गांवों के पुनरुद्धार की है जरूरत…बाहर रह रहे लोग निभा सकते हैं उत्प्रेरक की भूमिका

शैलेष कुमार सिंह
गोराईंपुर और बोधाछपरा दोनों गांव गंगा के दियारा की ओर बसे हैं। इस गांव में वैसे तो हर जाति के लोग हैं, लेकिन जमीन पर मालिकाना हक राजपूतों का रहा है। दोनों गांव के बीच आपसी सामंजस्य, मेल-जोल रहता था। गांव पूरी तरह से खेती पर निर्भर था। लोग खेती के साथ ही माल-मवेशी रखतेथे। सनपित होना पड़ा। गांव के समीप ही एक रेलवे लाईन थी जहां आज नेशनल 1925 के आसपास गंगा के कटाव की वजह से लोगों को मूल गांव से विस्थापित होना पड़ा था। ग्रामीणों को गंगा के कटाव के कारण सड़क के दूसरी तरफ बसना पड़ा। जहां वर्तमान गांव है वहां भी गांव की ही जमीन थी। कटाव के बाद लोग जिसकी जहां जमीन थी वहां आकर बस गए। मूल गांव से बेघर हुए लोगों का मूल पेशा कृषि और पशुपालन ही बना रहा। तब देश को आजादी नहीं मिली थी।

इसी दौरान एक ग्रामीण यदुनंदन सिंह गांव से पलायन कर बंगाल चले गए। वहां उनकी मुलाकात सेन बाबू  से होती है जो कलकत्ता कॉरपोरेशन की जमीन लीज पर दिया करते थे। सेन बाबू से यदुनंदन सिंह ने सब-लीज पर खेती के लिए जमीन लिया। इसके पश्चात वे हमारे दादा रामबहादुर सिंह को खेती के लिए कलकत्ता ले गए। धीरे-धीरे हरेक परिवार से एकाध सदस्य कलकत्ता में रहने लगे। ठेके पर जमीन लेकर खेतीबारी का काम करने लगे। सेन बाबू के जरिए सबलीज पर यदुनंदन सिंह के पास लगभग 100 बिगहा जमीन हो गयी। लगभग 20 बिगहा जमीन हमारे बाबा रामबहादुर के पास भी थी। इस तरह से लोगों ने परिवार पीछे दस या पांच बिगहा जमीन खेती के लिए लिया। खेतीबारी का काम चल रहा था, लेकिन इसी में से कुछ लोगों ने नौकरी भी कर ली। कलकत्ता ट्रामवेज से कई लोग जुड़े। धीरे-धीरे लोग वहां स्थापित हो गए। उन दिनों देश की आजादी के लिए संघर्ष चल रहा था। इसी बीच बाबा रामबहादुर सिंह ने कलकत्ता का कार्यभार छोटे भाई के हवाले कर गांव में रहने का मन बनाया और वे गांव लौट आए। यहां वे मलखाचक के डॉ राम विनोद सिंह के साथ समूह बनाकर आजादी की लड़ाई में सम्मिलित हो गए। डॉ रामविनोद सिंह आजादी के बाद इलाके के पहले विधायक भी चुने गए थे।

 

आजादी की लड़ाई के दौरान जब बाबा राम बहादुर सिंह के नाम वारंट निकलता तो वे नेपाल की ओर चले जाते थे। उनका नेपाल आना-जाना बाद में भी बना रहा। इसी दौरान उनकी मुलाकात जयनगर में सूरज नारायण सिंह से हुई जो नरपत नगर इलाके के क्रांतिकारी युवा थे। उन्हें कालापानी की सजा हुई थी, लेकिन वे जहाज के नीचे से सीट काटकर समुद्र में चले गए और गायब हो गए। सूरज नारायण सिंह के जरिए उनका संपर्क दरभंगा महाराज से हुआ और सूरज नारायण सिंह ने जयनगर में 40 बिगहा जमीन भी खरीदवाया। यह लगभग 1936 की बात है। जयनगर से करीबन सात किलोमीटर दूर सेलरी गांव में जमीन लिया गया था जहां आज भी परिवार के लोग रहते हैं। इस दरम्यान उन्होंने काफी संघर्ष किया। वेषभूषा बदल कर चावल भेजने के लिए अंग्रेजों से परमिट लेने लगे। आजादी मिली उसके बाद ही केस खत्म हुआ और फिर वे गांव में रहने लगे। जयनगर, निर्मली आदि इलाके में गांव के दूसरे परिवारों ने भी खेती के लिए जमीन लिया। लोग बसने लगे और संपन्नता की ओर बढ़ने लगे। लोगों में शिक्षा के प्रति रूचि जग रही थी। कई लोगों ने बच्चों को स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। कलकत्ता में रहने वाले कई लोगों ने अपने बच्चों को ब्रिटिश मिशनरी स्कूल, जिला स्कूल आदि में भर्ती कराया।

 

 

जो गांव में रह गए थे, उसी में से एक परिवार के रामविनोद सिंह 1970 के दशक में अमेरिका गए और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से वेटनरी साईंस में एमए और पीएचडी किया। तब हम लोग छोटे थे। आगे चलकर वे अमेरिका के केंद्रीय सरकार में फूड एवं एडल्टरेशन के निदेशक के पद से सेवानिवृत हुए। उनके बच्चे आज भी वहां रहते हैं और डॉक्टर, इंजीनियर हैं। गांव के कामेश्वर प्रसाद सिंह बिहार पब्लिक सर्विस कमिशन के जरिए डीएसपी के पद पर चयनित हुए और आईजी के पद से रिटायर हुए हैं। यदुनंदन सिंह के बड़े लड़के शत्रुध्न प्रसाद सिंह 1973-74 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग कर एमटेक करने अमेरिका गए। वहां उन्होंने अमेरिकन रेलवे में काम भी किया। लेकिन पिता के देहांत के बाद वापस आ गए और अब कोलकाता में रहते हैं। उनके छोटे भाई डॉ अवधेश कुमार सिंह ने कानपुर से डॉक्टरी की पढ़ाई की और आगे चलकर सफदर जंग अस्पताल में आर्थोपेडिक के निदेशक के पद से सेवानिवृत हुए। इसके साथ ही कोलकाता में रहने वाले कुछ परिवारों ने व्यवसाय शुरू किया। कई लोग इंट भट्टे चलाते हैं।

मैं बचपन में एसटीटी बोस्को में पढ़ता था। 1970 या 1972 के आसपास वहां नक्सलाईट मूवमेंट शुरू हुआ और कानून व्यवस्था की समस्या शुरू हो गयी। जिससे गांव वापस आना पड़ा और गांव के स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ने लगा। शुरूआत में कुछ दिक्कत हुई। गांव में जो हाई स्कूल है उसे यदुनंदन सिंह ने ही बनवाया है। भले ही शिक्षकों की तनख्वाह कम थी लेकिन उस जमाने में शिक्षक काफी सजग थे। यही कारण है कि गांव से पढकर भी कई लोग उच्च पदों पर गए। इस दौरान मैं दो साल के लिए जयनगर भी पढ़ने गया। लेकिन छठी और सातवीं वीं कक्षा गोराईपुर हाईस्कूल से किया। सातवीं कक्षा में मुझे नेशनल स्कॉलरशिप मिला। यह सरकारी योजना थी जिसमें जिला के बेहतर स्कूल में पढ़ने के लिए चयनित बच्चों को 100 रूपया प्रतिमाह मिलता था। इसलिए आठवीं और नवीं कक्षा छपरा जिला स्कूल से किया जहां हमारे ग्रामीण डॉ रामअयोध्या सिंह वार्डन थे। दसवीं व ग्यारहवीं कक्षा में पटना कॉलेजियट स्कूल में स्थानांतरण करा लिया था। पटना एएन कॉलेज से इंटर करने के बाद कोलकाता इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। इसके पश्चात एक जर्मन कंपनी में नौकरी की। इसी दौरान 1991 में भारतीय इंजीनियंरिंग सर्विस में चयन हो गया। वर्तमान में दिल्ली सरकार में असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में कार्यरत हूं।

हमारी पीढ़ी तक गांव में लड़कियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं दिखती थी, लेकिन वर्तमान पीढी़ को इसका ध्यान है। गांव की कई लड़कियां अच्छा कर रही हैं। टीएनबी कॉलेज में बॉटनी के विभाग्यध्यक्ष रहे दिवंगत डॉ अरूण कुमार सिंह की दो लड़कियां मैनेजमेंट और सॉफटवेयर में दक्षता प्राप्त कर काम कर रही हैं। गांव के योगेन्द्र सिंह की दो लड़कियां मेडिकल और इंजीनियरिंग कर काम कर रही है। मेरी दो लड़कियां है। बड़ी बेटी स्वाति सिंह नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन टेक्नॉलजी से फैशन डिजाईनिंग कर काम कर रही हैं। जबकि छोटी लड़की शालिनी सिंह को इंजीनियरिंग करने के बाद अमेरिका से फेलोशिप मिला। वहां उसने नासा एसोसियेटेड यूनिवर्सिटी इन टेक्सास से मास्टर्स इन इंजीनियरिंग किया और अब अमेरिका के पोर्टलैंड में इंटेल कंपनी में सीनियर इंजीनियर के पद पर है।

इस तरह से गांव में दो तरह का ट्रेंड देखने को मिलता है। एक तो काफी शिक्षित लोग हैं जो प्रतिभा की बदौलत आगे बढ़ रहे हैं। वहीं बाकी पिछड़ते हुए परिवार हैं जो आगे नहीं बढ़ पाए और खेती, छोटा व्यवसाय या नौकरी कर जीवन गुजार रहे हैं। वर्ष 2000 के आसपास गांव में फिर से गंगा का कटाव होने लगा। खेती की बहुत सारी जमीन गंगा में चली गयी। राजमार्ग के दक्षिण जो थोड़ी बहुत जमीन बच गई है उसी में खेती कर गांव के लोग अपना काम चला रहे हैं। बाहर जो लोग नौकरी कर रहे हैं वे पूरक की भूमिका में हैं।
हालांकि अन्य गांवों की तरह हमारे यहां मानव विस्थापन की समस्या नहीं है, लेकिन जब आपकी जोत सिमट जाती है तो परिवार की खुशहाली पर असर होता है। आजादी के पहले जो कटाव हुआ था और काफी दिनों बाद जब जमीन वापस आई तो गांव में खुशहाली लौटी। उम्मीद की जानी चाहिए कि जब फिर से जमीन वापस आएगी तो खुशहाली लौटैगी। पुनः जब खेतों में उपजाऊ मिट्टी आएगी तो पहले की तरह ही गेहूं, जौ, चना, मसूर आदि की खेती कर पाएंगे और खलिहान व ड्योढ़ी अनाज से भर जाएगी। समृद्धि और संपन्नता आएगी। पारिवारिक बंटवारे के कारण जमीन पर मालिकाना हक में कमी आई है। खेती पहले की तरह लाभप्रद नहीं रही। ऐसे में जरूरत है कि खेती के साथ ही पशुपालन, मुर्गीपालन या अन्य तरह के कामों को बढ़ावा दिया जाए ताकि हर हाथ को काम मिले।

इस लिहाज से देखें तो गांव के पुनरूद्धार की जरूरत है। यह चर्तुदिक प्रयास से ही संभव है। इसमें गांव से बाहर रह रहे लोगों के साथ ही गांव में रहने वाले ग्रामीणों का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। सब मिलकर जवाबदेही समझें तो बात आगे बढ़ेगी। गांव राष्ट्रीय राजमार्ग के नजदीक है। बुनियादी सुविधाएं गांव में उपलब्ध हैं। गांव में हाई स्कूल और प्राथमिक चिकित्सालय भी है। जरूरत है स्थानीय स्तर पर व्यवस्था को बेहतर करने की। जो भी सुविधाएं गांव में उपलब्ध हैं उन्हें सुढृढ़ करने और व्यवस्थित तरीके से संचालित करने की है। हमें अपने आत्मबल को बनाए रखते हुए गांव को नए सिरे से गढ़ना होगा। गांव में जो भी सेवानिवृत लोग हैं उनके अनुभवों का लाभ लेते हुए उनके सहयोग से गांव को काफी बेहतर बनाया जा सकता है। हमारे गांव में आपसी सामंजस्य का अभाव नहीं है। आज भी दोनों गांव के लोग एक दूसरे के दुख-सुख में सहभागी होते हैं। शादी-विवाह, दशकर्म आदि में शामिल होते हैं। वैमन्स्यता का माहौल नहीं है। लेकिन जरूरत है इसे और गहरा करने की। पहले हमारे गांव की शक्ति थी कि कोई परिवार पिछड़ जाए तो बाकी के लोग मदद कर उसे आगे लाते थे। गांव एक परिवार की तरह ही था। जरूरत है उस भावना को और मजबूत करने की।

मैं हमेशा गांव जाता रहता हूं। मुझे महसूस होता है कि दो चीजों पर गांव को जागरूक करने की जरूरत है। पहला, पूर्वजों के जमाने में हमारे गांव में हर व्यक्ति के पास आम, महुआ, जामुन आदि का बगीचा था। समय के साथ पेड़ कट गए। एक बार फिर से गांव में नयी पीढी को वृक्षारोपण के प्रति जागरूक करने की जरूरत है। यदि पेड़ लगें तो संपन्नता आने की उम्मीद है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जो लोग बाहर रह रहे हैं, वे समय-समय पर गांव जाए और गांव में अपने स्तर पर कुछ करने का प्रयास करें। मैं दो-तीन बार अमेरिका गया। वहां गांव के जो लोग रह रहे हैं उनके मन में यह बात है कि हम भले समयाभाव के कारण गांव में समय व्यतीत नहीं कर पाते हैं लेकिन हमें गांव के लिए कुछ करना चाहिए। मेरी बेटी का विचार है कि गांव के गरीब बच्चों के लिए स्कॉलरशिप की व्यवस्था की जाए ताकि अभावग्रस्त परिवार के बच्चों को पढ़ाई लिखाई में मदद मिले। ऐसी ही भावना बाकी लोगों के मन में भी है या होगी। यदि सब मिलजुलकर प्रयास करें और गांव के स्थानीय लोग एक व्यवस्था बनाएं तो बाहर रह रहे लोग उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकते हैं और हमारा गांव प्रगति की ओर बढ़ सकता है।

(दिल्ली इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्टक्चर डेवलपमेंट बोर्ड में सलाहकार)

 

 

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