
45 डिग्री तापमान में लगातार झुलस रहे एनसीआर में एक पखवाड़ा गुजारकर कल शाम हम 25 डिग्री वाले बंगलुरू पहुँच गये।
बिटिया और दामाद जी की भावनाओं का ख्याल रखते हुए नोएडा में अस्वस्थ रहकर भी वह जानलेवा गर्मी झेल ली। विदा करते हुए बिटिया ने कहा कि अब से आपलोग गर्मी में मत आइएगा।
बंगलुरू में बेटे-बहू ने स्वागत करते हुए कहा कि हरेक साल गर्मी में यहीं रहिए।
2 जून को दिल्ली पहुंचे थे। 3 को हमारी शादी की 40वीं वर्षगांठ थी। बेंगलुरू से बेटा और बहू दोनों आ गए खुशियाँ मनाने। बिना किसी मेहमान के हम छहों ने सेलिब्रेट किया क्योंकि उसी शाम मातारानी के दरबार के लिए प्रस्थान करना था। 4 की रात वैष्णोदेवी के दर्शन कर भोर में होटल पहुंचने तक सभी बीमार हो गए। चार दिन बाद बेटा और बहू वापस लौट गए। हम दोनों 14 जून को दिल्ली से बेटे-बहू के पास बेंगलुरू आ गए।
ये दोनों जब भी मौका मिलता है घुमाना शुरू कर देते हैं। जब यूके गए तो 26 दिनों तक लगातार घुमाते रहे थे। पिछली बार बेंगलुरू आए तो पश्चिमी कर्नाटक भ्रमण करवा दिया था। इस बार भी हरेक सप्ताहांत देशाटन का कार्यक्रम तय है। दो-तीन दिन रोज शहर के विभिन्न रेस्तराओं में दक्षिण भारतीय व्यंजनों का रसास्वादन करने के पश्चात निकल पड़े एक धार्मिक स्थल लेपाक्षी देखने।
कर्नाटक के सीमावर्ती जिले अनंतपुर (आंध्र प्रदेश) में एनएच 7 के पास बैंगलुरू से 140 किलोमीटर दूर स्थित लेपाक्षी मन्दिर अपनी भव्यता, अनूठेपन और रहस्यपूर्ण किंवदंतियों के कारण प्रसिद्ध है।
भगवान शिव (नागलिंग), विष्णु, गणेश, भद्रकाली, वीरभद्र (शंकर का रुद्र रूप), श्रीराम, सीता, पक्षीराज जटायु, अगस्त्य मुनि, विजयनगर साम्राज्य आदि से संबद्ध यह मन्दिर ‘कूर्म शैलम’ नामक विशाल कछुए के समान शिला पर अवस्थित है। इसका उल्लेख रामायण, स्कन्द पुराण और विजयनगर साम्राज्य के इतिहास में मिलता है।
रामायण के अनुसार सीता का अपहरण कर ले जाते हुए रावण के साथ इसी स्थान पर जटायु ने युद्ध किया था। श्रीराम ने जटायु को मोक्ष प्रदान करते हुए ‘ले पक्षी ‘ (तेलुगू अर्थ rising bird) की उपाधि दी थी। स्कन्द पुराण के अनुसार अगस्त्य मुनि ने यहाँ भगवान शिव (नागलिंग) का मन्दिर स्थापित किया था। विजयनगर साम्राज्य के इतिहास के मुताबिक सम्राट अच्युतार्य के काल में विरूपन्ना और वीरन्ना नामक दो भाई राज्याधिकारी थे। एक कथा के अनुसार दोनों अंधे थे जिन्हें इस मन्दिर में दृष्टि मिली थी, अतः मन्दिर का नाम ‘लेप -अक्षी ‘ पड़ गया। दूसरी कथा के अनुसार दोनों भाइयों को किसी अपराध के दण्ड स्वरूप सम्राट ने आँखें निकलवाकर दीवार पर लिपवा दीं। अतः ‘ लेप – अक्षि ‘ नाम हुआ। लोकमानस में इसी प्रकार की दर्जनों कहानियाँ यहाँ प्रचलित हैं।
पानी के बहाने.. स्मृतिपटल पर बसे पुरखों द्वारा खुदवाये गये कुएं
दक्षिण भारत घूमने वाले पर्यटकों को यह मन्दिर अवश्य देखना चाहिए। हमें पिछले शनिवार (18 जून) यह सुअवसर प्राप्त हो गया। यहाँ की वास्तुकला और किंवदंतियों से अभिभूत होकर कई दिनों तक इसी के विषय में वार्तालाप करते रहे। फिर अगले सप्ताह मैसूर जाने की तैयारी है।
(क्रमशः जारी…)










