गांव की मुकम्मल तस्वीर के बीच… उदासी की कथा कहते पलायन में छुपा है गांव का यथार्थ

मनोरमा सिंह
स्वतंत्र पत्रकार,लेखन व कविता में रुचि

शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूं
ज़ेहन में पर गांव का नक़्शा रखा है

ये शेर ताहिर अज़ीम का है लेकिन हर उस शख्स के भीतर है जो गांव से शहर आकर बसा है या जो कहीं भी रहे लेकिन जिसके दिल में हमेशा उसका गांव आबाद होता है। महात्मा गांधी भी कहते थे भारत की आत्मा गावों में बसती है और असली भारत का दर्शन गांवों में ही सम्भव है। ये सब बातें बहुत सही हैं लेकिन जमीन पर हक़ीकत कुछ और है, हमारे देश और राज्य में गांव का दूसरा मतलब भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा और पलायन भी तो है।

हरे भरे खेत, बाग़-बगीचा, पोखर-तालाब, नदी-नालों का सौंदर्य, कोयल की कूक और मोरों का नाच, गांव की बहुत खूबसूरत तस्वीर होती है लेकिन ये सब मिलकर भी लोगों को गांव में रोक नहीं पाते उन्हें सब छोड़कर एक दिन किसी शहर में प्रवासी बनना ही पड़ता है, यही पलायन गावों की उदासी है और गांव की कितनी भी मुकम्मल तस्वीर हो उसके भीतर का सच है।

मेरे गांव की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है जो बिहार के सिवान जिले में स्थित गोठनी प्रखंड का ताली बुजुर्ग है। सिवान के देवरिया से लगते सीमा क्षेत्र में , ऊपर से खूबसूरत लेकिन भीतर से उदास। बीते दिसंबर 11 साल के बाद अपने इस पैतृक गांव में जाना हुआ तो ऐसे ही तमाम सवाल जेहन में उमड़—घुमड़ रहे थे। दस साल में वैसे बहुत कुछ बदला है। अब सड़कें पहले से बहुत बेहतर हैं, सभी जरूरी भवन चाहे स्कूल के हों या सामुदायिक केंद्र बने हुए हैं, बिजली रहती है और इन सब ने गांव का जीवन पहले से आसान कर दिया है। गांव में ही अब काम करने को मजदूर उपलब्ध नहीं हैं तो मजदूरों पर निर्भरता कम करने के उपाय भी तकनीक ने मुहैया करा दिया। खेती के हल बैल अब किसी के दुआर पर नज़र नहीं आते, ट्रैक्टर, कम्पाइन, हार्वेस्टर और सिंचाई के लिए पाइप खेती के तमाम नए औज़ार हैं, कटनी, दवनी, ओसवनी का महीनों का काम कुछ घंटों और कुछ दिन में ख़त्म हो जाता है और ये अभी का बदलाव नहीं है। ऐसे बदलाव को भी एक दशक से ज्यादा हो चुका है।

लेकिन जो सबसे ज्यादा खलता है वो गांव में युवा या वयस्क काम करने वाले लड़कों और पुरुषों का नहीं नज़र जाना, ज्यादातर का देश के किसी महानगर किसी शहर या खाड़ी देशों में अपनी रोजी के लिए चले जाना और उनके पीछे गांव में बूढ़ों, बच्चों, औरतों और लड़कियों का रह जाना। लेकिन इसका असर एक और रूप में दिखता है और वो है गांव में बने नए मकान जो हर तरह की आधुनिक सुख सुविधा संपन्न हैं। अगड़ी जातियों की अगली पीढ़ी धीरे धीरे गांव पर अपना क्लेम कम रही है तो उसका असर भी एक दूसरे तरीके से हुआ है तमाम पुराने घर अब खंडहर में बदल रहे हैं और ओबीसी के तहत आने वाले परिवार अब गांव के नए सामंत हैं दलित अब भी दक्षिण टोला में ही समेट दिए गए है।

लेकिन मेरे लिए गांव में होना केवल ऊपर जो लिखा वो नहीं था, इसके समानांतर मेरे भीतर स्मृतियों की एक अलग दुनियां चल रही थी और हर उस बात के लिए उदास कर रही थी जो बदल गया था। 2009 के बाद अब लौट कर आयी हूं। 11 साल लम्बा वक़्त होता है। मेरा बेटा तब ढाई साल का था और इस बार चौदह साल का। और सबसे बड़ी बात ये हुई थी कि तब पिता थे दुआर पर अब उनकी स्मृतियां थी।

मेरे बाबा ने अपने खेत में ही आम के पेड़ के नीचे अपना अंतिम विश्राम का स्थान चुना था, क्यों ये नहीं पता लेकिन जब भी गांव जाती वो आम का पेड़ बाबा लगता। वो पेड़ था भी ख़ास एक आम में तीन पेड़ आम, महुआ और कोयना एक साथ, हम जाते ही उस पेड़ से लिपट जाते जैसे वो पेड़ बाबा हो। हालात ऐसे बने कि पिता को आखिरी विदा रांची से करना पड़ा, वो कसक उन्हें होगी शायद और हमें भी …कितने लोग इस दौरान अदृश्य होते चले गए और परिचय के कितने गाछ बिरिछ भी, दोनों एक साथ उदास करने की बात थी।

गांव शुरू होते ही आनेवाला सिरिभगवान बाबा की बाड़ी उजाड़ थी, कुछ पेड़ ठूंठ बन कर खड़े थे। मेरी निगाहें सिंदुरिया आम के पेड़ को खोज रही थी वो लाल हरा पीला आम जिसका रंग बचपन में कोई जादू हुआ करता था और बाबा वाला बिज्जू आम का पेड़ भी तो नहीं था… सब ख़त्म होना है एक दिन आपकी अपनी स्मृतियां भी।

लेकिन पेड़ों की नई हरियाली कतार में नहर के दोनों ओर के बांध पर आबाद हो गई थी ये सरकार की योजनाओं के तहत का वृक्षारोपण था, शीशम के पेड़ ज्यादा दिख रहे थे और कुछ यूकेलिप्टस भी जो वहां सीधे बाहरी लग रहे थे,मेरे गांव में जो पेड़ सबसे ज्यादा उगता है वो नीम है, कहीं भी उग आता है, नीम के फूल का मौसम घूम गया और जड़ के नीचे उसके बिछे हुए फल भी … एक छुट्टी में अपनी चचेरी बहन और उसकी दोस्तों के साथ इन फलों को मैंने भी तो चुना था, तब गांव में एक आदमी आया करता नीम के सारे सुखाये फल बीज समेत ले जाता और पैसे देता, क्या अब भी लड़कियां ऐसा करती है ? मैं सोच रही थी, वो चचेरी बहन भी तो पिता की ही तरह अब केवल स्मृतियों का ही हिस्सा है..और गांव के बीचो बीच के दो विशाल बरगद के पेड़..जिस जगह का नाम ही बर -तर था मतलब बरगद की छांव, अपना वही पर उसके पत्तों से पिपहरी और घिरनी, चकरी बनाकर खेलना याद आया, बीते ग्यारह साल में उन दोनों बरगद की जगह नए पीपल के पेड़ थे और वो किशोर पीपल वयस्क हो गया था जो इनार से लगा था और गांव में मरने वाले किसी के भी किरियाकर्म मिट्टी का कलश जल के साथ उसी की डाल पर टंगा होता।
परिवर्तन और बदलाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन वो उदास तो करती ही हैं और याद भी दिलाती हैं कुछ भी सदा के लिए नहीं रहता, नाता-रिश्तेदारी भी संबंधों के बीच का प्रेम भी। संयुक्त परिवारों में जो लोग और उनका परिवार गांव से निकल गए और वापस केवल छुट्टियों व खास मौके पर ही आया करते तो प्रेम दूसरे तरह से बना रहता था, गांव जाने का मतलब, छुट्टी के वो डेढ़ महीने हर दिन उत्सव। लेकिन एक दिन भाइयों के बीच खेत भी बंटता है, घर भी और परिवार भी, उनके बीच का नेह -मोह -प्रेम भी..और गुलज़ार रहने वाला दुआर बियाबान भी होता है।

वैसे भी दिसंबर होली, छठ का मौका नहीं था इसलिए इस बार गांव जाने पर अपनी उम्र के वो सब जिनके साथ हम खेलकर बड़े हुए थे, कोई नहीं मिला, जो बच्चे दिख रहे थे उनसे कोई पहचान नहीं थी, मैं भी उनके लिए अनजान ही थी। हम गांव में पछिम की ओर से प्रवेश कर रहे थे जब सबसे पहले नीमियातर की काली माई मिलती है, हमारे बचपन में वहां तीन चार नीम के पेड़ और एक पेड़ के नीचे चबूतरा था जहाँ सातों मईया एक साथ होतीं, गांव -घर का हर शुभ काम के साथ पहला दृश्य टोली में यही आने का होता … नीमिया के डार मइयां लावेली हिडोलवा कि ..मेरे अवचेतन में ये गीत खुद सामूहिक स्वर में बजने लगा और भाई ने कार पर ब्रेक लगा दिया, अब एक छोटा सा मंदिर बन गया था वहां, नीम के तीन चार पेड़ अब भी थे उनपर मइयां का हिंडोला भी लटक रहा था। हम गांव में प्रवेश करने से पहले काली माई को प्रणाम करने पहुंचे कि वहां घर के पड़ोस की भाभी पूजा करती मिल गयी, दो साल हुए कैंसर ने भईया की जान ले ली थी तब भईया का परिवार राउरकेला में रह रहा था, उनके आखिरी महीनों में मैं राउरकेला से गुजरी थी एक दिन रुकी भी लेकिन वो ईलाज के लिए वेल्लोर चले गए थे तो मिलना नहीं हुआ और वो भी हमेशा के लिए चले गए, अब सीधे भाभी को देख रही थी, उनकी आँखों में उदासी थी लेकिन ये देखकरअच्छा लगा कि वो पहले के जैसे ही सामान्य साड़ी में थीं सफ़ेद में नहीं, कैंसर केवल भावनात्मक रूप से ही किसी को नहीं तोड़ता बल्कि आर्थिक रूप से भी कमर तोड़ देता है और इन्हें तो राउरकेला की अपनी जमी जमाई जिंदगी छोड़कर गांव वापस आना पड़ा था , भाभी बता रही थीं कि बेटे को चेन्नई में प्लेसमेंट मिल गयी है और बेटी बतौर कम्प्यूटर टीचर सोहनपुर के किसी इंस्टिट्यूट में पढ़ाने जाने लगी है, पांच – छह हज़ार मिल जाता है और गांव में माँ -बेटी का काम चल जाता है इससे … मैं सोच रही थी कितनी छोटी जरूरतें और कितनी छोटी छोटी खुशियां होती है।

लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे ऐसी ही छोटी ख़ुशी सिर्फ इस बात से मिल रही थी कि अभी भी गांव में कुछ लोग हैं जो पहचान रहे हैं मुझे और सुनते ही भागे भागे मिलने चले आये दुआर पर वो पड़ाँइन चाची भी जिनकी कमर इस बार एकदम झुक गई थी, वो देखकर हुलस कर मिलने चली आयी थीं, मुझे ध्यान आया एक -दो साल पहले ही इनका एक जवान बेटा सड़क दुर्घटना में ख़त्म हुआ था, वो हमें देखकर खुश थीं। गोंसार वाली भीखम बो चाचीभी मिली और उनकी बड़ी दियादिन की बड़ी पुतोह राजमंगल बो भी और उनकी अपनी दोनों पुतोह चन्द्रमा और चन्द्रिका की बहुएं भी, चन्द्रिका की पत्नी को मैं माला की माँ कहती थी, ये सब हमारी किशोरावस्था में गांव में नयी कनिया बन के उतरी थी, भीखम चाचा मेरे घर खेती बारी का काम संभालते थे और चन्द्रिका भी इस नाते ख़ास लगाव रहा, याद आया माला का जन्म, हम उसे देखने जाते तब कितने सपने थे चन्द्रिका की बहु की आँखों में, उसकी आंखों की चमक बढ़ जाती जब हम कहते इसे खूब पढ़ा लिखा कर डॉक्टर बनईह … हमारे लिए वो माला को खूब पाउडर लगा कर तैयार करती, वो कभी तेल में नहाये गांव के दूसरे नवजातों की तरह नहीं मिलती थी। इसी सपने चन्द्रिका को गांव से पहले दिल्ली गुजरात भेजा फिर दिल्ली और फिर पंजाब .. वो इस बार भी गांव पर नहीं मिला और माला के बारे में पूछने का ध्यान मुझे गांव से निकल आने के बाद हुआ। मैं तो उस वक़्त इस बात से ज्यादा सोच में पड़ गयी थी कि जब अरसे बाद गांव जाने पर भी पुरानी पीढ़ी के कुछ लोग हमें पहचान रहे हैं, आते ही हमसे मिलने चले आए लेकिन ऐसा अगले कुछ सालों बाद नहीं होगा, धीरे धीरे हमें पहचानने वाली पीढ़ी ख़त्म हो जाएगी और अगर गांव ऐसे ही मेहमान की तरह लौटे तो गांव हमें पहचानना बंद कर देगा, इस सच और इस ख्याल ने फिर मुझे और उदास कर दिया।

लेकिन एक बात सच में सबसे अच्छी लगी वो ये कि सरकार की सायकिल योजना ने सचमुच पुरे इलाके की तस्वीर बदल दी है, जिस सड़क की ओर देखिये लड़कियां साइकिल से स्कूल या ट्यूशन पढ़ने को जाती आती दिखती हैं, संपन्न घरों में साईकिल के बाद अब उन्हीं लड़कियों के लिए स्कूटी भी खरीदा जाना आम है। माता -पिता बेटियों की पढाई को लेकर फिक्रमंद दिखते हैं और उनकी उड़ानों में उनका साथ देते हैं। स्मार्ट फोन ,सस्ते डेटा और इंटरनेट तक सहज पहुंच ने ज्ञान का और सूचनाओं का विकेन्द्रीकरण किया है, टीचर अच्छे ना हों, स्कूल अच्छा नहीं हो, लाइब्रेरी जैसी सुविधा नहीं उपलब्ध हो लेकिन गूगल है तो वो टीचर से लेकर मार्गदर्शक सब बनकर मदद करता है, सूचनाओं के स्तर पर लोकल और ग्लोबल के फ़र्क़ की रेखा दिनों दिन पहले से हलकी होती जा रही है ये सच है और सकारात्मक बदलाव है।

और हाँ इन दिनों जब पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान किसान बिल के विरोध में नवंबर के आखिर से दिल्ली की सीमा पर आंदोलन कर रहे हैं, किसान बिल और किसानों के प्रतिरोध और आंदोलन की बात देश भर में हो रही है तब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मेरे इलाके के किसान इस आंदोलन से दूर अपनी ही दुनियां में अपनी अगली फसल की तैयारी में लगे हुए थे, गांव के चारो और सरसों खिली हुई थी और गेहूं भी एक हाथ बढ़ आया था। जबकि मैं जानना चाहती थी कृषि कानून पर ये क्या सोचते हैं, अपने इलाके से लगते देवरिया जिले के किसानों से पूछने पर वो बता रहे थे, सरकारी खरीद होती है तो एमएसपी जितने पैसे मिल जाते हैं जब तक सरकारी खरीद हो रही है ठीक ठाक चल जाता है, सरकारी खरीद बंद हो जाने का जवाब वो खुद देना भी नहीं चाह रहे थे। वैसे किसान बिल को लेकर उनकी उदासीनता इस वज़ह ये भी है कि उत्तर प्रदेश में पहले दौर की चकबंदी हो चुकी है अब दूसरे दौर की चकबंदी भी शुरू है, सबके खेत मिले हुए हैं तो बड़ी खेती दिखती है लेकिन निजी तौर पर दो -चार एकड़ से ज्यादा जमीन ज्यादातर के हिस्से में नहीं आने वाली और यही सोच उन्हें दिल्ली में चल रहे इस आंदोलन से दूर रख रही है।
जबकि बिहार में पहले ही दौर की चकबंदी भी पूरी नहीं हुई है, किसान आंदोलन की खबर उन्हें है लेकिन बिल के विरोध को लेकर बहुत स्पष्ट नहीं हैं। जब तक अनाज केवल खाने के लिए उपजना हो तो एमएसपी और मंडी का कोई ख़ास मतलब नहीं रह जाता है, लेकिन स्थानीय दूकानदार या साहूकार को अपनी फसल बेचने पर उन्हें कीमत से आधी या उससे भी कम पैसे मिलते हैं, ये बात वो भी जानते हैं। पैक्स के मार्फ़त होने वाली सरकारी खरीद में भी जरूरी नहीं कि हमेशा निर्धारित एमएसपी की कीमत पर सरकार उस फसल को जनता से खरीदे, कभी कभी बिल्कुल आधी या उससे भी कम कीमत में उन्हें अनाज बेचना होता है, क्योंकि बिचौलिए यहाँ भी होते हैं जो बिकवाने का कमीशन दूसरी तरह से हासिल कर लेते हैं।

बहरहाल, बदले हुए बिहार के मेरे इस बदले गांव की बदलाव की जमीनी हक़ीक़त ये भी तो है कि विकास के तमाम सूचकांकों और मानकों में यह राज्य नीचे से टॉप करने वाले स्थान पर है, विकास का कोई टापू हो सकता है हो कहीं लेकिन बड़ी तस्वीर सबसे कम साक्षरता, सबसे ज्यादा बेरोजगारी, सबसे ज्यादा गरीबी, सबसे ज्यादा कुपोषण और सबसे ज्यादा ख़राब शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था इसी से बनती है। जबकि देश की सबसे युवा आबादी इस राज्य की है यहाँ की 65 प्रतिशत आबादी युवा और काम करने की उम्र में है। लेकिन यहाँ 52 फीसदी आबादी बहुआयामी गरीबी की शिकार है। पिछले तीन वर्षों के दौरान भारत का प्रति व्यक्ति विकासात्मक व्यय ₹ 7,935 रूपये रहा जबकि बिहार का ₹ 3,633 यानि पुरे देश के मुकाबले आधे से भी कम। आंकड़ों में देखे तो बिहार की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय 3650 रुपये है जो राष्ट्रीय औसत 11,625 रुपये के लगभग एक तिहाई है। बिहार एकमात्र भारतीय राज्य भी है, जहाँ की अधिकांश आबादी – 52.47% – निरक्षर है। और इस सबके बीच में लगातर आर्थिक विशेषज्ञ ये कहते रहे हैं कि बिहार को इस चक्र से यहाँ पूंजी निवेश करके ही निकाला जा सकता है।
ये भी गौर करने वाली बात है कि बिहार में लॉक डाउन के दौरान बेरोजगारी का औसत भी राष्ट्रीय औसत से बहुत ज्यादा रहा, तो इसी के कारण छोटे स्तर पर कुछ सकारात्मक बदलाव या नई शुरुआत भी हुई है।

मेरे गांव के भी लौट कर आये प्रवासी मजदूरों ने अपना छोटा मोटा उद्यम शरू किया है जो अब खुद के लिए नौकरी सृजित करने का एक रास्ता है, हमें भरोसा भी इन्हीं छोटे प्रयासों पर ज्यादा है। वापस लौटते हुए पुल पर सिनन बो का समोसा खाने के लिए रुकी तो उनके बेटों को उनके साथ काम करते देख तसल्ली हुई जो लॉक डाउन में लौटे तो फिर वापस नहीं गए, उन्हें भरोसा है कि अब गांव के इसी पुलिया पर बैठकर भी कमाई हो सकती है, उनकी आखों में भरोसे की उम्मीद अच्छी लगी।

… इसी वक़्त मोटरसाइकिल से कहीं से लौट रहे गांव के ही दो भाई हमें देख रुक गए हमने प्रणाम किया, उन्होंने बताया लड़का देखने गए थे बड़े भाई की बेटी के लिए, कईसन लईका का घर दुआर रहे? पसन आईल ? दोनों मायूस थे बीस लाख तिलक की बात बता कर और अपने नहीं सक सकने की मज़बूरी पर जबकि इसी पैसे के लिए भईया का एक बेटा पहले मिडिल ईस्ट और फिर मलेशिया कमाने चला गया… कुछ चीज़ें बदलनी अब भी बाकी है नहीं ? बेटियों की शादी का बोझ और बेटों का पलायन, उनका प्रवासी बन किसी और शहर, देश उड़ जाना।

क्या संयोग है जब मैं लिख रही हूं उससे पहले की शाम अपने एक बातचीत के कार्यक्रम में नीदरलैंड के सरनामी भोजपुरी और डच भाषा के गायक राजमोहन हमसे जुड़े थे, कल ही तो वो अपना गीत गिटार की हलकी धून पर सुना रहे थे, दुई मुट्ठी एक दिन की मजूरी,कइसे भला चले, हाथ गोड़ में जांगर बा,अउर पीठ भी जबर,हौसला भी सबमें डबल है, साथ में इरादा भी अटल है,अब दुख रही न चिंता,जेब रही न खाली,घर आंगन आपन रही,रही जिंदगी मा खुशहाली,निकल रे सरनाम के ओरे…राजमोहन पांचवी पीढ़ी के हैं लेकिन उनके बाप-दादा की पीड़ा कल शाम भी उनके गीतों के बोल और संगीत में ध्वनित हो रही थी….और अब भी मेरे कानों में गूंज रही है ..

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