रणमऊ गांव..दशहरी आमों की नयी बाग में कहां है वह लुत्फ

शैलेंद्र प्रताप सिंह
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी
जब छोटा था उस वक्त रणमऊ गांव में बिजली नहीं थी। हम लोग ढ़िबरी और लालटेन में पढते थे। शाम होते ही चारों तरफ़ घुप्प अंधेरा हो जाता था। सियारों की आवाजें आने लगती थी। शाम होते ही सभी बच्चे घर आ जाते थे। अंधेरा होते ही सब कुछ ठहर सा जाता था। यहां तक कि रात सात आठ बजे के बाद गांव के पास से गुजरने वाली सड़क पर भी कोई बस नहीं चलती थी। मैं जब यूनीवर्सिटी में पढ़ता था तो शाम करीब साढ़े सात,आठ बजे के आसपास इलाहाबाद से आने वाली ट्रेन से पास के लालगंज रेलवे स्टेशन (घर से करीब 8 कि मी ) उतरा तो बस रायबरेली की तरफ जाने को नहीं थी। उस समय घर सूचना भेजने का भी कोई साधन नहीं होता था कि कोई आकर ले जाये। एक मास्टर साहब शायद नरेंद्र प्रताप सिंह के यहां पहुंच कर परिचय दिया। उन्होंने खाना खिलाया, सोने की व्यवस्था की और फिर सुबह मैं करीब 8 कि मी के फासले पर अपने घर आ पाया था। अब तो रात भर सड़क पर हर तरह के वाहन चलते मिल जायेंगे।
घर से निकलते ही पश्चिम में गलियारा के किनारे रणमऊ गांव के लोगों के काफी घूर थे जहां सुबह—सुबह महिलायें अपने घरों से गोबर आदि लाकर डालती थी और वहीं गोबर से कंडे भी बनाये जाते थे। तब खेती के हल चलाने और दूध घी के लिये गांव के लोगों के पास जानवर खूब होते थे। दिन भर जानवर गांव के जंगल और बागों में चराये जाते थे। शाम को वे घरों को धूल उड़ाते वापस लौटते और बांध दिये जाते थे। उनकी ज्यादा सेवा नही करनी पड़ती थी। घर में जो कुछ जिसके पास होता था, भूसा पैरा वह उनके आगे डाल दिया जाता था। रात भर गोबर होता जिसके सुबह कंड़े बनते। वही गांव वालों का मुख्य ईंधन था। ट्रैक्टरों के आने के बाद आज गांव में जानवरों की संख्या बहुत कम हो गयी है। छोटे— छोटे किसान दो चार घंटे के लिये ट्रैक्टर किराये पर लेकर खेत जुतवा लेते है, बैलों को साल भर पालने की अब कोई जरूरत नहीं रही सो अब जानवर भी गायब, कंडे भी गायब और इन सबकी महक भी गायब। धूल मिट्टी और गोबर की वजह से गांव में अपनी एक विशेष गंध बहती थी। मुझे याद है कि जब मैं चाचा के पास कटरा म प्र ( 1960-62 ) में रहते हुये गांव आता था तो वह महक साफ साफ महसूस होती थी।

घूरों से आगे गलियारा आगे बढ़ने पर पहले पुलिया और फिर खूब बडे क्षेत्र में फैला रणमऊ गांव का ऊसर था, जहां खेलने कूदने, गायों और भैंसो के चरने का मैदान था। तब वहां आज की तरह घर नही बने थे। बस एक मात्र घर उसके उत्तरी किनारे पर महरा बाबा का था और पुलिया के पास रामदीन की सुअरों का एक बाड़ा था। ऊसर के और आगे बढ़ने पर एक मैदान था जहा हटिया लगती थी और गलियारे के दाहिनी तरफ मुड़ते ही बडा पुल था जिसके नीचे बसहा नाला बहता था और पुल पारकर ही कठोइया, लोहड़ा सहजौरा और सतांव आदि गांवों को जाने के कच्चे गलियारे थे पर आज अब वहीं पक्की सड़कें बन गयी है।
रणमऊ गांव का यह ऊसर / मैदान या ताल—तलैया का किनारा ही मुख्यत: हमारे बचपन में सुबह सुबह हम सबके निवृत होने का स्थान था और ताल तलैयों का पानी शौच की सफाई के लिये प्रयोग किया जाता था, वहीं तलैया की मिट्टी से हाथ भी धोये जाते थे। पास ही रामदीन के परिवार के सुअर इन मैदानों की साफ सफाई रोज कर देते थे। आज तो काफी घरों में ट्वाइलेट बन गये है,सुअर भी गायब हो गये हैं।
गांव के इस बड़े मैदान पर दूसरी महत्वपूर्ण बिल्डिंग गांव के प्राइमरी स्कूल का बनना था जो मेरे नौकरी में आने के बाद ही मेरे साथी संजय अग्रवाल जी का जिले में बेसिक शिक्षा अधिकारी बनकर आने और मेरे अनुरोध पर उनके द्वारा ज़िला स्तर पर तदनुसार प्रयास कर सन् १९८० के आसपास स्कूल स्वीकृत कराने के कारण संभव हुआ था ।
गांव के ऊसर में पतले पतले सुराग में एक छोटा कीड़ा रहता था,जिसमें पतली घास की डंडी डालने पर वह उसे पकड़ लेता था और डंडी के साथ बाहर आ जाता था। हम बच्चों के लिये यह कौतूहल था।

घर व रणमऊ गांव के जानवरों के मरने पर उन्हें ऊसर में ही उनकी खाल उतारने के बाद गिद्धों द्वारा साफ सफाई हेतु छोड़ दिया जाता था। गिद्धों नें तत्काल सूचना प्रसारित हो जाती और सैकड़ों गिद्धो को वहां आकर लड़ते झगड़ते मैंने देखा है। आसपास से गुजरने पर बदबू भी बहुत आती थी। गांव के ही अनुसूचित जाति के लोग उनकी खाल निकाल लेते थे। आजकल यह सब गायब है। न गिद्ध दिखते हैं और न कोई खाल निकालने में रुचि ले रहा है। जानवर भी अब कम हो गये और शायद उन्हें अब गाड़ दिया जाता है।

मेरे बचपन में रणमऊ गांव में बिजली नही थी सो गर्मी से निजात पाने के लिये मकान कच्चे होते थे। छतें भी कच्ची होती थी। छप्पर के बरामदे होते थे जिससे कच्ची दीवाल की भी रक्षा होती थी। मकान कच्चे होने के कारण उनमें पिरोड़ मिट्टी गर्मियों में लिपाई होती थी। मुझे याद है यह कार्यक्रम हर गर्मी में बाबा करीब एक हफ्ते का कराते थे और पूरी छतों पर पिरोड मिट्टी (तलिया तालाबों की जो काफी मजबूत होती है) की एक परत लगायी जाती थी। जरूरत के मुताबिक दीवालों पर भी मिट्टी लगती थी और वे इतनी मजबूत होती थी कि बरसात आराम से निकाल देती थी। इसका एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्रम यह बनता था कि इससे तलिया/तालाब भी खुद जाते थे और उनमें पानी रुकता था, गांव में पानी का जलस्तर काफी ऊपर रखता था। तो इस तरह कच्चे घर गांव के जल स्तर को भी ऊंचा रख गांव में पानी की पर्याप्त उपलब्धता बनाये रखने में मददगार थे पर अब पक्के घरो की बढती संख्या के कारण ताल तलैया से पिरोड (मिट्टी) निकाली नही जाती और वे आसपास की मिट्टी से भर रहे है, सूख रहे है, जलस्तर बुरी तरह घट रहा है।
बरसात के बाद गांव का जीवन बहुत ही मनोरंजक हो जाता था। एक तो कुछ दिन बाद ही दशहरा दीवाली और नागपंचमी के त्योहार होते थे, गांव में कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के कारण डलमऊ से गंगास्नान कर लौटते बैलगाड़ी के मेले को दृष्टिगत रखते हुये हटिया (मेला) भी लगती थी। हम बच्चे लोग लोग साल भर विशेष कर बरसात के बाद से ही हटिया का इंतजार करने लगते थे। याद है हटिया के दो तीन दिन पहले एक दो पान बीड़ी आदि की दुकाने रास्ते में जाने वाले यात्रियों के लिये लग जाती थी और पूरे गांव में चर्चा होती थी कि दुकानें आने लगी। हटिया के दिन तो जश्न रहता ही था। हटिया देखने के कुछ पैसे भी हम बच्चों को मिलते थे। हटिया में बकरे भी कटते थे। घर पर उस दिन गोश्त जरूर बनता था।

रणमऊ गांव में त्योहारों की रौनक
रणमऊ गांव में नागपंचमी का त्योहार बहुत धूम—धाम से मनाया जाता था और बच्चों और युवाओं के लिये ऊसर में महरा बाबा के घर के पास गांव का अखाड़ा बना दिया जाता था। सब बच्चे और युवा शाम होते ही वहां इकत्रित होते,अखाड़ा कूदते , और उसके बाद कुश्तियां होती। यह सब करीब दो तीन महीने चलता था। नागपंचमी के दिन कौन गांव में सबसे लंबा कूदता है और कौन सबसे बढिया कुश्ती लड़ता है,यह तय होता था। हम सब बच्चे, ज्यादातर पढ़ने वाले शाम को अखाड़े कूदने जरूर जाते। मैं भी खूब कूदा हूं, मैने भी कुश्तियां लड़ी है ।

यहां हमें यह ध्यान में रखना चाहिये कि यह उस समय के गांव की बात है जब टी वी की कौन कहे बिजली तक नही थी,मोबाइल नही थे,टेलीफोन नहीं थे, मनोरंजन के साधन नही थे, सूचना आने—जाने के लिये मुख्यत: चिठ्ठी पत्री प्रमुख साधन थे सो ऐसे समय में शाम को मनोरंजन के लिये इन अखाड़ों में रणमऊ गांव के युवा और बुजुर्ग भी आ जाते थे, कूद और कुश्ती का लुत्फ लेते थे और अंधेरा होने पर हम सब घर वापस लौटते थे। बच्चों में यह विश्वास था कि अखाड़े में अगर गिलहरी को मारकर गाड़ दिया जाये तो अखाड़ा खू​ब उछाल देता है, दूर तक कूद जाती है सो तमाम गिलहरियों के मारे जाने में मैं भी शरीक रहा हूं।

नागपंचमी (गुड़िया) के दिन सुबह सुबह गांव के प्रसाद लोध ढ़ोलक लेकर कान में कनैल का फूल लगाये, गांव में डुगडुगी बजाते अखाड़े की ओर चल देते,पूरा गांव इक्ठ्ठा होता, लम्बी कूद होती,कौन सबसे ज्यादा कूदा, कौन कितना कूदा यह निश्चित होता। पहले लालमन भाई साहब, फिर दिनेश भाई साहब अपने समय में कूद में सबसे आगे रहते थे। गुलाब भाई साहब भी बहुत अच्छा कूदते थे, लखनऊ यूनी में भी वह प्रथम दो तीन स्थानों में रहते थे। कुश्ती में पहले नरेंद्र भाई साहब, और फिर बाद में अपनी लम्बाई और ताकत के बल पर महेंद्र भाई साहब उस समय विजेता रहते थे। नरेंद्र भाई साहब में दांवपेंच और फुर्ती बहुत थी पर बाद में ताकत में महेंद्र भाई साहब काफी भारी पड़ने थे।
नागपंचमी के दिन भी घर में होली दीवाली की तरह सुबह से ही पकवान,पूड़ी,सब्ज़ी, खीर आदि बनती थी। जब तक हम बच्चे सुबह सोकर उठते काफी कुछ पकवान बन गये होते।

नागपंचमी के दिन ही शाम को गुड़िया पीटी जाती थी । क्यों पीटी जीती थी, यह बचपन में कुछ नही समझता था। गांव भर के लोग इकठ्ठे होते,अरहर की लग्गी से घरों से आई गुड़िया पीटते फिर सब लग्गियों को एक में फंसाकर मजबूत बनाकर किसी से कहते कि चढ़ो। कभी लग्गियां वज़न सह लेती, कभी लग्गियां टूट जाती थी।
दीपावली में खूब दिये जलाये जाते। कुम्हार घरों में दिये बांट जाते, सरसों का तेल शाम से ही डाला जाता, दिये जलाये जाते और घर के हर कोने को उससे जगमग किया जाता, यहां तक कि खेतों में भी दिये रखे जाते थे। मेरी दादी खूब रुचि लेकर हम बच्चों से खूब चारों तरफ दिये रखवाती थी। सुबह—सुबह हम बच्चों को दिये इकत्रित करने का भी जुनून रहता कि किसने कितने दिये इकत्रित किये।
दीपावली के बाद से ही उबले हुये सिंघाड़े मिलने लगते थे । गांव के तालाब में गांव के कहार(गोडिया लोग) खूब सिंघाड़े लगाते थे, उन्हें तोड़ने के लिये मिट्टी के दो मटके आपस में बांध कर उल्टा तालाब में डाल देते और उनके बीच बैठकर सिंघाड़े तोड़ते रहते थे। इससे गहरे पानी में भी उन्हे सिंघाड़े तोड़ने में परेशानी नही होती थी। छब्बू कहार ने एक छोटी डोंगी भी रख ली थी। मुझे उबले सिंघाड़े बहुत पसंद है, आज भी खूब ढूंढ़कर खाता हूं।
इस बीच और भी त्योहार होते थे जैसे मकर संक्रांति आदि जब खूब ढूंढ़े पीढ़े बनते थे। महिलाओं का करवा चौथ ब्रत होता। हमारी नंबर दो की काकी (राजेश की मम्मी) जिन्हें हम मौसी कहते थे, बहुत धार्मिक थी, बहुत ही पवित्रता से साल भर पड़ने वाले सारे के सारे व्रत रहती थी,सो घर में भी कभी एकादशी है, कभी कोई और व्रत है यह सूचना हमें मिलती रहती थी।
नागपंचमी और हटिया के बाद ही गांव में कोल्हू लग जाते थे। गांव में गन्ना भी तब खूब पैदा होता था। कोल्हू पर गुड़ और राब बनती थी। शाम को वहां भी भीड़ रहती। एक तो आपसी गप्पों का वह अड्डा रहता और दूसरा कड़ाह के पास गर्मी भी मिलती। एक तरह से यहां भी सामूहिक उत्सव सा माहौल रहता। कुछ विशेषज्ञ वहां मौजूद रहते कि कड़ाह को कब उतारना है वरना गुड खराब हो जायेगा। रात भर कोल्हू चालू रहता, पूरी चहल पहल रहती। हम बच्चों के लिये कोल्हू पर जाना भी मनोरंजन का साधन था। वहां बन रहे गुड़ की एक अलग सुगंध थी। वहां पहुंचते ही नाक से होते हुये अंदर सुगंध झरने लगती थी, कुछ गर्मी भी मिलती थी। कोल्हू पर रात भर रतजगा रहता। अब गांव में गन्ना कोई बोता ही नही। शायद गन्ना मिल दूर है और गुड़ बनाना फायदेमंद न लगता होगा । आज गांव में कोल्हू वाली रौनक गायब है।
खेल कूद और गांव की सामाजिकता
जाड़ों में रणमऊ गांव के बच्चे और युवा झाबर खूब खेलते थे। गांव का यह खेल कबड्डी का बड़ा रूप जैसा है। हम बच्चा पार्टी भी शाम को पाटाहार में झाबर खेलते थे। इसमें गेहूं के लिये जुते खेत की बाहरी मेड़ चौहद्दी बन जाती थी। बाहर वाली टीम को अदर वाली टीम के किसी विरोधी को छूकर मेड़ तक भागकर छूना होता था। यह ताकत का खेल था। बाहरी लोग धकेल कर भी मेड़ तक पहुंच सकते है। इसमें गांव के तमाम लोग जाड़ों की उजाली रातों में इसे खेलते—खेलते दक्षता हासिल कर लेते थे। बताया जाता था कि हमारे काका अरिमर्दन सिंह,सुखदीन, रामदयाल लोध, मेरे पिता जी भी बचपन में खूब झालर खेलते थे। मैंने भी चांदनी रात में झाबर खेली है, खूब देखी भी है। आज के बच्चे तो शायद इस खेल का नाम ही न सुने हो।
जाड़ों मे ही मोमफली खूब होती थी। हम बच्चा लोग शाम को अपने खेत जाकर मोमफली पेड सहित उखाड़ते, पास के पेड़ों के नीचे लकड़ी और पत्तियां आदि इकत्रित कर होला लगाते, मिर्च अचार की चटनी घर से ले जाते और खूब होला चबाते। इसी तरह मटर और चने के भी होले लगते थे । मोमफली तैयार होने के बाद घर के आंगन में सूखने के लिये फैला दी जाती थी। शाम होते ही बड़े घर में जगह जगह अलाव जलते थे,उनमें अलाव तापने के साथ—साथ मोमफली भी खूब भूनी जाती, कोई आलू भी भूनता। जिंदगी उत्सव हो उठती थी। अब गांव में मोमफली नहीं बोयी जाती। मेरी समझ में इसका कारण आर्थिक ही होगा।


पढ़ाई की उमंग…होली का हुड़दंग
जनवरी से विद्यार्थीगण पढ़ाई में ज्यादा ध्यान देते लगते थे क्योंकि सभी परीक्षायें, बोर्ड से लेकर स्थानीय सब मार्च अप्रैल में होती थी। इसी बीच होली भी आ जाती थी। होली के कई दिन पहले से गांव में लोग अपनी—अपनी ढ़ोलके मढ़ा लेते थे, गाने शुरू हो जाते थे। होली के दिन हम बच्चों को यह बताया जाता था कि पिछले साल से कम ऊंची होली नही होनी चाहिये सो आसपास के जंगलों से खूब लकड़ी काटकर बच्चे/युवा लाते थे। मैं भी ऐसी कई टीमों में शामिल रहा हूं। होली की रात उसे जलाया जाता,तापा जाता, घरों से भी कुछ गेंहू की बालियां आदि दहन के लिये आती रहती थी। अगले दो दिन होती थी जमकर फाग। गांव की दो टोली बनती थी। एक हमारे पिता जी और काका के नेतृत्व में और दूसरी चाचा बाबा के। लोग किधर है यह पहले से तय था। अनुसूचित जाति के सभी लोग पिता जी की टोली में रहते थे। क्या गजब की शास्त्रीय लेज गायन होती। गडापा तो हमारे गांव का जवार में प्रसिद्ध है। आज यह होली की फाग भी गांव में गायब हो गयी है। ढोलकें बजाने वाले ही नही रहे।

रणमऊ गांव की जिंदगी बिजली न होने के कारण जल्दी ही सोने चली जाती और सुबह जल्दी उठती थी क्योकि सुबह जल्दी सबेरे ही उजाला हो जाता है, गांव जग जाता था, बैलों गायों को खाना पानी, गोबर उठाना, साफ—सफाई, दूध दुहना, मठ्ठा बनाना, आदि आदि काम सुबह—सुबह करने होते थे। आज जब ये काम गायब से है तो गांव बहुत सुबह सक्रिय भी नहीं होता।

 

अप्रैल मई में स्कूल सुबह के हो जाते थे। फिर भी दोपहर करीब 12.30 बजे के बाद स्कूल से घर तक पहुंचने में गर्मी तंग कर लेती थी। 20 मई को कॉलेज का स्थानीय रिज़ल्ट निकलता था और फिर 8 जुलाई तक स्कूल बंद हो जाते थे।
गर्मियां हम बच्चों के लिये बहुत व्यस्त होती थी। पहले तो गेहूं की मडाई मुख्य समस्या होती थी क्योंकि जब पूरे जवार की मढ़ाई हो जाती, तब भी हमारे घर के गेहूं बचे रह जाते थे। उस समय लोगों के खेत खलिहान में कोई फसल नहीं होती थी, लोग अपने जानवर छोड़ देते थे। हम बच्चा लोग किसी के छुट्टा बैल पकड़ लाते, दिन भर मडाई करते और शाम को छोड़ देते थे। अतरिक्त मडाई की पार्टियां बनती और हम विद्यार्थियों को भी इसमें सहयोग करना पड़ता क्योंकि तब थ्रेशर और ट्रैक्टर नही आये थे, पानी गिरने पर गेंहू खराब होने का डर रहता था। घर में कोई न कोई शादी रहती तो उसके पहले सब मडाई होनी जरूरी होती। इसी तरह गर्मियों में कम्पोस्ट खाद (पांस) को भी खेतों में डालने के लिये हम सभी घर के विद्यार्थियों को भी जुटना पड़ता था और मैं भी पूरी ड्यूटी निभाता था। बैलों और गाय भैंसों की वजह से ख़ूब कम्पोस्ट खाद बनती थी। मेरे घर पर एक समय दर्जन भर बैलों के अलावा दर्जनों गाये और उनके बच्चे रहते थे, और सब मिलाकर कम्पोस्ट खाद बहुत होती थी। गर्मियों में मुझे याद आता है कि करीब दो हफ्ते खाद ढोई जाती थी बैलगाड़ी से और खेतों में डाली जाती थी। चारो ओर टटिया बांधकर बैलगाड़ी को खाद ढोने के लिये तैयार किया जाता था और करीब 200 बैलगाड़ी खाद ढ़ोने को घर के युवाओं को लगना पड़ता था। मैनें भी इसमें काफी योगदान दिया है। घूर में दो तीन फीट के बाद काली कम्पोस्ट खाद वर्फी की तरह गरम गरम कटती थी, धुआं भी निकलता था। आज ट्रैक्टर आने के बाद बैल नदारत हुये, फिर अच्छी नस्ल की गाये आने के बाद गोबर देने वाली देशी गायों की भीड़ भी गयी और इस तरह धीरे धीरे कम्पोस्ट खाद ही गांव से करीब—करीब गायब हो गयी है।
गर्मियों में जल्दी जल्दी गेंहू की मडाई, खाद ढुलाई से निपट कर आम खाने और तीन दिन की शादियों के लुत्फ लेने के दिन आ जाते थे। गर्मी के कारण बारातें ज्यादातर बागों में पेड़ों के नीचे ठहराई जाती थी या किसी स्कूल में।
नहीं भूलता गंवई आम का स्वाद
हमारी ढेकवा बाग की देशी आम की बहुत बड़ी बाग अपनी तरह के स्वादिष्ट आमों के लिये पूरे जवार में प्रसिद्ध थी। आज भी गोलवा,गदक्का, सिंदूरिया,हरेरा आदि आमों का नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाता है। आम इतना होता था कि बैलगाड़ियों से घर लाया जाता था। जवार के लोग भी आम खाने आते थे। घर में अमावटें बनती थी। अमावट के पने से जाड़ों में रोटी खाने में बहुत मजा आता था। जाड़ों में जुंधी (ज्वार) की रोटी दूध में डालकर खाने में गजब का स्वाद मिलता था।

इसी बीच जामुन आ जाते थे। जामुन खाने के अपने आनंद थे। गर्मियों में पूरा गांव ही खाली समय में बागों मे रहता था। गांव में चारो बागों/ तरह तरह के पेड़ों की संख्या तब बहुत होती थी। गर्मियों में जिधर निकलो, आम और जामुन मिल जाती थी। यहां की जामुन अच्छी है, उस पेड़ का आम मीठा है, वहां की बेर अच्छी है और हम लोग घूम-घूम कर इधर-उधर भी खाया करते थे। अब बाग भी कट गयी। तमाम पेड़ भी कट गये या टूट गये। दशहरी आमों की नयी बाग में वह लुत्फ कहां है।
रणमऊ गांव में तब नहर भी खूब आती थी। धान खूब पैदा होता था। धान के पौधों का लहलहाते हुये बरसात के दिनो में देखना बहुत सुखद लगता था। नहर भी अब सूख गयी है ।
गर्मियों में बड़े तालाब (झील) के किनारे-किनारे पानी काफी कम हो जाता था। इसके तराई इलाक़े में कहार लोग एक विशेष तरह का धान लगाते थे जिसके लिये वे वही कच्चा कुआं खोद लेते थे और उससे सिंचाई करते थे। गर्मियों में गांव के किनारे जब चारों तरफ आंधी और लू चलती थी, लहलहाते धान के ऐसे खेत बहुत रमणीय लगते थे। मै भी अक्सर शाम को वहां जाता था विशेषकर पास ही महरा बाबा के खेतों की ओर और कुछ देर उनसे गप्पे मारता था। महरा बाबा काफी मुखर हो अपनी बात कहते थे और उनसे बतियाना अच्छा लगता था । अब वह सब भी गायब हो गया। तालाब सिकुड़ने के कारण वहां खेती बारी होने लगी। गर्मियों में छब्बू खरबूज, तरबूज़ और कुछ सब्जियां आदि भी पैदा करते थे। उन्हें खाने में भी मजा आ जाता ।

शाम को घर से निकलते ही पहला घर रामदयाल लोध का था। आस पास काफी खुला—खुला गलियारे के बगल का घर था। वही बगल में खूब कंचे भी खेले है हमने। वहां प्राय: हम सबका बैठका भी होता था। रामदयाल भी काम करते—करते, जानवरों के लिये हरा चारा काटते, अपनी कुछ लंतरानियां भी सुनाते। कभी कभी भूत से अपनी मुलाकात का हाल सुनाकर डरा देते।

रामदयाल लोध पर कभी मैंने यह तुकबंदी लिखी थी –
मेरे गांव में घर के पास ही रहते है , रामदयाल लोध ,
उनकी आर्थिक स्थित देख,बचपन में होता था अपराध बोध।
सोचता था क्यों कोई जरूरत नहीं समझता रामदयाल की मदद की,
कुछ सपने भी बिने थे, बड़े होकर उसकी इमदाद की ।
आज अधिकारी हूं,रामदयाल से मुलाकात भी हो जाती है।
रामदयाल अब काफ़ी बुजुर्ग हो गये है,
शारीरिक क्षमता भी घट गयी है,
आर्थिक स्थिति पहले से से भी अधिक पतली हो गयी है ।
दुआ बंदगी होते ही अब,रामदयाल से बचपन की तरह बतियाने से बचता हूं,
डरता हूं, बचपन की हुड़क कहीं, ज़ोर न मार दे,
जेब हल्की कर,आर्थिक ताने बाने की, मेरी गणित न गड़बड़ा दे।
याद आता है जब पहली बार मैंने रामदयाल को एक हजार रुपये दिये थे, रामदयाल हड़बड़ा गये। काहे के लिये साहब, मैंने कहा तुमसे बचपन में मैने कर्ज लिया था।
(लेखक परिचय: बैसवाड़ा रायबरेली के गांव रणमऊ में जनवरी 1954 को पैदा हुआ। हाई स्कूल गांव के पड़ोस के कालेज से ही । वर्ष 1974 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की और उसी वर्ष पी पी एस में चयनित हुआ। IPS ( 89 ) की वरिष्ठता प्राप्त कर सात जिलों में पुलिस अधीक्षक, मेरठ , सहारनपुर और मुरादाबाद रेंज का पुलिस उप महानिरीक्षक। वर्ष 2013 में IG रेलवे इलाहाबाद के पद से रिटायर हुआ। गांव रणमऊ की कहानी की दूसरी कड़ी। क्रमश: जारी…)

रेड़ीमऊ से रड़िमऊ…से रणमऊ और आज रनमऊ तक के सफर पर सरपट दौड़ता हमारा गांव

 

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