गांव का नाम, बफापुर बांथू… जिला…लोकतंत्र की जननी वैशाली

विकास कुमार

मेरा गांव कब आबाद हुआ ये तो ठीक-ठीक कहीं दर्ज नहीं है। लेकिन मेरे गांव का नाम बहुत दिलचस्प है: बफापुर बांथू। बफापुर को लेकर गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि इस गांव से जो लगान वसूलते थे वो मुस्लिम थे। बहुत पहले की बात है। अगला शब्द है, बांथू। इसके लिए वो कहते हैं कि बना बाबू एक थे जिनसे ये पूरा गांव है। करीब सौ से दो सौ घर भूमिहारों के। मुझे ये बताने में झिझकना नहीं चाहिए कि ये एक भूमिहार प्रधान गांव है। इस गांव में हैं तो हर जाति के लोग लेकिन दबदबे के मामले में भूमिहार आगे हैं।  ……बफापुर बांथू
एक जाति ही है, जाति की वजह से होने वाले छोटे-छोटे भेदभाव ही हैं जिसकी वजह से मुझे अपना गांव कई बार, अपना नहीं लगता।
लेकिन आज जब मैं जीवन के तीस बसंत देख चुका हूं खुद को पूर्ण पाता हूं। पूर्ण किसलिए? क्योंकि मेरा जन्म गांव में हुआ। मैं उस गांव में पैदा हुआ जो गंगा के करीब बसा है। मेरी परवरिश उस गांव में हुई जहां हर मुहर्रम जुलूस निकलता था और जब वो हमारे टोले में आता तो हमारी चाची, दादी अपने हिसाब से उसकी पूजा करती।                                                        ….बफापुर बांथू

चपन की किताबों में हम सब ने ही पढ़ा है: भारत गांवों का देश है या भारत एक ग्राम प्रधान देश है। जब मास्टर साहब ये पढ़ाते थे तो पता नहीं था कि हम जहां पैदा हुए, जहां बड़े हो रहे और इन खेतों, टोलों और घरों में बेधड़क घूमा कर रहे हैं, ये वही गांव है। और हम गांव वाले हैं जिससे देश बना है। आदि, आदि।


छुटकपन में हमने गांव को समझा भले ना हो लेकिन जिया खूब। भरपूर जिया। मुझे नहीं पता कि जो बच्चे गांव में पैदा नहीं होते। गांव में घर-घर जाकर बड़े नहीं होते। जिन्हें गांव के सबसे बड़े पेड़ के नीचे डोल-पात खेलने का मौका नहीं मिलता। जो माल-मवेशी देखते हुए बड़े नहीं होते वो बड़े होकर कैसे होते हैं? क्या उनमें कुछ छूट जाने का भाव होता भी है या नहीं। या वो जिस तरह से बड़े होते हैं वही उनका अतीत होता है, वो उसी में ख़ुश होते हैं।
मैं उस गांव से शहर गया जिसे पता था कि पर्यावरण के लिए प्लास्टिक सबसे ख़राब चीज है। ये तब की बात है जब मैं दस साल का था। तब गांव में लगभग हर घर के सामने दो-तीन दुधारू जानवर बंधे होते थे। उनके गोबर से ही खेती होती थी। गोबर एक जगह जमा किए जाते थे और फिर उन्हें बैलगाड़ी से खेत में पटा दिया जाता था। यही खाद था। मेरी दादी की उम्र की महिलाएं जिनके पास घर का काम होता नहीं था वो इन गोबर के टाल से जब भी मौका मिलता तो प्लास्टिक को चुन-चुन कर हटातीं।                                                                      ….बफापुर बांथू
बचपन में मुझे उनका ये करना अजीब लगता। सोचते क्या करती रहती हैं सब। अब लगता है कि वो समय से कितनी आगे थीं। आज प्लास्टिक को लेकर सरकारें लाखों खर्च कर रही हैं। शायद करोड़ों फिर भी ये संकट दूर नहीं होता।
गांव बाहर से जितना सुलझा हुआ दिखता है। गांव बाहर से जितना हरा-भरा दिखता है, अंदर से वैसा नहीं होता है। गांव की अपनी अलग मुश्किलें हैं। दीगर झंझटे हैं। जैसे किसी भी इंसानी समाज के होते हैं।
जैसा मैंने ऊपर कहा कि मुझे गांव वाला होने पर आज गर्व है लेकिन मुझे गांव की समस्याएं भी ठीक-ठीक दिखती हैं। इन समस्याओं को अपने स्तर से ठीक करने, सुलझाने की कोशिश भी करता हूँ लेकिन वो काफी नहीं है। बहुत काम करना है।                                                                                                          ….बफापुर बांथू


गांव से नौकरी के लिए बाहर गए लोग अक्सर गांव की हरियाली, नदी, तालाब और खेत-खलिहान को लेकर एक तरफ भाव रहते हैं। जैसे, सब अच्छा-अच्छा ही है। लेकिन ऐसा है नहीं। किसी भी समस्या को ठीक करने के लिए पहले उसे एक समस्या के तौर पर मानना जरूरी है।
कुछ मामलों में मैं अपने गांव को प्रगतिशील भी मानता हूँ। जैसे आज़ादी मिली 1947 में और 1950 से 1960 के बीच मेरे गांव में पुस्तकालय, स्कूल खुल गए। ये अपने आप नहीं खुल गए। या किसी सरकार ने नहीं खुलवा दिया। तब के लोगों ने कहीं से खर, कहीं से ईंट लाकर। मिट्टी का गारा बनाकर इसे खड़ा किया।
पुस्तकालय तो मेरे देखने तक वैसे ही था। खर-पतवार का। एक झोपड़ीनुमा लेकिन इसका होना ही बड़ी बात थी।
तब और भी परेशानियां रही होंगी। तब और भी मुश्किलें होंगी लेकिन उसके बाद भी पढ़ने-पढ़ाने के लिए ऐसी दीवानगी क़ाबिले तारीफ़ है।                                                                              ….बफापुर बांथू
आज हम कैमरे के युग में रहते हैं। बड़े नेता से लेकर छोटे-छोटे लोग भी कुछ भी करते हैं तो उसका फोटो-वीडियो बनवाते हैं। बनता है। लोग अपने काम को कहीं ना कहीं रजिस्टर करवाना चाहते हैं। किसी के काम का ब्योरा पीआईबी से जारी होता है तो कोई अपने जिले के पत्रकार को चाय, नाश्ता करवाकर ब्योरा छपवा लेता है। ऐसे कई लोग हैं जो सोशल मीडिया पर ही अपने काम का आभा बिखेरते रहते हैं।


लेकिन तब की सोचिए? देश के कई गांवों में से एक गांव में कुछ लोग बिना किसी बाहरी मदद के किसी घर से खर, कहीं से बाँस, कहीं से ईंट(जैसा मुझे गांव के कुछ बुजुर्गों ने बताया ईंट आसपास के ईंट भट्टों से चोरी कर के लाया गया था क्योंकि पैसे थे नहीं) जुटाया गया। फिर सब मिलकर ख़ुद से दीवार खड़ी किए। छपर रखाया और शुरू हो गया स्कूल-पुस्तकालय।
इन सारी बातों के बारे में जब आज कल्पना करता हूं तो लगता है कैसे थे वो लोग। तब गांव में जमीन के झगड़े खूब होते थे। लोग सीधे एक-दूसरे पर बरछा-तलवार चला देते थे। कानून-वानून का ना लोगों को पता था और ना ही डर। सबसे बड़ी सम्पत्ति थी, जमीन और जमीन के लिए मारना-मरना आम-सी बात थी।
अब ऐसा तो नहीं होता। बिजली दिन में 15-20 घंटे रहती है। हर घर गैस का चूल्हा है। ज्यादातर घरों के आगे से मवेशी खत्म हो गए हैं। कहें तो एक तरह से गांव समृद्धि हुआ है। खाने-पीने में भी बदलाव हुआ है। घर भी पक्के के हो गए। लेकिन गांव की सबसे बड़ी खूबी खत्म हो रही है। और वो है, आत्मनिर्भरता।                ….बफापुर बांथू

गांव पहले सही मायने में आत्मनिर्भर थे। गांधी जैसा गांव चाहते थे वैसा ही। अब गांव भी शहरों की माफ़िक़ सरकारों के भरोसे हैं। नाला-नाली बनाने से लेकर साफ-सफाई तक के लिए। इस बीच, गांव से पलायन बहुत तेजी से हुआ है। खेती-किसानी वही कर रहे हैं जो बाहर नहीं जा सके। या जिन्हें नौकरी नहीं मिली।
घर-घर में टीवी की आमद हो गई है। शोर मचाते न्यूज चैनल गांव के लोगों का दिमाग़ ख़राब कर रहे हैं। ख़बरिया जगत के एजेंडेबाज़ी से अनजान गांव वाले इसे घटों सुनते-देखते हैं और इस वजह से गांव, गांव से ही कट रहा है।
कोरोना कल में ही मैंने गांव में कई बड़े बदलाव देखे। जैसे समाजिकता खत्म। दिमाग में चीन और पाकिस्तान के रास्ते अपने बगल में रह रहे मुसलमानों के प्रति नफ़रत का भाव रखना। और इन सब में टीवी का बड़ा अहम रोल है।
आजकल गांव में बतकही का स्तर भी और तरीक़ा भी बदला है। बात शुरू होती है देश की राजनीति से और ख़त्म होते-होते शुरू हो जाती है हाथापाई या गाली-गलौज। जो आज न्यूज़ चैनल वाले करवा रहे हैं, वो हमारी तरफ़ सालों पहले से होते आ रहा है। शाम में टीवी पर होनेवाले न्यूज़ डिबेट वैसे देखे जाते हैं जैसे कुश्ती देखी जाती है। एक सौ प्रतिशत असली दृश्य बताता हूँ।                                                                                  ….बफापुर बांथू
शाम का वक्त है। सात से साढ़े सात बजे का समय है। फ़ुल वॉल्यूम से थोड़ा कम पर टीवी चल रहा है। एक हिन्दी चैनल समाचार चैनल लगा हुआ। इस टाइम स्लॉट पर इस चैनल पर एक डिबेट होता है जिसका ऐंकर है तो एकदम गोलूमोलू-सा लेकिन चीख़ता बहुत तेज़ है। इस ऐंकर को पिछले दिनों एक पार्टी के प्रवक्ता ने लाइव कार्यक्रम में ‘नहीं मई फ़्रेंड, मैं आपको फिर से भंडावा कहूँगा…’ बोल दिया था। इस ऐंकर की लोकप्रियता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि शो शुरू होने से पहले आस-पड़ोस के तीन चाचा जिसमें से एक रिटायर फ़ौजी हैं, आ चुके हैं। शो शुरू होता है। ऐंकर स्क्रीन पर है। वो बोलना शुरू करता है। अभी दो-चार लाइनें ही बोली होंगी कि कुर्सी पर दोनों पैर रखकर बैठे फ़ौजी चाचा अपनी मूँछ पर ताव देते हुए कहते हैं—आया बेट्टा…!’              ….बफापुर बांथू
उनका ये कहना कमरे में बैठे बाकी लोगों के लिए एक सामान्य बात है। सब अभी भी स्क्रीन की तरफ़ ही देख रहे हैं। डिबेट शुरू हो चुकी है। विपक्ष की तरफ से आया एक प्रवक्ता अपनी बात रख रहा है। एंकर उसे बीच में काटते हुए बोलने लगता है। सब एकदम से ख़ुश हो जाते हैं। एंकर वीर रस के किसी कवि की मानिंद बोल रहा है। बोले जा रहा है। माहौल में ऊर्जा है। सब एकदम देख रहे हैं। एंकर अपनी बात खत्म ही करनेवाला होता है कि एक बार फिर फ़ौजी चाचा की दमदार आवाज़ कमरे में गूँजती है—‘ये ये ये ये ये ये ये चढ़ गया बेट्ट्टा!!!!’
ये ठीक उसी तरह की ध्वनी है जैसी कुश्ती के मैदान में एक पहलवान दूसरे को चारों खाने चित्त कर देता है तो किनारे बैठे लोग निकालते हैं।

यहां मीडिया का यही माने हैं। चढ़ जा, उतार दे, चीर दे, फाड़ दे; और यही वजह है कि सोशल मीडिया पर लगभग हर रोज़ आलोचना झेलने के बाद टीवी पर ऐसे कुश्तीनुमा शो यथावत चल रहे हैं या लांच हो रहे हैं। टीवी को खासकर हिन्दी के समाचार चैनलों को पता है कि उनका दर्शक वो नहीं है जो मीन-मेख निकालता है। दिनभर सोशल मीडिया पर बैठा रहता है। उनका दर्शक अब गांवों में है जो उनकी बातों को पत्रकारों का बोला हुआ मानकर भरोसा करता है। उनकी हरकतों को देखने के लिए टीवी से चिपका रहता है और सीधी-सपाट बातों में ज़्यादा रुचि लेता है। उसे मुश्किल ज्ञान या कई लेयर में चलनेवाली राजनीति, काजनीति से कोई मतलब नहीं है। ….बफापुर बांथू
मैंने इसी गांव का वो दौर देखा है जब आज जितनी बिजली नहीं रहती थी। पूरे गांव में चार-पाँच घरों में टीवी था जहाँ उम्रदराज़ लोग रामायण और ‘महाभारत’ देखने के लिए जमा होते थे और हम जैसे बच्चे ‘चंद्रकांता’ और ‘शक्तिमान’ देखने के लिए इस घर से उस घर भागते थे। जो जवान थे वो क्रिकेट मैच देखते थे। ख़ासकर विश्व कप के मैच। समाचार के लिए रेडियो था। टीवी नहीं। रेडियो पर शाम के साढ़े सात बजे प्रादेशिक समाचार चलता और फिर कुछ जगहों पर बीबीसी लंदन से प्रसारित होनेवाले समाचार चलते। खैनी खाते-खाते और बतकही करते-करते लोग रात के पौने 9 बजे का दिल्ली से प्रसारित होने वाला समाचार भी सुन लेते और साथ ही चर्चा करते—अरे येह में कुछो नहीं है। ई ऑल इंडिया रेडियो हई, ई सरकारी भर्जन हई।


माने लोग बूझते थे कि असली समाचार वही है जो सरकार या व्यवस्था के खिलाफ हो। उनकी बखिया उधेड़ता हुआ हो और तब ये खुराक केवल बीबीसी ही सप्लाई करता था।                                      ….बफापुर बांथू
एकदम से बिजली आई। टीवी घर-घर में आ गया। टीवी के आते ही लग गए छोटे-छोटे डिश वाले छत्ते और मार-धार से भरपूर टीवी चैनलों ने घरों पर कब्जा कर लिया और इन घरों में रहनेवालों में से अधिकतर के सोचने-समझने की क्षमता को ख़त्म कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे आजकल टिड्डी दल खेतों पर कर रहे हैं और उन्हें बर्बाद कर दे रहे हैं।
लेकिन आज इसी गांव में लोगों ने समाचार की परिभाषा अपने हिसाब से तय कर ली है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि गांव में सब बुरा ही हो रहा है, मेरे गांव में चार-पांच नवयुवकों का एक ग्रूप बना है। ख़ुद से ही। इन लड़कों ने कमाल का काम किया है। पूर्वजों ने जिस पुस्तकालय को खर-फूस से बनाया था। जो लगभग खत्म हो गया था तो मुखिया की कृपा से पक्का मकान बन गया उसे इन लड़कों ने पुस्तकालय बना दिया है। किताबें लौट आई हैं। कैरम बोर्ड है। नई कुर्सियाँ आई हैं। पढ़ने-पढ़ाने का माहौल है। और इसके लिए इन युवकों को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। ….बफापुर बांथू

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