विस्थापन का दर्द दिल में लिए…गांव से जुड़ा ही रहा मेरा रिश्ता

अंजनी कुमार
फिल्म /टी.वी निर्देशक
मेरा जन्म मुंगेर जिले के सहूर गांव में हुआ। ये गांव पंडित कार्यानद शर्मा के गांव के रूप में जाना जाता है। यहीं उनका जन्म हुआ था। मेरी मां श्रीमती ज्योतसना शर्मा और पिता श्री धनंजय सिंह दोनो ही शिक्षक थे। बचपना के बाद मां के तबादले के हिसाब से मेरा गांव बदलता रहा।  यानी गांव का साथ मेरा रिश्ता विस्थापन का दर्द समेटे हुए है।

इस लिहाज से देखें तो मेरे जन्म से लेकर चार साल का समय कन्हैया चक में बीता। उस वक्त का तो कुछ भी याद नहीं। लेकिन एक धुंधली स्मृति जरूर है की मेरी मां ने या मां के परिवार वालों ने मेरे पैदा होने से पहले मनौती मांगी थी की कोई संतान हुआ तो काली मां को सोने की नाथिया चढ़ाएंगे। मैं पैदा भी हुआ, वहां रहा भी लेकिन लेकिन वो मन्नत मेरे माता जी के मृत्यु उपरांत मेरे पिता जी ने मेरे 45 साल हो जाने के बाद पूरा किया वो भी जब किसी ज्योतिषी ने मुझे ऐसा करने की सलाह दी।

हमारा गांव से जुड़ा नजदीकि स्टेशन धनौरी  एक छोटा सा स्टेशन है। यहां कोई एक्सप्रेस ट्रेन नहीं रुकती। पैसेंजर ट्रेन के सवारी वहां से उतर कर पैदल ही आसपास के गांवों में जाते हैं। गांव शहूर स्टेशन से मात्र एक किलीमीटर की दूरी पर है। बावजूद इसके उस जमाने में सड़क की सुविधा नहीं थी और स्टेशन से रोड की कोई कनेक्टिविटी नहीं थी। लोग स्टेशन से लोग उतर कर पैदल ही आया करते थे। वैसे भी पैसेंजर ट्रेन की फ्रीक्वेंसी ज्यादा नहीं रहने के कारण लोग या तो बस से हाईवे रामपुर उतर कर रिक्शा से आया करते थे या किऊल या लखीसराय से रिक्शा के माध्यम से गांव शहूर आया करते थे। कई बार तो लोग किऊल लखीसराय से 7 किलोमीटर पैदल चल कर आते थे। उनके साथ में सामान होता था। गांव में एक हाई स्कूल के साथ ही मिडिल स्कूल भी था और वहां छात्रावास की व्यवस्था भी थी। दूर दराज के गांव के बच्चे वही रह कर पढ़ते थे। स्कूल के पास एक बेतरतीब सा खेलने का ग्राउंड था। जहां लोग क्रिकेट खेला करते थे। स्कूल का अपनी पुस्तकालय था, जहां हिंदी,इंग्लिश के पेपर आया करता था। गांव में परस्पर सामंजस्य का वातावरण था। सारे ग्रामीण मध्यम वर्गीय परिवार के थे। जिसके कारण आपस में द्वेष नहीं था। घर के छत से दूर फैली पहाड़ियां दिखा करती, आते जाते ट्रेन बच्चों के आर्कषण का केंद्र हुआ करते। गर्मी के दिनों में छत पर सोने का मजा ही कुछ और था। नानी के हाथ बना आलू कद्दू को सब्जी और लकड़ी के चूल्हे पे बनी फुल्के की याद अक्सर आया करती है।                                                                                      ….विस्थापन का दर्द

हालाकि पांच साल के बाद मैं पटना जिला के सदीसोपुर गांव में आ गया। क्योंकि मां का तबादला सदीसोपुर हो गया था। पहली क्लास में बैठने को बोरा मिला और स्लेट और सरकंडा के बने कलम-दवात से पढ़ाई शुरू हुई। अद्भुत था, गांव का बचपन। जहां स्कूल था, वो गांव से दूर था। आसपास कोई नहीं रहता था। पास में ही रोड के दूसरी तरफ अंग्रेजों के जमाने का बना हुआ एक और स्कूल था। मां बेसिक स्कूल की शिक्षिका थीं जिसकी शुरूआत गांधी जी के प्रेरणा से हुई थी। स्कूल से सटे एक बड़ा सा खेलने का मैदान था। तड़के सुबह दिन की शुरूआत महुआ बीनने से होती, फिर स्कूल और उसके बाद सरपट खेल के मैदान में, और मौका मिला तो गंवई बाजार। यही दिनचर्या हुआ करती और यही मनोरंजन का साधन हुआ करता था। छुट्टी के दिन कोई दोस्त मिलते नहीं थे तो आम, इमली, शीशम का पेड़, ये हमारे दोस्त हुआ करते थे। शीशम के पेड़ का गुलेल बहुत मजबूत और गुल्ली डंडा बनाया करते। ट्रैक्टर और बैलगाड़ी पर जाते गन्ने की चोरी करना भी हमारे मनोरंजन का एक साधन हुए करता। सदीसोपुर गांव स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर बसा है। सदीसोपुर में पैसेंजर ट्रेन रुका करती है। आस-पास के लोग पटना जाने के लिए यहीं से ट्रेन पकड़ते थे। स्टेशन के पास बड़ा मार्केट नहीं था, हालाकि छोटे खाने-पीने की दुकानें थी। रेलवे क्रॉसिंग थी। इसके जरिए लोग पैनाल या पटना से होते हुए लोग विशुनपुरा या विक्रम भी जाया करते थे। रोड के बाएं ओर दाएं आम के पेड़ का बगीचा था। रोड के किनारे जामुन और इमली का बहुतायत पेड़ थे। आज भी वो दृश्य याद है कि हमारे स्कूल के एक बच्चे का इमली के पेड़ से गिर कर मौत हो गई थी। स्टेशन से आने पर दाहिने तरफ बेसिक स्कूल था और बाएं तरफ मिडिल स्कूल। वहां से जब आगे बढ़ते थे तो बस्ती शुरू होती थी। वहीं पर एक आदमी थे जो हड्डी या मोच बैठाने का काम किया करते। जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे बस्ती और घनी हो जाती थी। वहां हम बचपन में आटा पीसने और तेल पेराने जाया करते थे।                                       ….. विस्थापन का दर्द

 

वहीं एक नारा लिखा था,
”चौदह रुपया करुआ तेल, देखो रे इंद्रा के खेल।”  इसके आगे जाने पर हाई स्कूल था और उसके बाद बाजार शुरू हो जाता था। आस पास के गांव के लोग सदीसोपुर ही खरीदारी करने आया करते थे। हमलोग भी सब्जी खरीदने वहीं जाया करते। 25 पैसे की एक किलो भिंडी अभी भी याद है। बाजार जाने के क्रम में ही एक जमींदार की बड़ी हवेली थी। पता नहीं कौन थे। बाल मन कभी जानने की कोशिश भी नही किया।
उम्र के बढ़ने के साथ साथ शौक भी बदलने लगे। साईकल सीखने के शौक चढ़ा लेकिन मुश्किल ये थी बाबूजी के पास साईकल थी नहीं। एक महाशय स्कूल में साईकल लगा स्टेशन ट्रेन पकड़ने जाया करते। उनकी साईकल का ताला खोल हाफ पैडल साईकल चलाना सीखना शुरू किया। पैर कटे पर साईकल चलाना स्वतः सीख गया। जैसे कोई भी ताला खोलने की महारथ हासिल कर ली थी। इसी महारथ में हम स्कूल में पाचक नमकीन और पेड़ा बेचने वाले सज्जन की ताला खोल चट कर जाया करता। स्कूल के गेट पर एक महिला बैठती थी। वो चिनिया बादाम और पाचक बेचा करती। मोहर्रम व दुर्गा पूजा की हल्की यादें हैं। ट्रेन का आना जाना ही हमारा घड़ी का काम करता था। संपूर्ण क्रांति के समय मालगाड़ी से चप्पल ले कर भागते लोग याद हैं।
खेल में क्रिकेट, फुटबॉल और गिल्ली डंडा पसंदिदा खेल हुआ करता। बड़े लोगों का फुटबॉल मैच बड़े रोमांच से देखा करता। उनका नींबू चूसना आज तक याद है। मैच के दरम्यान मारपीट का भी होना याद है।

इसी बीच छुट्टियों में अपना पैतृक गांव कंचनपुर जो की सदीसोपुर से कंचनपुर और खड़गपुर जाना होता। किसी की शादी, किसी के मरनी में भी हमलोग जाया करते थे। और जाने का सवारी हुआ करता था भूलेटन जी की बैलगाड़ी। अदभुत रोमांच होता उस बैलगाड़ी से सफर करने में। मेरा पैतृक घर रोड पर नहीं था रोड से लगभग पांच सौ मीटर अंदर था मां चुकी पैर से लाचार थी तो उनके लिए डोली आती थी और वो डोली में बैठ कर घर तक आया करती थी। कभी-कभी लाठी के सहारे भी आ जाया करती थी। डोली का प्रचलन शादी में खूब हुया करता था। लड़का का आना और लड़की का विदा होना डोली से हुया करता, फिर बैल गाड़ी, टमटम से जाया करते। बिहटा स्टेशन से आना होता तो हमलोग टमटम से गांव आते या बिहटा से बस से विक्रम जाने वाले रास्ते में गोवर्धन तर उतरते या गौरी शंकर सिंह के घर के पास उतर कर पैदल 2 किलोमीटर चल कर गांव आते। आरी चलते रास्ते में कोई भी हो, पहचान गए तो हाल समाचार पूछ लिए, नहीं पहचाना तो पूछ लिया परिचय। हम खड़गपुर होते कंचनपुर गांव पहुंचते। एक ही गांव में दो गांव का होना अजीब सा लगता था। खड़गपुर के लोग थोड़ा ज्यादा समृद्ध थे। कंचनपुर वाले थोड़ा कम। भोज-भात भी शायद नहीं होता था। आगे चलकर जब मैं बड़ा हुए तो खड़गपुर के गंगा शरण सिंह थे जो राज्य सभा सांसद रहे। बैल गाड़ी या टमटम वही गंगा शरण सिंह जी के घर तक ही जाती जिसे लोग बड़ तर कहा करते। वही भुंसार, छोटे किराना का दुकान एक सिलाई करने वाले मौलवी साहब की दुकान थी। गांव की अजीब संरचना थी। रोड से आने पर सबसे पहले टोला पड़ता था,जहां पिछड़ी जाती के लोग रहते। फिर आगे आने पर सवर्ण लोगों का घर शुरू होता। ज्यादातर मकान मिट्टी की और खपरैल थी। जो थोड़ा धनाढ्य थे उनके घर ईट और छत के थे। बचपन में ऐसा लगता कि अपना गांव कितना समृद्ध गांव है। गांव में दो तीन धनाढ्य लोग थे। उनके घर तक रोड जाती थी। बाकी लोगों का घर गलियों में था। मेन रोड से सड़क आई जरूर थी लेकिन गांव में सड़क खत्म हो जाया करती थी। जो की किसी भी गांव के विकास में बाधक है। गांव में एक मध्य विद्यालय है। मिडिल पास करने के बाद गांव के लड़के लड़कियों को 2 किलोमीटर दूर अम्हारा या पांच किलोमीटर दूर बिहटा हाई स्कूल में पढ़ने जाना होता। लड़कियां अम्हारा जाती पर लड़के बिहटा पढ़ने जाते। अजीब सी ईगो थी लोगों की। मध्य विद्यालय के पास छोटा सा कब्रिस्तान था। वही गांव का प्ले ग्राउंड भी था और इसके साथ ही लगा हुआ था एक छोटा सा तालाब। जिसमें भेंट के फूल बहुतायत मात्रा में हुआ करता। इसके साथ ही स्कूल के पास एक कुश्ती का अखाड़ा भी था, जिसमें गांव के लोग कुश्ती किया करते। स्कूल में लोग रात में नाटक भी करते थे जो बाद के दिनों में खत्म हो गया। आगे चलकर लोगों को राईफल और रंगदारी का शौक ज्यादा चढ़ गया।

गांव की अपनी मस्ती थी। सुबह उठना लोटा लेकर सीधा खेत में जाना। मूरत बाबा के पास हमलोग जाते थे। मूरत बाबा की मूर्ति का गर्दन कटा हुआ है। लोग कहते हैं की हमारे पूर्वज लड़ाई में मारे गए थे । वही खंडित मूर्ति है। वही के बसवारी से दातुन तोड़ना ज्यादा तर चिड़चिड़ी, नीम या बांस के दातुन करके हम घर आया करते। वहां नाश्ता तैयार रहता।

 

यदि अपने परिवार की बात करूं तो हमारा गांव का घर संयुक्त परिवार का बहुत ही खूबसूरत नमूना था। हमारे तीन बाबा और बाबा के एक चाचा का बारह रूम का घर था। एक बड़ा सा आंगन था। यहीं शादी ब्याह,श्राद्ध कर्म, भोज भात हुआ करता। घर के आंगन में कुआं था? तुलसी चौरा था जिसमें धाजा लगा होता। घर का प्रवेश द्वार इतना बड़ा था की हाथी अंदर आ जाए और वहीं ड्योढी बना हुआ था। चूड़िहार, या कोई भी उस ड्योढ़ी से अंदर नहीं जा सकते थे। अंदर जाते हुए मैनें हलवाहा या नाई को देखा है। इसे जनानी घर बोला जाता था। इसके अलावा हमलोग का दूरा हुआ करता था। वहां सभी अविवाहित और बूढ़े रहा करते थे। घर पे शादी शुदा लोग ज्यादा रहते, लेकिन रात में ही बाकी समय दूरा पर। दूरा पर गाय, भैस बैल रहा करते। हमलोगों की पढ़ाई भी वहीं लालटेन की रौशनी में हुआ करती। नाश्ता करने के बाद फिर दूरा पर आ जाते। फिर खाना खाने आते शाम में घर से चावल चना लेकर गमछा में बांध भूईसार चले जाते। वही भूनवाते और भूंजा लेकर खेत में भैंस चराते या खेत में फूटबाल खेलते स्कूल के पास कब्रिस्तान में। वही कब्रिस्तान, वही कुलदेवता का मंदिर। न कोई विवाद न कोई रंजिश।

मैं फिर अपना गांव कंचनपुर छोड़ सदीसोपुर आ जाता। आज से लगभग 45 साल पहले की बात करूं तो सदीसोपुर हमारे गांव से विकसित गांव था। जहां रेलवे,स्टेशन,बाजार सब था। यहां तक की पेयजल आपूर्ति भी नल से हुआ करती।
पांचवी क्लास में पहुंचते-पहुंचते मैने बोरा से टेबल की यात्रा पूरा किया। इसी सदीसोपुर से मेरे म्यूजिक प्रेम की शुरूआत हुई और टेबल पे तबला का ठेका बजाना शुरू किया ये कैसे डेवलप हुया मुझे पता नहीं। मेरा एक मित्र हुआ करता था चमार जाती का उसके पिता जी मरे हुए जानवर का खाल निकाल कर बेचने का व्यवसाय करते थे उस मित्र ने मिठाई के एक मिट्टी के बर्तन में चमड़ा मढ कर दिया और बोला इस पर बजाओ। इतना बड़ा गिफ्ट आजतक किसी मित्र ने मुझे नहीं दिया।
इसी बीच कभी नानी के घर शहूर, फूआ के घर नदवां अक्सर जाता रहता। शहूर में नानी के घर की यादें भी बहुत है। हम किऊल स्टेशन उतर कर आठ किलोमीटर पैदल चल कर शहूर नानी के घर आते। नानी के घर से श्रृंगी ऋषि, 1 जनवरी का पैदल पिकनिक मनाने जाना गर्म कुंड में नहाना खाना बनाना। ताश खेलना नानी यहां ही सीखा। जिसके घर चले जाओ लगता था अपना ही घर है। नानी गांव की होली कमाल की होती थी। एक गड्ढ़ा कर उसमें कीचड़ कर दिया जाता और सारे दामाद को उस कीचड़ में डाल दिया जाता। फिर शाम में अधि का कुर्ता पजामा पहन कर सबके घर जाना। ऐसी ही मस्ती का आलम फूआ के घर में दिखाई देता। बहुत ही खातिरदारी होती। भाभियों का गाना सुनना, हंसी-मजाक। खान पान, खेल कूद,अदभुत माहौल। एक विधवा भाभी थी शाम में खेल के आने पर पैर में तेल मालिश कर देती जिससे उन्हें अपार खुशी मिलती।                                                                    ….विस्थापन का दर्द
विस्थापन का यह सिलसिला चलता ही रहा। मां का तबादला सदीसोपुर से पटना हो गया। ऐसे में 12 वर्ष की उम्र में गांव से शहर आ गया। गांव आना जाना पहले की तरह ही लगा रहा। शादी ब्याह, मरनी और छुट्टी ये खास मौके होते। शादी में किसी का मंडप सजाना, खाना खिलाना, मरनी का पूरी जलेबी हमेशा याद रहता। बासी हो जाने तक हम लोग खाते। दही हमेशा लाल वाली मिलती। कभी उसका मक्खन और मिसरी भी मिल जाता। कच्ची चावल और दाल भोज में घर के लोग ही बनाते, पक्की हलवाई बना दिया करता। घर से पानी का लोटा ले जाना, पुआल के अटिआ पर बैठना पत्तल में खाना खाना। इसमें एक अद्भुत आनंद मिलता। गांव के हज्जाम, बढ़ई, भूईसरन, मौलवी जी, सावजी सब मिल कर एक बेहतर समाज की रचना करते थे। हमारे गांव में धोबी नहीं थे तो बाहर से बुला कर गांव में जगह दी गई लेकिन गांव मनचले लडको की उद्दंता के कारण वे लोग वापस चले गए।                        …   विस्थापन का दर्द

उसके बाद मेरी थिएटर और सिनेमा में सक्रियता बढ़ती गई और गांव जाने का सिलसिला थोड़ा कम होता गया। वैसे भी गांव का माहौल 1970-80 के बाद बदलने लगा। अब गांव के लोगों में आपसी झगड़े शुरू हो गए। वो किताब कलम की जगह राईफल खरीदने लगे। इसी गोली बारी में मेरे बड़े बाबा उसके शिकार हो गए। गांव में हत्या शुरू हो गई। नक्सल मूवमेंट चालू हो गया और गांव धीरे धीरे जंग का मैदान बनाए लगा। नरसंहार शुरू हो गए। जात -पात के झगड़े शुरू हो गए। अब बाबूजी गांव नही जाने देते। समाज रसातल में जाने लगा और गांव से दूरी बढ़ती गई। फिर 1992 में मुंबई पलायन कर गया,अपने सपनों की दुनिया में। बांह पसारे, अंजुरी मे तमन्नाओं की हसरत को समेटने।

गांव जाने का सिलसिला मेहमान की तरह हो गया। महानगर की चकाचौंध के सामने हमारा खूबसूरत गांव पिछड़ा लगने लगा। भाभियों की खूबसूरती में कमी आने लगी क्योंकि मेरी आंखों पर महानगर का चश्मा चढ़ चुका था। अब लोटा लेकर खेत जाने का ताकत नहीं रह गया था। रूम से निकलते ही टॉयलेट की आदत लग गई थी। गांव जाने पर लोग भी परदेशी ही समझने लगे थे। जाते ही पूछते कब तक हो? वो कभी नही बोलते ठहर जाओ, रुक जाओ। हम भी मेहमान की तरह जाते हैं और मेहमान की तरह ही लौट आते हैं। दुख होता है कि विगत 40 साल में हमारा गांव और पिछड़ गया। अच्छे पढ़े लोग शहर की तरफ पलायन कर गए है। गांव में नौजवान कम है, गांव में वही हैं जिनके साथ मजबूरी है। गांव की स्थिति देख कर दुख होता है। गांव का मध्य विद्यालय, उच्च विद्यालय का आकार नहीं ले सका। मजबूरन आज भी बहुत सारे बच्चियां और बच्चे सातवीं से आगे पढ़ नहीं पाए। आज गांव की हालत ये है की कभी जिस परिवार में 10 लोग सरकारी नौकरी में थे, आज बमुश्किल एक या दो लोग।                            …..विस्थापन का दर्द

मुंबई पलायन के बाद भी स्मृतियों में गांव सदा जिंदा रहा। तीन फिल्में बनाई वो भी गांव की पृष्ट भूमि पर ही। “कौवा हकनी”, कस्तूरी, और जिंदगी ह गाड़ी सैया ड्राइवर बीवी खलासी” महुआ का सीरियल बाहुबली, इम्तहान का निर्देशन किया वो भी गांव की ही पृष्टभूमि की थी। इस लिहाज से देखें तो गांव ने हमें कभी छोड़ा नहीं, हमने भले छोड़ दिया। इतना ही नहीं मेरी तीनों फिल्में “कौवा हकनी”, कस्तूरी, और जिंदगी ह गाड़ी सैया ड्राइवर बीवी खलासी” इनको समर्पित है। एक बालिका शिक्षा की बात करती है, दूसरी लड़कियों की शिक्षा की बात और अपने पैर पर खड़े होने की बात करती है तीसरी महिला सशक्तिकरण की बात करती है।

वनवासियों का गांव “घोड़ीपाड़ा”
इसी गांव के प्रति सर्मपण और प्यार से वशीभूत वापस बिहार के गांव में तो जा नहीं पाया लेकिन महाराष्ट्र के गांव ने मुझे बुला लिया। 2019 में पालघर जिला के दहानू तालुका के घोड़ीपाड़ा गांव में मैने तीन एकड़ जमीन पर खेती शुरू की जो मैने कभी नही की थी। नेचुरल फार्मिंग, सब्जियों की खेती। बिहार के अपने गांव से अलग मुंबई से 100 किमी दूर वनवासियों का गांव है “घोड़ीपाड़ा।” पहाड़ों से घिरा ये घोड़ीपाड़ा गांव बहुत खूबसूरत है। खेती में ये लोग बिहार के किसानों से ज्यादा प्रशिक्षित हैं, स्किल्ड हैं। लेकिन बिहार के गांव की तरह ही यहां विकास नहीं पहुंच पाया है। वही अशिक्षा वही गरीबी, वही नशाखोरी। लेकिन यहां बिहार की तरह असुरक्षा नही है। हम वहां आराम से खेती कर पाते हैं। यहां का सामाजिक ताना बाना अलग ही है। तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा प्रोग्रेसिव है। जात-पात का जटिल ताना बाना नही दिखता। मंदिर नही है, पंडित की जगह भगत हैं। कुल देवता इमली का पेड़ है। मस्ती है बहुत बड़े सपने नहीं है।

………मस्ती का आलम ये है की दारू के नशे ने 50 से 60 वर्ष की आयु सीमा के सभी आदमियों को मौत के आगोश में ले लिया है। जो बच्चे 10 वीं या 12 वीं तक पढ़ लिख गए है वो खेती नहीं करते बल्कि फैक्ट्री में काम करते हैं। जो अनपढ़ है वही खेती का काम करते है। मजदूरों का हब है ये गांव। विशेष रूप से महिलायें बड़ी संख्या में सुबह गाड़ी में भर कर खेत में काम करने जाती हैं शाम को लौट आती है। अपने घर की पूरी जिम्मेवारी भी निभाती हैं।कहा जा सकता है कि इस गांव ने एक बार फिर से मेरा बचपना लौटा दिया है। शूटिंग नहीं रहने पर ज्यादा तर अपने गांव घोड़ीपाड़ा में ही रहता हूं। पैतृक गांव, अपने दोस्तों को,भाभियों का सम्मोहन आज भी है लेकिन खुद को गांव के करीब पाता हूं। आम के पेड़, चीकू का पेड़, जामुन, नीम केला सब्जी यही तो मेरे बचपन के दोस्त हुआ करते थे। सादीसोपुर में आज फिर यही मेरे दोस्त हैं। शेरू मेरा कुत्ता मेरे साथ है। मेरे बिहार के गांव की स्मृतियां हैं। मुंबई की लोकल ट्रेन वनगांव आती है। स्टेशन से लगभग 5 किमी की दूरी पर गांव है। यहां आने केलिए शेयरिंग मैजिक चलता है या ऑटो रिक्शा रिजर्व कर के आ सकते हैं। शाम के ७ बजे के बाद सवारी नही मिलती। जिसके कारण बहुत से लड़के पास में बोईसर शहर है वहां काम के लिए नही जा पाते। ऐसे में जिसके पास मोटरसाइकिल है वही जा पाते है। शिक्षा की कमी हैं। सपने बड़े नही है। जितना है उसमें ही संतुष्ट हैं। औरतें बहुत मेहनती हैं। वो बाहर और घर का दोनों काम संभालती हैं। मर्द की तरह वो भी दारू पीकर मस्त रहती हैं। मर्द पसंद नहीं आया तो दूसरी शादी भी कर लेती हैं। कई मर्द भी दो शादी किए हुए हैं। दोनों औरतें साथ में रहती है। शादी करना इनके लिए सपना सा होता है। शादी में औरतें और मर्द पूरी रात नाचते हैं। एक खास तरह का परंपरागत वाद्य यंत्र बजाया जाता है। शादी में ताड़ी , दारु बीयर, ठंढ़ा अनिवार्य है। खाने में चावल और चिकन मिश्रित दाल खाते हैं। मुख्य भोजन चावल मछली और दाल है। चावल की रोटी या आटे की पतली रोटी भी खाते हैं।                                                                              …….. विस्थापन का दर्द

हरी मिर्च की खेती, शिमला मिर्च की खेती, टमाटर भरपूर मात्रा में होता है। लिली और मोंगरे के फूल की खेती भी भरपूर मात्रा में होती है। गांव में नहर की अच्छी सुविधा है। पास में डैम है। जिससे पीने का पानी आस-पास के इलाके में भेजा जाता है। लेकिन दुखद बात है की गांव के लोगों को पानी नहीं मिलता।
गांव में तीन छोटे बड़े राशन के दुकान हैं। दो मिडिल स्कूल हैं। गांव से कुछ दूरी पर दो सरकारी अस्पताल भी है। यहां के कम पढ़े लड़के मराठी फिल्म देखने के बजाए, भोजपुरी फिल्में देखते हैं गाने सुनते हैं उन्हें वो अपना सा लगता हैं। ताड़ी का व्यवसाय, दारू का व्यवसाय अच्छा चलता हैं। गांव का लगाव फिर से गांव खींच लाया है। रोजगार और शौक दोनों पूरा हो रहा है। खेत का काम, पढ़ना लिखना, म्यूजिक सुनना, नाटक करना, फिल्में बनाना सब चल रहा हैं। प्रकृति ही देवता है। उसी के शरण में हैं।                                        …..  विस्थापन का दर्द
लेखक परिचय:
पटना में लंबे समय तक रंगमंच के साथ जुड़े रहे। इसके बाद मुंबई आकर निर्देशक प्रकाश झा के साथ बतौर सहायक कई सालों तक काम किया।
संजय उपाध्याय, सतीश आनंद के साथ रंगमंच।
प्रकाश झा, महेश मांजरेकर के बतौर सहायक हथियार, तेरा मेरा साथ रहे, जिस देश में गंगा रहता है, विद्रोह, मृत्युदंड, बंदिश, मुंगेरी के भाई नौरंगी लाल ।
सीरियल—
बाहुबली, इम्तहान, साथ निभाना साथिया, ससुराल सिमर का, नीली छतरी वाले, चिड़िया घर, पीटरसन हिल, हर साख पे उल्लू बैठा है। रौशनी, दिव्यशक्ति

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