रही है। ऐसे में कहा जा सकता है कि भले ही समय की रफ्तार तेज है, बदलाव की बयार भी है, परंपरा छूट भी रही हैं,टूट भी रही हैं लेकिन बोधाछपरा के ग्रामीणों में आज भी आपसी सौहार्द बना हुआ है।

(बोधा छपरा गांव के कहानी की पहली कड़ी।)

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