शेरपुर…गांव को गांव ही रहने देने में आनंद है

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गोपाल जी राय

गांव का नाम जेहन में आते ही गांव के वे बीते हुए दिन याद आ जाते हैं जब गांव के प्राईमरी पाठशाला में पढ़ने के लिए जाने पर पटरी, दवा​​त,कलम के साथ एक सीमेंट या अनाज का खाली बोरा भी पीठ पर लेकर जाना पड़ता था। बाबू साहब, मुंशी जी, पंडित जी पढ़ाते कम थे मारते ज्यादा थे। लेकिन अब वे दिन बस यादों में ही है। बड़े होने पर जब हाई स्कूल में गये तब भी स्थिति ज्यादा नहीं सुधरी। वहां भी घंटा बजने वाली मुंगरी से पिटाई होती रही और उसका एक अलग ही आनंद रहा। गांव के स्कूल में अधिकतर बच्चे गांव के ही होते थे। स्कूल के प्रधानाचार्य ऐसे थे कि हाई स्कूल के छात्रों के घर रात में भी जाकर देखते थे कि वह पढ़ रहा है कि सो रहा है। लेकिन अब वह सब नहीं दिखाई दे रहा। आप पढ़ो चाहे न पढ़ो स्कूल से कोई खास मतलब नहीं है। गांव में प्राइमरी स्कूल और मीडिल स्कूल तो आजादी के पूर्व से है लेकिन अब तो पब्लिक स्कूल, प्राइवेट ​स्कूल, बालिका विद्यालय, महाविद्यालय भी गांव में खुल गये हैं।

आप सोच रहे होंगे कि मैं किस गांव की बात कर रहा हूं तो गांव का नाम बता ही देता हूं। शेरपुर नाम है इसका। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद तहसील में गाजीपुर से बलिया जाने वाले सड़क पर कुन्डेसर से दो किलोमीटर ​दाहिने तरफ है।

गांव का देश की आजादी में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शेरपुर गांव की प्रतिष्ठा बलिदानियों के गांव के रूप में है। असहयोग आंदोलन ने इस गांव के लोगों में नई चेतना पैदा की। गांव के 8 लोग राष्ट्रीय झंडे को तहसील भवन पर फहराने के चक्कर में शहीद हो गए थे जिस कारण गांव का नाम देश के मानचित्र पर अंकित है। इस पूरे घटनाक्रम तो विस्तार से दर्ज किया जाए तो इस घटना के आलोक में इतिहास कुछ यूं बनता हैं।
वे वर्ष 1942 के सुलगते दिन थे। एक दशक पहले बेरहमी से कुचला गया सविनय अवज्ञा आंदोलन अपनी राख से दोबारा उठ बैठा था। अंग्रेजों भारत छोड़ो की सिंह गर्जना के साथ उत्तर प्रदेश में गाजीपुर जिले के शेरपुर गांव में कई सप्ताहों से सभा और धारा-144 को तोड़ने का कार्यक्रम चलाते हुए जन-जागृति जुलूस आयोजित किए जा रहे थे। मुंबई में महात्मा गांधी सहित अनेक राजनेताओं की गिरफ्तारी की सूचना ने शेरपुर के माहौल को और भड़का दिया।

11 अगस्त को शेरपुर के दो छात्रों यमुना गिरि और भोला राय ने विद्यालय में मीटिंग की और दूसरे दिन मुहम्मदाबाद के तीन विद्यालयों में हड़ताल की व जुलूस का नेतृत्व किया। तब जिला मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस ने भोला राय के हाथ से राष्ट्रीय ध्वज छीनकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जिस पर दूसरे दिन यमुना गिरि के सुझाव से गाजीपुर घाट स्टेशन को आम लोगों ने जला दिया, निर्माणाधीन हवाई अड्डे पर आक्रमण किया और झोपड़ियों में रखे साजो-समान में आग लगा दी।

शेरपुर गांव के लोगों द्वारा जगह-जगह सरकारी मशीनरी को ठप करने का उद्देश्य सिर्फ विरोध प्रदर्शित करना था। लूटे गए खजाने को भी किसी ने हाथ तक नहीं लगाया। व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल जा चुके डा. शिवपूजन राय यह अच्छी तरह जानते थे कि आंदोलन में जनता की सक्रिय भागीदारी ही रणनीति की प्रभावशीलता, वैधता और उसकी सफलता का परिचायक हो सकती है। छात्र जीवन की राजनीति और क्रांतिकारियों से निजी संपर्क को उन्होंने स्थानीय आंदोलन को सक्रिय और जीवंत बनाने में प्रयोग किया।

17 अगस्त को डा. राय के नेतृत्व में कुंडेसर, हरिहरपुर आदि गांवों के नौजवानों की टोली ने टेलीफोन सेवा भंग करते हुए मुहम्मदाबाद की निचली अदालत और पोस्ट आफिस पर कब्जा कर वहां राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया। टोली के सदस्य लगे हाथ तहसील पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मांग कर रहे थे, जिस पर डा. राय ने कहा, ‘हमारा कदम जनता को पुलिस और सेना के भय से मुक्त करना है। अत: निश्चित योजना के तहत कल 18 अगस्त को ही झंडा फहराया जाएगा।’

अगली सुबह डा शिवपूजन राय के नेतृत्व में विशाल समूह भारत माता और महात्मा गांधी का जयगान करता हुआ तहसील पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने निकला। रास्ते में पड़ने वाले गांवों के लोग इस जुलूस का हिस्सा बनते गए। डा. राय ने अपनी योजना समझाते हुए कहा, ‘हो सकता है तहसील भवन पर झंडा फहराने को बढ़ने पर मैं गोलियों से भून दिया जाऊं, पर मेरे कंधे से कंधा मिलाकर मातृभूमि की बलिवेदी की तरफ बढ़ने वाले जवानों, तब तक आगे बढ़ते रहना, जब तक तहसील भवन पर ध्वज फहर न जाए। याद रखें यदि पुलिसकर्मियों पर हमारा कोई भी जवान मिट्टी का छोटा से छोटा टुकड़ा भी फेंकेगा तो वह टुकड़ा हमारे कलेजे पर चोट करेगा।’ यह अहिंसा का चरम बिंदु था।

इसी बीच विश्वनाथ उपाध्याय ने सूचना दी कि तहसील प्रांगण में पुलिस बल की संख्या 30 है। वहीं तय हुआ कि दो-दो जवान एक-एक सशस्त्र पुलिसकर्मी को पकड़ लेंगे, जिससे वे गोली चलाने में सफल नहीं होंगे और सामने से आ रहे विशाल जुलूस का नेतृत्व कर रहे डा. शिवपूजन राय तहसील भवन पर ध्वजारोहण कर देंगे। विश्वनाथ उपाध्याय, दादा तिलेश्वर राय के नेतृत्व में 70 जवानों का चयन हुआ। अहरौली में जुलूस दो भागों में बंट गया और चल पड़ा। बाजार बंद था, लेकिन सड़क के दोनों तरफ लोग इस गौरवपूर्ण नजारे को देख रहे थे।

तहसील के निकट पहुंचते ही हृदय नारायण राय से संकेत मिलते ही ऋषेश्वर राय ने दीवार फांदकर दो सिपाहियों की बंदूकें पकड़ लीं। इसके बाद 20 अन्य युवक परिसर में प्रवेश कर गए। बंदूकों की छीना-झपटी में नारायण राय, बंशनारायण राय, वशिष्ठ राय और राजा राय घटनास्थल पर ही बलिदान हो गए। रामबदन उपाध्याय और सीताराम राय मरणासन्न अवस्था तक पहुंच गए। रामाधार राय, कृपाशंकर राय, रामनरेश यादव और सामू दादा, जो कम घायल थे, साथियों संग प्रांगण से बाहर चले गए।

डा. राय तहसील भवन के पीछे की स्थिति भांपकर झंडा लिए तहसील भवन की ओर बढ़े। तहसीलदार ने गोली मारने की धमकी दी तो डा. राय ने कहा, ‘तुम अपना काम करो, मैं अपना काम कर रहा हूं।’ ज्यों ही डा. राय ने कदम बढ़ाए, तहसीलदार ने तीन गोलियां उनके शरीर पर दाग दीं और शेरपुर का यह अप्रतिम योद्धा सदा-सदा के लिए मां की गोद में सो गया। यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया। अगले तीन दिन तक गाजीपुर में ब्रिटिश सरकार का अता-पता नहीं था और वहां जनता की सरकार थी।


ज़िले के गजट में लिखा है कि अंग्रेज़ों ने इसके जवाब में ”चारों ओर आतंक का बाज़ार गर्म कर दिया।” जल्द ही, ”गांव के गांव तबाह कर दिए गए, लूट, और आगज़नी मचाई गई।” सेना तथा घुड़सवार पुलिस ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के प्रदर्शनकारियों को कुचल कर रख दिया। उन्होंने अगले कुछ दिनों में ज़िले भर में लगभग 150 लोगों को गोली मार दी। रिकॉर्ड्स बताते हैं कि अधिकारियों और पुलिस ने यहां के नागरिकों से 35 लाख रुपए लूट लिए। लगभग 74 गांवों को जला दिया गया। ग़ाज़ीपुर के लोगों को सामूहिक रूप से 4.5 लाख रुपए का ज़ुर्माना भरना पड़ा, जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि थी।

आजादी के बाद से ही देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उनके समकक्ष के नेता गांव में आते जाते रहे हैं। जिस कारण गांव में बिजली की सुविधा आदमी के लिए तो नहीं लेकिन नलकूपों के लिए पहली पंचवर्षीय योजना से ही रही है। सड़क 1974 तक तो कच्ची रही है लेकिन आपात काल से पूर्व जब नक्सली आंदोलन बिहार से उत्तर प्रदेश की तरफ बढ़ रहा था और उसका प्रभाव साथ के जिलों पर पड़ रहा था, उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा गांव में आये तो हेलीकॉप्टर से थे लेकिन उनके आगमन के कारण सड़क बन गयी।


पंचायती राज के कारण गांव की सभी गलियां और संपर्क मार्ग अब बन गये हं। स्ट्रीट लाइट और सोलर लाइट भी लग गयी है। गांव में पीने के पानी के लिए पानी की टंकी बन गयी है। गली गली सरकारी नल और जगह-जगह हैंड पंप लग गये हैं। कच्चे मकान समाप्त हो रहे हैं। पक्के मकानों में कूलर और एसी लग रहे हैं।
खेल के नाम पर तो सभी खेल खेले जाते हैं लेकिन कभी कुश्ती प्रमुख रहा है। अब काफी समय से वालीवाल ने उसका स्थान ले लिया है। वालीवाल पूरे साल खेला जाता है। शायद ही देश का कोई वालीवाल टीम हो जिसमें गांव का लड़का न हो। वालीवाल ने गांव के लड़कों को काफी नौकरी दी है। पहले जब गांव के लड़के हाई स्कूल में ज्यादा नहीं पढ़ते थे तो नौकरी के नाम पर पुलिस,पीएसी,सेना में भर्ती होना ही उनका उद्देश्य होता था। वे नौकरी करते थे और पूरा पैसा घर परिवार को भेजते ​थे। अवकाश ग्रहण करने के बाद गांव में आकर खेती बाड़ी संभालते थे। जब से उच्च शिक्षा की व्यवस्था गांव में भी हो गई है और इजीनियरिंग, मेडिकल, की पढ़ाई के लिए लोग लड़कों को वाराणसी,इलाहाबाद, पटना,भेजने लगे वे पढ़ाई के बाद वहीं रहने लगे हैं। आईएएस,पीसीएस करने वाले तो इलाहाबाद,दिल्ली के बाद देश के किसी कोने में चले गए और अब वहीं पर मकान बनाकर रहने लगे हैं। कभी कभार गांव आते हैं।

गांव गंगा के किनारे है इसलिए गांव पर गंगा भी अपना रौद्र रूप भी दिखाती रहती हैं। हर वर्ष बाढ़ से गांव प्रभावित रहता है। इधर के कुछ वर्षों से तो गंगा कटान पर है और वह गांव को अपने अंदर लेने में लगी है। सरकार उसे रोकने का प्रयास तब करती है जब बाढ़ आ जाती है और सैकड़ों ट्रक बोल्डर बहा ले जाती है। हालांकि इस वर्ष गाँव शेरपुर को कटान से बचाने के लिए जो प्रयास शुरू हुआ था उसमें कुछ सफलता भी मिली है। गंगा नदी के कटान को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा ठोकर बनाने का कार्य शुरू कर दिया गया है। अगस्त सितम्बर में ग्रामीण डॉ प्रशांत राय और डॉ संतोष राय ने प्रधानमन्त्री के पोर्टल पर लिखा उसके बाद प्रशासन और गांव के लोगों कि सक्रियता बढ़ी जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 21 करोड़ रुपए की जिन दो परियोजनाओं को स्वीकृति मिली थी। इस प्रयास में गांव के अनेक मुर्धन्य लोगों ने प्रयास किया था। आज वह समवेत प्रयास रंग लाता दिख रहा है।


गांव पर दो देवियों का आर्शीवाद हमेशा बना रहता है। गहमर स्थित कामाख्या देवी का और दूसरा रेवतीपुर की भगवती माई का। वैसे तो गांव में बहुत से डीह हैं। काली माई, महावीर जी, ब्रह्मस्थान, सत्ती माई हैं लेकिन उनका दायरा सीमित है।

कहने के लिए क्षेत्रफल की दृष्टि से गांव पूरे प्रदेश का सबसे बड़ा गांव है। लेकिन गंगा में उसकी बहुत सी जमीन चली जा रही है। गांव में खेती का ढंग अब काफी बदल रहा है। परंपरागत खेती से हटकर अब लोग नकदी खेती कर रहे हैं। अनाज की जगह सब्जी का उत्पादन कर रहे हैं। वहीं कुछ लोग अपना खेत दूसरों को देकर किराये पर खेती करा रहे हैं। खेती में आये बदलाव से पशुओं का महत्व कम हो गया है। पहले जहां सबके यहां गाय,भैंस, बैल रहा करते थे अब ट्रैक्टर दिखाई देता है। पहले गांव से दूध शहरों को जाता था अब बाहर से पैकेट का दूध गांव में आने लगा है।
गांव में खेती करना अब आसान नहीं है। मजदूरों का काफी अभाव है। पहले जहां गांव में हर प्रकार के व्यक्ति जैसे नाउ, धोबी, दर्जी, लोहार,कोहार, मोची, हलवाई, बनिया, हरिजन, यादव, मल्लाह, रहते थे और सब मिलकर कार्य करते थे। अब सभी अपने पुश्तैनी कार्य को छोड़कर शहर की तरफ भाग रहे हैं। घरों में ताला लटका रहता है।


पढ़ने के लिए लोग कस्बे में छोटे बच्चों को भेजने लगे हैं। लोग अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल में भेजने लगे हैं। लेकिन वे कुछ कर नहीं पाते हैं क्योंकि स्कूल में जो होम वर्क दिया जाता है वो घर का कोई अभिभावक पूरा ही नहीं करा पाता और गांव में ट्यूशन की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए सक्षम लोग अपने बच्चों को गाजीपुर,बलिया व वाराणसी में बच्चों को भेज देते हैं और किराये के मकान में रहकर पढ़ाई करते हैं क्योंकि वहां ट्यूटर भी मिल जाते हैं।
आज शादी व्याह का आलम यह है कि जहां पहले किसी भी शादी ब्याह में पूरा गांव अपनी इज्जत समझता था, और अपने सामर्थ के अनुसार मदद करता था। अब लोगों ने बारात घर और होटलों में शादी ब्याह करना शुरू कर दिया है।
गांव का एक प्रसिद्ध त्योहार है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का जिसमें जिसके घर मनायी जाती है उसके परिवार के सदस्य और लड़कियां कहीं भी हों इस मौके पर गांव में लौटती हैं और उल्लास पूर्वक इस त्योहार को तीन दिन तक मनाते रहे हैं और एक दूसरे को भोज भात देते रहे हैं। जिसमें पास के ही गांव कबीरपुर के ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा रही है। अब स्थिती यह हो गयी है कि ब्राह्मणों के नये भोजन करने आते ही नहीं हैं। उसमें वे अपनी बेइज्जती समझते हैं। बहुत से तो गांव के बाहर ही रहते हैं जो पुराने बूढ़े पंडित आते हैं उनके लिए मारामारी होती है। एक ब्राह्मण तीन घरों के लिए दिया जाता है। अब वह किसके घर खायें,एक जगह मुंह जुठारते हैं,दूसरे जगह खाते हैं और तीसरे जगह छन्ना ले जाते हैं।
होली और दशहरे के त्योहार पर पहले जो भी लोग गांव से बाहर रहते थे आते थे। गांव में रामलीला का मंचन होता है और दशहरा का मेला भी लगता है लेकिन अब धीरे-धीरे लोगों का उत्साह कम हो रहा है। होली भी गांव में एक घर से दूसरे घर घूम-घूम खेली और गाई जाती रही है लेकिन उसमें भी गिरावट आयी है। अब लोग पारंपरिक त्योहारों की जगह जन्म दिन और शादी की वर्ष गांठ मनाने लगे हैं।

गांव की स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई खास परिवर्तन नहीं दिखता। अस्पताल तो बना है लेकिन न तो डॉक्टर हैं न नर्स,बस भवन है। गांव के लोग पुराने वैद्य और हकीम या आर एम पी के सहारे ही जी रहे हैं। बड़ी बीमारी होने पर गाजीपुर, मऊ या फिर वाराणसी जाना पड़ता है। कभी जमानियां तहसीली और दिलदार नगर विधानसभा क्षेत्र में रहा, गांव अब मोहम्मदाबाद तहसील और मोहम्मदाबाद विधानसभा में है। लोकसभा पहले गाजीपुर फिर रसड़ा अब बलिया है।

थाना वही पुराना भावर कोल पहले भी था अब भी है। अब गांव में पुलिस चौकी खुल गयी है। गांव में पुलिस चौकी कोई नहीं चाहता था लेकिन जब थाना अपने पहले स्थान मछटी से गाजीपुर बलिया सीमा पर चला गया तो दूर हो गया और इसका बहाना बनाकर प्रशासन ने पुलिस चौकी खोल दी। पहले गांव में किसी भी समस्या को लोग आपस में या फिर प्रधान के घर बैठकर सुलझा लेते थे। लेकिन अब लोग तुरंत थाने पुलिस के यहां चले जाते हैं।
अब तो गाजीपुर या वाराणसी से गांव पहुंचने के लिए रोडवेज की बस चलने लगी है लेकिन गांव का स्वभाव नाम के अनुकूल है इसलिए वह चलती कम है, बंद ज्यादा होती रहती है। जब से पूर्वांचल एक्सप्रेस चालू हुयी है, गांव का संबंध लखनऊ से हो गया है लोग किसी भी काम के लिए सीधे लखनऊ चले जाते हैं। गांव में जहां पहले बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी एक्का चलती थी ट्रैक्टर, कार, जीप, टेम्पू, ई रिक्शा, स्कार्पियो का आना जाना लगा रहता है। गांव के पास ही दोनो दिशाओं में पीपा पुल बन जाने से गंगा पार जो नावों से किया जाता था अब कार,जीप से होने लगा है। कभी—कभ तो लगता है कि इतना विकास से बढ़िया वे पुराने दिन ही थे जिसमें आपस में प्रेम भाव बना रहता था। लोग एक दूसरे के घर में आना जाना रखते थे। लेकिन क्या करेंगे यही विकास है जिसमें किसी के पास मिलने जुलने का भी समय नहीं है, सब अपने में हैं।

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