उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में मेरा गांव ‘इसरायण कलां’

रामदेव सिंह

गूगल पर मेरे गांव ‘इसरायण कलां’ को सर्च करेंगे तो वह बतायेगा कि यह बिहार के मधेपुरा जिला मुख्यालय से पैंतीस किलोमीटर दूर है और प्रखंड मुख्यालय कुमारखंड से सात किलोमीटर । इस गांव का भौगोलिक विस्तार 1279 हेक्टेयर में है । मुरलीगंज इसका निकटतम रेलवे स्टेशन है जो गांव से पन्द्रह किलोमीटर दूर है । यह रेलवे स्टेशन पूर्व मध्य रेलवे के समस्तीपुर मंडल का एक छोटा लेकिन रेलवे राजस्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्टेशन है । मुरलीगंज से ही सहरसा-पूर्णिया राष्ट्रीय राजमार्ग 107 गुजरता है । मेरे गांव से पश्चिम की ओर सहरसा और पूरब दिशा में पूर्णिया है और दोनों की दूरी लगभग साठ किलोमीटर है ।
गूगल इस गांव के लोगों की व्यक्तिगत उपलब्धियों के बारे में भी बताता है जिसकी चर्चा बाद में करुंगा । पहले ‘इसरायण कलां’ गांव के इतिहास की चर्चा ,जो कहीं भी लिखित नहीं है । जबकि यह गांव लगभग तीन सौ साल पुराना है । बंगाल के मुर्शिदाबाद के राजा के पुराने अभिलेखों में इसकी चर्चा मिल सकती है क्योंकि हमारे यहां के ‘जमींदार’ या ‘पतनीदार’ उनके लिए राजस्व वसूलते थे या भागलपुर या सहरसा डिस्ट्रिक्ट के गजेटियर में मिलेगा, क्यों कि यह गांव पहले भागलपुर और बाद में सहरसा जिले का ही अंग था ।
यूं तो आज का ‘इसरायण कलां’ गांव नये परिसीमन में दो पंचायतों में बंट चुका है लेकिन गांव के रुप में यह अपने पुराने स्वरूप में ही है जो जमींदारी दस्तावेजों में ‘खास महाल’ के नाम से जाना जाता था, जिसकी अपनी खास सांस्कृतिक पहचान रही थी । इस गांव के इतिहास और संस्कृति के बारे में मैं जो कुछ बताने जा रहा हूं वह लगभग साठ वर्षों से तो प्रत्यक्ष रूप से मेरा भी देखा- जीया है । बाकी वह है जो पीढ़ियों से होते हुए मुझ तक पहुंचा है ।

 

यह गांव कम से कम ढाई सौ और अधिकतम तीन सौ वर्ष पुराना होगा । मैं जब आठवीं- नौवीं कक्षा में पढ़ता था तभी से अपने गांव का इतिहास जानने की जिज्ञासा मेरे मन में थी । हमारे बड़े बाबा ठाकुर प्रताप नारायण सिंह को अपने शाम के साथ ‘ठाकुर’लिखने में गर्व का बोध होता था । क्योंकि हमारे पुरखे उत्तर प्रदेश से आये थे ,जहां राजपूतों को ‘ठाकुर साहब ‘ कहने का प्रचलन था । बाबा ने अपनी पीतल की थाली , लोटे और हुक्के पर भी ‘ ठाकुर प्रताप नारायण सिंह’ लिखवा रखा था । उन्हीं से पूछ- पूछकर मैं एक डायरी में यदा-कदा कुछ जानकारियां नोट करता रहता था । बीच- बीच में उनसे भी बुजुर्ग बाबाओं और परबाबाओं से इसकी तस्दीक भी करता रहता था ।
इसरायण कलां मुख्यत: राजपूतों का गांव है । आज भी इस गांव की मुख्य आबादी राजपूतों की ही है । अन्य जातियां इसकी परिधि पर या ‘खास-महाल’ के बाहर ही है । दूसरी जातियों के अलग-अलग टोले हैं ।

आज से लगभग तीन सौ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले स्थित मंझौली इस्टेट से दो भाई -नौल सिंह और धौल सिंह कोसी के इस कछार में खेती करने के इरादे से आये थे । बहुत बड़ी चुनौती रही होगी ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी की बलुआही जमीन पर खेती करना । जहां बाढ़ से हर वर्ष उजड़ने का खतरा बना रहता होगा । क्योंकि तब कोसी नदी की मुख्य धारा पूरब की तरफ से ही बहती थी ।

इसी बालुचर में दोनों भाइयों ने अपने कठोर परिश्रम से सैकड़ों बीघे जमीन को आबाद कर हरियाली से आच्छादित कर दिया । यह हरियाली आज भी वरदान है हमारे गांव के लिए । यदि किसी ड्रोन कैमरे से हमारे गांव की तस्वीर ली जाए तो यह जंगल में ही बसा नज़र आयेगा ।
इन्हीं दोनों भाइयों ने ‘इसरायण कलां’ में बिसेन वंश की नींव रखी। हालांकि इनमें नौल सिंह का ही वंश चला । छोटा भाई धौल सिंह नि: सन्तान थे । नौल सिंह के दो बेटे थे- उमराव सिंह और केहरी सिंह ।
उमराव सिंह के पांच बेटे थे – नवाब सिंह, काशी सिंह, श्रवण सिंह, महाराज सिंह और कंचन सिंह केहरी सिंह का एक ही बेटा था मधुसूदन सिंह । कंचन सिंह नाबल्द थे । आज इस गांव में बिसेनों के जितने वंशज हैं , बाकी भाइयों की ही सन्तानें हैं । वे सभी गांव के मध्य में है । इनसे बिल्कुल सटे हुए दक्षिण में बैस राजपूतों की भी अच्छी संख्या हैं और उत्तर में कलछूरियों के परिवार हैं । इसके अलावा ‘ भगिनमानों’ की संख्या भी है जो ‘ननसार’ में बसे हैं । जाहिर है ये सभी बिसेनों के बाद बसे या बिसेनों द्वारा राजपूतों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से बसाये गये थे ।

ब्रिटिश हुकूमत के दौरान नौल सिंह की चौथी पीढ़ी के दो युवाओं तेज नारायण सिंह और अयोध्या प्रसाद सिंह ने गांव के बाहर अपनी ख्याति के साथ अपना दबदबा भी कायम किया था । ये दोनों अंग्रेजी राज में पुलिस इंस्पेक्टर थे । तेज नारायण सिंह की नियुक्ति मधेपुरा में और अयोध्या प्रसाद सिंह की नियुक्ति अररिया में थी । इन दोनों थानों के बीच की दूरी लगभग 70-80 मील की है जिसके मध्य में हमारा गांव पड़ता है ।

तेज नारायण बाबू की इलाके में बहुत प्रतिष्ठा थी । उन्हें लोग ‘बाबू साहेब’ के नाम से पुकारते थे । इंस्पेक्टर के पद से रिटायर होने के बाद वे मधेपुरा में आनरेरी मजिस्ट्रेट भी नियुक्त हुए थे । उनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता लगभग सभी जातियों में थी ।
तेज नारायण बाबू किसी भी तरह के भेदभाव के खिलाफ थे । चाहे लिंग भेद हो या रंग भेद । उन दिनों समाज में बेटियों को बोझ मानकर जनमते ही मारने की कुप्रथा थी । तेज नारायण बाबू इसके सख्त खिलाफ थे । उनके भय से लोगों ने ऐसा सोचना भी बन्द कर दिया था ।
एक बार ‘इसरायण कलां’ गांव की  एक लड़की की शादी तय हुई थी। लड़का भी जमींदार टाइप के अच्छे खानदान का था । बारात गांव आ चुकी थी । लेकिन लड़की की मां को जब पता चला कि लड़के का रंग सांवला है तो उसने कन्यादान करने से साफ इंकार कर दिया क्योंकि उनकी बेटी गोरी और सुंदर थी । तेज नारायण बाबू तक यह बात पहुंची तो वे नाराज हुए और कहा कि शादी तो उसी लड़के से होगी। मैं कन्यादान करुंगा। अब भला किसकी हिम्मत थी कि कुछ बोले ! उन्होंने अपने कहे के मुताबिक सचमुच कन्यादान का अनुष्ठान पूरा किया ।
उन दिनों हमारा इलाका मुर्शिदाबाद के राजा की रियासत के अन्तर्गत आता था । पूर्णिया में उनकी रियासत के प्रतिनिधि रहते थे । हमारे गांव के आसपास भी उन्हीं की जमींदारी थी । तेज नारायण बाबू उस रियासत के ‘पतनीदार ‘ थे । ‘पतनीदार’ बड़े राजाओं के प्रतिनिधि होते थे जो रैयतों से ‘लगान’ वसूल कर भेजते थे । इसमें उनका कमीशन निर्धारित रहता था । हालांकि तेज नारायण बाबू की हैसियत भी अब छोटे जमींदारों वाली तो थी ही। इसरायण ड्योढ़ी में भी दीवान , मुनीम आदि कर्मचारी नियुक्त थे।

बाबू तेज नारायण सिंह की एक दुर्लभ तस्वीर, काशीवास के दौरान , जहां उन्होंने देहत्याग किया

तेज नारायण बाबू की धर्म और आध्यात्म में गहरी आस्था थी। अपने जीवन के आखिरी वर्षों में वे सांसारिक इच्छाओं से मुक्त होकर काशीवास करने चले गए थे । काशी में ही उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया ।
तेज नारायण बाबू के दो बेटे थे – ठाकुर प्रसाद सिंह और गुरु प्रसाद सिंह । तेज नारायण बाबू की अर्जित जमींदारी इन दोनों को विरासत में मिली थी । आगे चलकर वे दोनों वर्चस्व के दो ध्रुव भी बने । इसी वर्चस्व और शानोशौकत के पीछे हजारों बीघे जमीन से अपना दखल-कब्जा खो बैठे । आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन कानून बना तो ‘जमींदार ‘होने का तमगा भी छिन गया । लेकिन दरबार की संस्कृति चलती रही। जमीनें फिर भी बची थी लेकिन मिट्टी से रिश्ता नहीं बना पाने की वजह से वे बिकती भी रही ।

तेज नारायण बाबू के दूसरे पुत्र गुरु प्रसाद सिंह की जमींदारी के तहत लगान की रसीद

 

बिसेन परिवार के दूसरे इंस्पेक्टर अयोध्या प्रसाद सिंह का प्रभामंडल तेज नारायण बाबू जैसा तो नहीं था लेकिन जमीनें उनके पास भी कम नहीं थी । उनकी संतति सूरज बाबू और उनके चचेरे भाई महावीर बाबू बड़े किसानों में शुमार किये जाते थे । दोनों भाइयों के पास पांच-पांच सौ बीघे जमीनें थी । सूरज बाबू का तो भरा-पूरा परिवार था लेकिन महावीर बाबू नि: सन्तान थे । महावीर बाबू ने गांव में पहला दो मंजिला महलनुमा मकान बनवाया था । उनके दरवार में रोजाना हाजिरी लगाने वाले लोग भले उनसे खूब लाभान्वित होते थे लेकिन उनकी छवि एक कंजूस आदमी की थी । हालांकि व्यंग्य में उन्हें लोग ‘ राजा कर्ण’ कहते थे । एक बार गांव के कुछ लोगों ने उनसे कहा कि गांव में एक हाईस्कूल बनवा दीजिए ,आपका नाम अमर हो जायेगा । गांव के बच्चों को मिडिल स्कूल के बाद रामनगर, बनमनखी और मुरलीगंज नहीं जाना पड़ेगा । वे बहुत देर तक पान चुभलाते रहे , फिर बोले – ‘स्कूल बनवा देंगे तो सब पढ़- लिख लेगा… फिर हल कौन जोतेगा ? खेती कौन करेगा ?’

महावीर बाबू की पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं थी लेकिन धार्मिक विचारों की महिला थी । घंटों पूजा- पाठ करती थीं । उन्हीं की इच्छा से महावीर बाबू ने अपनी उम्र के अन्तिम वर्षों में एक तालाब और शिवमन्दिर बनवाया । लक्ष्मी के उपासक और सरस्वती के दुश्मन , पांच सौ बीघे के मालिक महावीर बाबू की यही एक ‘कीर्ति’ (?) गांव में है । यदि उन्होंने अपनी सम्पत्ति का छोटा हिस्सा भी स्कूल- कालेज बनवाने में खर्च किया होता तो गांव ही नहीं आसपास के गांवों के लोग भी लाभान्वित होते ।

गांव के आजीवन मुखिया रहे सीता बाबू (श्री सीताराम सिंह)

तेज नारायण बाबू के बाद गांव के जिस व्यक्ति को गांव के बाहर सबसे अधिक लोगों ने जाना , वे थे सीताराम सिंह-महावीर बाबू के चचेरे भाई सूरज बाबू के लड़के । उन्हें लोग सीता बाबू के नाम से अधिक जानते थे । कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे सीता बाबू पंचायती राज की शुरुआत से लेकर अपनी उम्र के आखिरी वर्ष सन् 2000 तक ‘इसरायण कलां’ गांव के मुखिया रहे । उनकी पहुंच सरकारी अमलों से लेकर पटना के राजनीतिक गलियारों तक थी । लेकिन बदलती राजनीतिक संस्कृति के लिए वे ‘मिसफिट’ भी थे ।
वे साहित्य के गंभीर अध्येता थे । उस दौर की साहित्य की सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं मंगवाते और पढ़ते भी थे। चांद , माधुरी , कहानी , नई कहानियां, दिनमान, धर्मयुग , सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत, इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया, लिंक आदि न जाने कितनी पत्रिकाएं गांव में नियमित आती थी । गांव में पढ़ने का यह संस्कार प्रायः सभी घरों में था ।
सीता बाबू की रुचि नाटकों में भी थी । वे अच्छे अभिनेता थे । अपने बचपन में मैंने उन्हें मंच पर अभिनय करते भी देखा था । जब हमलोग अपने युवा दिनों में नाटक करने लगे तो वे कभी-कभी हमारा रिहर्सल देखने आते और हमें अभिनय की बारीकियां भी बताते ।
उनके व्यक्तित्व में गजब का सम्मोहन था । वे जब भी गांव में होते सुबह- शाम उनकी चौपाल लगती । गांव-घर से लेकर देश-दुनिया की बातें होती । चाय-पान का मैराथन दौड़ चलता । शाम को पहले प्रादेशिक समाचार , फिर बीबीसी और अन्त में आल इंडिया रेडियो सुनने के बाद ही उनका चौपाल भंग होता ।

उन दिनों मुखिया का पद प्रतिष्ठा का था। कमाने के उद्देश्य से कोई मुखिया नहीं बनता था । वे घर की पूंजी फूंक कर ही सामाजिकता का निर्वाह करते थे । वे बहुत बड़े संयुक्त परिवार के मुखिया थे । जिसका ‘सांझा चुल्हा’ था । हवेली नुमा घर में दर्जनों नौकर-चाकर थे । बाहर से आये सरकारी ‘अमला-फैला’ का भोजन भी मुखिया जी के दरवाजे का रिवाज था । सो ,उनकी रसोई के चुल्हे की आंच कभी बुझती ही नहीं थी।

उनके समय में गांव में मिडिल स्कूल , हेल्थ सब सेन्टर, पोस्ट आफिस जैसी बुनियादी सुविधाएं तो थी लेकिन भविष्य की दृष्टि से गांव के विकास का कोई सपना नहीं था। सरकारों में पहुंच रहने के बावजूद इस गांव को कोई लाभ नहीं मिला। प्रायः लोग अपने बच्चों को मिडिल की पढ़ाई के बाद हाईस्कूल और कालेज की पढ़ाई के लिए मुरलीगंज, बनमनखी और पूर्णिया भेजने में सक्षम थे इसलिए गांव में ऐसी संस्थाएं हों इसकी चिंता उन्होंने कभी नहीं की ।

मनोहर सिंह का बनवाया हाईस्कूल भवन जिसे आज भी शिक्षकों और छात्रों की प्रतीक्षा है

इसी गांव के रहने वाले धनबाद के बड़े कोयला व्यवसायी मनोहर सिंह ने गांव में हाईस्कूल खोलने का संकल्प लिया था । जमीन लेकर स्कूल का भवन भी बनवाया लेकिन कोयलांचल की व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा में उनकी हत्या हो गयी और स्कूल नहीं खुल सका । बरसों बाद भी यह भवन यूं ही वीरान पड़ा है । शादी ब्याह के अवसर पर कभी बारात रुकती है या चुनाव के दिनों में पोलिंग बूथ बनाने के काम आ जाता है ।
बिहार के विकास पुरुष मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को भी ज्ञापन दिया गया गया कि सरकार चाहे तो इस भवन में हाईस्कूल खोल सकती है लेकिन उच्च स्तरीय पैरवी के बाद भी सरकार ने कोई रुचि नहीं ली । लोगों का मानना है कि चूंकि यह गांव सवर्णों का है इसलिए नितीश कुमार ने कोई रुचि नहीं ली ।

खपरैल की जगह अब इस भवन में स्कूल चलता है जहां बच्चे सिर्फ मिड डे मील करने आते हैं।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ‘इसरायण कलां’ गांव को सरकार से कभी अपना वाजिब हक भी नहीं मिला । जबकि स्वतंत्रता की लड़ाई से लेकर आजाद भारत पर आए संकटों में भी इस गांव के लोगों ने देश के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई है । इस गांव के त्रिवेणी प्रसाद सिंह जो नवाब सिंह के बेटे उदित नारायण सिंह के पड़पोते थे, 1942 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़े और काफी दिनों तक जेल में रहे । आजादी के रजत जयंती वर्ष में जब स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान में हर प्रखंड मुख्यालय में प्रस्तर पट्टिका पर नाम खुदवाया गया तो एकमात्र उन्हीं का नाम था । हालांकि बाद में और भी कई नाम जोड़े गये थे ।

1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के सिपाही स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय त्रिवेणी प्रसाद सिंह

त्रिवेणी प्रसाद सिंह समाजवादी विचारधारा के थे । आजादी के बाद उन्होंने जयप्रकाश नारायण और प्रभावती जी के समाजोत्थान मिशन के लिए बिहार के सेखोदेयोरा आश्रम का काम संभाला था । उनका सम्बन्ध कर्पूरी ठाकुर और रामसुंदर दास जैसे बड़े नेताओं से भी था ।
मुझे 1962 के भारत-चीन युद्ध की याद है जब स्वतंत्र भारत पर पहला संकट आया था । गांव -गांव में देशभक्तों का जत्था घूम रहा रहा था । सीता बाबू के दरवाजे पर कार्यक्रम हुआ था । कोई गा रहा था – “शंकरपुरी में चीन ने सेना को उतारा है…चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा‌ है..”   इस गीत को सुनकर लोगों की रगों में जोश भर आया था ।
बहुत बाद में पता चला कि यह गोपाल सिंह नेपाली का गीत है । पूरा गांव जैसे जोश से भर गया था । हर घर से रुपए-पैसे और सोना- चांदी दिया जा रहा था । मेरी मां ने भी अपनी नाक से सोने की कील निकाल कर दिया था ।
इतनी सुन्दर परम्पराओं वाला हमारा गांव  ‘इसरायण कलां’ यदि आज सरकार के विकास के एजेंडे में नहीं है या सबसे सबसे पीछे है तो इसके लिए सिर्फ सरकार ही दोषी नहीं है । आज जबकि ‘ पॉलिटिकली एक्टिव’ होने की जरूरत थी हमारा गांव अपनी पुरानी रईसी चाल में चल रहा है । सीता बाबू के बाद हमारे पंचायत में इस गांव से फिर कोई मुखिया नहीं हुआ । एक सरपंच का पद है जो लगातार दूसरी बार इस गांव के हिस्से में आया है ।

गांव का हेल्थ सब सेन्टर

पुराने दिनों में यह गांव यातायात के मामले में भले कितना ही पिछड़ा था लेकिन यहां के लोगों का जीवन स्तर तब भी आधुनिक था । खानपान से लेकर जीवन स्तर तक अभिजात्यता का प्रभाव था । आज से सौ साल पहले भी  ‘इसरायण कलां’ गांव में पुस्तकालय था । कहते हैं तब के युवाओं ने पुस्तकालय में पुस्तकें खरीदने के लिए सहयोग का अनोखा तरीका अपनाया था । सभी घरों में औरतों से यह अनुरोध किया जाता था कि वे भात बनाने के पहले एक मुट्ठी चावल निकाल कर अलग रख दें । महीने के अंत में यह चावल जमा किया जाता था जिसे बेचकर पुस्तकें खरीदी जाती थी ।
भले उन दिनों अधिकांश घर फूस के थे लेकिन वे होते थे बहुत शानदार । बैलगाड़ी और लालटेन युग के बावजूद लोगों के जीवन में आनन्द था । रिश्तेदारियों में इस गांव की चर्चा ‘महीन’ गांव में होती थी । उन दिनों एक कहावत प्रचलित था कि इसरायण की बकरी भी चाय पीती है। चाय उन दिनों नया और आधुनिक पेय था । बहुत से गांवों में इसे पीने का प्रचलन नहीं था । लेकिन इसरायण में ‘ बेड टी ‘ का भी प्रचलन शुरू हो गया था । उन दिनों अंग्रेजी ढंग के कपड़े पहनने वाले और अंग्रेजी में बातें करने वाले कई लोग थे । निकट सम्बन्धियों के गांव में ‘इसरायण कलां’ वालों का बौद्धिक आतंक था । इस गांव से बारात बुलाते या यहां बारात आने से पहले लोग आतंकित रहते थे और किसी अंग्रेजी बोलने वाले का इंतजाम पहले से रखते थे , क्योंकि वे जानते थे कि इसरायण वाले अंग्रेजी में ही शास्त्रार्थ करेंगे । उन दिनों बारातियों की महफ़िल में सवाल-जबाव की परम्परा थी ।

और यदि इसरायण के बैजू बाबू ( तेज नारायण बाबू के पोते बैजनाथ प्रसाद सिंह ) खड़े हो गये तो पटना और भागलपुर यूनिवर्सिटी के पढ़वैया लड़कों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी । बैजू बाबू के दो ही व्यसन थे – अंग्रेजी और बीड़ी । शादियों की महफ़िल में शास्त्रार्थ होते थे । बनारस और मुजफ्फरपुर से तवायफें तो बुलायी ही जाती थी , शास्त्रीय गायक भी आते थे । रघु झा और मांगन की गायन शैलियों पर चर्चा होती थी ।

गांव में साहित्य के साथ धार्मिक और आध्यात्मिक पुस्तकें भी खूब पढ़ी जाती थी । दूर्गा पूजा और छठ के अवसर पर नाटक होते थे । आज के समय में लोगों को मुश्किल से यह विश्वास होगा कि 1935-40 के बीच इस गांव की एक बेटी जया ने अपनी शादी में पिता से सिर्फ किताबें मांगी थी । उनके पिता ने गहनों-कपडों के साथ कई ट्रंको में भरकर हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य की किताबें बेटी को दी थी । लेकिन इसे विडंबना ही कहिए कि जिन घरों में ‘इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ के साथ अंग्रेजी के क्लासिक्स का संग्रह था वहां आज इसकी कोई जीर्णशीर्ण प्रति भी नहीं है।

गांव के बुजुर्ग श्रेष्ठ राजेश्वर प्रसाद सिंह जिनकी आंखों में गांव का शानदार अतीत समाया है

किसी भी पुराने गांव की तरह मेरा गांव ‘इसरायण कलां’ भी जाति विशेष यानि सिर्फ राजपूतों का है । दूसरी जातियों के अलग-अलग टोले हैं । जिनमें ज्यादातर पिछड़ी जातियां हैं । जिनका जीवनाधार राजपूतों की जमीनें ही रही हैं । हमारे गांव में सामाजिक समरसता में कभी कमी नहीं रही । कभी जिन खेतों में वे मजदूरी करते थे आज या तो बटाई करते हैं या उन्हीं की जमीनें खरीद रहे हैं ।उनकी आर्थिक स्थिति अब काफी बदल चुकी है । राजपूतों का खेती से विमुखता या अरुचि से धीरे- धीरे उनके हाथ से जमीनें खिसकती जा रही हैं । जितना ही वे पढ़ते- लिखते गये खेती उनके हाथ से छूटती गयी । और वे प्रवासी होते गये । गांव के विकास के प्रति उनकी कोई रुझान भी नहीं रह गयी । कभी उनके पूर्वज ‘प्रवासी’ बन कर यहां आये थे आज उन्हीं की संततियां प्रवासी बनकर नगरों, महानगरों और और विदेशों में रह रही हैं।

(कमश: जारी। शेष अगली कड़ी में।)

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