गांव उखई से जुड़ी यादें मंजिल पर पहुंचने में सदैव रही हैं मददगार

संता नंद मिश्रा, मैनेजमेंट कंसल्टेंट (वॉशिंगटन डीसी, अमेरिका)

मेरे गांव का नाम उखई पश्चिम पट्टी है, जो सिवान जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस गांव में पहले 22 टोला हुआ करता था लेकिन समय के साथ जैसे—जैसे जनसंख्या में बढ़ोतरी होती गई, गांव का भी विस्तार होता चला गया और वर्तमान गांव लगभग 30 टोलों में फैला है। सुविधाओं के लिहाज से अगर देखा जाए तो मेरे गांव में वह सबकुछ है, जिन सुविधाओं की बात एक आदर्श गांव को लेकर होती है। सीवान जिले में स्थित हमारा गांव उखई लगभग 200  परिवारों का गांव है। गांव में प्राथमिक विद्यालय, बच्चों के खेलने के लिए मैदान, ब्रह्मचारी बाबा का मठिया,पोखरा, खाड़ी, शिवमंदिर, दुर्गा मंदिर सबकुछ उपलब्ध है। अपने गांव से 25 साल बाहर रहते हुए भी शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब मुझे अपने गांव की भींगी मिट्टी की खुशबू की याद नहीं आयी हो।

यहां तक की सात समंदर पार अमेरिका में विगत 15 साल रहने के बावजूद मैं अपने गांव उखई को नहीं भूला। आपके जेहन में ये सवाल उठ सकता है कि क्या गांव भी कोई भूलने की ​चीज है। मैंने गांव को अपने जेहन में ता उम्र संजोया है और मुझे गर्व है की इसी गांव ने मुझे अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्षशील बनाया। जमीन में जुड़ी अपनी पहचान, गांव गंवई के संस्कार से ओतप्रोत अपने सरोकार से रूबरू कराया और गंवई पहचान को लेकर गर्व की भावना मन में भरी। भले ही कभी—कभी महानगरीय पिज्जा, बर्गर और भौतिक विचारधारा ने मुझे भी अपने साथ जोड़े रखने, उसे आत्मसाात करने की कोशिश की। लेकिन इसी गांव की मिट्टी, गांव से जुड़ी यादों ने मुझे अपना वजूद समझाया और मंजिल तक पहुंचने में आये थकान,विराम को हर संभव दूर किया और अपने मंजिल पर पहुंचाया।

मेरा बचपन गांव उखई में बीता है। जब भी गांव की बात होती है, अचानक मेरे मनोमस्तिष्क में अपने गांव की पुरानी तस्वीर आ बैठती है। मेरी शुरूआती शिक्षा दीक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई। यदि अपने स्कूली जीवन के शुरूआत के दिनों की याद करता हूं तो याद आता है कि उन दिनों में हम स्कूल के फर्श पर बोरा लेकर बैठा करते थे। आज की तरह चकाचौंध की दुनिया भले ही हमारे बचपने में न दिखाई देती हो, भले ही हमें आज की तरह बुनियादी सुविधायें भी न मिली हों बावजूद इसके हमारे जीवन में खुशी बहुत थी, जीवन उल्लास से भरा हुआ था। मास्टर साहब को हमलोग मार्ट साब कहते थे और उनकी इज्जत हमारे नजर में किसी भी देवता से कम नहीं थी, यानी हम उन्हें देवतुल्य मानते थे। उस समय के शिक्षक भी अपनी कक्षा,अपने स्कूल के सभी बच्चों को अपना समझते थे। उनकी पढ़ाई लिखाई और उनकी बेहतरी का बखूबी ध्यान रखा करते थे, अपने परिवार के बच्चों की तरह स्नेह देते थे। एक अजीब तरह का भावबोध शिक्षक और छात्र के बीच हुआ करता था। जिस तरह का स्नेह और गुरू शिष्य परंपरा की झलक हमें प्राथमिक स्कूल में मिली आगे के स्कूल,कॉलेज और विश्वविद्यालयों की पढ़ाई के दौरान इस स्नेह बोध व बंधन का सर्वथा अभाव दिखा।

यदि उखई गांव के सामाजिक विन्यास की बात की जाए तो मेरे गांव में सभी जाती बिरादरी के लोग हैं। अधिकतर अवधिया जाती के लोग हैं, जो आजकल खुद को पटेल कहलाना या पटेलों के साथ खुद की पहचान को समायोजित करने का ्प्रयास अक्सर करते हुए दिखाई देते हैं, यानी वे पटेलों में खुद को सम्मिलित करना चाहते हैं। इसके साथ ही गांव में अन्य जातियां भी हैं मसलन ब्राह्मण, हरिजन, धोबी, कोईरी आदि। उन दिनों हर मौके पर सब एक दूसरे के लिए खड़े दिखाई देते थे, हालांकि जातीवादी सोच का विस्तार शुरू हो गया था, कभी—कभार कटुता भी दिखाई देती थी, बावजूद इसके समाज में एक तरह की समरसता थी, जाती के बंधन के जकड़ में गांव पूरी तरह सिमटा हुआ नहीं था और समाज में समरसता थी, आनंद था और कमोबेश ग्रामीण जीवन संतोष जनक था।

बचपन में मेरा ज्यादा समय अपने बाबा स्वर्गीय राघव मिश्र के साथ ही बीता और उन्होंने ही मुझे एक अच्छे इंसान के रूप में जीवन जीने की कला सिखायी। वे कथा वाचक थे। पुरोहित का कार्य भी किया करते। मेरे पिता त्रिलोकी नाथ मिश्र भी शिक्षक थे। वे रामचरित मानस का पाठ करते हैं और प्रवचन भी किया करते हैं। बाबा 2002 में गुजर गए। लेकिन बाबा ने मरते दम तक मेरे पिता से एक पैसा नहीं लिया। यहां तक की जब उन्हें यह अहसास होने लगा कि अब मृत्यु करीब है तो उन्होंने चार-पांच दिन पहले मुझे दिल्ली से उखई बुलवाया और जो भी कुछ पैसे उनके पास थे वो मुझे सौंप दिया। आज भी कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता है जब मैं बाबा को याद नहीं करता हूं।

बाबा अक्सर कहा करते थे कि ‘पढ़ लिख लिह तो गांव-समाज ला कुछ करिह।’  वे कहा करते कि कोई जरूरी नहीं कि हर कोई बड़ा दान ही करे। कोई भी दान छोटा नहीं होता,चाहे दातुन का ही दान क्यों न हो? जो जिस स्तर पर है उसी स्तर पर गांव समाज के प्रति सेवाभावी होना चाहिए। साथ ही उनकी यह भी सीख रही कि यदि किसी की मदद की जाए तो उसे अहसास न दिलाया जाये कि उसे मदद की गई है। इससे दान का महत्व कम हो जाता है। इतना ही नहीं कर्मकांडी ब्राह्मण होते हुए भी उनमें जात-पात छूआ छूत का भाव न था। एक बार उन्होंने मुझे महापात्र ब्राह्मणों के विषय में शिक्षा देते हुए कहा,बाबू ये लोग महा पात्र हैं यानी इनके बिना मृत्यु का भोज पूर्ण नहीं हो सकता। मेरे छोटे बाबा श्री लक्ष्मी नारायण मिश्रा से मैंने बहुत कुछ सीखा है और मेरे जीवन में उनका बहुत ही योगदान है। जब भी मैं पढ़ाई के दौरान दिल्ली से थकता था, उन्हीं से शांति पाता था। उनसे बात कर न सिर्फ मुझे शांति मिलती बल्कि आत्मबल भी प्राप्त होता था। छोटे बाबा को हमलोग बाजा बाबा भी कहते थे, सत्य चरितार्थ होता है। अपने 96 साल के उम्र में कभी भी दूसरो को उन्हें सेवा करने का अवसर नहीं मिला।

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मुझे बताते थे की जब वो कॉलेज में थे तो उन्हें महात्मा गांधी के बिहार आने का प्रोग्राम याद है। वे 1971 में मिलिट्री से रिटायर्ड हुए थे, जंग में दुश्मनों को मात दिए थे, वे जितना सख्त जंगे मैदान में थे उतना ही सरल और सहज समाज और परिवार के साथ थे। 1990 के दशक में वो पूर्णतः रिटायर हो अपनी जिंदगी अपने अंदाज से जी रहे थे।
उनकी एक बात मुझे हमेशा याद आती है वो कहते- आप ठगा जाओ लेकिन दूसरों को न ठगो कारण कम से कम ठगने वाला कुछ समय के लिए खुश तो होगा। मैं अक्सर उन्हें अपने यादों में संजोता हूं, उनकी जिंदगी के राज को टटोलता हूं, अचानक उठ बैठता हूं, भींगी खुशबू आती है, कोई मुझे झकझोरता है,कहता है उठो और लड़ो, ये आवाज सुनकर मैं फिर दौड़ता हूं और फिर भागता हूं
और मैं अपने बाबा को सदर नमन याद करता हूं।

इसी क्रम में मैं एक और व्यक्ति का जिक्र करना चाहूंगा। वे हैं मधुसूदन पांडे, जो डीएवी हाईस्कूल में शिक्षक होने के साथ ही मेरे रिश्तेदार भी हैं। मैं उनसे पढ़ता था और वे मुझे मानते भी बहुत थे। इसलिए इस पड़ाव पर यह स्वीकारोक्ति जरूरी है। मैं यह कहना चाहूंगा कि मैं बहुत आभारी हूं। मैं कुछ कर नहीं पाता इन सबों के लिए लेकिन उनके बताये रास्ते पर चलने की कोशिश अवश्य रहती है।

वो दौर कुछ और था। जीवन मे कोई भागदौड़ नहीं थी। हमेशा कीर्तन भजन होते रहता था। घर में कोई आ गया तो उसे जाने की जल्दी नहीं होती थी। लेकिन ये उन दिनों की बात थी, आज घड़ी का अलार्म बाद में बजता है और मैं पहले ही जग जाता हूं। यही फर्क है बचपन और आज की जिंदगी में।

 

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हरेक पर्व चाहे होली हो या दिवाली या फिर छठ, धूमधाम से उखई में मनाया जाता। जिसकी जितनी क्षमता होती उसी में अमीर लगता। मुझे याद है कैसे दिवाली के एक सप्ताह पहले से घर की सफाई शुरू हो जाती थी। जो लोग शहर में प्रवास करते थे, वो भी इस मौके पर घर जरूर आते। संयुक्त परिवार था, सामूहिक उत्तरदायित्व था। आज की तरह अपने में ही खोये रहने,परेशान रहने का रिवाज नहीं था और यही कारण था कि सभी लोग मस्त थे।
उखई गांव में दुर्गा मंदिर के प्रांगण में तीन दिन यानी रविवार, मंगलवार और शुक्रवार को बाजार लगता था। मेरे बाबा शाम को बाजार जरूर जाते। मंदिर और बाजार सिर्फ सामान खरीदने और बेचने का स्थान मात्र नहीं था। यह सामाजिक एकजुटता का पर्याय भी था। ऐसा सामाजिक स्थान जहां लोग घंटो बैठकी लगाते, देश दुनिया की बात करते और फिर शाम होते—होते घर वापस आते क्योंकि बिजली की व्यवस्था उन दिनों में नहीं थी।

हमारे गांव उखई का एक मुख्य सार्वजनिक स्थान है ब्रह्मचारी बाबा का मठ, जो बहुत ही दैविक, रमणीय एवं सुकून प्रदान करने वाला स्थान है। वहां गांव के ब्रह्मचारी बाबा एवं माटूराम जी की समाधी है। मैं अक्सर वहां सुबह—शाम जाया करता और अपने व देश-दुनिया के बारे में सोचा करता। उस जगह की पवित्रता का वर्णन के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। गांव के पूरब में स्थित यह एक ऐसा स्थान जो बिलकुल मन को शांती देता है और यहां हरियाली ही हरियाली है। मैं अपने मन में इसकी तुलना रामचरित मानस के अशोक वाटिका से करता रहा हूं। आम, कटहल, अमरूद, आवला के पेड़।

आज भी मैं अपने  उखई गांव के इन पवित्र स्थानों को अक्सर याद करता हूं और जब भी मेरा गांव जाना होता है, इस जगह पर जरूर जाता हूं और समाधी को नमन करता हूं। ऐसा करते हुए मेरे अंदर एक नई उर्जा का संचार हमेशा होता रहा है और इन देव स्थानों से आर्शीवाद प्राप्त होता रहा है। मेरे गांव में जो लोग मुझे जानते हैं, यदि मैं अपने घर में नहीं होते हैं तो वो ये मान कर चलते हैं कि मठिया पर जरूर मिलूंगा। मठिया पर स्थित तालाब जिसे हमलोग पोखरा कहते थे, के बगल में हैंड पंप लगा दिया गया है। आज की नयी पीढ़ी पोखरा में कम चांपा कल पर ज्यादा स्नान करती हुई मिल जाएगी। फिर भी कुछ लोग गर्मी के दिनों में या माघ के पाला में भी पोखरा में डूबकी लगाते जरूर मिल जायेंगे।
ये रही बचपने की बात लेकिन समय के साथ हमारे ग्राम समाज की विडंबना है कि यदि आपको कुछ पाना है तो गांव छोड़ने की मजबूरी होती है। वर्ष 1997 में मैं पढ़ाई लिखाई के सिलसिले में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय चला आया और फिर दिल्ली स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स से एमए किया। वर्ष 1997 में जिस पढ़ाई के लिए गांव छोड़ आया था, उसी पढ़ाई लिखाई के सिलसिले में वर्ष 2007 में अमेरिका चला आया। सोचा था कि कुछ पैसा कमाकर वापस चला जाउं लेकिन आप जानते हैं कि एक बार जब कोई गांव, घर छोड़ता है तो विरले ही वापस जाता है। मेरे दिमाग में आज भी बाबा की एक बात कौंधती है। जब मैं जेएनयू आने लगा तो उन्होंने कहा,” सब तो ठीके बा,इहां पिताजी नौकरी में तो हैं ही,” लेकिन मैने मन ही मन कहा कि मुझे तो दुनिया मुट्ठी में करना है और आज 25 साल बाद भी मुझे लगता है कि बाबा सही कह रहे थे की दुनिया को मुट्ठी में करने के बजाय हमसब उसी मुट्ठी में तो नहीं समा रहे हैं।
तो ये रहा बचपन के स्वच्छंद गांव की झलक। बिल्कुल साधारण, सहज,निर्भिक एवं साफगोई से अपनी बात रखने वाला। भले ही मैं गांव से दूर हूं। दिल्ली में रहा, अमेरिका में रहते हुए भी लगभग डेढ़ दशक होने जा रहे हैं लेकिन बावजूद इसके गांव की माटी की खुशबू हर पल अपने अंदर महसूस करता हूं। आज भी गांव से जुड़ा हूं, अपनी माटी के सरोकार से जुड़ा हुआ हूं। मुझसे कोई मेरा गांव नहीं छीन सकता। उसकी छाप अमिट है।

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ऐसा भी नहीं है जैसा छोड़ के आया था गांव वैसा ही है। आज उखई गांव काफी बदल गये हैं। राजनीति और व्यवस्था ने भले ही गांव की तरक्की में कोई योगदान दिया हो या नहीं लेकिन गांव के विभाजन में,आपसी सहसंबंधो पर आधारित गांव की व्यवस्था के तोड़फोड़ में इनका योगदान काफी रहा है। कथित तरक्की के इस दौर में, एक दूसरे से आगे निकलने की नकारात्मक होड़ ने गांव को एकजुट करने के बजाय विभाजित कर दिया है। नयी पीढ़ी के युवा स्मार्ट फोन पर पब जी खेल रहे हैं। लस्सी, छांछ की जगह कोला पेप्सी ने ले लिया है, संयुक्त परिवार का विघटन हो चुका है। होली, दिवाली का पर्व मनाया तो जा रहा है, लेकिन वो उत्साह नहीं दिखता। लोग सिर्फ परिवार तक सिमटते जा रहे हैं। बावजूद इसके अभी भी गांव में उम्मीदें बची हुई हैं। गांव में आज भी वो बात है जो समय के थपेड़ों के बावजूद भी खुद को बचाये हुए हैं। वो मिटाये नहीं मिट सकतीं और गांव आज भी लोगों को जोड़े रखने की क्षमता रखता है।

गांधी जी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवो में बसती है, तो आईये हम सब मिलकर कुछ ऐसा करें जिससे मां भारती की आत्मा प्रसन्न हो।इस दौरान जितना संभव हो सका मैनें उखई गांव के लोगों का मदद किया। अमेरिका में रहकर भी सिवान के लोगों के लिए सदैव तत्पर रहने और गांव समाज के हर समाजिक काम में चढ़कर हिस्सा लेने की कोशिश होती है। बाबा के कथन को दुहराउं तो एक दातुन देने से लेकर कैंसर हॉस्पिटल बनाने तक और इस सभी का अपना महत्व है। पूरे कोरोना महामारी के समय में हमारी कोशिश रही बाकी के सा​थियों के सहयोग से लोगों की मदद की जाये। इसी कम्र में हमलोगों ने न सिर्फ अपने गांव में बल्कि सीवान के अलग-अलग गांव में 10,000 मेडिसिन कीट बंटवाया। फूड पैकेट बांटे गये। छठ दीवाली के मौके पर जरूरतमंदों को कंबल वितरण किया जाता रहा है। ग्रामीणों के आशीर्वाद और सहयोग से एवम सिवान अमेरिका मैत्री के सौजन्य से सिवान के अलग-अलग गांवों में साड़ी, नारियल एवम सुपली का वितरण कार्य जितना हो सका करने की कोशिश हुई। साथ ही दूसरों को प्रेरित करने का कार्य भी। यही ग्रामीण जीवन का आधार है,यही समाज जीवन का आधार है।

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इसके साथ ही ब्रम्हाचारी बाबा के मठ पर बंग्ला बनवाया। ब्रह्मचारी बाबा के आश्रम पर श्री रामकंठ मिश्रा एक मंदिर बनवाने के विषय में सोचे थे। उनका भी बहुत आर्शीवाद है। मैं चाहता हूं कि गांव का सहयोग हो और इस मंदिर का कार्य पूर्ण हो।
कहानी के इस पड़ाव पर मैं चंद भावनात्मक पंक्ति के जरिए गांव को याद करना चाहता हूं…
कविता है…
बहुत दिनों बाद आज वो मैं बचपन का गांव गया
सोचा था वहीं लोग होंगे, वही पकवान
वही खेत,वही खलिहान, वही बागवान और वही नाते—रिश्तेदार।।
..लेकिन समय की चकाचौंध और बदलते हुए दौर ने बहुत कुछ बदल डाला
मुझे बदल डाला तो भला गांव क्यों पीछे रहे?
वहां न अपना या न पराया
आज वही बचपन का गांव लगने लगा वीराना।
महानगरों में जहां दिवाली टीवी के सामने मनायी जाती है, हमेंशा चर्चा होत,वों गांवों का खाटी दूध, वो ​हरियाली, वो मंगरूआ का भोलापन, वो गांवों का पिछड़ापन ऐसा शायद ही था।
आज सभी अपनी देहातीपना छोड़, शहरी अंग्रेज बनने में लगे थे।
मैं उन्हें क्यों दो​ष दूं।
फिर बगल से अचानक आवाज आई और शिवजी काका ने जोड़ से पुराने अंदाज में गले लगाया।
फिर एहसास हुआ, गांव अब भी है महान, अब भी है महान
बहुत दिनों बाद………………………………मैं उखई गांव गया
….

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