एकौना गांव के रग-रग में बसा हुआ है रामचरित मानस

मार्केण्डेय राय व सूर्यभान राय

बक्सर जिले के सुदूर उत्तर में गंगा नदी बहती है। गंगा नदी से करीब 5 किलोमीटर पहले एकौना गांव है। गांव की चौहद्दी की बात की जाये गांव के उत्तर में राजापुर दक्षिण में सिंघनपुरा, पश्चिम में सहियार और पूरब में दुबौली गांव है। एकौना गांव का ग्राम पंचायत एकौना के नाम से ही है और इस पंचायत में एकौना, जलालपुर, दुबौली, शिवाला डेरा, और ईं​गलिस डेरा आदि गांव हैं।

एकौना गांव आजादी से पहले बसा था, बल्कि यह भी कह सकते हैं कि पुराने शाहाबाद में जब चेर वंश का शासन था, तब से यह गांव विकसित था। इसके भी प्रमाण मिलते हैं। बचपन में गांव के बाहर जहां बस्ती नहीं बनी थी तो पुराने लोग बच्चों को यह कहकर डराते थे कि, ” बहरी मत जइह ओहिजा चेरो खरवार बाड़न स”। गांव के मरहूम नेता राम अवधेश चौधरी बताते थे उनके बचपन मे जब कहीं खुदाई होती थी विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ निकलती थी।
एकौना गांव मूल रूप से कौशिक गोत्र का गांव है। कौशिक वंश के लोग गाजीपुर से संबंध रखते हैं। यह गांव कब बसा इसका ठीक ठाक कोई प्रमाण नहीं है। पुराने लोग यह बताते हैं कि प्लेग की बीमारी के समय गाजीपुर के सुर वत -पाली से कुछ लोग पलायन करके इस गांव में आए थे। इतिहास का घटनाचक्र जो भी रहा हो, जब से यह गांव बसा है,तबसे अपने श्रम के लिए पूरे जिले में विख्यात है। राजनीति से कोसों दूर रहते हुए भी गांव धुरंधरों के लिए विख्यात था। एक थे स्वर्गीय कवलापति राय जो महात्मा गांधी के सहचर थे और दूसरे सूर्यबली प्रधान जो कलकत्ते में डॉ राममनोहर लोहिया के परम अनुयायी थे।

एकौना गांव की आबादी लगभग 10,000 हजार होगी और मतदाता सूची में लगभग 4000 मतदाताओं का नाम दर्ज है। लेकिन आबादी के हिसाब से भूगोल का रकबा बहुत कम है। जब कलकत्ता अर्थ का केंद्र हुआ करता था,तब इस गांव के लोगो ने हावड़ा की तरफ रूख किया और वहां अपना सिक्का जमाया। बैलगाड़ी का गांव कलकत्ते में जाकर ट्रकों के व्यवसाय में एकाधिपत्य जमा लिया।

 

धार्मिक रूप से एकौना गांव दो चीजों के लिए मशहूर था पहला गांव के पुराने बुजुर्ग नित उठकर गंगा स्नान को जाया करते थे और वापसी में लौटते समय पीतल के लोटे में गंगाजल भर के लाते थे। गंगाजी एकौना गांव से लगभग 5 किलोमीटर दूर गंगौली गांव के निकट स्थित हैं।
दूसरा, उस पूरे ईलाके में एक कहावत प्रचलित थी, ‘एकौना गांव के झीकरियो रामायण जानले’। रामचरित मानस हमारे गांव के लिए आस्था का केंद्र था। एकौना गांव के रग-रग में बसा हुआ था। उसका प्रतिफल यह हुआ कि एकौना गांव में आस्था के दो बड़े केंद्र बने। एक गांव की कुलदेवी जवहरी का मंदिर और दूसरा गांव की ठाकुरबाड़ी जिसको मठिया नाम से भी जाना जाता है. इस मठिया को लेकर एक किस्सा प्रचलित है। यहां यज्ञ और भंडारा होता था, डालडा और घी कम पड़ने लगा तो महाराज जी बोले कि जाओ गंगा जल डाल दो। गंगा जल डाला गया और पूरी बन गया। रामदहिन दास से ठाकुरबाड़ी की परंपरा समृद्ध हुई। उनके उत्तरवर्ती रामधनी दास और संतकुमार दास से लेकर आज तक यह परंपरा कायम है। रामदहिन दास और रामधनी दास गांव के पूरब टोला से संबंध रखते थे। एकौना गांव के मध्य में एक शिवालय है। यह शिवालय भी ग्रामीणों के आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। गांव के दक्षिण मे स्थित बजरंग बली का पुराना मंदिर और पुरब मे काली जी का मंदिर भी आस्था का प्रमुख केंद्र है।

ये भी पढ़ें…

पैतृक गॉंव चमथा में बीते बचपन के दिन भी क्या दिन थे

गांव की परंपरा में तांबे का लोटा प्रमुख रूप से था। प्रत्येक घर के मुखिया के पास तांबे का लोटा होता था। जिसपर उनका नाम लिखा होता था। स्टिल के बढ़ते चलन ने भले ही गांव में तांबे के प्रयोग को कमतर किया हो, बावजूद इसके गांव की नयी पीढ़ी आज भी पूर्वजों के इस धरोहर को संजोये हुए है।

रामचंद्र राय

एकौना गांव कुल मिलाकर चार टोलों में विभाजित है, जिसमें दक्षिण टोला और पूरब टोला, उत्तर टोला और बिचला टोला की गणना मूल रूप से की जाती है। इसके आलावा दादा घर और भईया घर नामक दो बड़े घराने भी है. दक्षिण टोला के अंतर्गत एक घराना है, जिसका नाम है नवो घर। अर्थात नौ भाई रहे होंगे। नवो घर के अंतर्गत एक व्यक्ति थे जिनका नाम था रामचंद्र राय। ठेठ में गांव के लोग इनको चनर राय के नाम से जानते थे। इनके शरीर का क्या वर्णन करूं भोजपुरी के महान कवि और कालजयी कुंवर सिंह के रचनाकार स्वर्गीय राकेश जी ने लिखा है कि ” बोंग निठाह, पाखान शरीर, छव फुट जने नव फुट के लाठी, सोची इहे लड़हीँ के परि, कस बाप के पूत ना माई के आटी “। इनके शरीर का क्या वर्णन करूं भोजपुरी के महान कवि और कालजयी कुंवर सिंह के रचनाकार स्वर्गीय राकेश जी ने लिखा है कि ” बोंग निठाह, पाखान शरीर, छव फुट जने नव फुट के लाठी, सोची इहे लड़हीँ के परि, कस बाप के पूत ना माई के आटी “।
इनकी प्रमुख विशेषता यह थी कि जो इनसे लड़ने के लिए आता था तो बालि की तरह सामने वाले का आधा बल ये खींच लेते थे, यानि सामने वाला बल विहीन हो जाता था। इसका फ़ायदा गांव को यह हुआ कि ये जब तक जीवित रहे एकोना गांव की चौहद्दी बिल्कुल सुरक्षित रही।
कालांतर में 23 वर्षों बाद जब ग्राम पंचायत का चुनाव हुआ तो ये मुखिया निर्वाचित हो गए। वैसे मुखिया पद इनसे कृतकृत्य हो गया।
कहने को तो अक्षर ज्ञान से रहित थे लेकिन जीवन अनुभव का विशिष्ट ज्ञान था। क़ृषि प्रधान मेरे गांव मे तब दलहनी फसले ही हुआ करती थी। जीविकोपार्जन का कोई अन्य साधन नही था, उस ज़माने मे स्वर्गीय चनर राय ने जी तोड़ मेहनत किया, खुद बैलगाडी तक चलाया और अपने अनुज लक्ष्मण राय को इंजीनियर बनाया जो मेरे गांव से पहले इंजीनियर हुए।
इलाके मे सिमरी एक बड़ा गांव है जो स्वामी सहजानंद सरस्वती की कर्मभूमि रही है। पंडित सूर्यनारायण शर्मा उसी गांव के थे जिन्होंने स्वामी जी की विरासत को आगे बढ़ाया। शर्माजी विधायक और बिहार सरकार मे क़ृषि मंत्री भी रहे। उनके प्रयास की बदौलत सिमरी मे एक महाविद्यालय भी है उस महाविद्यालय के प्रधानाचार्य मेरे गांव के हैं, श्री इंद्रासन प्रधान। कालेजों की आपसी राजनीति मे सिमरी गांव के लोगों ने एक बार प्रधानाचार्य की बेअदबी कर दी, यह ख़बर मेरे गांव तक पहुंची फिर क्या चनर बाबा का पारा हाई! दूसरे दिन मेरा गांव सिमरी के लिए कूच कर गया। जिन लोगों ने बेअदबी की थी वे सभी सन्न रह गए। आज भी नौ घर के लोग अपने परिश्रम के बल पर व्यव​सायिक दृष्टि से चारों तरफ अपनी ख्याती बिखेर रहे हैं।

उत्तर टोला ओर बिचला टोला के संधि पुरूष थे रामदास राय। अर्थोपार्जन के लिए जब इस गांव के लोग कलकत्ता की तरफ प्रस्थान कर रहे थे, उस जमाने में रामदास राय ने गांव के कुछ समूह को लेकर डुमरांव महाराज के बड़े काश्तकार गंगौली के बासिंदे लालमोहर ठाकुर के साथ सामूहिक लड़ाई लड़ी और गंगा के ठीक किनारे पर 600 बीघे जमीन हासिल किया। जिसमें लगभग यथायोग्य सभी जातियों की हिस्सेदारी थी। रामदास राय ने गांव को एकत्रित करने में महत्ती भूमिका निभाई।

एकौना गांव के ठाकुरबाड़ी के सबसे प्रमुख संत रामदहिन दास और रामधनी दास गांव के पूरब टोला से संबंध रखते थे, जिनके वंशज आज भी इस गांव में उनके आर्शीवाद से फल फूल रहे हैं।
एकौना गांव के एक मुखिया हुए जिनका नाम था मंगनी राय। वे भी अक्षर ज्ञान से तो रहित थे लेकिन जब कचहरी में खड़े होते थे तो बड़े—बड़े वकील उनके कानूनी ज्ञान के सामने पानी मांगते नजर आते। कानूनी दांव—पेंच के बीच उनका मुखमंडल और भाव भंगिमा देखने लायक होता। कभी मायूस तो कभी हंसमुख नजर आते, लेकिन उनके मन के भीतर क्या चल रहा होता, कोई नहीं जान पाता था।

ये भी पढ़ें…

पैतृक गॉंव चमथा में बीते बचपन के दिन भी क्या दिन थे

कर्मकाण्ड के कबीर स्वर्गीय महंथ राय…

महंथ राय

कबीरदास एक घोषणा करते है कि ‘मसि कागद छुयो नही, कलम गहो नही हांथ ‘
लेकिन मेरे गांव के कबीर ऐसी घोषणा नही करते है। महंथ राय किसी मठ के महंथ नही थे। पूर्वजों ने नाम रख दिया तो रख दिया। ये ठेठ किसान थे। जवानी मे पहलवानी करते थे, खूब लड़ाकू थे। जब स्वामी सहजानंद का आगमन मेरे गांव मे हुआ तो ये सारा काम छोड़ कर अध्ययन मे लग गए। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान बन गए। आजीवन कुछ न कुछ सीखते रहे। काशी से निकलने वाला पंचांग हमेशा इनके सिरहाने होता था। कोई पंडित के पास जाता होगा, लेकिन गांव के जो कर्मकांडी पुरोहित थे अपने मसले सुलझाने के लिए कभी कभी इनके पास आते थे।

गांव में एक और प्रतिभा है, जिनका नाम है श्याम नारायण राय। वे भले ही आर्थिक लाभ के लिए किसी पद पर नहीं गए। लेकिन रामायण, महाभारत,शास्त्र और पुराण के साथ आधुनिक विमर्शों के भी प्रकांड विद्वान है।
गांव की पुरानी पीढ़ीयों मे स्वर्गीय अनर्थ राय और सिधारी राय जैसे सात गांवों के पंचो की समृद्ध परम्परा विद्यमान थी। ये सारे पंच बड़े से विवाद को भी आपस मे बैठकर सुलझा लेते थे। गांव के वर्तमान मुखिया अशोक राय और निवर्तमान मुखिया उमाशंकर राय भी इलाके के अन्य ग्राम पंचायतो मे प्रतिष्ठित माने जाते हैं।

एकौना गांव में होली गायन की अद्भुत परंपरा थी, होली के ठीक पहले वाली रात जिस दिन संवत् जला करता था, उस दिन गांव के बाहर डिहवार बाबा के मंदिर के बार समत जलाकर गांव के चारो टोलों के लोग अपना-अपना दल लेकर जवहरी के मंदिर में बैठते थे और कब रात बीत जाती पता नहीं चलता था। वैसी परंपरा तो अब नहीं रही लेकिन होली गायन की परंपरा आज भी उस गांव में बनी हुई है।
इस गांव की एक और विशेषता यह भी है कि यह गांव मूल रूप से कौशिक वंश का बाहुल्य गांव है, लेकिन अन्य गोत्रों के लोग भी इस गांव में बहुत ही सद्भाव के साथ रहते हैं। भूमिहार बहुल इस गांव में कौशिक राय कहे जाते हैं लेकिन गैर कौशिक मसलन पांडे, प्रधान, मिश्रा आदि भूमिहार जाती के लोग इस गांव में हैं। राय लोगों ने अन्य लोगों को कभी दबाने का प्रयास नहीं किया।

ये भी पढ़ें…

सहसराम का नया टोला हमारा गांव कुम्हउ

 

गांव के अंदर ही एक मौजा है जलालपुर, जिसमें अन्य वर्ण के लोग रहते हैं। जिसमें मुख्य रूप से ब्राह्मण, चौधरी, कुर्मी, यादव, मुसलमान, कमकर और तुरहा बिरादरी के लोग शामिल हैं। कुर्मी बिरादरी में एक बड़े समाजवादी नेता रहे स्व. राम अवधेश चौधरी। बाल्यकाल में वे कलकत्ता पढ़ाई करने के लिए गए और वहां पर डॉ लोहिया के आंदोलन से जुड़ गए। कलकत्ते में एकौना गांव के भूमिहार बिरादरी के लोग रहते थे। उन्हीं लोगों ने राम अवधेश चौधरी के पढ़ाई की समुचित व्यवस्था भी की। बाद में वे बक्सर जिले में लौट आये और समाजवादी आंदोलन के बड़े नेता बन गए। आपातकाल के दिनों में वे एकौना गांव के मुखिया भी चुने गए। उस गांव का सामाजिक सौहार्द देखिए कि उनके जिंदा रहते पूरा गांव उन्हें नेता जी कहकर ही संबोधित करता था। वर्ष 2018 में 92 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ। उनके निधन के पश्चात बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मृत्यु भोज में शामिल होने के लिए एकौना आए।

 

कृषि पर आधारित गांव एकौना का मौजा लगभग 1500 बीघा है। आज भी गांव की अधिकांश आबादी खेती पर आधारित है। ग्रामीणों का कृषि भूमी से जुड़ाव को इस बात से भी समझा जा सकता है कि एकौना के चोहद्दी में आने वाले गांवों के बिकाउ कृषि भूमि पर हमारे ग्रामीणों की नजर होती है। चाहे कोई भी भूमि बिकाउ हो ग्रामीणों की कोशिश होती है कि वो जमीन गांव की जमीन से जुड़ जाए। गांव की परंपरागत फसल बूंट, गेहूं,खेसारी, मटर, मकई आदी ही हैं। मक्के का फसल काफी प्र​चलित था ओर हर किसान मक्का उगाता था तभी तो भोजपुरी ईलाके में गाया जाने वाला यह लोकगीत हमारे गांव में भी अक्सर कहा सुना जाता।

वो यूं है…
‘मकईया रे तोहार गुण गवलो न जाला
भात करे खुटूर-खुटूर सातू उधियाला,
भैंसी के मट्ठा संगे सरसर घोटाला
मकईया रे तोर गुण गवलो न जाला।।
लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे बिजली की उपलब्धता बढ़ी है, सिंचाई के साधन विकसित हुए हैंं मक्के का स्थान धान की फसल ने ले लिया है। पहले हमारे यहां धान की खेती नहीं होती थी लेकिन अब जमकर धान की खेती होने लगी है। हालांकि नगदी कृषि के प्रति अभी लोगों का रूझान कम है। साग—सब्जी का उत्पादन सिर्फ अपने उपयोग के लिए ही किसान करते हैं।

गांव में शिक्षा के प्रति रूझान है। शिक्षा संस्था के रूप में गांव में उत्क्रमित उच्च विद्यालय, एकौना है। एक प्राथमिक विद्यालय और तीन ​निजी विद्यालय भी हैं। शिवपूजन राय उर्फ दादा ने गांव के स्कूल के लिए जमीन दान दी थी। वे नौघर के थे। स्कूल के निर्माण के लिए गांव के जो लोग कलकत्ता में रहते थे वो हर माह पैसा भेजते थे। लेकिन शिक्षा के प्रति रूझान का मुख्य उद्देश्य नौकरी पाने तक सीमित है।

हमारे ग्रामीण सैन्य बलों, अद्र्ध सैन्य बलों, पुलिस, शिक्षक आदी अन्य सरकारी नौकरियों में भी हैं। नई पीढ़ि भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर नौकरी पाना चाहती है। लेकिन बावजूद इसके गांव में उच्च पदस्थ अधिकारियों की संख्या इक्का-दुक्का ही है। गांव को लेकर यह स्वप्न अभी अधूरा सा ही प्रतीत होता है कि गांव से कोई लड़का या लड़की सिविल सेवा में चयनित हो। गांव के भीतर या बाहर रह रहे बहुत से परिवारों के बच्चे डॉक्टर,इंजीनियर जैसे पदों पर रहे हैं। शिक्षक स्व सभापती राय की चर्चा भी यहां उल्लेखनीय है, क्योंकि ग्रामीण उन्हें मैथ के रामानुजन के नाम से जानते थे। वहीं शिक्षा के क्षेत्र मे रामदास राय के वंशज प्रो रमेश राय अंग्रेजी के लिए पूरे इलाके मे विख्यात है तो शिक्षक श्री नारदमुनी राय गणित के लिए विख्यात है।

गांव की लड़कियों में शिक्षा के प्रति रूझान बढ़ा है। लगभग हरेक वर्ग के लोग अपने परिवार की बेटियों की शिक्षा के मामले में तत्परता दिखा रहे हैं। यह एक नयी परंपरा की शुरूआत है, जो पहले नहीं थी। क्योंकि पहले गांव अभाव ग्रस्त था। जैसे-जैसे समृद्धी आ रही है वैसे-वैसे लोग नारी शिक्षा के प्रति सजग हो रहे हैं।
भले ही गांव का रूझान सरकारी सेवाओं के प्रति कम रहा हो लेकिन कृषि प्रधान गांव एकौना व्यवसाय की दृष्टि से आसपास के गांवों का प​थ प्रदर्शक है। हमारे ग्रामीण कोल्ड स्टोरेज, सिनेमा हॉल्, फिल्म वितरण, इंट भट्ठे जैसे उद्योगों में गांव का नाम आगे बढ़ा रहे हैं।
पहले गांव में कुश्ती,फूटबॉल, और वॉलीबॉल जैसे खेलों की समृद्ध परंपरा थी। इसके अलावां एक और खेल है जो भोजपुरी ईलाके प्रचलित था वो है ओल्हापाती। हमारे गांव में भी यह खेल खेला जाता था लेकिन बदलते हुए दौर में खेल के नाम पर क्रिकेट का प्रचलन रह गया है।

शहीद सत्येंद्र राय

गांव से दो शहीद भी हुए है सीआरपीएफ मे नौकरी करते हुए शहीद सत्येंद्र राय जो उत्तर टोले के उदयनारायण राय के सुपुत्र थे। ये असम जिले के कोकराझार मे शहीद हुए थे और दादाघर के शहीद प्रमोद राय जो रामनाथ राय के सुपुत्र थे वे झारखंड के लातेहार मे शहीद हो गए थे। इन दोनों अमर बलिदानियों की शहादत गांव की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है।

स्वामी सहजानंद का एकौना आगमन
एकौना से 5 किलोमीटर दूर एक गांव है सिमरी। सिमरी सहजानंद की कर्म भूमी थी। वहीं पर बैठकर उन्होंने कर्मकलाप नामक पुस्तक की रचना की। कर्मकलाप पुस्तक मूल रूप से हिंदी में है जो कर्मकांड की पुस्तक है। स्वामी सहजानंद ने किसानों से कहा वे अपना कर्मकांड स्वयं करें। उस जमाने में कर्मकांडी पुरोहित गैर ब्राह्मणों के यहां नमक नहीं खाते थे। जिसका स्वामी जी ने विरोध किया। इसी सिलसिले में वे संभवत: 1914 से 20 के बीच एकौना गांव की मठिया पर आये थे और किसानों को समझाया कि वे अपना कर्मकांड स्वयं करें। इस दौरान स्वामी जी ने जगह—जगह संस्कृत विद्यालय खुलवाया। स्वामी सहजानंद के बाद सिमरी गांव के ही रहने वाले पंडित सूर्य नारायण शर्मा की देखरेख में एकौना में भी एक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की गई। जो लगभग 15 वर्षों तक चला लेकिन आगे चलकर तत्कालीन बिहार सरकार की उदासीनता और वित्तिय अभाव में यह विद्यालय बंद हो गया। गांव की पुरोहिती वयवस्था मे उपाध्याय परिवार के विप्र कुल हमेशा से पूजनीय और अनुकरणीय रहा है जिसमे स्व महादेव उपाध्याय की चर्चा आज भी गांव मे आदर पूर्वक की जाती है।

ये भी पढ़ें…

परदेशी मन को देश से जोड़े रखता है मेरा गांव ”चिकनौटा”

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
3,376FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -

Latest Articles