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परंपराओं को सहेजे आधुनिकता की डगर पर बढ़ रहा है मेरा गांव कुन्नमकुलम

कहते हैं कि हर व्यक्ति का एक गांव होता है और वह चाहे जहां भी चला जाए गांव की पहचान साथ लिये चलता है। कुछ लोग इस पहचान को पीछे छोड़ आते हैं तो कुछ इसे सहेजे हुए गांव की परंपराओं का हिस्सा बनते हैं और ऐसे ही किसी परंपरा किसी परंपरा का हिस्सा बनने …

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ब्रांड और विज्ञापन के पीछे सरपट भागता गांव

मुन्नू से उसकी सखी केश्वरी का हाल पूछा। उसने बताया कई सालों से उसकी भेंट नहीं हुई है। मैंने उसके घर चलने को कहा। वह उदास हो गयी। अब मियांटोली में लोगों का आना जाना कम हो गया है। जबसे नयी सरकार आयी है सबके अंदर हिंदू मुस्लिम की भावना घर कर गयी है। अब …

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मेरा गाँव स्मृतियों के पन्नों में…

अम्मां के गुजरने के 6 साल बाद 2019 में मैं अपनी बहन बीना के साथ अपने गाँव चैनपुर गई थी। मुझसे मिलने मेरी दो भतीजियाँ भी अपनी ससुराल से आ गयी थीं। मैं दिनभर गाँव की सुनसान गलियों में अपनी यादों में बसे उस गाँव की चहल पहल को तलाशती रहीं जो न जाने कहाँ …

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पैतृक गॉंव चमथा में बीते बचपन के दिन भी क्या दिन थे

वैसे तो मेरा जन्म 1958 में सीवान जिला के रघुनाथपुर के पुलिस क्वार्टर में हुआ लेकिन पूरा बचपन पैतृक गॉंव चमथा में बीता। पिताजी स्व. रामराज सिंह पुलिस अफसर थे और मेरे जन्म के समय रघुनाथ पुर में पोस्टेड थे। माँ शिवदुलारी देवी गृहिणी महिला थीं। मैं चार भाई और एक बहन में दूसरे नंबर …

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पैतृक गाँव चमथा के लिए अपनी जवाबदारी

हर व्यक्ति की एक कहानी होती है। उस कहानी में एक घर और गाँव होता है। मेरे पैतृक गाँव का नाम है चमथा। धार्मिक किंवदंतियों के अनुसार त्रेता युग में मिथिला के राजा महाधिराज राजा जनक यहाँ गंगा स्नान करने के लिए आते थे। यहीं से गंगाजल राज दरबार में जाता था। उसी से जानकी …

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बदलाव के विभिन्न पड़ावों से गुजरता मेरा गांव अमृत पाली

  मेरा गांव उत्तर प्रदेश के पिछड़ा समझे जाने वाले पूर्वांचल के ए​क जिले, बलिया, में पड़ता है। नाम है अमृत पाली, बलिया शहर के पूरब। नजदीकी कदमतला रोड, जिससे होकर गुजरने वाली मांझी-बलिया सड़क सीधी शहर को जाती है, से उत्तर दिशा में लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर मेरे गांव की सीमा शुरू …

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बदलते हुए गांव में ढ़ीली पड़ती संबंधों की गांठ

पिता एन सी श्रीवास्तव मध्य प्रदेश कैडर के इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी थे। बचपन लुटियन की दिल्ली में पुराने भाजपा दफ्तर के सामने 6 अशोक रोड में ही गुजरा। स्कूल से लेकर कॉलेज तक सब दिल्ली में। कॉलेज की पढ़ाई भी दिल्ली विश्वविद्यालय कॉलेजों में हुई। 1961 में यशवंत सिन्हा से शादी हुई जो …

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सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार और पुरखों की परंपरा को सहेजे आगे बढ़ रहा है गांव बोधाछपरा

ठीक ही कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांव में निवास करती है। व्यक्ति अपने जीवन की उपलब्धियों का मूल्यांकन गांवो में अपने आरंभिक जीवन की शुरूआत में करना शुरू करता है एवं अपने जीवन की विविध पहलुओं का विवेचन करते समय गांव के संस्कार,सामाजिक सरोकार, प्रचलित रीतियां एवं प्रयासों का भी समुचित ध्यान …

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बदलते समय के साथ पीछे छूटती परंपरायें, लेकिन बरकरार है बोधा छपरा के ग्रामीणों में अपनत्व

बिहार के सारण जिले ​में दिघवारा प्रखंड के अंतर्गत अवस्थित ग्राम बोधा छपरा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। शक्ति् पीठ अंबिका स्थान इस गांव की सीमा में पूर्वी छोड़ पर विद्यमान है। गांव का नाम यहां के ही एक ग्रामीण श्री बोधा सिंह के नाम पर पड़ा है। बोधा सिंह दो भाई थे। बड़े भाई …

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गांव बभंडी के यात्रा के बहाने पैतृक गांव श्रीपाल बसंत की यादें

मैं कभी गांव में नहीं रहा। मेरा घर छपरा शहर में है और बचपन में जब कभी गांव (श्रीपाल बसंत) गया तो रात में लौट आया। वह भी तब जब स्टेशन, अवतारनगर कई कोस दूर था और पैदल चलने के अलावा कोई साधन नहीं होता था। आने-जाने के लिए ट्रेन का कोई विकल्प नहीं था। …

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