
- इक्कीसवीं सदी का इसरायण कलां
गूगल के पास हमारे गांव इसरायण कलां से जुड़ी कुछ और जानकारियां मिलती हैं । वह इस गांव के कुछ व्यक्तियों के बारे में जानकारी देता है । कुछ जानकारियां मैं आपसे साझा करना चाहता हूं मसलन ,इस गांव के श्री अरविन्द कुमार 2019 में भारत सरकार के आइबी प्रमुख ( Director , Intelligence Bureau ) बनाये गये , जो 1984 बैच के आइपीएस हैं । यूं तो हमारे कोसी इलाके से अनेक आइपीएस हो चुके हैं लेकिन अरविन्द कुमार पहले आइपीएस हैं जिन्होंने इस सर्वोच्च पद पर पहुंचकर अपने गांव ही नहीं पूरे कोसी अंचल को सम्मानित किया है ।
इसरायण कलां के कुमार विवेक को 2016 में प्रथम प्रयास में यूपीएससी में सफलता मिली। वे भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी हैं । कुमार विवेक इन दिनों शैक्षिक अवकाश पर अमेरिका के कोलम्बिया यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं। दिल्ली कालेज आफ इंजीनियरिंग से एयरोनॉटिकल इंजीनियर विवेक अंग्रेजी के लेखक और वक्ता भी हैं ।
कोसी क्षेत्र का पहला ई-पोर्टल ‘ मधेपुरा टाइम्स’ के निदेशक-सम्पादक राकेश कुमार सिंह का गांव भी इसरायण कलां ही है । मधेपुरा टाइम्स त्वरित और विश्वसनीय सूचनाओं के लिए पाठकों और दर्शकों में काफी लोकप्रिय है । ‘मधेपुरा टाइम्स’ ने अपनी यात्रा के बारह वर्ष पूरे कर लिए हैं । नीरज कुमार सिंह भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय हैं । वे इन दिनों दिल्ली स्थित बड़े मीडिया हाउस ‘ आज तक ‘ से जुड़े हैं । बिपिन कुमार सिंह एक क्रियेटिव फोटोग्राफर हैं , जिनके कैमरे का व्यू फाइंडर ह्यूमन मूड्स पकड़ने में माहिर हो चुका है । उनके द्वारा खींची गयी तस्वीरें राष्ट्रीय अखबारों के परिशिष्टों और विशेषांकों में जगह पाती हैं ।
हिंदी के कवि और साहित्य की गहरी समझ रखने वाले गौरीशंकर सिंह भी पूर्णिया में बस गये हैं और ‘चटकधाम’ के बैनर तले पूर्णिया की साहित्यिक गतिविधियों के सूत्रधार हैं । इसके अलावा इस गांव के दर्जनों बेटे-बेटियां और बहुएं डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, सेना अधिकारी और बैंकर्स हैं जो पटना , बनारस, लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, मुम्बई , कोलकाता, बंगलुरु से लेकर अमेरिका और यूरोप के शहरों में फैले हुए हैं ।

ये कुछ अपडेट्स हैं जो इसरायण कलां गांव को ‘ पढ़ा-लिखा’ होने की तस्दीक करता है । लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि इनमें से अधिकांश की शिक्षा-दीक्षा गांव में नहीं हुई है । हो सकता है पिता या दादा ने गांव के प्राथमिक स्कूल से शिक्षा ग्रहण की हो ।
बहुत दिलचस्प होगा यह जानना कि गांव से बाहर रहने वाली नयी पीढ़ी के बहुत से युवाओं ने एक दूसरे को देखा तक नहीं है । कई बार तो वे ट्रेन या हवाई जहाज में अगल-बगल की सीटों पर यात्रा के दौरान बातचीत न हो तो जान भी नहीं पाते कि वे एक ही परिवार या गांव के हैं ।
ऐसे तमाम लोग अपने ही गांव के लिए प्रवासी हैं जिनकी जड़ें तो गांव में हैं लेकिन फूले-फले शहरों में हैं । उनके पुरखों के घर-द्वार , जमीन-जगह आज भी गांव में हैं । वे तभी गांव आते हैं जब अपने खास गोतिया-देयाद में शादी पड़ी हो या किसी की मृत्यु हो गयी हो । या कभी शहरों में उनके यहां शादी पड़ी हो और अपनी कुल-देवी को निमंत्रण कार्ड चढ़ाना हो । हालांकि अब इसमें भी कमी आती जा रही है । कुछ लोग नैतिक मजबूरी में गांव आते हैं कि वहां बूढ़े माता-पिता हैं जो शहर जाकर नहीं रह सकते हैं ।
पर्व-त्योहारों को छोड़ दें तो गांव में प्रायः सन्नाटा रहता है । सुबह और शाम दो बार यह सन्नाटा जरुर टूटता है जब मंदिरों से भक्ति संगीत का कैसेट फुल वाल्यूम में बजता है । गांव के दक्षिण में पुराना देवी मंदिर है और उत्तर में महावीर बाबू का बनवाया शिवमन्दिर । शिवमन्दिर के निकट ही हनुमान जी भी विराजते हैं जिसे मुनि बाबा ने अपने दरवाजे पर बनवाया है ।
इन तीनों मंदिरों से एक साथ दुर्गा, शिव और हनुमान जी की महिमा का कैसेट बजता है । इसरायण कलां गांव के ठीक मध्य में गांव का ‘बोधि-वृक्ष'(?) विशाल पीपल के नीचे भी एक हनुमान जी हैं लेकिन वहां अभी यह संगीत नहीं बजता है । घरों के अन्दर का सन्नाटा भी पीतल की छोटी-छोटी घंटियों की टुनटुनाहट से ही टूटता है जब औरतें अपनी दैनिक पूजा और संझा-बाती के समय देवी-देवता को जगाती हैं ।
नौकरी से रिटायर होकर जब मैं गांव आया तो मुझे लाउडस्पीकर या घंटियों की आवाज से परेशानी होती थी । आखिर शहर के शोर-शराबे से ऊबकर ही तो मैं गांव आया था । लेकिन धीरे-धीरे इन घंटियों की आवाज अच्छी लगने लगी । ये आवाज़ जब सन्नाटे को तोड़ती तो लगता कि जीवन आबाद है ।
शाम की संझा-बाती के बाद मोबाइल का कॉलर ट्यून बजना शुरू हो जाता । गांव में रह रही मांओं और दादियों- नानियों के लिए ये मोबाइल फोन बहुत बड़ा सहारा है । शहर में रह रहे बेटे-बहू और बच्चों के कुशल-समाचार जानने के लिए और दूर्गा पूजा या छठ पूजा के समय गांव आने का निहोरा । उधर से बेटे- बहू की ओर से गांव नहीं आ सकने की मजबूरियां होती हैं। कभी छुट्टी नहीं मिलने ,तो कभी बच्चों की पढ़ाई के नुक़सान की मजबूरी। इधर मां की व्याकुलता- ‘अच्छा इस बार किसी तरह समय निकाल कर आ जाओ , बौआ के नाम का छागर कौबला ( मनौती) है ..’ या फिर छठ पूजा के पहले फिर मां की पीड़ा -‘ इस बार छठी मइया को हाथ उठाकर गोर रंग लेंगे.. इतना नेम-टेम वाला पर्व अकेले पार नहीं लगता ! ‘
गांव में पक्की सड़क और बिजली आ चुकी है । पुराने ‘ घरों ‘ की जगह नये-नये डिजाइन के मकान बन रहे हैं । जमीनें भले लोगों के हाथ से खिसकती जा रही है लेकिन बाहर की नौकरी या व्यवसाय से लोगों के पास पैसा तो आ रहा है । प्रतिस्पर्धा में कुछ लोग जमीनें बेचकर भी मकान बना रहे हैं । लेकिन सीमेंट और कंक्रीट की दीवारों ने लोगों के दिलों के बीच भी दीवारें खड़ी कर दी हैं । जिस गांव को हम पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण एक विशाल परिवार का गांव समझते थे । वहां अब ईर्ष्या, द्वेष और साजिशों की गंध हवा में तैरती रहती है ।
यूं तो अब हर गांव में ‘ बर्थडे’ और ‘मैरिज डे’ मनाने का प्रचलन है लेकिन अपने गांव में कुछ ज्यादा ही देखता हूं। सबसे बड़ा उत्सव ‘ मृत्यु भोज ‘ है । आर्थिक स्थिति कैसी भी हो , जमीन है न ? भोज नहीं होगा तो मृतक को ‘ पइठ ‘ भला कैसे होगा ? पिछले 4-5 वर्षों में जबसे मैं गांव आया हूं लगभग 20-25 लोगों की मृत्यु तो हुई होगी । एक अनुमान है कि इनमें कम से कम डेढ़ करोड़ रुपए ‘भोज’ पर खर्च हुए होंगे । इस गांव में कम से कम तीन दिनों का भोज होता है । चौथे दिन मांस-मछली का भोज ऐच्छिक है लेकिन इसी भोज की संभावना पर कार्यकर्ताओं का सहयोग निर्भर करता है ।
ऐसा नहीं कि भोज की यह संस्कृति इसरायण कलां के राजपूतों में ही है । आसपास के पिछड़े और दलित जातियों पर भी इसका प्रभाव कम नहीं पड़ा है । तीन वर्ष हमारे गांव के निकट केज्ञ ऋषिदेव टोले में एक व्यक्ति की मृत्यु हुई तो पंजाब में मजदूरी करने वाले उसके बेटों ने ‘भोज-भात’ पर करीब डेढ़ लाख रुपए ख़र्च किये । ‘भोज-भात’ समाप्त होने के बाद उसके स्वजातीय मंत्री अपना ‘वोट बैंक’ मान मातमपुर्सी करने आये तो उनके लिए खस्सी काटा गया और एक छोटा-मोटा भोज उस दिन भी हुआ। जिस व्यक्ति के पास रहने के लिए कायदे का घर नहीं है , शौचालय नहीं है । बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं उनके यहां पता नहीं कैसे मंत्री जी से मांस-भात खाया गया ?
फिलहाल , गांव के पुराने स्वरूप और ग्रामीण जीवन मूल्यों के लिए चिंतित होने का ‘बौद्धिक विलाप’ बन्द कर सोचें तो मेरा गांव इसरायण कलां ही नहीं, आसपास के तमाम दूसरे गांव की आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति में काफी बदलाव आया है । पहले जहां कुछ ही परिवार सुख-सुविधा में जीते थे ,वहां अब बहुतायत को यह उपलब्ध है । सभी उसका उपभोग कर रहे हैं । इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारक है वह है धनार्जन के लिए अस्थाई माइग्रेशन या प्रवास । चाहे नौकरी- व्यवसाय हो या मजदूरी । जाहिर है इस प्रवास ने गांव की पूरी संरचना को बदल दिया है । गांव को लेकर ‘नास्टेल्जिक’ होकर सोचने से बेहतर है हम बदलते गांव को स्वीकार करें क्योंकि समय के प्रवाह को हम नहीं बदल सकते ।
(कहानी की दूसरी और अंतिम कड़ी।)
इसरायण कलां गांव की कहानी की पहली कड़ी यहां पढें…






















