सरिसब-पाही गांव का मूल खाका नहीं बदला

डाॅ प्रवीण झा

सरिसब-पाही  गांव की कहानी लिखना कठिन है क्योंकि उसका नायक तो ग्राम ही है जिसका हजारों वर्षों का इतिहास है, उस काल-खंड के एक बिंदु पर हम खड़े हैं तो महज अपनी कहानी ही लिखी जा सकती है। लेकिन गांव की एक खासियत होती है कि वह अपनी कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहता रहता है। यह लिखित नहीं होता, लेकिन सब जानते हैं।

जैसे हम बाल्य-काल में एक श्लोक बोल कर जीभ-तालु का व्यायाम करते थे-
“बालोहं जगदानंदे न मे बाला सरस्वती
अपूर्णे पंचमें वर्षे वर्णयामि जगत्रयम”
सरिसब-पाही का बच्चा-बच्चा इस श्लोक से परिचित है। वर्षों पूर्व भवनाथ मिश्र नामक एक व्यक्ति हुए जो स्वावलंबी थे और किसी से याचना नहीं करते थे। उन्हें ‘अयाची’ कहा गया। यह उन्हीं की रचना है।

यह एक तरह का मॉडल था कि सवा कट्ठा जमीन में उपजी शाक-सब्जियों से अपना घर चलाना। आज भी इस गांव में ऐसे कई लोग मिल जाएंगे, जिन्हें देख कर लगेगा कि इनका जीवन कैसे चलता है? ये काम तो करते नहीं। फिर उनके डीह को गौर से देखने पर नजर आएगा कि कुछ आम-लीची के पेड़ लगे हैं, पीछे कटहल का पेड़ भी हैं, कुछ पपीते भी। वहीं सामने ओल (सूरन) के पौधे भी दिख रहे हैं, दीवाल के किनारे साग की लत्ती जा रही है, बाड़ी में मिर्च-नींबू के पौधे, लौकी की लता और कोहरे लदे हुए। सामने एक छोटा तालाब भी है, जिसमें मछली, मखान, घोंघे पल रहे हैं। मुश्किल से आधे कट्ठे में दाल भी उगायी जा रही है। और कुछ दूर बिना चकबंदी किए छोटे-छोटे खेत हैं जिसमें परिवार लायक धान उपज जाता है। यह जमींदारों का गांव नहीं, बस इतनी जमीन के मालिकों का गांव है कि अपना घर चल जाए। और इस इकोसिस्टम में सभी वर्णों का योगदान है, जिनके खानदानी पेशे भी चल रहे हैं और कई लोग उससे मुक्त होकर अन्य कार्य भी कर रहे हैं।                                                                                                                                                   …सरिसब-पाही 

अयाची के पुत्र शंकर मिश्र का जब जन्म हुआ तो चमइन (दाई) को इनाम देने के लिए कुछ गहना तो था नहीं। वही बालक जब थोड़ा बड़ा हुआ तो काफी प्रतिभाशाली निकला। पांच वर्ष से कम की अवस्था में उसके पांडित्य की चर्चा सुनकर महाराज ने शंकर मिश्र को दरबार में बुलाया। उनके साथ वह छोटा बालक भी गया। उस बालक से परिचय पूछा गया तो उसने यह श्लोक वहीं ‘ऑन द स्पॉट’ रचा, जिससे खुश होकर महाराज ने इनाम में अपना चंद्रहार दे दिया। और बालक की यह पहली कमाई अयाची मिश्र ने चमइन को दे दिया। चमइन भी ऐसी कि इस आभूषण से स्वार्थ-सेवा न कर गांव के लिए एक तालाब खुदवा दिया। आज वह चमाइन पोखर इस गांव का हृदय है और अब उनकी मूर्ति भी मुख्यमंत्री जी के कर-कमलों से स्थापित की गयी है। चमइन यहां सबके लिए पूज्य है जो सामाजिक समरसता का एक संकेत भी है।
गांव में मल्लाहों का एक बड़ा समूह अब भी कायम है, क्योंकि मखान और मछली से उनकी आमदनी ठीक-ठाक रही है और इस व्यवसाय पर उनका एकाधिकार भी है। मल्लाहों ने ही खेत भी संभाल रखे हैं तो यह दोहरी आय है। और चूंकि यहां मांसाहारी मैथिल ब्राह्मण बसते हैं जो स्वयं खेती-बाड़ी, मत्स्य-पालन करते रहे हैं तो उनकी मल्लाहों से खूब जमती भी है। ‘जमने’ का अर्थ यह भी है कि छूआ-छूत नहीं दिखेगा, कि मछली पूजा-घर में आ गयी तो अशुद्ध। बल्कि विवाह के बाद जब नववधू घर आती है, तो मल्लाह जाल फेंकते हैं और वधू के हाथ में जीवित मछली पकड़ा कर खूब हंसी-ठट्ठा करते हुए काटने को कहते हैं। बाकी रोजाना जीवन में तो आपस में हर तरह का हंसी-मजाक होता ही है।                                                                                                                                  …सरिसब-पाही 

एक और बात, जो मैंने बचपन से आज तक देखी है कि यहां अक्सर साहित्यिक गतिविधियां होती रहती है। इसी  जुलाई में जब मैं गांव गया तो बाढ़ का समय था। आवाजाही कठिन थी। अहाते में घुटनों तक पानी था। लेकिन इस विकराल समय में भी देर रात तक कथा-गोष्ठी चलती रही और दूरस्थ गांवों से लोग आए। सभी कथाएं कागज पर लिख कर लाए थे और पाठ के बाद तीखी समालोचना भी हो रही थी। वरिष्ठ कथाकारों को भी युवा कथाकारों की आलोचना सुन कर मौन रहना होता, इस आश्वासन के साथ कि वे कथा में सुधार ला सकते हैं। ऐसा वातावरण तो हिन्दी के मंचों पर कम देखने को मिलता है। ऐसे आयोजन तब भी होते थे, जब मेरी उम्र सात-आठ वर्ष रही होगी। अब इसका आयोजन अधिक संगठित और समावेषी हो चुका है।                                                                          …सरिसब-पाही
सरिसब-पाही पहले मशहूर बाजार हुआ करता था, जब यह बसों का नियमित रास्ता था। यहां के रसगुल्ले और बालूशाही का डंका दूर-दूर तक बजता था। कभी यहां के मुसलमान लहठी और औजार उद्योग से भी जुड़े थे। मुसलमानों में कई मिस्त्री आज भी हैं और गांव के अधिकतर पक्के मकान उनके ही बनाए हुए हैं। अब राष्ट्रीय राजमार्ग इस गांव को लगभग बायपास कर निकल जाता है तो बाजार कुछ कमजोर पड़ गया है। आस-पास के ग्रामीण ही आते हैं। पुश्तैनी उद्योगों में भी बदलाव आया है और मकान बनाने के लिए अन्य जगहों से भी लोग आ रहे हैं।

लेकिन सबसे अधिक चिंता मुझे यहां के तालाबों की होने लगी है। जब गांव गया तो कई तालाब सूख गए थे या उनका उत्पादन घट गया था। मखान-मछली प्रकृति के भरोसे चल रहे हैं, आधुनिक तकनीक का प्रयोग न के बराबर है। लेकिन जब सामने का बांध टूट कर बाढ़ का पानी गांव में आया तो सभी तालाब लबालब हो गए। कबई और सिंघी जैसी मछलियां बह कर अहाते में आने लगी। घोंघे चारों तरफ नजर आने लगे। यह औरों को घिनौना लग सकता है, लेकिन इस गांव के लिए यही उल्लास है। यहां हर वर्ग के लोग (ब्राह्मण भी) घोंघे खाते हैं जिसका स्वाद मिट्टी जैसा ही होता है। और कहीं न कहीं, इन तालाबों और बाध (नदी किनारे खाली जमीन) की वजह से ही बाढ़ का पानी घरों को नहीं क्षति पहुँचा सका। जल को जलाशय मिल गया तो घर क्यूं बरबाद करे?                                                      …सरिसब-पाही 


उत्तम स्कूल और कॉलेज होने की वजह से यहां शिक्षा का स्तर अच्छा ही रहा है। मुझे सवैया और अढ़ैया के पहाड़े मल्लाहों ने ही सिखाए थे। यह जरूर है कि अब कई छोटे-मोटे निजी विद्यालय खुल गए हैं, जिनसे भला कुछ खास हुआ नहीं। राजकीय विद्यालय में रुचि जरूर घट गयी और स्तर भी घट गया। लेकिन उनकी इमारत और इन्फ्रास्ट्रक्चर से मुझे अधिक असंतोष नहीं। कॉलेजों में शिक्षक अनुशासन से पढ़ा रहे हैं, यही फौरी तौर पर लगा। अंदर की बात पता नहीं। सड़कों में भी अप्रत्याशित सुधार है कि जहां मैंने सड़कें तीन दशक तक देखी नहीं, अब गांव के अंदरूनी इलाकों तक पक्की सड़कें बन गयी है। बिजली का वोल्टेज जरूर अनिश्चित है, लेकिन हमने बिजली-रहित गांव भी देखा है। अब यह समस्या नहीं रही। हर घर में बिजली पहुंच गयी है।
बदलती दुनिया के कुप्रभाव भले गांव में आए हों, मौलिक खाका नहीं बदला। शायद यही वजह है कि कई प्रवासियों को देखता हूँ कि सेवा-मुक्त होने के बाद गांव लौट आए हैं और रचनात्मक भूमिका निभा रहे हैं।
(नार्वे, चिकित्सक और लेखक, पुस्तक ‘कुली लाइन्स’ इसी वर्ष आई है। सरिसब पाही, मधुबनी,बिहार।)

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