गांव सोनाड़ी..सामाजिक सौहार्द का नमूना लेकिन महात्मा गांधी के सपनों के गांव से काफी दूर

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रामबहादुर राय

इस समय सत्ता का केंद्र बिंदु दिल्ली, कोलकाता या मुंबई अर्थात बड़े नगरों में है। मैं उसे भारत के सात लाख गांवों में बांटना चाहूंगा। अपनी इस आकांक्षा को महात्मा गांधी ने अमेरिकी पत्रकार लुई फीशर को बताया। आजादी के तत्काल बाद की यह बात है। ‘महात्मा गांधी के साथ एक सप्ताह’ नामक पुस्तक में यह दर्ज है। भारतीय राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना का जब भी सवाल आता है तो इसे हमेशा याद किया जाता है। आज भी यही वह मानक है जिससे राज्य व्यवस्था को आंका, जांचा और परखा जा सकता है।
घोर आश्चर्य और गहरे अफसोस की बात यह है कि महात्मा गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी पंडित जवाहरलाल नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव में इसका उल्लेख भी नहीं है। संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसंबर, 1946 को उन्होंने प्रस्तुत किया था। उसमें लोकतंत्र के लक्ष्य की घोषणा जरूर थी, लेकिन स्वतंत्र भारत में गांवों का स्थान, सरकार में उनकी भूमिका और भारतीय गांवों के परिप्रेक्ष्य में स्वराज्य का अर्थ आदि विषयों का संकेत भी नहीं था। महात्मा गांधी ने 31 दिसंबर, 1947 को हरिजन में लिखा कि संविधान में पंचायतों और विकेंद्रीकरण का उल्लेख नहीं है। हमारी स्वतंत्रता में लोगों की आवाज के प्रतिघोष का संकेत पाने की इच्छा हम रखते हैं तो इस क्षति के प्रति अविलंब ध्यान देना आवश्यक है। पंचायतों के पास जितनी अधिक सत्ता होगी, उतना लोगों को लाभ होगा। महात्मा गांधी ने जब इसे लिखा, तब तक संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव पारित हो गया था।
संविधान का प्रारूप 4 नवंबर, 1948 को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया। उसमें परिवार, गांव और पंचायत का कहीं भी उल्लेख नहीं था। संविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेंद्र प्रसाद ने सबसे पहले इस भूल को पकड़ा। उन्होंने कहा कि संविधान के प्रारूप में संशोधन करना चाहिए। संविधान को गांव से शुरू करके केंद्र तक पहुंचना चाहिए। इस देश में आज तक गांव ही बुनियादी इकाई रहे हैं और आगे भी रहेंगे। प्रारूप प्रस्तुत करते हुए डा. अंबेडकर ने जो तथ्य और तर्क दिए, उसे सदस्य पचा नहीं पाए। उन पर तीखे तर्कों के बाणों की भयंकर बौछार सदस्यों ने की। संविधान सभा की कार्यवाही के शब्द चित्र यही बताते हैं। दो प्रश्न थे। पहला कि सरकार का स्वरूप क्या होगा? दूसरा कि उसके लिए किस प्रकार की संवैधानिक व्यवस्था की गई है। सदस्यों ने संविधान सभा के प्रारूप पर प्रश्न उठाए। जो केंद्रीयकरण का संदेश लिए हुए थे। सदस्य लोकतंत्र को व्यापक बनाना चाहते थे। इसलिए ग्राम स्वराज्य को साकार करने के लिए पंचायत प्रणाली आधारित राज्य व्यवस्था के तर्क एक के बाद दूसरे सदस्य देते रहे।

ज्यादातर सदस्यों ने डा. भीमराव अंबेडकर के भाषण के इस अंश को अत्यंत आपत्तिजनक माना कि हमारे ग्राम हैं क्या? ये कूप मण्डूकता के परनाले हैं, अज्ञान, संकीर्णता एवं सांप्रदायिकता की काली कोठरियां हैं। मुझे तो प्रसन्नता है कि संविधान के प्रारूप में ग्राम को अलग फेंक दिया गया है और व्यक्ति को राष्ट्र का इकाई माना गया है। इससे सभा में उत्तेजना की लहर पैदा हो गई। बहुत तीखी बहस छिड़ी। जवाहरलाल नेहरू को हस्तक्षेप करना पड़ा। हालांकि जो प्रश्न खड़े हुए थे उसका उन्होंने सीधा उत्तर नहीं दिया। लेकिन संविधान सभा में 8 नवंबर, 1948 को अपने लंबे भाषण से उन्होंने अनेक संदेश दिए। उनके भाषण का प्रासंगिक अंश इस प्रकार है-हम लोग, जो यहां सभा में समवेत हैं, अवश्य ही भारतीय जनता के प्रतिनिधि हैं, पर इस संविधान के अधीन नया चुनाव होने के बाद, जिसमें हर बालिग नर-नारी को मतदान का अधिकार होगा, जो सभा बनेगी-उसका नाम कुछ भी हो-वह वास्तविक प्रतिनिधि-मूलक सभा होगी, जिसमें प्रत्येक वर्ग के लोग आएंगे। यह उचित है कि इस प्रकार निर्वाचित सभा को यह अवसर मिलना चाहिए कि वह संविधान में इच्छानुसार परिवर्तन कर सके और संविधान के अनुसार उसको अवश्य ही यह अधिकार दिया जाएगा।

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अपने संविधान को किसी भी हालत में ऐसा अपरिवर्तनशील नहीं बनाना चाहिए जिसमें परिवर्तित स्थितियों के अनुसार आसानी से अनुकूल परिवर्तन किए ही नहीं जा सके। खासतौर पर आज जबकि समस्त विश्व घोर विप्लव की दशा में है और हम एक द्रुतग्रामी परिवर्तन काल से गुजर रहे हैं, आज हम जो करते हैं, वह हो सकता है कि कल के लिए उपयोगी न हो। इसलिए हमें अपने संविधान को यथासंभव ठोस और बुनियादी तो बनाना ही चाहिए किंतु साथ ही इसे लचीला भी रखना चाहिए और हमें ऐसी सुविधा होनी चाहिए कि हम इसमें आसानी से संशोधन कर सकें। उनका कथन आज भी प्रासंगिक है। वह इस अर्थ में है कि अगर वर्तमान लोकसभा चाहे तो जो भूल हो गई थी, उसे सुधार सकती है। यह मानना उससे भी बड़ी भूल होगी कि 73वें संविधान संशोधन से पंचायत की वह कल्पना साकार हो गई है जिसका सपना महात्मा गांधी ने देखा था।

संविधान सभा में हुई पंचायत संबंधी उस बहस में ज्यादातर सदस्यों ने कहा कि संविधान का प्रारूप अभारतीय है। संविधान को पिरामिड आकार का होना चाहिए। इसकी आधारशिला ग्राम पंचायतें होंगी। महावीर त्यागी ने कहा कि डा. अंबेडकर को पता ही नहीं है कि स्वतंत्रता के आंदोलन में गांवों ने कितना बलिदान किया है। एक सदस्य ने पूछा कि व्यक्ति को संविधान में इकाई बनाया गया है वह व्यक्ति गांवों को छोड़कर कहां मिलेगा? एक स्वतंत्र देश का संविधान स्थानीय स्वराज्य की नींव पर निर्मित होना चाहिए। यह इस संविधान में दिखाई नहीं दे रहा है। संविधान में स्थानीय स्वराज्य को शामिल करना होगा। दो अत्यंत महत्वपूर्ण बातें सामने आई। पहली यह कि संविधान के प्रारूप में ही दोष है। दूसरी बात कि प्रारूप बनाने वालों को यह जानने की कोशिश करनी चाहिए थी कि प्राचीन भारत में हमारा राज्यतंत्र किस प्रकार स्वायत्त और आत्मनिर्भर गांवों के आधार पर रचा गया था। उनके कारण ही कैसे हमारी संस्कृति युगों-युगों से बनी हुई है। इसे जानने के लिए डा. काशी प्रसाद जायसवाल और श्री अरविंद की पुस्तकों को पढ़ने की सलाह दी गई।
डा. भीमराव अंबेडकर ने बहस का जबाब देते हुए लंबे भाषण में स्पष्ट किया कि शासन प्रणाली की दृष्टि से भारत का संविधान संसदीय लोकतंत्र की स्थापना करता है। जो सदस्य गांधी विचार आधारित शासन प्रणाली बनाने के पक्षधर थे, वे चाहते थे कि गांव सभा का चुनाव वयस्क मताधिकार पर हो। राज्य और केंद्र के लिए चुनाव परोक्ष हो। बहस के बीच एक ही तरह के कई संशोधन दिए। बिना देर किए बेहिचक डा. अंबेडकर ने सभा को यह कहकर चैंका दिया कि मैं संशोधन को स्वीकार करता हूं। इससे संविधान में पंचायत का प्रावधान हो सका। पंचायत के प्रश्न पर मतदान में जाने की जरूरत नहीं पड़ी। इस तरह बीच का एक रास्ता संविधान सभा में निकला। इससे अनुच्छेद 40 में पंचायतों का उल्लेख हो गया। यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य सरकारें ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएंगी। उन्हें ऐसी शक्तियां और अधिकार प्रदान करेगी जिससे वे स्वायत शासन की इकाई के रूप में काम कर सकें। इस बारे में केंद्र की नेहरू सरकार और राज्यों की कांग्रेसी सरकारें लंबे समय तक उदासीन रहीं।

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पैतृक गाँव चमथा के लिए अपनी जवाबदारी

भारत में पंचायतों का इतिहास बहुत पुराना है। महात्मा गांधी के मन में गांव और पंचायतों को लेकर एक परिकल्पना थी। आजादी के बाद वह ग्राम पंचायतों को पुनर्जीवित और गांव को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने 5 अक्टूबर, 1945 को पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक लंबा पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने अपने विचार बताएं। इस विषय पर बात करने की जरूरत भी रखी। महात्मा गांधी चाहते थे कि स्वतंत्र भारत आधुनिक सभ्यता-अर्थात पश्चिम की सभ्यता के दुष्चक्र से निकले। और स्वयं के साथ पूरी दुनिया को विनाश से बचाए। इसलिए ग्राम स्वराज का प्रसंग उन्होंने अपने पत्र में उठाया। गांधीजी अपने राजनीतिक वारिस का दिमाग जानते थे। वे सावधान थे। इसलिए लिखा कि अगर तुम ऐसा समझोगे कि मैं आज के देहातों यानी गांवों की बात करता हूं, तो मेरी बात नहीं समझोगे। मेरा देहात यानी गांव मेरी कल्पना में ही आज है। उसमें देहाती यानी ग्रामवासी जड़ नहीं, शुद्ध चैतन्य होगा। उन्होंने अपने पत्र में बताया कि उनकी कल्पना के गांव में मर्द और औरत आजादी से रहेंगे। वहां न हैजा होगा, न मरकी, न चेचक होगा। अंत में लिखा कि मैं ऐसी बहुत सी चीजों का ख्याल करा सकता हूं, जो गांव में बड़े पैमाने पर बनेगी। वहां रेलवे भी होगी। डाक घर, तार घर भी होंगे। क्या होगा क्या नहीं, उसका मुझे नहीं पता। न मुझे फिकर है। गांधीजी के पत्र में मूल तत्व इस वाक्य में है-‘मैं चाहता हूं कि हम एक दूसरे को राजकरण (यानी राज्य व्यवस्था की रचना के संबंध में भी) भलीभांति समझें।’ नेहरू जी ने हिन्दी में लिखे गांधीजी के पत्र का जवाब अंग्रेजी में दिया। जिसमें उन्होंने लिखा कि ‘गांव आम तौर पर बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा होता है। ऐसे वातावरण में प्रगति नहीं की जा सकती।’ इस पत्र व्यवहार के 33 दिन बाद वे पूने में मिले। उनमें थोड़ी बात भी हुई। उसमें गांधीजी ने ग्राम स्वराज की अपनी कल्पना को स्पष्ट किया। गांव एक इकाई हो और वह स्वालंबी हो। पर उस विषय में पंडित नेहरू की कोई दिलचस्पी नहीं थी। इस कारण ग्राम स्वराज की अवधारणा के बारे में उनमें यह बातचीत आखिरी ही थी।

जयप्रकाश नारायण ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर देश में पंचायती राज प्रणाली लागू करने की मांग की थी। लेकिन नेहरू ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। सामुदायिक विकास कार्यक्रमों की विफलता के बाद नेहरू की तंद्रा टूटी और बलवंत राय मेहता कमेटी बनाई। यह पंचायत राज प्रणाली की शुरुआत थी। बाद में भी पंचायती राज प्रणाली पर कई कमेटियां बनीं। 1992 में पंचायती राज प्रणाली पर महत्वपूर्ण कानून बना। लेकिन गांधी और जेपी के सपनों की ग्राम पंचायत अभी नहीं बन सकी है।

राजनीतिक अनुभव से रहित राजीव गांधी अच्छे इंसान थे। लेकिन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्हें चलाते उनके सलाहकार थे। जो भी हो, पी.वी. नरसिंहा राव की सरकार ने उसे ही 73वें और 74वें संविधान संशोधन का रूप दिया। संविधान के 73वें संशोधन से पंचायतों को संवैधानिक मान्यता मिली। उसके लिए कानून बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया। इस तरह 24 अप्रैल, 1993 से जिला, मध्यवर्ती और ग्राम स्तर की पंचायतें बनीं। इनके निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या 34 लाख है। क्या इन संशोधनों से ग्राम स्वराज आया है?
गांव सोनाड़ी,बचपन और छात्र जीवन
मेरा जन्म गाजीपुर जिले के सोनाड़ी गांव में 4 फरवरी 1946 एक किसान परिवार में हुआ था। हमारे परिवार की जमीन दो जगह पर है। एक तो गाजीपुर के सोनाड़ी में और दूसरी जगह है पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में। पिताजी अध्यापक थे, लेकिन अपनी नौकरी छोड़कर वे खेती में लग गए थे। बचपन पिता के साथ मालदह में रहते हुए बीता। मालदह में पांचवी तक पढ़ाई हुई। छठी से दसवीं तक की पढ़ाई गाजीपुर में हुई।

इस तरह से आप कह सकते हैं कि औपचारिक पढ़ाई छठी कक्षा से शुरू हुई और यहीं से गांव से नाता भी जुड़ा। गाजीपुर के अवथाही मिडिल स्कूल से आठवीं की परीक्षा पास करने के बाद गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर ही है एस.एम. इंटर कॉलेज नवीं की परीक्षा पास की। इसके बाद तय किया कि अब आगे की पढ़ाई गाजीपुर जाकर करनी है। इसके लिए मां से कुछ पैसे मांगे और गाजीपुर पहुंचा। उस वक्त गाजीपुर के सांसद होते थे सरयू पांडे। वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे। सरयू पांडे पिताजी के मित्र थे और जिला मुख्यालय में एकमात्र परिचित। उनके सहयोग से दसवीं में दाखिला हुआ। दसवीं की परीक्षा देने के बाद किसी ज्योतिषी ने बता दिया कि वे परीक्षा में फेल हो जाएंगे। हालांकि पढ़ाई ठीक से की थी और परीक्षा भी ठीक से दी थी। ज्योतिषी की बात पर यकीन करना मुश्किल था, उत्सुकता बढ़ गई थी। जिस दिन परीक्षा का परिणाम आया, उस दिन वे सुबह से ही अखबार तलाशते रहे, लेकिन नहीं मिला। समय काटने के लिए वे स्थानीय प्रकाश टॉकिज में फिल्म देखने चले गए। तीन घंटे बाद जब निकला तो अखबार आ गया था और पास हो गया था। मन में संशय था इसलिए कुछ और लोगों से अपना परिणाम दिखलाया। सीपीआई नेता सरजू पांडे 1957 में गाजीपुर संसदीय क्षेत्र व विधानसभा चुनाव में खड़े हुए तो स्कूली छात्र के रूप में उनके लिए प्रचार करने का मौका भी मिला।

दसवीं से आगे की पढ़ाई के लिए बनारस जाना हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बीए, एमए और लाॅ की पढ़ाई की। इंटर के दौरान ही जुड़ाव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हुआ। वर्ष 1965 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदू शब्द हटाने के विरोध में छात्रों का आंदोलन हुआ। एक छात्र के नाते इस आंदोलन में हमारी भी प्रमुख भूमिका रही। वर्ष 1971 में वीसी कालूलाल श्रीमाली के खिलाफ आंदोलन छेड़ने पर 46 छात्र नेता निष्कासित कर दिए गए। छात्रों का निष्कासन तभी रद्द होता जब वे माफी मांगे। 46 में से 44 छात्र नेताओं ने माफी मांग ली। माफी न मांगने वाले में मात्र दो लोग थे, एक मैं और दूसरे मार्कंडेय सिंह। इस दौरान मैं बीएचयू से अर्थशास्त्र में पीएचडी कर रहा था। इसकी वजह से शोध का कार्य अधर में लटक गया।
1971 में जेपी बनारस आए। उन्हें छात्रों के बीच भाषण देना था। उनके भाषण से प्रेरित होकर पूर्वी बंगाल जाना गया और वहां से लौटकर मुक्ति संग्राम का आंखो देखा हाल आज अखबार के 5 मई 1971 के अंक में लिखा। उन दिनों बनारस में इंदिरा गांधी की सभा रखी गई। छात्र संघों पर रोक के खिलाफ विद्यार्थी परिषद ने उन्हें काला झंडा दिखाने का प्रयास किया। इंदिरा जी की सभा में प्रदेष के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह भी आए थे। उन्हें काला झंडा दिखाने के क्रम में गिरफ्तारी हुई। इसके विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सचिव का दायित्व दिया गया। बिहार में संगठन को मजबूत बनाने की जवाबदेही सौंपी गई। बिहार में घूम घूम कर विद्यार्थी परिषद का संगठन खड़ा किया। एक वर्ष बाद छात्रसंघ का चुनाव हुआ। लालू प्रसाद अध्यक्ष, सुशील मोदी महासचिव और रविशंकर प्रसाद सचिव चुने गए। 1974 में छात्र संघर्ष समिति बनी। विधानसभा घेराव का कार्यक्रम बना। मीसा में पहली गिरफ्तारी मेरी ही हुई। इस दौरान दस माह जेल में रहा। आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी हुई। 16 माह जेल में रहने के बाद जब रिहा हुआ तो राजनीति के बजाय पत्रकारिता का रास्ता चुना। 1979 में हिंदुस्थान समाचार एजेंसी से पत्रकारिता प्रारंभ की और आगे का जीवन पत्रकारिता के क्षेत्र में ही रहा।

गांव की संरचना
गांव सोनाड़ी एक नदी किनारे का गांव है। नदी सात-आठ किलोमीटर लंबी है। भारत के अन्य गांवों की तरह हमारा गांव साधारण और छोटा सा गांव है। गांव में अमूमन सभी जातियों का निवास है। हिंदू-मुसलमान सब हैं और यह गांव सामाजिक सौहार्द का एक नमूना रहा है। राजनीतिक लोग भी रहे हैं और स्वतंत्रता सेनानी भी। कांग्रेस के समर्थक भी और कम्युनिस्ट पार्टी के भी। विधायक कांग्रेस के तो सांसद सोशलिस्ट पार्टी के। सोशलिस्ट पार्टी के प्रति आदर भाव था लेकिन वोट नहीं था। 1967 के बाद गांव में जनसंघ की हवा पहुंची। गांव में संघ का काम था। संगठन पुराना था। 1984 में भाजपा का प्रभाव महसूस किया गया। पहली बार सहानुभूति, समानुभूति का भाव दिखा, जीत नहीं पाए लेकिन संभावना दिखी। यह गांव शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी नहीं रहा। हालांकि गांव में हाईस्कूल तो था। बीएचयू में पढ़ने वाला या एमए करने वाला गांव का पहला व्यक्ति मैं था। आज गांव में पढ़े लिखे लोगों की ठीक ठाक संख्या है।


गांधी के सपनों से दूर है गांव 
महात्मा गांधी जी की दृष्टि से यदि मेरे गांव को देखें तो आज की जो पंचायत या चुनाव प्रणाली है, वह गांधी के सपनों के गांव से दूर है। गांधी ऐसा गांव बनाना चाहते थे जिसमें वोट के विभाजन या मतभेद न हो। सब कुछ ग्राम सभा निर्धारित करे। शिक्षा, उद्योग समाज के भलाई के लिए हो। वह काम मसलन खेती, बागवानी और उससे जुड़े उद्योग जिससे गांव स्वावलंबित हों, उन बातों का निर्णय गांव खुद कर सकता है। लेकिन आज गांव रहने की जगह नहीं रह गयी है। मजबूरी में लोग रह रहे हैं या खेती की वजह से रह रहे हैं। हम चाहेंगे कि हमारा गांव ऐसा बने कि ग्रामीण वहां अपना भविष्य खोज सकें।
एक घटना याद आती है। 1954-55 का साल रहा होगा। कमलापति त्रिपाठी आए मोटर से धूल उड़ाते। गांव के शुरूआत में माता का मंदिर है। चबूतरे पर सभा लगी। पंडित जी चले गए तो बाबा से पूछा, ‘‘ई के रहल ह।’’ जवाब मिला, नेता हैं कमलापति, सिंचाई-सड़क मंत्री। पूछ रहे थे कितना ट्यूबवेल दें। हमको ट्यूबवेल की जरूरत नहीं। बरसात से अच्छी खेती होती है। जितनी सड़क चाहिए उतनी है हमारे पास। मोटरें, बैलगाड़ी सब आसानी से गांव पहुंचती। 1954-55 तक खुशहाल स्वावलंबी गांव था लेकिन विकास के दौर में आगे पिछड़ता चला गया।

नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने ग्राम स्वराज को सचमुच गले लगाया है। शासन संभालने के बाद हर साल 24 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ पर वे अपने विचार और सुझाव देते हैं। यह विषय उनकी प्राथमिकता में है। 2015 में उन्होंने शुरूआत की।
तब उनके कहे का यह अंश देखें-‘महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि भारत गांवों में बसता है।’ यह याद दिलाते हुए उन्होंने तब गांवों की चौतरफा उन्नति के लिए उपाय सुझाए। यह क्रम निरंतर चल रहा है। कोरोना की वैश्विक महामारी के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते 24 अप्रैल को लाखों सरपंचों को वीडियों कांफ्रेंसिंग से संबोधित किया। उन्होंने कहा-‘गांव तक सुराज पहुंचाने के हमारे संकल्प को दोहराने का पंचायती राज दिवस एक अवसर है।’ इससे भी ज्यादा बड़ी बात, लाख टके की बात उन्होंने कही-‘कोराना संकट के इस दौर में इस संकल्प की प्रासंगिकता तो और बढ़ गई है।’ उन्होंने इस संकट का सबक समझाया। आत्म निर्भर बनना है।
इसमें ग्राम पंचायतों की बड़ी भूमिका है। उसी दिन उन्होंने ई ग्राम स्वराज की शुरूआत की। आत्म निर्भरता का यह आह्वान वैसा ही है जैसा कभी लोकमान्य तिलक ने कहा था-‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ यह सही समय है। पहली बार शहरों ने गांवों का रुख किया है। लाखों लोग शहर से अपने गांव पहुंचे हैं। समय का चक्र घूम गया है। ग्राम स्वराज को इस समय पुन: स्थापित किया जा सकता है।

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महात्मा गांधी जी की 150 वीं जयंती वर्ष में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि गांधी क्या चाहते थे। गांधी जी गांव की संप्रभुता चाहते थे। गांव से सत्ता उपर की ओर चलती हुए दिल्ली पहुंचे, जबकि वर्तमान राज्य व्यवस्था दिल्ली से गांव की ओर चलाती है। जयंती वर्ष की सार्थकता तभी होगी जब हम गांधी की कामना के अनुरूप राज्य व्यवस्था का पुर्नगठन करें। दिल्ली या राज्यों की सरकार भारत का उद्धार नहीं कर सकती। जबतक इस देश में सात लाख गांवों की अपनी सरकार नहीं है, इस देश में गरीबी, छुआछूत जैसी कुरीतियां और सांस्कृतिक नकल की प्रवृतियां अपना जड़ जमाए रहेंगी। मैं चाहता हूं कि हमारा नेतृत्व यह समझे। इसे समझने के लिए बंधे-बंधाए रास्ते से निकलना होगा।

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(पदम श्री से सम्मानित। अध्यक्ष, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार। समूह संपादक, हिन्दुस्थान समाचार।)

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