सहसराम का नया टोला हमारा गांव कुम्हउ

निराला बिदेसिया

कुम्हउ. यही नाम है मेरे गांव का. बिहार के मशहूर शहर सासाराम से अगर बनारस की ओर जीटी रोड पकड़कर बढ़ें, तो बाईपास पर ही एक रंगीन चमकता हुआ गेट दिखेगा. गांव कुम्हउ, लिखा हुआ. अगर रेल से गया, डेहरी-आन-सोन या सासाराम से बनारस की ओर जाएंगे तो पैसेंजर ट्रेन का सासाराम के बाद अगला पड़ाव मेरे गांव के ही रेलवे स्टेशन पर ही होता है. हॉल्ट ही है, पर है बहुत पुराना. गांव से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर. अगर पैसेंजर की बजाय एक्सप्रेस ट्रेन से भी गुजरें तो सासाराम से बाद जो तीसरा रेलवे गुमटी दिखे, अब गुमटी के पास बड़ा रेलवे ओवरब्रिज दिखे, वही गांव है अपना. रेलवे लाइन से सटा हुआ गांव है अपना.

गांव तो बड़ा है, अपना घर रेलवे लाइन वाले साइड ही पड़ता है. याद है कि जब एक्सप्रेस ट्रेनें गुजरती थी, तो घर तक में कंपन होता था. बचपन में हमारा प्रिय काम था छत पर चढ़कर मालगाड़ियों के डब्बे गिनना. बाद में जब किशोरावस्था में आये तो दस अन्नी पैसा लेकर रेलवे लाइन की ओर जाते और रेलगाड़ी आने से पहले पटरी पर उस पैसे को रखते, ताकि तेज जाती हुई गाड़ी उस पैसे का साइज बढ़ा दे. दोनो पटरियों के बीच पैर फैलाकर स्टैच्यू बनकर खेलते. पटरियों के बीच लगी लकड़ी या लोहे की सिल्ली पर हम बच्चे दौड़ प्रतियोगिता भी कर लेते. ट्रेन के बिल्कुल पास आने पर हटते. रेलवे लाइन किनारे गांव बसने से यह सब बचपने का अभ्यास था. बाद में उस रेलवे लाइन के किनारे अलग कहानियां भी बनीं गांव में. कोयले से लदी ट्रेन रूका करती थी हमारे गांव के पास. एकाध मिनट के लिए या फिर रूकती नहीं भी थी, तो स्लो हो जाती थी. पहले से तैयार कोयला उतारनेवाले उस पर चढ़कर फटाफट तेज गति से कोयले को पटरियों के​ किनारे फेंक दिया करते थे. ट्रेन थोड़ी देर में अपनी गति से चल देती थी. पटरियों के किनारे फेंके हुए कोयले के बड़े चट्टानों को तुरंत बटोरते. उन कोयलों को खच्चरों पर लादकर जीटी रोड किनारे लाइन होटलों पर पहुंचा दिया जाता. फिर लाइन होटल से ट्रकों पर लादकद कोयले की मंडियों में.

बचपन में जब से होश संभालना हुआ, तब से ट्रेनों को गुजरते हुए देखा. रेल की पटरियों पर खेला. इसलिए गांव की स्मृति आते ही रेलवे की स्मृति ताजा हो गयी. बाबा से पूछता था कि यह बताइये कि हमारा गांव कुम्हउ यहां पर है और गांव के नाम पर ही रेलवे स्टेशन इतनी दूर क्यों? यहां क्यों नहीं बना? बाबा तो नहीं बताये कभी, पर मेरे नाना उनके सामने उनसे मजाक करते हुए कहते थे कि अरे जानते नहीं हो. यह स्टेशन कुम्हउ ही बनना था. सरकार तैयार थी. सब तय हो गया था. पर, कुम्हउ के लोगों ने मीटिंग कर तय किया कि यहां स्टेशन नहीं बनेगा. दूर बने, पर नाम हमारे गांव का ही रहे. यहां इसलिए नहीं बनने दिये गांव वाले कि हित-नात रिश्तेदार, ज्यादा आने लगेंगे. खरचा बढ़ जाएगा. सच यही हो, नहीं मालूम, क्योंकि यह दो समधियों के बीच हंसी-मजाक के बीच निकली हुई बात है.

 

भले मेरे गांव की पहचान रही रेलवे से, पर गांव की नियति और प्रारब्ध को बदलनेवाला साबित हुआ जीटी रोड.  शेरशाह ने ही जीटी रोड बनवाया था. अपने विकास मॉडल से देश का कायाकल्प किया था. पर, शाहाबाद नाम पड़ा हमारे इलाके का. कहते हैं कि शेरशाह ने इस इलाके को खूब आबाद किया. नहरों का जाल बिछाकर. आवागमन के लिए राह बनाकर. इलाका समृद्ध होता गया. इसलिए शाह की कृपा से इलाका यह इलाका शाहाबाद हो गया. वैसे शाहाबाद नाम के पीछे कि एक कहानी है यह. और भी अनेक कहानियां हैं. उसी शाहाबाद के मशहूर शहर सासाराम -रोहतास जिला मुख्यालय-से सटे ही बसाहट है मेरे गांव कुम्हउ की.

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जीटी रोड के ही सौजन्य से मेरा गांव कुम्हउ तेजी से शहर होने की राह पर है. पंचायत की परिधि से निकल नगरपालिका के क्षेत्र में आ गया है. गांव में अपार्टमेंट बन रहे हैं. गांव के बीच से निकल रहा रेलवे ओवर ब्रिज गांव को शहर टाइप महसूस करवा रहा है. गांव के ही गेट पर अब सासाराम का बाईपास भी है और टॉल प्लाजा भी. टॉल प्लाजा के पास ही मारुति,टाटा आदि के शो रूम खुल गये हैं. आधुनिक रेस्तरां,होटल खुल गये हैं.

 

दिन-रात गुलजार रहता है गांव का वह गेट. इस गेट की अनेक स्मृतियां हैं. वह गांव का प्रवेश द्वार था, तो होश संभालने के बाद ही दोनों ओर द्वारपाल,हाथी की नक्काशीवाला गेट देखा. बाद में वह टूट गया तो वर्षों तक मेटल का गेट रहा.फिर गांववालों ने आपस में चंदा कर पुराने रूप में गेट बनवाये. बचपन में बस पकड़ने जाते थे. सुनसान रहता था गेट का इलाका. गांव से निकलकर गेट पर आने में दिन में भी डर लगता था. जेठ की दुपहरिया में बरजा जाता था कि वहां जाने लायक नहीं. शाम ढलने के बाद तो कोई आता ही नहीं था. लूटपाट के डर से. अपने गांव में कम समय ही रहा. जन्म से लेकर अधिकांश समय ननिहाल में गुजरा. औरंगाबाद जिले के महथु गांव में. पर, दो—तीन सालों तक गांव रहा था. वह किशोरावस्था के दिन थे, इसलिए गांव की हर यादें जीवंतता के साथ मानस में रहती है.

याद है कि बाबा एक केस मुकदमा लड़ने सासाराम जाते थे. उनका खेत का एक मुकदमा पास के मोरवा गांव के विमल यादव के साथ था. विमल यादव गरीब आदमी थे. जिस दिन अदालत की तारीख होती, विमल सुबह ही घर पहुंच जाते. बाबा से ढेर देर तक गप्प मारते. फिर हमारे ही घर खाना खाते. बाबा और विमल साथ ही सासाराम के लिए निकलते. बतियाते हुए जाते. अदालत में जाकर दोनों एक—दूसरे के सामने खड़े होते. फिर अदालत से निकलकर बतियाते हुए गांव वापस आ जाते. बाद में विमल ने रिक्शा खरीद लिया. वे अदालती तारीख के दिन रिक्शा लेकर ही घर पर आते. खाना खाते. उसी रिक्शे से बाबा जाते. दोनों पूरे रास्ते उसी तरह से गांव,जवार, घर,परिवार की बात बतियाते जाते. वहां दोनों एक दूसरे के खिलाफ केस लड़ते. शाम को वापस आ जाते. बाबा जो सब्जी वगैरह खरीदकर लाते बाजार से, विमल को भी उसमें से आजी दे देती.

गांव पर जब दो साल रहा, तो मेरे बाबा ने उर्दू सिखने के लिए मौलवी साहब को घर पर बुलाना शुरू कर दिया था. मेरे बाबा रामनामी दुनिया में मगन रहनेवाले इंसान थे. पक्के सनातनी. दिन रात हरे राम की किताब लेकर जाप करते थे. कॉपी पर दिन भर सीताराम सीताराम लिखते रहते थे. पर, उन्हें लगा कि उर्दू भी जरूरी है तो उन्होंने उर्दू की तालिम शुरू करवा दी. घर के सामने ही दो घर मुसलमान रहते थे. उसी में एक मौलवी साहब थे. वही आते थे. इस बात का हमेशा अफसोस रहता है कि गांव पर रह नहीं सका. मामा गांव रहने आ गया. नहीं तो उर्दू् सिख गया होता. उर्दू भाषा को सिखने की ललक अभी भी हिलोर मारती है.

मेरे गांव कुम्हउ के नामकरण के पीछे की कहानी एक बार मैंने अपने बाबूजी से सुनी थी. गांव का मूल नाम कुंभउ था, जो कुम्हउ के नाम से लोकप्रिय हुआ. कहते हैं कि सासाराम शहर का नाम सहस्त्राबाहु और परशुराम के नाम पर पर पड़ा. सासाराम का असली नाम सहसराम बताया जाता है. जब सहस्त्राबाहु और परशुराम के बीच लड़ाई शुरू हुई, यज्ञ भी होने शुरू हुए. यज्ञ के कुंभ की स्थापना वहीं हुई, जहां आज मेरा गांव है. यज्ञ हुआ और वहां कुछ लोग वास भी कर गये. मुगल काल में फतेहपुर के इलाके से एक गांव का पलायन शुरु हुआ. पूरा गांव वहां से चला और चलते-चलते यज्ञवाले कुंभ के पास पहुंचा. वहीं डेरा डाला. जो कुछ स्थानीय वाशिंदे वहां रह रहे थे, उनसे पूछा कि इस जगह का नाम क्या है, बताया गया- कुंभ. बसेरा डालनेवालों ने पूछा कि कौन सा कुंभ.

फतेहपुर से जो दल पलायन कर वहां पहुंचा था, उसमें शासक के तौर पर नवलकिशोर सिंह थे. वे फतेपुर से सभी जातियों के समूह को लेकर चले थे. इस दल के राजपुरोहित थे डाला तिवारी. डेरा डालने के बाद वहां से उस दल को आगे बढ़ना था. अगली यात्रा के लिए शासक ने डाला तिवारी से सलाह ली. पुरोहित ने बताया कि सुबह आंख खुलने के बाद जो सामने जो दिखे, उसकी बली देनी होगी. शासक तैयार. पुरोहित को रात भर नींद नहीं आयी. इसी सोच में रहे कि क्या पता सुबह क्या सामने आ जाये. कोई जानवर ही आये, यह तो तय नहीं! सुबह-सुबह राज पुरोहित खुद शासक के दरवाजे पर खड़ा हो गये. शासक हैरत में. पर,राज पुरोहित ने कहा कि घबराये नहीं, मैंने जैसा कहा था वैसा ही करे, मेरी ही बली दे, मैं ही सामने आया हूं. शासक तैयार नहीं थे. पर,पुरोहित ने वचन की याद दिलायी. डाला तिवारी ने अपनी जान दे दी. उनकी बली के बाद दल वहीं रह गया. गांव वहीं बस गया. प्राय: सभी जातियों व सभी पेशे के लोग थे दल में. डाला तिवारी की बली के बाद से राजपूत परिवारों ने उनकी पूजा भी शुरु कर दी. मेरे गांव कुम्हउ में आज भी हर शुभ काम में डाला बाबा की पूजा की परंपरा है.

मैं अपने गांव कुम्हउ को जब भी याद करता हूं, सबसे ज्यादा याद मोहर्रम की आती है. मोहर्रम यानि तजेया का त्योहार. यह अवसर जब-जब आता है, मुझे अपने गांव की याद आती है. बचपन में ही देखा, अव्वल दरजे का बिगडै़ल गांव था मेरा. जाति का जहर यहां बचपने से रगों में दौड़ता. सामंती मिजाज उफान पर रहता था. नशाखोरी पराकाष्ठा पर. कुछेक बिंदुओं को छोड़कर विशालकाय आबादी वाला मेरा गांव बदनामी के पर्याय के रूप में स्थापित करने वाले तमाम गुणों से परिपूर्ण रहा.

याद है कि एक बार रोहतास जिले के ही एक गांव में गया था. मामा गांव के एक लड़के के साथ. वहां शाम को एक बच्चा नशा करते हुए पकड़ा गया. उसके अभिभावक उसे पिटते हुए घर ला रहे थे और कह रहे थे कि ससुरा  कुम्हउ के लइका बनल जात बा. बनबअ कुम्हउ के लइका. टांग तोड़ देब. कुछ देर बाद वही अभिभावक हमारे सामने थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि बाबू तोहार गांव कहां पड़ी? मैंने देखा था कि मेरे गांव कुम्हउ का ही नाम लेकर उसे पीट रहे हैं तो तुरंत कह दिया कि मैं तो औरंगाबाद जिले का हूं. इधर से मेरा कोई वास्ता नहीं. इस तरह का विख्यात गांव था मेरा.

लेकिन ये सारी बातें एक तरफ. तजेया का त्योहार आते-आते हर साल मन अपने गांव की ओर तेजी से भागता है. हालांकि नॉस्टेल्जिया ही है यह.आठ साल पहले अपने गांव गया था तजेया देखने. पहले जैसा अब रहा नहीं तजेया का त्योहार भी. पर, लगता है कि जड़ें गहरी रही हैं. शायद आज नहीं तो कल फिर से लौट आये अपने ढर्रे पर.

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स्मृतियों में अटका मेरा गांव

घर के सामने के अलाउद्दीन मियां रहते हैं. अलाउद्दीन, बड़क, छोटक, नसीम, मुन्ना वगैरह-वगैरह मिलाकर, बंटवारे-दर-बंटवारे के बावजूद कुल जमा दर्जन भर घर भी तो नहीं हो सके हैं अब तक मुसलमानों के मेरे गांव कुम्हउ में. पर, संख्या से मतलब नहीं. मेरे गांव का तजेया सासाराम का अब भी मशहूर है. सासाराम में तजेया का मतलब क्या होता है, यह उस इलाके के लोग जानते हैं. मुरादाबाद, कुम्हउ, बाराडीह और भी न जाने कितने गांवों के भव्य तजेया पहुंचते हैं सासाराम. पहलाम होने. गजब की सजावट वाले तजेया होते हैं. मोतियों की लरी के बीच झूलते लाइट से चमकदार तजेयाओं का हुजूम जुटता है. शाम से ही सासाराम में कड़वर कत्ता-कड़वरकत्ता की धून के साथ तासे की आवाज, गदका का आपस में टकराना, लाठी की भंजाहट माहौल को बदल देता है.पूरी रात अलग ही माहौल में रहता है सासाराम. न जाने कितने गांव से, कितनी भारी संख्या में जुलूस लिये पहुंचते हैं लोग लेकिन उन सबके बीच मेरे गांव की तजेया की बात अलग है. मेरे गांव का ही तजेया सासाराम में बड़ी तजेया के रूप में जाना जाता है.

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दस घर मुसलमानों के हैं मेर गांव में लेकिन जब तजेया का जुलूस निकलता है तो सैकड़ों की संख्या आसानी से पहुंच जाती है. अब कुछ कम हुआ है नहीं तो याद है बचपने की कि मेरे गांव में रहनेवाले तमाम हिंदुओं के घर में आफत-सुल्तानी के समय देवी-देवता-डीहवार-ब्रहम बाबा के साथ तजेया निकालनेवाली मान्यता भी लोकप्रिय थी. मलिदा वाला जो प्रसाद होता है, वह सभी हिंदुओं के घर में पहुंचता था. मेरे गांव में हिंदू बच्चा तासा बजाना जानते थे. गदका खेलना भी.

मेरे गांव में मोहर्रम मुसलमानों का त्योहार भर नहीं था, गांव कुम्हउ की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई थी उससे. पूरे गांव का सामूहिक पर्व था. पूरे गांव के लोग जुलूस की चिंता करते थे. सब इंतजाम में लगते थे. भारी संख्या में पहुंचकर बड़ी तजेया का जो तमगा पीढ़ियों से कुम्हउ गांव के तजेया को मिला हुआ है, उसे बरकरार रखना चाहते थे. बहुत ही बिगड़ैल गांव को सांप्रदायिक राजनीति की लपटें वर्षों तक झूलसा नहीं सकी. अब भी सांप्रदायिकता की बू उस तरह से नहीं है गांव कुम्हउ में.

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