mahatma gandhi antarastriya hindi vishwavidyalaya

अपने टोले ही चलेंगे…जैसे लाखों लोग गए…जो होगा…देखा जाएगा

बाबा चले गए, मेरे लिए गांव का मतलब ही बदल गया. बैराग मेरे अंदर भी जागने लगा. मैं भी बाबा की तरह रक्त होकर भी विरक्त होने लगा. तब ये समझ नहीं आता था- ये कैसा अमोह है, जो मेरे अंदर उठ रहा है. क्यों गांव अब सूना लगने लगा है. इसका दायरा सीमित लगने …

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बाबा ने ठाना… मंदिर बनाकर ही मरूंगा

कुमार विनोद, वरिष्ठ टीवी पत्रकारअब नई दिक्कत शुरु होती है- बघड़ियों के टीले पर. बाबा ने अपने पांच बेटों के साथ टोला तो बसा लिया, लेकिन खाने पीने की दिक्कत तमाम थी. ये फतेहपुर बाजार तो अब हुआ है न, जहां सबकुछ मिल जाता था. पहले नून-तेल-मसाला और सरकारी राशन लेने के लिए भी पुराने …

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…खाक में क्या सूरतें होंगी

बघड़ियों का टीला… वो ख़ाक की तरह ही दिखता है अब यादों के झरोखे से. मिर्जा गालिब के मशहूर शेर में इस बयान की तरह. ये खाकसार भी उसी खाक से, उसी मिट्टी से बना है, जिसमें दबी गड़ी जाने कितनी ही सूरतें बरसों की खाक कुरेद जाती हैं- सूरतें कुछ देखी हुईं और कुछ …

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ग्राम आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हुए… लेकिन टूटी है सामाजिक एकजुटता

प्यारे मोहन त्रिपाठीमेरा गांव उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के मनियाहू तहसील में हरद्वारी है। ये तीन तरफ से नदियों से घिरा हुआ है। मेरी उम्र अभी लगभग 84 साल है लेकिन गांव में सड़क नहीं है। जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो गांव खेती किसानी दृष्टि से खुशहाल था। खेती-बाड़ी ही मुख्य पेशा …

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ददिहाल के गांव बड़ौत से ज्यादा…ननिहाल के गांव पुरकाजी से रहा है नाता

निशि सिंह हम सभी की जड़ें गांव से जुड़ी हैं। व्यक्ति उम्र के किसी भी पड़ाव पर पहुंच जाये, सफलता की कितनी भी सीढ़ियां चढ़ लें लेकिन जब यादों का पिटारा खोलता है,  तमाम खिड़की, दरवाजों,झिर्रियों के पार बचपन के वो अनमोल क्षण कुछ चुहल,कुछ बदमाशियां, कुछ सखी-कुछ सहेलियां सामने आ खड़े होते हैं। स्वाभाविक …

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बदल गया है सामुदायिक जीवन

डॉ अनामिका मेरा जन्म चीन से युद्ध के समय हुआ था। उस समय की घटनाएं याद नहीं हैं। एक-दो दृश्य याद हैं। भैया हमको कहते थे कि चाइनीज है। मेरी नाक चपटी थी, इसलिए चिढ़ाते थे। हमको याद है कि नेपाल के बॉर्डर से आती थी एक बूढ़ी औरत, स्मगलिंग की साड़ियां लेकर। कुछ दूसरे …

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गांव, गरीब और गाछ बचाने के लिए एकजुट हुए गांधीजन

प्रसून लतांत सलाहकार संपादक, पंचायत खबर नयी दिल्ली: कोरोना महामारी के इस दौर में एक ओर जहां देश कठिन परिस्थिती से गुजर रहा है, न जान बचाने की जुगत है और न खाने—पीने की सुविधा। कब कौन संक्रमण का शिकार हो जाये, पता नहीं। यह वही वर्ष है जब देश गांधी की 150 वीं जयंती …

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गांधी वास्तविकता में कम, कल्पना में ज्यादा जीते थे

डाॅ मैनेजर पांडेय मेरा गांव लोहटी गोपालगंज जिले के कटिया थाने में हैं। वैसे तो गांव साल में एक-दो बार ही जाना होता है लेकिन गांव से जुड़ाव है। हमारा गांव भी देश के दूसरे गांव की तरह बहुत बदल गया है। विशेष रूप से मानवीय संबंध के मामले में ईष्र्या, द्वेष के कारण लड़ाई, …

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जरूरी है अंदर के गांव को बचा कर रखना

डॉ प्रदीप कांत चौधरी बचपन गांव में नहीं बीता। गांव कभी कभार जाता था, पर उसकी कोई ऐसी याद नहीं है, कोई नोस्टाल्जिया नहीं है। हालांकि गांव से इतना दूर भी नहीं था, कस्बानुमा शहर लहेरियासराय-दरभंगा जहां मेरा बचपन बीता उसमें शहर की कोई ऐसी चमक नहीं थी कि गांव जाने पर कोई खास अंतर …

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आंसू से मुस्कान तक, धूप से छांव तक… जारी है झौवा गांव की यात्रा

हरेन्द्र प्रसाद सिंह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती समारोह पूरे भारत में चल रहा है। बापू ने कहा था कि स्वातंत्र्योत्तर भारत का विकास गांवों के विकास से ही होना चाहिए क्योंकि 70 फीसदी जनसंख्या गावों में ही वास करती है। किन्तु, ऐसा हुआ नहीं। सरकार शहरों के विकास में लग गई और गांव …

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