सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार और पुरखों की परंपरा को सहेजे आगे बढ़ रहा है गांव बोधाछपरा

राम किशोर सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता (पटना उच्च न्यायालय)

ठीक ही कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांव में निवास करती है। व्यक्ति अपने जीवन की उपलब्धियों का मूल्यांकन गांवो में अपने आरंभिक जीवन की शुरूआत में करना शुरू करता है एवं अपने जीवन की विविध पहलुओं का विवेचन करते समय गांव के संस्कार,सामाजिक सरोकार, प्रचलित रीतियां एवं प्रयासों का भी समुचित ध्यान रखता है। अपने जन्म के समय से लेकर गांव में ली गई शिक्षा, खेल-कूद, पर्व त्योहार एवं गांव से जुड़े महान व्यक्तित्वों के जीवनवृत का विश्लेषण करना भी नितांत आवश्यक होता है। ऐसा ही जीवनवृत मेरा भी है, जो मेरे गांव बोधाछपरा के संदर्भ मे समीचिन है।
सारण जिला में दिघवारा प्रखंड के वर्तमान रामपुर आमी पंचायत में अवस्थित बोधाछपरा गांव जो वर्ष 2000 के परिसीमन के पूर्व ग्राम पंचायत राज बोधाछपरा के नाम से प्रचलित था। परिसीमन के पहले जो पंचायत था, उसमें बोधाछपरा के अलावा गोराईंपुर,पकवलिया,फकुली और पुरूषोत्तम पुर गांव का कुछ हिस्सा आता था। लेकिन नये परिसीमन में जो पंचायत बनी हैं उसमें फकुली,पकवलिया कट गये हैं और नये गांव आमी और मथुरापुर जुड़े हैं। पंचायत का नाम बदलकर रामपुर आमी पंचायत हो गया है। गांव का रकबा लगभग 800 बीघे का होगा। आबादी लगभग 2000 होगी।

 वैसे तो बोधा छपरा राजपूत बहुल गांव है लेकिन इस गांव में राजपूतों के अलावा 3 घर बढ़ई, लगभग 12 घर कानू, 2 घर हजाम, 1 घर यादव, 1 घर डोम और लगभग 10 घर तेली के साथ हरिजनों की अच्छी खासी आबादी है। यादव और तेली को छोड़ बाकी जातियों के लोग गांव के ही हमारे पुरखों में से अलग-अलग परिवारों द्वारा दान की गई जमीन पर बसाये गये हैं। हालांकि समय के साथ ये संपन्न भी हुए और कुछ जमीनों की खरीदारी भी इन लोगों द्वारा की गई और अपनी जरूरतों के हिसाब से आवास का निर्माण हुआ। तेली परिवारों के पास आवास के अलावा खेती की परंपरागत जमीन भी रही है। इनमें से कुछ परिवारों ने अपनी पैतृक आवास के साथ खेती की जमीन भी अपनी सुविधानुसार ग्रामीणों को बेच दिया है। हालांकि पटना में इनके पास अच्छा खासा व्यवसाय है और संपन्न व्यवसायी कहे जा सकते हैं। इसी तरह गांव के बढ़ई परिवार बंगाली ठाकुर के पुत्रों में से शिवनाथ शर्मा वगैरह मुंबई में रहते हैं जिनका काम काज अच्छा है और अच्छी आमदनी करते हैं।

गांव का प्राथमिक विद्यालय

गांव के अन्य परिवारों के बच्चों के साथ ही मैंने भी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गांव के ही प्रा​थमिक विद्यालय बोधा छपरा में ही प्राप्त की। शुरू में हमारे गांव में एकमात्र प्राथमिक विद्यालय था। हालांकि आज दो प्राथमिक विद्यालय हो गए हैं। एक प्रमुख अंतर यह भी आया है​ कि पहले जो प्राथमिक विद्यालय था उसका भवन खपरैल था, लेकिन आज विद्यालय का भवन छतदार दो मंजिला हो गया है। जहां तक शिक्षा का सवाल है उस समय शिक्षक और छात्रों के बीच शिक्षा को लेकर उत्सुकता थी, छात्र भी अपने शिक्षक से नित दिन नये चीज ​सीखने को उत्सुक थे। कुछ नया कर दिखाना चाहते थे और शिक्षक भी पूरी छात्रों को पूरी निष्ठा से पढ़ाते थे। आज के ​परिवेश में ठीक उसके उलट हो रहा है। विद्यालय में छात्रों की उपस्थिति कम हो गई है। भले ही प्राथमिक विद्यालय की संख्या एक के बजाय दो हो गई। शिक्षकों की संख्या भले बढ़ गई हो लेकिन शिक्षा का अपेक्षित प्रसार नहीं हा पाया है। ये परिस्थिति इसलिए बनी है क्योंकि छात्र अपने अभिभावकों के दबाव में सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़ निजी स्कूल में जाने लगे हैं।  गांव के विद्यालय पर अभिभावकों का ध्यान न के बराबर है। फलस्वरूप शिक्षक स्वच्छंद होते चले गए और आज जो नाम मात्र के छात्र विद्यालय में उपस्थित होते भी हैं उनपर शिक्षकों का ध्यान न के बराबर है। कहने को तो विद्यालय शिक्षा समिति का गठन भी हो गया है लेकिन शिक्षा समिति भी अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करने में असमर्थ रही है, कारण चाहे जो भी हो।

प्राथमिक विद्यालय में झंडोत्तोलन करते ग्रामीण पशुपति नाथ सिंह

मुझे आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का वह दिन याद है, जब मैं अपने गांव के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता था। उस समय हमारे सहपाठियों में उस दिन के लिए गजब की उत्सुकता होती थी। सुबह-सुबह उठकर गांव के चारो ओर प्रभात फेरी करना, प्रभात फेरी के पश्चात झंडोतोलन, राष्ट्रध्वज एवं पुरस्कार वितरण तथा दिनभर झंडे की रखवाली करते हुए भोटवा आम पर दोल्हा पाती खेलना। ये परंपरा आज भी जारी होगी,अलबत्ता उत्साह में थोड़ी कमी जरूर आयी है।

जहां तक परंपरा के निर्वहण की बात है तो हमारे गांव में होली के दिन गजब का उत्साह हम बच्चों के होता था। होली की वह हुल्लड़बाजी आज भी मेरे जेहन में बरकरार है, जब हम एक टोला से दूसरे टोला होली का हुड़दंग मचाते रहते थे,तथा तरह-तरह के पकवान एक दूसरे के घर खाते रहते थे। होली खेलने के बाद सभी लोग नहा धोकर नये कपड़े पहनकर अबीर लेकर सभी बड़ों के पैर पर अबीर रखकर उनका आर्शीवाद लेते। खैर यह परंपरा आज भी बरकरार है, हां शहरी रहन-सहन के चलते कुछ ह्वास हुआ है।

गांव के ही शंकरदयाल सिंह के घर पर सभी ग्रामीणों का एकत्रित होना, वहां सबों पर पिचकारी से रंगों की बरसात, तत्पश्चात वहीं से होली गीत की शुरूआत जो गांव के सभी लोगों के दरवाजा पर होते हुए रात्रि के 12 बजे तक होली गीत चलता तथा प्रत्येक दरवाजे पर प्रसाद के रूप में पंचमेवा, लड्डू एवं बतासा का वितरण बच्चों के आकर्षण का विशेष केंद्र था। उस समय के शरारती बच्चे प्रसाद वितरण के समय यदा-कदा अपनी कलाकारी दिखा दिया करते थे। मसलन प्रसाद वितरण के लिए कुछ लोग चिन्हित थे, जो बच्चों को काबू में रख सकें। जैसे कि बैजनाथ चाचा, जो पेशे से शिक्षक और स्वतंत्रता सेनानी भी थे, उनका बच्चों पर नियंत्रण था, इसलिए टड़वा टोला में प्रसाद का वितरण उन्हीं के जिम्मे होता था, फिर भी शरारती बच्चे उनके सामने भी अपनी कलाकारी दिखा ही दिया करते थे।

 

होली गीतों के विविध रंगों की बात की जाये तो हमारे गांव में आम तौर पर होली पूरे महीने  लोग एक दूसरे के बुलावे पर जाकर गाते ही हैं, लेकिन होली वाले दिन शाम को प्रत्येक दरवाजे पर होली होती है। इस दौरान आम तौर पर कोशिश ये होती है कि अपने पूर्वजों द्वारा गायी जाने वाली होली को उस परिवार का कोई न कोई सदस्य उठाता है और उस बुजुर्ग को याद भी करता है कि फलां चाचा या बाबा इस होली को जैसे .. राजेंद्र सिंह गाते थे….पूजत गौरी..पूजस गौरी…वन में महादेव…पूजस..गौरी..हमने उस परिवार के किसी न किसी सदस्य को यही होली उठाते अक्सर सुना है…इसी तरह हरी चा उठाते थे..वंदनी..वंदनी..वंदनी….अंबिका जी भवानी के वंदनी… स्व.अवधेश सिंह को यह कहते हुए कि हरी बाबा गाते थे। स्व. जयगोविंद सिंह गाते थे….सोनपुर में होली खेले महादेव….सोनपुर में होली..खेले..। उस परिवार के सदस्य को अनगिनत बार ये होली उठाते सुना है..।

स्व. राजनारायण सिंह ….हे जगदंबा, हे जगदंबा..हे जगदंबा..हे जगदंबा….खेले फाग…जोगन संग लिए जगदंबा खेले फाग.. जोगन संग लिए जगदंबा…. खेले फाग ही गाते थे। हमसे थोड़े ही उम्र में बड़े अरविंद सिंह को नकभेषर कागा ले भागा हो संईया अभागा ने जागा..इसी तरह स्वर्गीय राजेश्वर सिंह गाते थे..आहो बंगला में उड़े ला अबीर हो लाला बंगला में उड़त अबीर…हरियर लाला…. बंगला में उड़त अबीर. काशीनाथ सिंह अपने बाबा की होली .होली खेले रघुवीरा..केकरा हाथे कनक पिचकारी..केकरा हाथे अबीर … किसी घर में यदि नयी भौजाई हो तो .. या भईया नहीं आये हों घर तो फिर याद पार केबयरी बलमु घर ना अईलें….हो राम बैरी बलमु घर…ना अईले….या महुआ बिनन हम न जाईब हो राम देवरु के संगवा…इसी तरह किसी की शाली की शादी हमारे गांव में ही हो तो फिर उनके द्वार जब होली हो तो कांचे करैली नईहरवा या.ललका पियरका हई पेन्हनि बहुत दिन….सुगापंखिया हम रंगाईब हो राम. या फिर हमरा के लेके निकल जईह भौजो जैसे रोचक, रसीले गीत..जिसमें भदेस तो है लेकिन भाव भी है..एक दूसरे से जुड़़ने का। एक दूसरे के सुख-दुख में काम आने का। पीढी दर पीढी परंपरा को जीवित रखने का। ग्रामीणों के लिए होली न सिर्फ परंपरा के निर्वाह का नाम है, बल्कि गांवके सामाजिकता को भी बरकरार रखने का बेहतर जरिया। इस तरह हमारे पूर्वजों ने लोकबोली, लोक परंपरा लोकगीत को अपने आने वाले पीढी को सौंपा ये परंपरा अभी भी जारी है।

ये बात और है कि अब न वो लोग रहे और न वो समय रहा, फिर भी परंपरा का निर्वहण आज भी किसी न किसी रूप में हो रहा है, हां उत्साह में कमी जरूर आ गई है।

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 के उत्तर तथा अवतार नगर रेलवे स्टेशन के ​दक्षिण दिशा में अवस्थित हमारा गांव कई दशकों से शिक्षा के प्रति जागरूक रहा है, फलस्वरूप गांव के लोगों ने विभिन्न प्रकार के सरकारी पदों पर अपनी सेवायें दीं। अपने कार्यशैली से अपने-अपने विभाग में ख्याति अर्जित की। उदाहरण् के लिए स्व शिवदयाल सिंह, स्व. रघुवंश प्रसाद सिंह, स्व. जगत नारायण सिंह, स्व. रामनाथ सिंह, स्व. कैलाशपति सिंह, स्व रामदयाल सिंह, स्व विधि दयाल सिंह, ​स्व. सच्चिदानंद सिंह, स्व ब्रजनंदन सिंह, स्व राम ध्यान सिंह, स्व दुर्गा प्रसाद सिंह, स्व. राजेश्वर सिंह स्व. शिवपूजन सिंह, स्व. सकलदीप नारायण सिंह, स्व जय किशोर सिंह, स्व ​श्रीगोविंद सिंह एवं उस दौर के अन्य पुरखों का नाम सादर स्मरणीय है। आप इसी से समझ सकते हैं कि राजपूत बहुल इस छोटे से गांव में लगभग हर घर में कुछ लोग सरकारी सेवा में रहे ही है।

बिजेन्द्र सिंह, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, आर आर एम कैम्पस, जनकपुर धाम (नेपाल) में भूगोल के एसोसिएट प्रोफेसर से सेवानिवृत्त हैं।

 

नयी पीढ़ी अपने पुरखों के नाम और काम को आगे ले जाने का हर संभव प्रयास कर रही है और गांव में प्रोफेसर,इंजीनियर,डॉक्टर,वकील,शिक्षक,पुलिस बल,सैन्य सेवा एवं अन्य सरकारी,गैर सरकारी सेवा में रहकर ग्रामीण अपना-अपना योगदान दे रहे हैं। प्रमोद कुमार सिंह गांव को याद करते हुए कहते है कि जब मैं 1984 में मात्र 19 वर्ष का था उसी समय पढ़ाई लिखाई के सिलसिले में गांव से शहर आ गया था। विगत माह नवंबर में मेरा गांव जाना हुआ। इस दौरान पुराने दोस्त, वरिष्ठ चाचा, बाबा और भैया सब खुशी से मिले, स्नेह जताया और कुशल क्षेम पूछा। लेकिन मुझे एक ही कमी खली। मुझे उस फूटबॉल के मैदान की कमी खली जहां मैं खेला करता था, वहां अब कोई बच्चा खेलता नजर नहीं आया।

पूर्व दिघवारा प्रखंड प्रमुख सरिता देवी एवं पूर्व मुखिया राकेश कुमार सिंह

दो टर्म मुखिया और पिछले टर्म में दिघवारा प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि रहते ग्रामीण राकेश कुमार सिंह ने गांव में विकास कार्य को आगे बढ़ाने का हर संभव प्रयास किया है ओर जन सरोकारों के प्रति सचेष्ट रहे हैं।  कुछ ग्रामीणों ने ईंट-भटठे और अन्य तरह के ग्रामीण रोजगार के जरिए भी अपनी पहचान बनाई है। हमारे ग्रामीण कंचन सिंह के परिवार के कुछ लोग पड़ोसी देश नेपाल में भी निवास करते हैं और वहां उनकी खेती बारी भी है।

नेपाल में हमारे ग्रामीण स्व कंचन सिंह और उनके परिवार का गंवई घर

गांव में धनखेती न होने के कारण हमारे गांव के ज्यादातर परिवारों के पुरखों ने निर्मली में धान के लिए खेत खरीदा था और दो तीन दशक पहले तक वहां से चावल और चूरा आता था। लेकिन समय के साथ दूरी होने के कारण सभी लोगों ने वहां की जमीन हटा दी। स्वर्गीय कैलाशपति सिंह व स्वर्गीय प्राणपति सिंह के परिवार के पास आरा जिले के खरौनी गांव में भी खेती थी। आज भी वहां उनके परिवार के कुछ लोग निवास करते हैं और खेतीबारी को सहेजे हुए हैं।

गांव के बीचोबीच स्थित वन​शक्ति मंदिर भी ग्रामीणों की आस्था का केंद्र विंदू है। यहां प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी के दिन वार्षिक पूजा का आयोजन ग्रामीणों के आपसी सहयोग से किया जाता रहा है, जिसमें सभी ग्रामीण उत्साह पूर्वक हिस्सा लेते रहे हैं। पूजा के पश्चात प्रसाद वितरण एवं उसी दिन होली गायन का शुभारंभ किया जाता रहा है। न सिर्फ बोधा छपरा के बल्कि बगल के गांव पकवलिया और गोराईंपुर के लोग भी इस वार्षिक पूजा में शरीक होते हैं।
बोधाछपरा ढ़ाला पर विशालकाय हनुमान मंदिर भी ग्रामीणों एवं ट्रक बस चालकों की आस्था का केंद्र विंदू है। यहां के पुजारी नवल बाबा हैं जो आज भी सुबह शाम मंदिर में पूजा पाठ करते हैं। बोधाछपरा हनुमान मंदिर में ग्रामीणों की आस्था जाग्रत करने में स्व राजेश्वर प्रसाद सिंह का विशेष योगदान रहा है।
हरिजन बस्ती में अवस्थित डिहवारिन कें मंदिर में भी ग्रामीणों के सहयोग से प्रत्येक वर्ष सावन महीनें मे सावनी पूजा होती है, जिसमें सभी ग्रामीण विशेषकर हरिजन बस्ती के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 के दक्षिण में गंगा नदी बहती है, जो आज कल कटाव के वजह से सड़क के नजदीक आ गई है। गंगा नदी ने भले ही ग्रामीणों के जोत को कम कर दिया है लेकिन युवाओं को रोजगार देने में सहायक सिद्ध हो रही है। यहां पूरे बिहार से बालू के व्यवसायी आने लगे हैं और अवैध बालू का कारोबार जो सोन नदी से यहां नाव के जरिए आता है और ट्रक के जरिए बिहार उत्तर प्रदेश के अलग-अलग ईलाकों में पहुंचाया जाता है, फलफूल रहा है। गांव के कई युवा भी बालू के कारोबार में लग गये हैं और जिन लोगों का जमीन नदी के किनारे है,उनके लिए अतिरिक्त आय का जरिया भी बना है। कहने का आशय है कि न सिर्फ बोधा छपरा बल्कि जिला-जवार के अन्य गांवों के बेरोजगार युवाओं को रोजगार प्रदान करने का बेहतर जरिया बन गया है। जुलाई से लेकर अक्टूबर तक जब गंगा चढ़ान पर होती है, यह स्थल व्यवसायिक हब के रूप में काम करता है। उस दौरान लोग बालू स्टॉक करते हैं और साल भर स्टॉक किये गये बालू के जरिए कुछ न कुछ अतिरिक्त आय का उपार्जन करते रहते हैं।

परंपरागत कुओं को बिसरा.. हर घर नल जल तक सरपट दौड़ता बोधा छपरा,गोराईंपुर और पकौलिया गांव का जल ऑडिट

हालांकि इन सब के बावजूद भारत के अन्य गांवों की तरह हमारा गांव भी कृषि प्रधान गांव ही कहा जायेगा, क्योंकि लोग अभी भी प्रत्यक्ष रूप से कृषि कार्य से जुड़े हुए हैं। गंगा के कटाव में कृषि भूमि के समा जाने के कारण खेती के प्रति थोड़ा आकर्षण कम जरूर हुआ है और बढ़ते परिवार के कारण कृषि जोत में भी कमी आई है, बावजूद इसके लोग अपने पुरखों के खेती-किसानी की परंपरा को पूरी शिद्दत के साथ न सिर्फ बचाये हुए हैं बल्कि सीमित जोत के बावजूद न सिर्फ खाने लायक परंपरागत अनाज उगाते हैं बल्कि सब्जियों के खेती और वैज्ञानिक तरीके से नकदी कृषि के जरिए उसे आगे भी बढ़ा रहे हैं।

गांव की कहानी के क्रम को बिना स्व .श्रीकांत सिंह उर्फ मुन्ना सिंह, सुपुत्र
सेवा निवृत पुलिस दारोगा स्व दुर्गा प्रसाद सिंह के चर्चा के पूरी नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए क्योंकि गांव में क्रिकेट के खेल का आरंभ करने का श्रेय स्व मुन्ना जी जिनको हमलोग सस्नेह ब्रेडमैन कहते थे, को जाता है। मुन्ना जी में गजब का जुनून था, क्रिकेट खेलने का और टीम तैयार करने का…मानो अपने नाम को चरितार्थ कर रहे हों। कभी-कभी उनको बच्चों के अभिभावकों का कोपभाजन का शिकार भी होना पड़ता था, लेकिन यह भी सच्चाई है कि उसी व्यक्ति के प्रभाव से बोधाछपरा व पड़ोसी गांव गोराईंपुर में क्रिकेट क पदार्पण हुआ। हमलोगों को भी उनके नेतृत्व में खेलने का मौका मिला है और गांव की आज की पीढ़ी जो किक्रेट खेल रही है,टूर्नामेंट करा रही है, जीत रही है, दाव लगा रही है, और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं, उसमें मुन्ना जी का बहुत योगदान है क्योंकि नीव के पत्थर को न बिसराने की परंपरा ही नये ईमारत के निरंतर फलने-फूलने व आगे बढ़ते जाने का आधार तैयार करती है और नये प्रतिभाओं के सृजन का मूलाधार होती है।

इतना ही नहीं इस सं​किल्पित युवा के संकल्पों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। आज नीति निर्माता गांव में हस्तकौशल के विकास और रोजी रोजगार की बात पुरजोर तरीके से करते दिख रहे हैं। लेकिन आज से लगभग 4 दशक पहले ये कहानी शुरू होती है बोधा छपरा से।

एक तरफ क्रिकेट का जुनून और दूसरी तरफ गांव में रोजगार सृजन की महत्वाकांक्षा। चिर युवा श्रीकांत सिंह उर्फ मुन्ना जी बनारस की ओर जाते हैं। वहां से हस्तकरघा का काम सीखकर, यहां  गांव के अपने घर में हस्तकरघा उद्योग स्थापित कर, कालीन बुनाई का कार्य भी शुरू किया तथा कालीन की आपूर्ति भी कुछ दिनों तक की, भले ही उस व्यवसाय से उन्हें विशेष लाभ नहीं मिला, लेकिन उन्हीं का अनुकरण कर या कहूं उन्हीं की प्रेरणा से घर-घर कालीन बनुाई का कार्य प्रारंभ हुआ। पावरलूम के युग में जब हैंडलूम यानी हस्त करघा उद्योग अपने मूल स्थान यानी बनारस में दम तोड़ रहा है और कारीगर परेशान हैं तो भला बनारस से लगभग 500 किलोमीटर दूर बोधा छपरा गांव कहां से सफल होता। बावजूद इसके बोधा छपरा, गोराईंपुर,आमी या कहा जाये तो पूरे जवार के अलग-अलग गांवों में क्रिकेट खेल के सूत्रधार और गांव बोधा छपरा में कालीन बुनाई के जरिए रोजगार सृजन के अगुआ रहे चिर युवा स्व श्रीकांत सिंह के जुनून के भला कैसे भुलाया जा सकता है।

अंतत: यह कहा जा सकता है कि बोधा छपरा गांव का चहुंमुखी विकास हुआ है, हो रहा है और भविष्य में भी होगा। यदि पंचायत स्तर की संस्थायें और जन प्रतिनिधियों की नीयत सही रही तो गांव को आदर्श गांव के रूप में स्थापित होने में कोई रूकावट नजर नहीं आती। इस बीच व्यक्तिगत स्वार्थ की वजह से लोगों के बीच आपसी कटुता बढ़ती जा रही है जो भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। अलबत्ता सामाजिक सरोकार आज भी कायम है। कुल मिलाकर गांव का सर्वांगीण विकास हुआ है और उम्मीद है कि आगे भी यह क्रम जारी रहेगा।
(बोधा छपरा गांव के कहानी की दूसरी व अंतिम कड़ी। )

बदलते समय के साथ पीछे छूटती परंपरायें, लेकिन बरकरार है बोधा छपरा के ग्रामीणों में अपनत्व


बोधा छपरा गांव के कहानी की पहली कड़ी

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