मेरा गांव आमी अर्थात अम्बिका स्थान

ब्रज किशोर सिंह

बिहार के सारण जिले में मेरा गांव दिघवारा स्टेशन से चार किलोमीटर पश्चिम छपरा-सोनपुर राष्ट्रीय उच्च पथ पर स्थित है। पटना से इसकी दूरी 52 किलोमीटर एवं छपरा से 25 किलोमीटर है। यह गंगा के किनारे अवस्थित है जिसकी धाराएं कभी पास आती है एवं कभी दूर जाती है। आज से 70 वर्ष पहले आमी से पटना जाने के लिए जहाज की सेवा भी थी और पैसेंजर तथा मालवाहक जहाज चला करते थे।

आमी अर्थात अम्बिका स्थान प्रसिद्ध तीर्थस्थल है, जिसे शक्तिपीठ माना जाता है। जन-श्रुतियों के अनुसार अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में बिना आमंत्रण के ही आ गई पार्वती अपने पति महादेव का अनादर देखकर यज्ञ-स्थल पर ही योग माया से अपने शरीर का परित्याग कर दिया। इससे क्रोधित भगवान शिव, सती का मृत शरीर कंधे पर लेकर तांडव करने लगे जिससे प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो गई। तब देवताओं की विनती पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन-चक्र से सती के अंगों को काटना प्रारंभ किया। सती के अंग जहां-जहां गिरे, वह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। सती जिस स्थान पर भस्म हुई, वही यज्ञ-स्थल सिद्धपीठ अंबिका स्थान आमी के नाम से जाना गया। यह मंदिर एक प्राचीन खंडहर के सबसे ऊंचे टीले पर अवस्थित है। मां की प्रतिमा मिट्टी की विशाल पिंडी के रूप में स्थापित है।

 

यज्ञ के स्थान के विषय में मत्स्य पुराण में कथा आती है कि दक्ष ने गंगा, सोन और सरयु के संगम-स्थान पर यज्ञ किया था। यह संगम स्थान यही पर था। इसका प्रमाण समय समय पर हुई खुदाई में प्राप्त सामग्री से मिलता है। नदियों के किनारे और जंगलों से आच्छादित होने के कारण पूरा सारण क्षेत्र ऋषि मुनियों की तपोभूमि था। कुंभज का आश्रम, गौतम का आश्रम, दधीचि का आश्रम, मेधा का आश्रम इन्हीं पवित्र नदियों के किनारे था। मेधा का आश्रम अंबिका स्थान के ही आसपास में था। मंदिर की ऊंचाई एवं आसपास के स्थलों को देखने पर यह मान्यता बनती है कि इस स्थान पर जरूर कोई महल रहा होगा।

प्रजापति दक्ष की कन्या सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। कहते हैं कि इस विवाह में बारात के ठहरने और उसकी अगवानी के लिए जो स्थान निश्चित किया गया था, उसका नाम सियानी है। शिव की पत्नी का एक नाम शिवानी भी है। शिव की पत्नी अर्थात सती का स्थान होने के कारण भी इसे शिवानी कहा जाता होगा जो बाद में सियानी हो गया होगा।

सारण गजेटीयर में भी इस स्थान का संबंध राजा सूरत एवं दक्ष से माना गया है और इसे पौराणिक स्थान माना गया है। मार्कंडेय पुराण तथा दुर्गा सप्तशती में राजा सूरत एवं समाधि की कथा आती है। राजा सूरत अपने शत्रुओं से पराजित होकर तथा वैश्य समाधि अपने पुत्रों से अपमानित होकर समान दुख की अवस्था में मेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचे तथा अपनी व्यथा कथा सुनाई। ऋषि ने उन दोनों को विस्तार से मां दुर्गा का चरित्र सुनाया एवं उन्हें गंगा के किनारे मिट्टी की प्रतिमा बनाकर देवी आराधना करने का आदेश दिया। ऋषि का संकेत उसी स्थल की ओर था, जहां जगदम्बा सती हुई थी। दक्ष यज्ञ-स्थल पर ही राजा सूरत एवं समाधि वैश्य ने गंगा के किनारे शक्ति की आराधना की। दोनों की अभिलाषा पूर्ण हुई और उन्हें शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। आमी निवासी महाकवि अर्जुन सिंह अशान्त ने अपने महाकाव्य बुद्धायन में आमी के महात्म का वर्णन किया है

इसी प्रसिद्ध गांव में चार अक्टूबर 1953 को मेरा जन्म हुआ। तब दो-चार घरों को छोड़कर गांव के सारे मकान कच्चे थे, किंतु समाज के लोग एक-दूसरे के इतने करीब थे कि किसका चूल्हा आज नहीं जलने की स्थिति में है, इसकी जानकारी होती थी तो सीमित संसाधनों में भी पड़ोसी का चूल्हा जले, इसकी व्यवस्था लोग करते थे। जाड़े में विभिन्न फसलों के अवशेषों से बने अलाव (घूड़ा) के पास चारों ओर से मोहल्ले के बुजुर्ग एवं बच्चे बैठते थे और विभिन्न विषयों पर चर्चा करते थे। यही विभिन्न सूचनाओं के आदान-प्रदान का केन्द्र था। गांव के ज्यादातर लोग कृषि एवं पशुपालन पर ही निर्भर थे। कुछ लोगों को बिहार पुलिस की नौकरी थी जिनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही थी। किसान मुख्य रूप से मकई, चना और आलू की खेती करते थे। गांव के दो-चार परिवारों को छोड़कर शेष सभी सिर्फ मकई का ही (भात और रोटी तथा सतुआ) उपयोग करते थे। गरीबी थी, किन्तु उस समय उनकी आवश्कताएं इतनी कम थी कि वे इसके लिए ज्यादा परेशान नहीं होते थे। बरसात के समय मकई की फसल में जब बाल होता था, उस समय गांव मे कई जगह अखाडों में डंके बजने लगते थे। मकई स्वास्थ्य के लिए कितना उपयोगी था, अब समझ में आता है जब हम मकई से दूर हो गए हैं। गांव में प्राथमिक, मध्य एवं उच्च विद्यालय था। प्राथमिक विद्यालय में मात्र एक शिक्षक थे, जिनका नाम बैजनाथ राउत था। उनका जीवन एक फकीर की तरह था। उनके पढाए छात्र को स्कॉलरशिप मिलने की गारंटी रहती थी। छात्रों के साथ-साथ गांव के सभी लोगों का अपार सम्मान उन्हें प्राप्त था। मध्य विद्यालय के शिक्षकों की पढ़ाई भी काफी प्रशंसनीय थी। स्वर्गीय बशरोपन तिवारी मध्य विद्यालय में गणित और संस्कृत के शिक्षक थे जो बाद में मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक बने। वे मंदिर के विद्वान पुजारी भी थे। उच्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक स्वर्गीय नवल किशोर सिंह की विद्यालय के छात्रों पर बेजोड़ पकड़ थी। बच्चे गुल्ली-डंडा, कबड्डी के साथ-साथ फुटबॉल भी खेला करते थे।

गांव को पलायन का दर्द भी झेलना पड़ा है। लोगों ने बच्चों की पढ़ाई के बहाने गांव छोड़ बाहर में बसना शुरू किया है। अवधेश बाबू द्वारा एसएस अकेडमी की स्थापना के बाद पलायन में कमी आई क्योंकि प्लस टू तक की अच्छी शिक्षा गांव में ही सुलभ हो गई। शहरों के विकास ने गांव को भी प्रभावित किया और बेरोजगार युवक कोलकाता, दिल्ली ,गुजरात, पंजाब कमाई के लिए पलायन करने को मजबूर हुए जो स्थिति बिहार के दूसरे इलाकों में थी, वही समस्या हमारी भी है। आजादी के बाद सरकारों ने शहरों के विकास के लिए जितने प्रयत्न किए, उसकी तुलना में गांवों की घोर उपेक्षा हुई। सभी बड़े शिक्षण संस्थान, अस्पताल शहरों में ही खोले गए। बिजली के मामले में भी गांव के साथ सौतेला व्यवहार किया गया। गावों का समुचित विकास न होने का दंश अब शहरों को भी भोगना पड़ रहा है। गांवों से पलायन कर आए लोगों से शहरों की आबादी का घनत्व बढ़ रहा है, यह शहरों को प्रदूषण की राजधानी बना देगा। सरकार को चाहिए कि वह आईआईटी, एम्स जैसी संस्थाओं की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में भी करे-हम ग्रामीणों को भी अपनी जनसंख्या के अनुपात में अपने क्षेत्र के लिए उच्च संस्थाओं की मांग करनी चाहिए।

 

पहले अम्बिका स्थान मंदिर के पास दो तीन दुकानें थी, आज लगभग पचास दुकानें हैं जो सालों भर पचास परिवार को रोजगार देती है। यदि पर्यटन-स्थल के रूप में इसे विकसित किया जाता तो यहां हजारों लोगों को रोजगार मिलता और सरकार को भी राजस्व की प्राप्ति होती। मंदिर भवन को आधुनिक बनाने में दर्जनों भक्तों का योगदान है किंतु मंदिर की चहारदीवारी, प्रकाश और पानी की व्यवस्था तथा मंदिर के मुख्यद्वार का निर्माण अवधेश कुमार सिंह ने कराया। पटना निवासी राकेश अग्रवाल और उनके साथियों ने भी कई कार्य कराए हैं।

इसी गांव में जन्में सुशील कुमार सिंह छपरा के राजेंद्र महाविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहने के बाद जगदम महाविद्यालय के प्राचार्य बने और 29 वर्षों तक जगदम महाविद्यालय को उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान बनाने में संलग्न रहे। उनके प्रयास से लगातार 27 वर्षों तक यह महाविद्यालय खेलकूद में विश्वविद्यालय चैंपियन रहा। अनुशासन और पढ़ाई दोनों मामले में बिहार के किसी भी संस्थान को टक्कर देने की स्थिति में जगदम महाविद्यालय रहा। जब वे सारण स्पोर्ट्स एसोसिएशन के सचिव थे, उसी समय राजेंद्र स्टेडियम का निर्माण प्रारंभ हुआ। उन्होंने बैडमिंटन और क्रिकेट संघों की स्थापना की और उसे राज्य संघ से संबंध भी कराया। कला और साहित्य के क्षेत्र में अर्जुन सिंह अशान्त का नाम स्मरणीय है। भोजपुरी गीतों के राजकुमार के रूप में अशान्त ने कवि सम्मेलनों में काफी ख्याति अजित की। पुलिस की नौकरी मे रहते हुए उन्होंने निरंतर साहित्य सेवा की। भोजपुरी गायन के क्षेत्र में अशान्त के दो शिष्यों ने अपने को शीर्ष पर स्थापित किया। उनके दो नाम हैं – संतराज सिंह राजेश और सुरेश कुमार सिंह।

आज जब हम अपने पिछले वर्षों को याद करते है तो पीपल, बरगद की छाव, दोपहर के खेल, गंगा किनारे बड के पेड़ और नदी में में बार-बार कूदना, नहाना। शाम में सेर भर मकई का भूंजा खाना और मित्र मंडली के साथ फुटबॉल खेलने जाना, मंदिर की आरती के बाद पुस्तकालय में पढाई और सामयिक विषयों पर सार्थक बहस। रबी मौसम में अलमुनियम और स्टील के हत्ते से साथियों के साथ भांज लगाकर पानी छींटना, फसल कटाई के बाद खलिहान में बोझों के इकठ्ठे होने पर मेह गाड़ना और बैलों को उनके उम्र के अनुसार मेहिया और पोठिया क्रम से जोत कर दौनी में बैलों के पीछे दौड़ना, दौनी के बाद रुई के गद्दे का सुख देने वाले पैर (भूसे और अनाज के गत्ते) पर सोना, रात से ही अपना महुआ अगोरना और दूसरे का चुन लेने के फेर में रहना।

विज्ञान ने हमें आगे बढाया। पम्पिंग सेट आ गया। हरित क्रान्ति के बीजों ने रोटी उपलब्ध करायी। पहले रात-रात भर दौनी होती। रोटी की गारंटी में बच्चे इस ड्राम से उस ड्राम में रात भर गरम पानी बदला करते। अब दौनी करने के लिए बड़ी-बड़ी मशीनें आ गई हैं। पहले जहां खलिहान महीने भर गुलजार रहता था, अब एक दो दिन की बात हो गयी। सुविधाएं बढ़ी है, संपन्नता भी बढ़ी है, किन्तु गांव की एकता को जातीय गोलबंदी ने मिटा दिया है। पंचायती राज संस्थाओं की व्यापकता का अनुकूल फल अब तक इस गांव को नहीं प्राप्त हो सका है। जबकि पूर्व विधायक विनय कुमार सिंह इसी गांव के हैं। कच्चे घरों की जगह मकान तो सारे पक्के हो गए किन्तु हरिवंश राय बच्चन के शब्दों को दुहराना पडेगा-जब मकान कच्चे थे तो रिश्ते सच्चे थे किन्तु आज सोफे और डबल बेड के आने से दूरियां बढ़ गयी हैं।

पूर्व पुस्तकालयाध्यक्ष, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा।

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