महानगर में भी गांव ( जमानियां ) की खुशबू जहां से उठती है, मन वहीं का हो लेता है

दिलीप पाण्डेय विधायक, तिमारपुर, दिल्ली

मैं गांव को छोड़ आया। लेकिन मेरा गांव जमानियां मुझे छोड़कर कभी नहीं गया। रोजी-रोटी की तलाश में मुझे गांव से निकलना पड़ा लेकिन गांव मेरे अंदर से नहीं निकला। आज भी मेरा गांव से गहरा नाता है। इस शहर में भी गांव की खुशबू जहां से उठती है, मन वहीं का हो लेता है। जमानियां गांव में मेरा पुश्तैनी मकान है। उसे बनवाएंगे और समय-समय पर वहां जाते भी रहेंगे। मैं हाल ही में बच्चों को लेकर गया था। वहां रामलीला दिखाया। गांव या आसपास के जो लोग किसी परेशानी को लेकर दिल्ली आते हैं, मैं उनकी सहायता करने का प्रयास करता हूं। आजकल जो लोग दिल्ली से जाते हैं या फिर दिल्ली के विषय में जानते हैं, यहां की सुविधाओं को देख रहे हैं, उन्हें लगता है कि आम आदमी पार्टी अच्छा काम कर रही है और पार्टी का विस्तार पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाके में भी होना चाहिए।
जिस जगह का मैं रहने वाला हूं, उसने शहर बनने की कोशिश की लेकिन बन नहीं पाया। यानी न गांव रह सका और न ही शहर बन पाया। लोग भी ऐसे ही रहे न शहर के न गांव के। शहर में रफतार ज्यादा होती है, गांव में कम। बाध्यता नहीं होती जमाने की गति से चलने की। इस कस्बे ने दोनों ही अवसर मुझे दिए। परिवार गरीब था तो जीवन का फलसफा सिखाने के लिए जीवन ही सबसे बड़ा शिक्षक बन गया। मसलन आठवीं कक्षा तक हवाई चप्पल, ग्यारहवीं कक्षा में जूता पहनना। होली-दीवाली, दशहरा में पांच पैसा से बढ़कर एक रूपया कभी नहीं मिला, लेकिन आनंद की मात्रा उतनी ही रही। पिताजी थे नहीं, माताजी हैं जो स्कूल में शिक्षिका थीं। पढ़ाई से ही जीवन को बेहतर बनाने का रास्ता खुल सकता है। इसलिए यही सिखाया गया कि पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं करना। जब भी दूसरी तरफ नजर गई तो डांट पड़ी। गंगा नदी के किनारे के पैदा हुआ तो तैरना सीख गया। बच्चा अच्छा बने इसलिए नानाजी स्वर्गीय प्रहलाद मिश्रा की देखरेख में कैमूर के मरीचा से नवासा पर जमानिया में आ गए थे।

प्रारंभिक शिक्षा जमानियां बाजार में हुई। पांचवीं कक्षा तक सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ाई हुई। फिर छठी कक्षा से सरकारी स्कूल में आ गया। बचपन से ही यह सोच बनी रही कि जो कुछ पाना है वह किताब के जरिए ही मिलना है। कभी यह सोच नहीं बनी कि किताब के बाहर बहुत कुछ सीखने को है। रैंक होल्डर कभी नहीं रहे, पर स्नातक तक सीखने को खूब मिला। बचपन की कई सारी घटनाएं ऐसी है जो खींच कर उसी गली में ले जाती हैं। दिया बटोरना, शाम को तराजू बनाना, नाना के पास बकुली होती थी, उसके सहारे कौड़ी तोलने का खेल। कहने का मतलब है कि खेलकूद के जो भी साधन थे वे पुरातन थे। बगीचे में ओला-पाती खेलते थे। ज्यादातर खेल उत्पात वाले होते थे। जब दसवीं कक्षा पास किया तो नौकरी करने का दबाव था। नौकरी में कुछ प्रशासनिक गड़बड़ियों के कारण छोड़कर आना पड़ा। 11 वीं में नेवी में भर्ती हो गया। हिंदू इंटर काॅलेज से ग्यारहवीं व 12 वीं की पढ़ाई की। ग्यारहवीं के बाद ही नेवल अप्रेंटिस ज्वाईन कर लिया था। नतीजा य​ह हुआ कि 12 वीं की पढ़ाई प्रभावित हुई। 12 वीं में भौतिक, रासायन और गणित में थर्ड डिविजन के साथ पास हुआ। बॉयोलोजी से भी पास हुए सेकेंड डिविजन से। नौकरी लग गई थी लेकिन कुछ प्रशासनिक गड़बड़ियों के कारण छोड़कर आना पड़ा। गणित विज्ञान का बोझ धरती के बोझ से उपर हो गया तो लाईन चेंज कर लिया फिर बीए में दाखिला लिया। विषय था अंग्रेजी, अर्थशास्त्र व मनोविज्ञान। इसी दौरान स्टेशन पर आरक्षण काउंटर पर कंप्यूटर दिखा। विज्ञान प्रगति पत्रिका नियमित पढ़ता था, जिससे कंप्यूटर में रुचि बढ़ी। एमसीए के प्रवेश तैयारी करने कानपुर चला गया। इसी के साथ गांव से नाता छूटा। राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भोपाल से 2005 में एमसीए किया।
वैसे तो जमानिया के विषय में कई कथा प्रचलित है। दो कथाओं के जरिए आपके सामने रखूंगा।
पहली कथा
जहां-जहां गंगा उत्तराभिमुख हुईं, वहां-वहां वह क्षेत्र अनायास ही तीर्थ बन गया। यहां भी गंगा अर्धचंद्राकार है और चंद कदम उत्तर की ओर भी चलती हैं। पर, अपन का गांव या छोटा-मोटा कस्बाई शहर कह लीजिए, गंगा के किनारे ही है। उसे भी मदन बनारस या कि मदन काशी कहा गया है। अब उसका आधुनिक नाम जमानियां है। इसकी चर्चा ‘बाबरनामा में होती है। वह अपने लाव-लश्कर के साथ नाव से यात्रा कर रहा था। उसका कारवां जमानियां के पास दो दिन रुका रहा। शिकार किया और फिर आगे बढ़ गया। उसने ही इस स्थान को ‘मदन बनारस’ नाम से संबोधित किया।
इसी जगह के पास जब भगीरथ गंगा को लेकर धरती पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे कि उनके रथ का चक्का यहीं आकर फंस गया। गंगा गोल-गोल चक्कर काटने लगीं। भगीरथ को भान हुआ कि यह तो परम पावन जमदग्नि ऋषि का क्षेत्र है। सो, उन्हें प्रणाम किया तो उनका रथ पुन: गतिशील हो गया। कहते हैं, जहां उनका चक्का फंसा, वहां एक बस्ती विकसित हुई, जिसे चक्का बांध कहा गया। यहीं से गंगा उत्तर की मुड़ती हैं और करीब-करीब आठ-दस किमी तक सीधे उत्तर ही बहती हैं। गंगा, जहां गोल-गोल घूमती रहीं, वहां आज भी घूमती हैं। उसमें कोई फंसा तो फिर बाहर नहीं निकल पाता। बरसात में इसकी विकरालता देखते बनती हैं। पुराण यही कथा सुनाते हैं। आप विश्वास करें, न करें। पर, गंगा भी सच हैं, चक्का बांध भी। इसी पूरे क्षेत्र को महाश्मशान भी कहा जाता है। यह काशी से भी पवित्र है। जो मरे, सो तरे। इसीलिए, गाजीपुर को भी लहुरी काशी कहा जाता है।

गंगा हमारी सांस्कृतिक विरासत भी हैं। इसी गंगा पर रवींद्रनाथ टैगोर भी मोहित हुए थे और राही मासूम रजा ने तो गंगा के नाम वसीयत ही लिख डाली है। राही की तरह किसी हिंदू ने घोषणा नहीं कि वह तीन मांओं का बेटा है-नफीसा बेगम, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और गंगा। नफीसा बेगम मर चुकी हैं। अब साफ याद नहीं आतीं। बाकी दोनों माएं जिंदा हैं और याद भी हैं। वसीयत में लिखते हैं-
मेरा फन तो मर गया यारो
मैं नीला पड़ गया यारो
मुझे ले जाके गाजीपुर की गंगा की गोदी में सुला देना।
मगर शायद वतन से दूर मौत आए
तो मेरी वसीयत यह है
अगर उस शहर में छोटी-सी एक नदी बहती हो
तो मुझको
उसकी गोद में सुलाकर
उससे कह देना
कि यह गंगा का बेटा आज से तेरे हवाले है।
आप सुन रहे हैं न, राही क्या कह रहे हैं?
बात सिर्फ राही की नहीं। जमानियां की..गाजीपुर की मिट्टी ही ऐसी है।
दूसरी कथा
जमानियां का संबंध यमदाग्नि ऋषि से जोड़ा जाता है। वैदिक युग में यह पूरा इलाका घने जंगलों से ढंका था और अनेक संतों के आश्रम यहां थे। रामायण काल में महर्षि यमदाग्नि का आश्रम यहां था, जो परशुराम के पिता थे। अन्य ऋषियों में गौतम और च्यवन के आश्रम भी यहां होने के उल्लेख मिलते हैं। स्वर्गीय राम नारायण मिश्र ने-यमदाग्नि पंचतीर्थ महात्म-पुस्तक लिखी है। इसकी पहचान पंचतीर्थ के रूप में है। आज भी इसे छोटा काशाी या मदन बनारस कहा जाता है। जो बनारस नहीं जा पाता वह मदन बनारस जाता है। मैंने भी अपने नाना का दाह-संस्कार वहीं किया। हमारे यहां दोनों तरह की परंपराए हैं। दाह संस्कार भी होता है व पटिया बांध के जल प्रवाह भी करते हैं। पानी में प्रवाह करेंगे तो मछलियां खाएंगी, ऐसी लोगों की धारणा है।
कुछ लोगों का कहना है कि जमानियां नामकरण अकबर के सिपहसालार जमन खान नाम पर हुआ। लेकिन अगर जमन के नाम पर नामकरण होता तो जमन बाग होता, जमनिया नहीं होता। कहा जाता है कि अकबर में जमाने में आढ़त-बाजार का केंद्र था जमानियां। उन दिनों अफगान अली कुली खान गाजीपुर का शासक था, उसने शहर जमनिया का विकास किया। कहा जाता है कि यहां विवेकानंद आए हैं। हमारे नाना कहते थे कि जमानियां स्टेशन से गांधी भी गुजरे थे तो पूरे इलाके के लोग उनके स्वागत के लिए गए थे।

गंगा नदी जमानियां शहर को दो हिस्सों में बांटती है। गंगा नदी के एक ही तरफ जमनिया रेलवे स्टेशन और जमनिया कस्बा है। स्टेशन और कस्बे के बीच 5 किलोमीटर का फासला है जहां बीच में गांव और खेत हैं। नई दिल्ली-पटना रूट का एक अहम रेलवे स्टेशन जमानिया है। यह गाजीपुर जिले का प्रमुख शहर है। यहां गंगा का बहुत ही गहरा पाट है। बचपन में हम नदी में तैरते हुए इस पार से उस पार चले जाते थे। जमानिया अब विधानसभा क्षेत्र है। नगरपालिका क्षेत्र में आता है। जमानियां के आसपास कई प्रसिद्ध गांव है। ढ़ढनी के बालेश्वर राय ने यहां दिल्ली में न जाने कितने परिवारों को रोजगार दिया है। उसी तरह सरयू राय का नाम भी काफी प्रसिद्ध है जिन्होंने अग्नि मिसाइल प्रोजेक्ट में कलाम साहब के साथ काम किया। तलाशपुर के निवासी शिव प्रसाद सिंह ने ‘अलग-अलग बैतरणी’ नामक प्रसिद्ध उपन्यास लिखा है। ढ़ढनी, बटावर, गहमर, रेवतीपुर आदि जमानियां के आसपास के प्रसिद्ध गांव हैं। ढ़ढनी भूमिहारों का गांव है, वहीं बेटावर व गहमर राजपूतों का गांव है।

जब मैं बड़ा हो रहा था तो कस्बे के कुछ साथियों के साथ मिलकर भगवान परशुराम की जन्म स्थली को व्यापक पहचान दिलाने की योजना बनाई। हमने भगवान परशुराम जन्म महोत्सव परिसर बनाया और अक्षय तृतीया के गंगा स्नान को विस्तार देने की योजना बनाई। हमारी सोच थी कि यदि हजारों की संख्या में लोग गंगा स्नान करेंगे तो बाजार की रौनक बढ़ेगी, रोजगार भी बढ़ेगा। हमने 4-5 साल अपना प्रयास जारी रखा। आगे चलकर भीड़ बढ़ी, तो रोजगार बढ़ा। हमलोग प्रभात फेरी निकाला करते और उस दौरान गाया जाता-
‘‘चलो जगाए मित रे बंधु, चलो जगाए मित रे,
कितने ही पल नींद में बीते, उदय अस्त भी हुए हजार,
चेतनशील बने सब जन, हम कर लें कल का सत्कार।’’
जो आयोजन हमने शुरू किया था, वो अब नहीं होता है। अक्षय तृतीया पर धर्म लाभ करने के लिए स्नान करने वालों की संख्या बढ़ गई है। कस्बे में हरेक जाती के लोग हैं। आज भी जमनिया बाजार में अपनी बड़ी-छोटी खरीदारी करते हैं और बाजार न सिर्फ रोजगार का जरिया है बल्कि सामाजिक मेल मिलाप और धार्मिक सौहार्द का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। आज भी लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे कि जमानियां जमाने से उपर है। आज भी हमारे यहां के मुसलमान आपके अभिवादन के जवाब में राम-राम ही कहते हैं। हमारे यहां 30 से 35 फीसदी मुसलमान आबादी है। इस इलाके के मुसलमान परिवारों का भदोही में कालीन व्यापार है। इसके साथ ही चार-पांच परिवार ब्राह्मणों का भी है जो बस्ती, मउ, गाजीपुर से आ कर यहां बसे हैं। गांव में हरेक जाति के लोग हैं। बनिया भी हैं, मारवाड़ी भी, धोबी हरिजन सब हैं।
कस्बाई गांव होने के कारण जमानियां में खेती करने वाले लोग नहीं रहे। पर पड़ोस के गांवों में खेती होती है। मेरे पास भी पांच बिगहा खेत है जो घर से दो किलोमीटर दूर बहादुरपुर गांव में है। गांव में कच्चे मकान नहीं बचे। छोटी-बड़ी हर तरह की दुकानें हैं। दो साप्ताहिक बाजार-शनिवार और मंगलवार को लगता है। खेतिहर किसान और ग्रामीण आबादी अनाज, सब्जी आदि की बिक्री और जरूरत के सामान खरीदने के लिए इसी बाजार पर निर्भर हैं। बाजार में किराना दुकान चलाने वाले मजीद चाचा को हिंदू रीति-रिवाजों की किसी भी पंडित से ज्यादा जानकारी है। सत्यनारायण पूजा, या दूसरे पूजा पाठ में कौन सी सामग्री लगेगी, इसके लिए उनको किसी पुर्जे की जरूरत नहीं है।

आज भी मैं समय-समय पर जमानियां गांव जाता हूं। इच्छा है कि जिस खेत का अनाज खाकर बड़ा हुआ, उन खेतों हरा—भरा कर दूं।, फिर से अनाज पैदा करूं, गाय पालूं, और उसी खेत का एक बड़ा हिस्सा विपश्यना केंद्र में तब्दील कर दूं। लॉक डाउन के दौरान गांव गया था। उसके बाद भी गांव गया था।  जब गांव जाता हूं तो पुराने लोगों से मिलता हूं। ग्राम प्रवास के दौरान स्कूल जरूर जाता हूं। पहले मिडिल स्कूल का गेट छूता हूं जो 6 से 8 तक है। इंटर कॉलेज जाता हूं, बगल में डिग्री कॉलेज है, उसका दरवाजा छूकर लौट आता हूं। एक गंगा घाट है जिसे टुटहिया कहते हैं, वहां बैठ कर चना,चटनी—पकौड़ी खाया जाता है। ग्राम यात्रा के दौरान अपने शिक्षकों से भी मुलाकात करना नहीं भूलता। कस्बे के पास हमारे गुरूजी उमेश सिंह यादव का चरण स्पर्श करने जाता हूं। डिग्री कॉलेज के शिक्षक अखिलेश सर जो हिंदी पढ़ाते हैं, शरत सर जो अर्थशास्त्र पढ़ाते थे उनसे आर्शीवाद लेना नहीं भूलता।

जमानियां डिग्री कॉलेज

पुत्र के साथ गंगा घाट पर

उमेश सर को आज भी हमारे भविष्य की चिंता रहती है। कहते हैं, ”कुछ कमो धमो, और लोगन के मदद कर जितना कर सकते हो।”
गांव में बेरोजगारी की समस्या है। यदि पूर्व सूचना देकर गांव चला जाउं तो दो चार दिन तो सिर्फ बेरोजगारों से मिलने में लग जाएगा। आज भी हमारे गांवो में रोजगार और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं बहुत हैं। इसके निदान की दिशा में प्रयास करना है।
समाज में काम करते हुए अंदर से जो फीलिंग आती है वो ये है कि जहां से लुढ़कना, खड़ा होना सीखा है, दफन भी उन्हीं गलियों में होउं। जीवन में संतोष और उम्मीद भी इसी बात का है​ कि एक छोर से दूसरे छोर की यात्रा में इस शरीर के माध्यम से कुछ जिंदगियां तो बेहतर कर जाउंगा।
आत्म परिचय
वर्तमान में तिमारपुर विधानसभा क्षेत्र से जीते दिलीप पाण्डेय की गिनती आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं में होती है। एक अक्तूबर 1980 को गाजीपुर जिले के जमानियां कस्बे में पैदा हुए दिलीप हांगकांग में एक आईटी कंपनी में नौकरी करते थे। 2011 में वह नौकरी छोड़कर लौट आए। यहां भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन में शामिल हुए। 2012 में जब आम आदमी पार्टी का गठन हुआ तो वे इसकी पहली कतार में शामिल थे। 2014 में आम आदमी पार्टी की दिल्ली इकाई के संयोजक बने। 2017 के नगर निगम चुनाव में पार्टी की बुरी तरह से हार के बाद इस्तीफा दे दिया था। 2019 लोकसभा चुनाव में केजरीवाल ने पांडे को उत्तर पूर्वी सीट से चुनाव लड़वाया। लेकिन वह बीजेपी के मनोज तिवारी और तीन बार कांग्रेस से दिल्ली की सीएम रह चुकीं शीला दीक्षित का मुकाबला नहीं कर पाए। इसके अलावा दिलीप यूनाईटेड नेशन और सिविल सोसाईटी की कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन के आजीवन सदस्य हैं। उनके द्वारा उनके नाना—नानी के नाम पर स्थापित गैर सरकारी संस्था राधिका प्रहलाद फाउंडेशन लगातार समाज के विभिन्न वर्गों के कल्याण के लिए काम करती रही हैं। गरीबों के ईलाज, निशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर लगाने के साथ ही मानवता के क्षेत्र में काम करने वाली लड़की को ह्यूमेनिटी अवार्ड भी देती है।
दिलीप पाण्डेय की माता विमला मिश्रा राजकीय बालिका इंटर कालेज जमानियां में अध्यापिका थी। उनका जन्म 1 अक्टूबर 1980 को हुआ। उनकी पत्नी का नाम प्रियंका पांडे है, उनके दो बच्चे हैं। साहित्य और लेखन में दिलचस्पी रखने वाले दिलीप की कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। दो किताबें दहलीज पर दिल पेग्विन प्रकाशन व खुलती गिरहें,कॉल सेंटर राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं। इसके साथ ही टपकी और बूदी के लड्डू बाल साहित्य हैं।

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