अजमेर के पीपलाज और झुंझुनू के मोहनवाड़ी गांव से जुड़ी हुई है स्मृतियां

श्रीपाल शक्तावत,वरिष्ट पत्रकार

सौभाग्यशाली हूं क्योंकि मेरे एक नहीं,दो-दो गांव हैं। पहला-पिपलाज। जहां जन्म हुआ। दूसरा-मोहनवाड़ी। जहां,बचपन बीता। पांचवीं-छठी तक पढ़ाई की। पिपलाज राजस्थान के अजमेर जिले का आखिरी गांव ,जिसकी सीमा भीलवाड़ा जिले से सटी है।

मोहनवाड़ी राजस्थान के ही झुंझुनू जिले का एक गांव,जहां बचपन में सुनी नवजात कन्याओ की हत्या की कहानियों ने जन्म के 45 साल बाद मुझे कन्या भ्रूण हत्या पर टेलीविजन इतिहास के सबसे बड़े स्टिंग ऑपरेशन का आइडिया दिया।
दोनों गांवों की कहानी मेरे जीवन में रेल पटरियों की तरह चलती है। पिपलाज नदी,नालों से घिरा अजमेर जिले का एक गांव है तो मोहनवाड़ी रेतीले धोरों के बीच बसा झुंझुनू जिले में स्थित गांव।
मोहनवाड़ी मेरे माथे पर लगा तिलक है तो पिपलाज मेरे मस्तक पर सजा वह साफा (पगड़ी) जिसकी आन-बान की कहानी हर घड़ी जिम्मेदारी का बोध कराती रहती है।

पिताश्री ईश्वर सिंह शक्तावत

शुरुआत शेखावाटी के उस मोहनवाड़ी गांव से,जहां मैंने चलना-बढ़ना और पढ़ना सीखा । पिता श्री ईश्वर सिंह शक्तावत पेशे से शिक्षक थे सो पढ़ाई, अनुशासन उनके जरिये जीवन में कब प्रवेश कर गया पता ही नहीं चला। मां श्रीमती भंवर कंवर मेरे जीवन में सम्वेदनाओं का सबसे बड़ा स्रोत बनकर चट्टान सी खड़ी रही।

मोहनवाड़ी सेकंडरी स्कूल

मोहनवाड़ी में अब सब कुछ है। सड़क। शानदार हायर सेकंडरी स्कूल। घर घर पानी पहुंचाते नलकूप। डिस्पेंसरी। यानी,हर जरूरत अब गांव में ही पूरी हो जाती है। लेकिन तब प्राइमरी स्कूल थी,जिसके प्रधानाध्यापक मेरे पिता श्री ही थे। पानी के लिए कुँए में लाव (मोटी रस्सी) से चड़स (चमड़े का बना बड़ा थैला) खींचते हुए चार-पांच लोग आज भी फिल्मी रील से जेहन में घूम जाते हैं। पानी की एक-एक बूंद कितनी महत्वपूर्ण होती है, ये सबक कुँए पर चड़स खींचते लोगों या मां को एक-एक बूंद का करीने से इस्तेमाल करते मिला था। रसोई में मिट्टी से बर्तन साफ कर पानी को बचाने का सबक था तो नहाने के बाद उसी पानी से कपड़ों को धोने फिर साबुन लगा दूसरे पानी से धोने की कवायद होती। खाना खाने के बाद चुल्लू करने या हाथ धोने में यह खास ख्याल रहता कि पानी या तो किसी पेड़ की जड़ में गिरे या फिर कुछ हिस्से में लगायी गयी हरी घास में। खुले आसमान के नीचे सोते वक्त गर्मियों में बिस्तर पर घण्टे भर पहले पानी का छिड़काव इसलिए जरूरी था ताकि वह ठंडे हों और सोते ही नींद आ जाये।

मेरा जन्म 1966 में हुआ कि 1967-68 में ये पहेली मैं आज भी सुलझा रहा हूं। लेकिन मोहनवाड़ी की जीवन यात्रा जन्म के ठीक बाद ही शुरू हुई थी। तीन अंकों में तनख्वाह और कुल नौ जनों का परिवार। बावजूद इसके हमारा ‘हैपीनेस इंडेक्स’ उस गांव के ज्यादातर घरों से बेहतर था।

इस ‘हैपीनेस इंडेक्स’ की वजह थी-वर्तमान को बेहतर तरीके से जीते हुये पिताश्री द्वारा हमारे भविष्य को गढ़ने की कोशिश। कुछ समझ बढ़ी तो पता चला पिताश्री के दृढ़ संकल्प ने ही,गांव की बेटियों को घर की चारदीवारी से निकाल स्कूल तक का रास्ता साफ किया। आर्य समाज के आंदोलन का प्रभाव मोहनवाड़ी की जीवन शैली और सामाजिक सोच पर साफ दिखाई पड़ता था। जाति या गोत्र की बजाय पहले नाम से हर एक को सम्बोधन बराबरी का भाव तो पैदा करता ही, जातिवाद की जड़ों पर प्रहार भी करता। बावजूद इसके भूत-प्रेत की कहानियां और कुरीतियां इस कदर हावी थी कि पिताश्री स्कूल क्वार्टर्स से दूर तक साफ दिखते जोहड़-तालाब और उससे सटे मसाण-श्मशान के जरिये ही मन का भय भगाने का उपक्रम करते। बातों ही बातों में बहादुर होने का भाव जगाते और रात के अंधेरे में श्मशान से सटी एक कोटड़ी-मकान के हाथ लगाकर आने का फरमान सुना देते। उधर,मां क्वार्टर के पीछे बने सोहन जी के कुंए की तरफ जाने से इसलिए मना करती क्योंकि उस कुँए में नवजात बेटियों को गिराकर मार देने की अपुष्ट कहानियां सुनी थी। एक तरफ मां बेटियों के प्रति समाज के इस सोच पर लानत देती तो दूसरी तरफ मेरी दोनों बहनों को बेटे की तरह पालने पर गर्व भी जताती ।

ऐतिहासिक पातालतोड़ कुँए मोहनवाड़ी में पुराने जलस्रोत

पत्रकारिता के पांचों ककार (फाइव डब्ल्यू)-क्या,कहां, क्यों,कैसे,किसलिए .. जेहन में उसी वक्त उभर गये थे । तभी तो जिज्ञासा वश कुँए की मुंडेर को पकड़ बाल मन उस पातालतोड़ कुएँ में यह झांकने की कोशिश करता कि मारकर फेंकी गई वो नवजात कन्याएं इसमें दिखती भी है कि नहीं!
प्राइमरी स्कूल में पढ़ते हुये ही पहली बार मंच पर जाने और पंचायत समिति स्तर पर वाद विवाद प्रतियोगिता में अव्वल आने का अनुभव मिल गया। सम्भवतः यही अनुभव भविष्य में माइक थामने का प्रेरक भी बना। ये प्रतियोगिता अब अंतराष्ट्रीय स्तर पर मारवाड़ी घोड़ों को तैयार करने वाले चर्चित गांव- डूंडलोद की स्कूल में आयोजित की गयी थी।
एक तरफ यह इनाम जीतने की खुशी थी तो दूसरी तरफ वह खुशी जो किसी से खुशखबरी सांझा करने पर अक्सर हुआ करती। शेखावाटी के सीकर जिला मुख्यालय से हर शाम आने वाली बस कभी-कभार ऐसी खुशी लाती। होता ये कि गांव के फौजी जब छुट्टी आते तो उनके आगमन की खबर देने के लिये हम बच्चों की फौज उनके घर की तरफ दौड़ती। कोई पहले खबर न दे पाये,इसलिए चीखते-चिल्लाते हम सभी उनके घर की तरफ दौड़ते। कोई पिता को फौजी पुत्र के आगमन की खबर देता तो कोई मां, बहन,बहू या बेटी बेटे को। अपना बेडिंग और बक्शा लिये फौजी घर आता तो तिलक लगाकर स्वागत होता। पत्नी घूंघट की ओट में पति के आगमन को देख खुशी से बल्लियों उछलती तो हम नारंगी जैसी फांकें-टॉफी या चीनी के बने पतासे खा जश्न मनाते। फौजी होना कितना बड़ा गर्व देता है,यह अहसास उसी समय होने लगा था। फौजी के आगमन पर यह जश्न अलग-अलग अंदाज में कई दिन चलता।

छठी क्लास में आते-आते संघर्ष और समाधान के कई सबक सीखने को मिल गये। छठी क्लास में पहले पास ही के खिरोड़,फिर बसावा की स्कूलों में दाखिला लिया। बड़े भाई श्री सत्यपाल सिंह के साथ साथ हम कई बच्चे सर्दी,गर्मी में एक साथ स्कूल की और जाते और वापस लौटते। पांच-छह किलोमीटर की यह दूरी पाला जमा देने वाली (शून्य डिग्री के आसपास) सर्दी और बुरी तरह तपा देने वाली (48-49 डिग्री) गर्मी के अनुभव तो देती ही, होमवर्क न करने की सूरत में हाथ पांव पर गीली लकड़ी से कई तरह के निशान की पीड़ा भी देती।
सर्दियों में तो सूं-सूं करती नाक और कांपते डील के सहारे जैसे-तैसे स्कूल हो आते। लेकिन गर्मियों में हालात और भी मुश्किल होते। न रास्ते में पीने को पानी। न ही पेड़ों की छांह। ऐसे में रेत के धोरों में चप्पल के फीते निकल पांव को तपती रेत में धंसने पर विवश करते सो अलग। लेकिन,जहां समस्या हो वहां समाधान भी निकल ही आता है। ज्योंही कोई खेजडी का पेड़ दिखता ,हम जोर से चिल्लाते-वह जांटी-खेजड़ी मेरी। दूर तक दौड़ते और उस पेड़ की छांह में सुस्ता आगे बढ़ जाते। तपते झुलसते पांवों को अगर कोई राहत मिलती तो किसी गाय के गोबर या भैंस के पौठे से। दौड़ते और तपते पांव को उसमें धंसा राहत देते। या फिर खींप (एक घास) से रस्सी गूंथ आक के पत्तों को पांव से बांध उस तपती रेत से पांवों को बचाने के जतन करते। चप्पल रेत में धंसकर टूट जाती तो कपड़े के जूतों में रेत भर जाती।
कहीं कोई खेत में काकड़ी(ककड़ी) या काचरे की खुशबू आती तो बिना किसी संकोच उस खेत में दौड़ जाते। ऐसे में पानीदार मतीरे-तरबूज हाथ लग जाते तो सभी उसे फोड़ गला तर कर आते। न खेत वाले को शिकवा न साथ वालों को कम मिलने की शिकायत। बंटवारा वही करता जो बड़ा होता।
नर सेवा,नारायण सेवा का भाव शेखावाटी के व्यापारिक वर्ग में शुरू से रहा। शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में जितनी चैरिटी शेखावाटी के प्रवासी व्यापारियों ने की वह शुरू से अनुकरणीय रही। विनोबा भावे के भू स्वामी आंदोलन में खिरोड़ के श्री भवानी भाई की भूमिका इतनी बड़ी थी कि बचपन में ही उनके योगदान की कहानियां सुनने को मिल गयी थी। मोहनवाड़ी के शिक्षक श्रद्धेय सुल्तान सिंह जी महात्मा गांधी के दांडी मार्च का हिस्सा बने थे तो पिता श्री ने राजस्थान के चर्चित भू स्वामी आंदोलन में शिरकत करने के लिये सवाई मान गार्ड की नौकरी त्याग सड़क पर संघर्ष का रास्ता अख्तियार किया था। बाद में वह शिक्षक बन शिक्षा सेवा में आ गये। बतौर शिक्षक उनकी सेवाओं को 1971 की जनगणना में सर्वश्रेष्ठ सेवाओं के लिये राष्ट्रपति पुरुस्कार और कांस्य पदक के जरिये नवाजा गया।
ये वह दौर था जब गेहूं रूस से आयात होता था और बाजरे की रोटी के साथ हम बच्चों को एक आधी फ़ल्कि गेंहू की मिलती। वार-त्योहार जिन घरों में चावल बनते थे,वह सक्षम परिवारों की श्रेणी में होते। यह वह दौर था जब मेहमान आने पर एक दूसरे के घर से बनी सब्जियों की आपूर्ति होती। शादी विवाह में बारात दो-तीन ठहरती और आवभगत में पूरा गांव जुटता। बिस्तर,चारपाई से लेकर खाने के बर्तन सहकारिता के भाव के साथ बारात के लिये जुटाये जाते। समृद्धि ने यहां विकास की राह प्रशस्त की है। लेकिन सहकार का वह भाव अब उतना नहीं दिखता।

लालटेन से बिजली की रोशनी और खेती में नये प्रयोगों ने शेखावाटी के धोरों को पानी से तर करने के प्रयोग उसी दौर में शुरू हुये थे। 70 के दशक में कुओं की खुदाई और बिजली से सिंचाई के प्रयोगों ने गति पकड़ ली थी। क्या हिन्दू और क्या मुसलमान? जो भी कुएं की खुदाई शुरू करता हनुमानजी के सवामणी यानी प्रसादी बोलता और खेजडी के नीचे हनुमानजी स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू कर देता। उस रेगिस्तान में पानी निकलेगा भी या नहीं या निकलेगा तो कितने हाथ पर,यह तय करने के लिए ग्रामीण समझ वाले विशेषज्ञ बुलाये जाते और जिस जगह वह हाथ रखते वहीं खुदाई शुरू हो जाती। खेजडी राजस्थान का कल्पवृक्ष और राज्य वृक्ष है सो हर काम में उसकी महति भूमिका होती।

मोहनवाड़ी और उससे सटे गांवों में अब सीमेंट कारखाने की आहट ने लोगों की जेबें बेशक भर दी हों,लेकिन पहली बार खुशहाली पेट्रो डॉलर ने ही दी। उसी दौर में खाड़ी देशों में शेखावाटी से कुशल अकुशल श्रमिकों का जाना और पेट्रो डॉलर का आना शुरू हुआ। पास ही सटे पुरोहितों की ढाणी के जांगिड़ परिवार से श्री राम लाल,श्रीयुत श्रीराम, श्री हरलाल तीनों भाइयों ने दुबई का रुख किया तो खाड़ी देशों में जाने और पेट्रो डॉलर कमाने की ललक और बढ़ गयी।
जांगिड़ परिवार के ही श्री मक्खन जांगिड़ और श्री अशोक जांगिड़ ने अविभाजित मध्यप्रदेश के रायपुर (छत्तीसगढ़) का रुख किया तो पता चला कि समृद्धि की राह खाड़ी देशों से ही नहीं,भारत के बडे शहरों से भी निकल सकती है।
तपती रेत से निकल सफलता की कहानी रचने वालों में से एक सख़्श का पहला परिचय तो शिविरा (शिक्षा विभाग राजस्थान की पत्रिका) के जरिये ही हुआ। काला चश्मा लगाये पुरोहितों की ढाणी के इस शख्स-श्री गोकुल चंद पुरोहित का फोटो और सफलता का समाचार इस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। वजह थी-दृष्टिहीन पुरोहित द्वारा उस वक्त सेकंडरी बोर्ड मेरिट में अपना नाम दर्ज कराना। गोकुल जी ने इस सफलता के जरिये साबित कर दिया था कि मेहरबानी से नहीं, मेहनत से मंजिल हासिल की जा सकती है। यही गोकुल जी बाद में अध्यापक फिर तहसीलदार बने।

कमल मोरारका

देश को सर्वाधिक सैनिक देने वाले शेखावाटी की पहचान अब राजस्थान के एजुकेशन हब के रूप में बन गयी है । हालांकि,इससे पहले चैरिटी के तौर पर सेठ साहूकार स्कूल,सामुदायिक भवन,धर्मशाला या मंदिर बनाते और दूसरे प्रदेश में कमाई कर अपनी धरती पर बड़ी रकम खर्च कर जाते । ऐसी ही सेठ श्रीरघुनाथ प्रसाद क्याल सेकंडरी स्कूल-खिरोड़ में कुछ दिन क्लास छठी में पढ़ने का मौका मिला। वहीं बसावा में छठी की पढ़ाई करने कुछ महीनों बाद पहुंचे तो इतिहासकार श्रद्धेय सुरजन सिंह शेखावत और झाझड़ के व्यवसायी मोरारका परिवार की यश गाथाएं सुनने को मिली। कालांतर में इसी मोरारका परिवार के उद्योगपति श्री कमल मोरारका सांसद,केंद्रीय मंत्री और बीसीसीआई के बड़े पदाधिकारी बने।

महावीर सिंह शेखावत, एयर वाइस मार्शल

इधर देश को फौजियों की सौगात देने वाले मोहनवाड़ी ने वायु सेना को श्री महावीर सिंह शेखावत नामक एक एयर वाइस मार्शल दिया। ठेठ हरियाणवी अंदाज़ वाली भाषा के बीच मोहनवाड़ी में श्री बद्री सिंह का लहजा ठंडी बयार सी होता। उनकी भाषा में शेखावाटी के साथ मारवाड़ी भाषा का मिश्रण ऐसा ही होता जैसे लाठी मारने के बाद कोई मरहम पट्टी।

मोहनवाड़ी के दुर्जनशाल सिंह जी उस दौर में तहसीलदार से रिटायर हो चुके थे तो उनके छोटे भाई रतन सिंह जी के छोटे पुत्र जगमाल सिंह जी फ़ूड कॉर्पोरेशन में अधिकारी बने। जगमाल सिंह जी के परिवार से हमारा दिली रिश्ता इतना प्रगाढ़ था कि उनकी पत्नी श्रीमती इंद्र कंवर और मेरे पिताश्री का रिश्ता बहन भाई का बना तो मोहनवाड़ी से यही रिश्ता और प्रगाढ़ होता गया। मोहनवाड़ी से पिपलाज चले जाने के बावजूद बुआसा से मिलने और बचपन के साथियों से संवाद के लिये मोहनवाड़ी आना जाना बना रहा। स्वर्गीय पिता अपने जीवन में क्या कुछ कमाई कर के दुनिया से विदा हुये, उसका अंदाज़ तब लगता है जब मोहनवाड़ी जाने पर आज भी बुजुर्गों से पहचान मास्टरजी के बेटे के तौर पर होती है।

गांव के ही नारायण सिंह जी उस दौर में चर्चा का विषय इसलिये थे क्योंकि कुछ ही साल पहले करौली रियासत से अपने दायित्व से मुक्त हो वह सीकर शिफ्ट हुये थे। उनके कमर से लगी पिस्टल हम सबके आकर्षण का केंद्र होती। उनके पुत्र श्यामसिंह जी राजस्थान पुलिस में थानेदार बने तो किशोर सिंह जी मध्यप्रदेश पुलिस में डिप्टी एसपी तक पहुंचे। राजेन्द्र सिंह जी की संगत मेरे बड़े भाई यशेन्द्र पाल सिंह जी के साथ होती और अक्सर पांच-दस मित्र सीकर से उनके साथ मोहनवाड़ी आते।

व्यवसाय के स्तर पर मोहनवाड़ी के मंगेज सिंह जी और बसन्त सिंह जी पीडब्ल्यूडी के क्लास वन ठेकेदार के रूप में चर्चित रहे।
पूरण मल जी जोशी गांव के लिए ऑल इन वन वाले अंदाज़ में उपलब्ध रहते थे। वह नामी नाड़ी वैद्य भी थे,ज्योतिष के जानकार भी। पोस्मास्टर रहे सो अलग। श्री गोपी राम जांगिड़ इलाके में संकटमोचक की भूमिका में सक्रिय रहते। मोहनवाड़ी के ही सुमेर सिंह जी नवलगढ़ पंचायत समिति में यूडीसी रहे।
वहीं गिरधारी सिंह जी ने दिल्ली जाकर बड़े कारोबारी के तौर पर खुद को स्थापित किया । जहां तक मोहनवाड़ी की बात है,यहां उस दौर में नारायण दास जी स्वामी ऊंट गाड़ों में सामान लाकर गांव में बेचते। सही तरीके में गांव के वह पहले सेठ थे,साहूकार थे। राज बाईसा और दो चार लड़कियां उम्मीद की किरण बनी। वक्त बदला तो इसी गांव के श्री पूरण सिंह ने अपनी बेटी की घोड़ी पर बिंदौरी निकाल शादी की और बेटियों के प्रति श्रद्धा का भाव प्रकट किया।

यह भी पढ़ें…

यादों के सरोवर में झिलमिलाता मेरा गांव “चिकनौटा”

छठी कक्षा ने मेरी कई परीक्षाएं ली। पहले रेत के टीलों को नापते खिरोड़ फिर बसावा में पढ़ाई की तो कुछ महीने बाद ननिहाल चुरू जिले के लोहा गांव का रुख किया। इस बीच शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्ति के साथ पिता श्री ने पैतृक गांव -पिपलाज (जिला-अजमेर) जाने का फैसला किया तो थके मन से उस जगह को छोड़ तीन सौ किमी दूर उस गांव की तरफ बढ़ गये, जहां जाने की कभी कल्पना भी नहीं की।
बिजली को एक घर से दूसरे घर की तरफ तारों के जरिये बढ़ते उसी दौर में देखा।

(शेष अगली कड़ी में…क्रमश: जारी।)

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
3,376FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -

Latest Articles