बदलते हुए गांव में ढ़ीली पड़ती संबंधों की गांठ

नीलिमा सिन्हा, ( एडब्लूआईसी की चेयरपर्सन, बाल पुस्तक लेखिका, उपन्यासकार, साहित्यकार)

पिता एन सी श्रीवास्तव मध्य प्रदेश कैडर के इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी थे। बचपन लुटियन की दिल्ली में पुराने भाजपा दफ्तर के सामने 6 अशोक रोड में ही गुजरा। स्कूल से लेकर कॉलेज तक सब दिल्ली में। कॉलेज की पढ़ाई भी दिल्ली विश्वविद्यालय कॉलेजों में हुई। 1961 में यशवंत सिन्हा से शादी हुई जो कि बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी थे। इस दौरान तात्कालिन बिहार के अलग-अलग जिलों में मसलन दुमका, गिरिडीह, पटना के सुदूर गांवों को देखने समझने का मौका मिला। लेकिन सही मायने में गांव से नाता जुड़ा आज से 30 साल पहले। पति जब चुनावी राजनीति में आये। हजारीबाग के सांसद बने तो मुझे छोटे-छोटे गांव में घूमने का मौका मिला। इस अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि गांव पहले की तुलना में काफी बदल गया है,हालांकि बदलाव के पैमाने पर गांव को कसते हुए यह कहा जा सकता है कि गांव कई तरह के हैं।

 

हम लोग जिस गांव में रह रहे हैं वह हजारीबाग से 8 किलोमीटर दूर रांची रोड पर स्थित है डेमोटांड। जब रहना शुरू किया था, तो छोटा सा गांव था। लेकिन फैलते हुए शहर ने गांव डेमोटांड का शहरीकरण कर दिया है। शहर इतना तेजी से बढ़ा की गांव का पता नहीं चलता है। डेमोटांड ,वहां इंड्रस्टियल एरिया बनता दिख रहा है। राईस मिल, हुंडई का शो रूम और कई फैक्ट्रियां खुल गई हैं । ऐसे में गांव के विकास को लेकर अलग-अलग नजरिया है। हो सकता है कुछ लोग इस तरह से गांव के शहर बनने की दिशा में बढ़ते कदम को ही गांव की तरक्की मान लें। आप यदि चाहें तो इसे गांव का विकास कह सकते हैं लेकिन सही मायने में क्या यही गांव का विकास है, जहां शांति खत्म हो जाए, अपनापन न दिखाई दे और जहां देखें वहीं कोलाहल सुनाई दे।

मुख्य सड़क से थोडी ही दूरी पर सुंदरपुर है। हुपाद, बनहां, मुकुंद गंज, हरहद आदी गांव है। ये सारे गांव हरहद पंचायत के अंतर्गत आते हैं। इसलिए ये पूरी कहानी पूरे पंचायत को समेटे हुए है यानी हरहद पंचायत, जिला हजारीबाग। इन सभी गांवों से मेरा जुड़ाव है। इस पंचायत में मुस्लिम, कोईरी, भुईयां, क्रिश्चियन आदिवासी, प्रजापती, काढू आदि जातियां हैं। जब हमलोग इस ईलाके में रहने गये थे तो सुंदरपुर कुम्हारों का गांव हुआ करता था। मिट्टी के बर्तन बनते थे। लेकिन अब कुम्हार का काम करते हुए कोई नहीं दिखाई देगा। अब सब किसी न किसी जगह काम कर रहे हैं। शहर में रोजी रोटी कमाने जाते हैं। मिट्टी के बर्तन बनने कम हुए तो लोग शहर में रोजी रोटी कमाने के लिए जाने लगे। उनका स्किल बदला यानी दूसरे काम काज सीखना शुरू किया। पढ़ाई करने लगे। बड़ी संख्या में आज लड़कियां पढ़ने जाती हैं।

हुपाद जहां हम वोट डालने जाते हैं वहां एक हाई स्कूल भी है। पहले नक्सल प्रभावित था। लेकिन अब स्थिती बदली है। डेमोटांड की एक बालिका ने इकोनामिक्स और हिंदी में सेंट कोलंबस से स्नातक किया। हमारे घर के पास ही एक डेंटल कॉलेज बन रहा है, वहां नौकरी कर रही है। एक लड़की ब्यू​टीशियन का कोर्स कर रही है। पहले जैसे मिट्टी के घर अब कहीं नहीं दिखते। पहले जब मिट्टी के घर बने होते थे तो इन घरों पर सोहराई आर्ट दिखता था। बहुत खूबसूरत लगते थे ये गांव। लेकिन समय के साथ वो प्रथा खत्म हो गई। अब ठोस घर बन गये हैं। घर भले छोटे हां लेकिन पक्के के हैं। पहले कच्ची पगडंडी होती थी,लेकिन अब सड़कें बनी हुई हैं।

पहले गांव के लोग पानी तालाब या पोखड़ से लाते थे, कपड़ा धोते थे। महिलायें पोखरे के आस-पास कपड़ा धोते नजर आती थीं। अब हैंड पंप हो गया है। शौचालय, बाथरूम निर्माण की प्रक्रिया दिखती है। लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले औरतें सिर पर गट्ठर लेकर जाती थीं। केवल साड़ी पहनती थीं लेकिन अब पहनावा ओढ़ावा भी बदला है। लकड़ी पर खाना नहीं बनता। गैस के चूल्हे उपयोग होने लगे हैं। लड़कियों में जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार हुआ है, ल​ड़कियां भी काम कर रही हैं। कंप्यूटर स्किल सीख रही हैं।

हमारे पति जब गिरिडीह में एसडीओ के रुप में पदस्थापित थे तो उस ईलाके में अक्सर जाते रहते थे। उनके भाई विजय सिन्हा फॉरेस्ट आॅफिसर थे। हमारे पति ने जब नौकरी छोड़ा तो डेमाटांड में 5 एकड़ जमीन लिया जिसमें आम के पेड़ लगे हुए थे। वहां थोड़ा बहुत खेती—बाड़ी का काम भी शुरू हुआ। आम के बगीचों के बीच ओल, हल्दी, आलू इत्यादी की बुवाई भी की जाती है। इसी बीच हमलोगों ने इनके माताजी के नाम पर श्रीमती धाना देवी चेरिटेबल ट्रस्ट नाम के एक संस्था की शुरूआत की। इसी ट्रस्ट के जरिए इस ईलाके के गांवों में हमने स्वयं सहायता समूह के जरिए कुछ काम करना शुरू किया। एसएचजी के जरिए दरी बनाने का काम, सिलाई का काम करवाते थे। चार—पांच साल पहले मैं और मेरी बहू संगीता ने इस ईलाके में महिलाओं को प्रशिक्षण दिलवाया था। धीरे—धीरे ये महिलाएं अपना काम करने लगीं। इस दौरान यहां फ्री कंप्यूटर क्लास चलवाई गई।

अपने कंपाउंड में एक मंदिर भी बनवाया है। वहां आसपास की महिलायें सोमवार को एकत्रित होती हैं और कीर्तन भी करती हैं। बिरहोर जनजाती के परिवार वहां अच्छी खासी संख्या में रहते हैं। हमने इस समुदाय के बच्चों के लिए पुस्तक का इंतजाम किया। उन्हें बांटा,जिससे उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ने का प्रोत्साहन मिला। । वहां से 7-8 किलोमीटर दूर तरंग ग्रुप के नाम से एक संस्था काम करती है। उस संस्था के जरिए भी पुस्तक वितरण करवाया गया। संस्था की तरफ से कहा गया कि बच्चे पढने जा रहे हैं, वो लोग चाहते हैं कि आगे बढ़ें विशेष रूप से लड़कियों में पढ़ने की लगन है, आगे बढ़ने की ललक है। जबकी केवल नौकरी नहीं कराना चाहते थे लेकिन अब लड़कियां भी पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं।

सरकार के स्तर पर, सांसद के जरिए भी व्यापक कार्य पूरे हजारीबाग के गांवों में किया जा रहा है। जोहार संस्था, अक्षय पात्र योजना शुरू किये गये हैं। पौष्टिक आहार देने का काम भी सरकार के स्तर पर चलाया जा रहा है।
अब वहां जाना कम हो पाता है। कोरोना के कारण ज्यादा समय दिल्ली में ही बीता है। जैसे ही मौका मिलेगा बच्चों से संपर्क करूंगी। बच्चे पढ़ाई में मन लगायें, भले ही कहानी की पुस्तके पढ़ें लेकिन पढ़ाई करते रहें क्योंकि पढ़ाई से ही जीवन में बदलाव आता है। कोरोना के दौरान भी ऐसा देखने को मिल रहा है कि बच्चे मोबाईल के द्वारा पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन पुस्तकों का विशेष महत्व है। जिन-जिन बच्चों को पुस्तकों की जरूरत होगी, हमारी कोशिश होगी बच्चों के हाथ में पुस्तकें पहुंचे।

यदि सारांशत: विगत कुछ वर्षों में गांव में आए बदलाव की बात की जाये तो उस समय से अब तक काफी बदलाव आया है। भले ही गांवों के बदलाव की रफ्तार गांव डेमोटांड जितना न हो जिसे शहर द्वारा लील जाने का खतरा है लेकिन देश और झारखंड प्रदेश के अन्य गांव के बरक्स अपने गांव के संदर्भ में भी यही बात कही जा सकती है गांव खुद आगे बढ़ रहा है। गांव आगे निकल चुका है, फैल चुका है। भले ही छोटा सा गांव है लेकिन बाकी दुनिया से उसका नाता है, संपर्क के साधन बढ़े हैं। गांव का रूप बदल गया है। बिजली गांव में पहुंच रही है। गांव अब सूचना तकनीक से अछूता नहीं है। नयी पीढ़ी तकनीक के इस्तेमाल के जरिए देश दुनिया से जुड़ रही है। गांव आधुनिक हो रहे हैं, और समय के साथ परंपरागत व्यवसाय बदले हैं। हालांकि संबंधों का बंधन कमजोर हुआ है। लड़कियां भी अपनी बात रख रही हैं। बावजूद इसके कुरीतियां बरकरार है। दहेज आदी की कुप्रथा बनी हुई है। लड़कियां पढ़ रही हैं, पैरों पर खड़ा भी हो रही हैं। बावजूद इसके लड़कियां पढ़ भी जायें तब भी महिला उत्पीड़न की घटनायें और लड़कियों से भेदभाव और छेड़छाड़ की घटनायें सभ्य समाज के समक्ष गाहे बेगाहे सवाल खड़ा करती रही हैं। यह चिंता का विषय भी है।
(नीलिमा सिन्हा  यशवंत सिन्हा (भारत के पूर्व विदेश और वित्त मंत्री) की पत्नी और  जयंत सिन्हा (हजारीबाग के वर्तमान सांसद) की मां हैं।)

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