बदलाव के विभिन्न पड़ावों से गुजरता मेरा गांव अमृत पाली

 

व्यास जी (सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी) पूर्व उपाध्यक्ष, बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण

मेरा गांव उत्तर प्रदेश के पिछड़ा समझे जाने वाले पूर्वांचल के ए​क जिले, बलिया, में पड़ता है। नाम है अमृत पाली, बलिया शहर के पूरब। नजदीकी कदमतला रोड, जिससे होकर गुजरने वाली मांझी-बलिया सड़क सीधी शहर को जाती है, से उत्तर दिशा में लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर मेरे गांव की सीमा शुरू होती है। बलिया-छपरा रेलवे लाइन मेरे गांव को दो हिस्सों- उत्तरी और दक्षिणी-बांटती हुई बीचों-बीच से गुजरती है। दोनों हिस्से में बसे लोग एक दूसरे हिस्से को ”ओह पार” कहते हैं।

गांव से दक्षिण थोड़ी दूरी पर कदमतला रोड को पार कर गंगा की धार बहती है किन्तु बलिया सुरक्षा बांध की कृपा से हमारा गांव बाढ़ से सुरक्षित रहता आया है। वह बांध बाढ़ में आजतक कभी टूट गया हो, मुझे ज्ञात नहीं है। शायद वह कभी नहीं टूटा है। मेरे गांव के पूरब सहरस पाली है। कई लोग समझते हैं कि अमृत पाली… सागर पाली के पास है किन्तु ऐसा बिल्कुल नहीं है। सागर पाली मेरे गांव से पश्चिम बहुत दूर स्थित है जहां बलिया-वाराणसी रेलवे लाइन का एक स्टेशन है। शायद उस रेलवे स्टेशन के कारण सागर पाली का नाम जानने वालों की तादाद अधिक है।

मेरे गांव अमृत पाली का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है परंतु अनुमान है कि इसे अमृत नाम के किसी सज्जन ने बसाया होग। वे सज्जन कौन थे इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। गांव का कोई व्यक्ति मुझे नहीं मिला जो दावा करे कि अमृत उसके पुरखे थे। संभव है कि यह सज्जन कोई जमींदार रहे होंगे जिनके हल्के में यह भूभाग आता था। जमींदारी व्यवस्था के अधीन मेरा गांव 1960 के दशक तक रहा है। हमने बचपन में देखा था कि जमींदार का कोई आदमी लगान वसूलने आया करता था। एक बार लगान न जमा हो पाने पर हम लोगों के कई खेत नीलाम होने जिन्हें बड़ी कठिनाई से बचाया जा सका। सरकार द्वारा मुकर्रर कुर्क अमीन धमक गया था नीलाम करने जिसे ​खिला पिलाकर साधा गया था। वैसे हमारे परिवार के संस्थापक पुरनिया चार-पांच पीढ़ी पहले अपने भाई के साथ तत्कालीन शाहाबाद जिले के बड़का गांव से आये थे, जो अब बक्सर जिले में पड़ता है। भाईयों ने अलग-अलग मकान बनाए, जमीनें खरीदीं और गांव के बाशिंदे बन गए। उनकी देखा देखी ब्राह्मणों के दो अन्य परिवार भी आए। इस प्रकार गांव में ब्राह्मणों के चार घर बस गए। समय के साथ परिवार बढ़ा और आज की तारीख में कई मकान बन गए हैं। ब्राह्मणों के चार घर अब अनेक घरों में तब्दील हो गए हैं।

लेकिन मेरा गांव अमृत पाली पारंपरिक अर्थों में गांव कभी नहीं रहा। जबसे मैंने होश संभाला पाया कि गांव का दक्षिणी हिस्सा बलिया शहर की नगरपालिका का एक वार्ड था। अब भी है। उत्तरी हिस्सा जिला परिषद में आता है। हालांकि गांव के दोनो हिस्से पहले पूरी तरह गांव से दिखते थे, किन्तु शहरीकरण के कारण जिन खेतों में पहले फसलें लहलहाती थीं और खलिहान लगते थे उनमें से अधिकांश अब रिहायशी हो गए हैं। न जाने कहां-कहां से आकर परिवार उनमें बस रहे हैं। फिर किस अर्थ में यह गांव था।

 

यहां ब्राह्मण समेत विभिन्न जाति-संस्कारों के सामान्य जन अधिकांशत: खेती-किसानी एवं पशुपालन किया करते थे। खरीफ के सीजन में मक्के के साथ ज्वार, बाजरा और अरहर उगाया जाता और रबी में गेहूं, जौ, चना, सरसों, मटर, लेतरी (एक प्रकार की दाल जिसका सत्तू भी तैयार होता), तीसी की फसलों से खेत जगमगा उठते। जिनके पास खेती की ज़मीनें अधिक थीं उनके दरवाजे पर बैलों की जोड़ी बंधती। जो कम जमीन रखते थे वे लगान-बटाई पर दूसरों की ज़मीनें लेते तथाा आपसी सामंजस्य से हल बैल की व्यवस्था करते। गाय, भैंस, बकरी जैसे दुधारू पशु अपनी सामथ्र्य के अनुसार प्राय: सभी बिरादरी के लोग पालते थे। यादव बिरादरी की आजीविका का मुख्य साधन पशुपालन ही था। वे दूध-दही, मट्ठा बेचकर अच्छा कमा लेते थे। भूमिहीन मजदूर जो प्राय: दलित समुदाय से आते थे ओर जिन्हें उन दिनों हरिजन अथवा उनकी उपजाती के नाम से पहचाना जाता, बनिहारी में मिलने वाली मजदूरी और पवनी के रूप में मिलने वाले नेग-जोग (जो पूरा नही पड़ता था), से अपनी जीविका चलाते। शहर के क़रीब होने के कारण ऐसे कई भूमिहीन मज़दूर, यहां तक कि कई सीमांत किसान भी, बनिहारी के अलावा मोटिया के रप में सेठो की गद्दी या रेलवे मालगोदाम पर माल ढ़ोने या रिक्शा खींचने के काम से रोजी कमाते।

कुछ ऐसे भी मेहनती किसान थे, खासकर कोईरी जाति के, जो सब्जी की खेती बाड़ी मेहनत से करते और ओड़िया (एक खास तरह का सिर पर ढोया जानेवाला बांस का बड़ा डलिया) में सब्जियां डाल या रिक्शें पर लदवा कर शहर की मंडी में बेच आते। उनमें से कुछ के पास ही ठीक ठाक जमीनें थी, अधिकांश अधिया-बटाई या नकदी लगान पर दूसरो से जमीन पास ही ठीक ठाक जमीनें थी, अधिकांश अधिया-बटाई या नकदी लगान पर दूसरों से जमीन लेकर खेती करते। वे बैगन, भिंडी,आलू, मूली, गाजर,लौकी,कोहड़ा, निनुआ, पालक, मेथी, धनिया, हरी मिर्च आदि उगाते।

 

महत्वपूर्ण बात जो देखने में आती वह यह थी कि बहुत से कोईरी परिवारों के स्त्री, पुरूष, बच्चे, सभी खेतों में काम करते। पर्दा का चलन होने के कारण युवा स्त्रियां काम करते समय सिर पर अपनी साड़ी का पल्लू डाले रहतीं। उस जमाने में दलित जातियों को छोड़कर किसी अन्य जाति की स्त्रियों के खेतों में काम करने को सीधे-सीधे घर की इज्जत से जोड़ दिया जाता था, परंतु खेती किसानी करने वाली कोईरी जाति की महिलाएं इस मामले में प्रगतिशील थी। वे घर और बाहर, दोनों ही तरह के कामों में प्रवीण थी। खेती में वे पुरूषों से किसी भी मायने में सूत भर भी कम नहीं थी। वे हल नही चलाती थी परंतु खुरपी-फावड़े से खेतों में सोना उगाने में सक्षम थीं। पुरूष घर का काम नही करते थे, इसलिए खाना पकाने और झाड़ू बर्तन कपड़े से लेकर छोटे बच्चों की परवरिश जैसे सभी काम उनके जिम्मे थे। हम कहेंगे कि वे पुरूषों से ज्यादा मेहनती थीं।

कहावत है उद्योगिनम् पुरूषसिंहमुपैति लक्ष्मी अर्थात् लक्ष्मी उद्योगी पुरूष सिंह का ही वरण करती है। यानी मेहनती व्यक्ति के पास ही लक्ष्मी का वास होता है। यह कहावत मैंने अपने बचपन में चरितार्थ होते देखी। जमीन होने के बावजूद अपने खेतों में मेहनत नही करने वाले किसानों के घर में (मेरे घर मे भी) साल भर के खाने का अनाज नही उपजता था और प्राय: फाकाकशी की नौबत आ जाती थी।​ किंतु इन मेहनती पुरूषों और वीर बालाओं ने लक्ष्मी को अपने घर में बिठा लिया था! इस सच्चाई की जानकारी मुझे कालक्रम में एक तल्ख अनुभव से हुई। मेरे परिवार के पास अच्छी-खासी जमीनें थी। घर के लोग हलवाहा रख कर कुछ खेती खुद कराते थे किन्तु अधिकांश जमीनें बटाई-लगान पर दे दी जाती थी। जेठ के महीने में बटाई-लगान पर हमारी जमीन लेने के इच्छुक बटाईदारों की आवाजाही हमारे दरवाजे पर बनी रहती थी। हमारे चचेरे बाबा, जो घर के मालिक थे, बटाई लगान की शर्ते तय किया करते थे। यदि कोई बटाईदार नहीं आ पाता था तो घर के छोटे बच्चों को वे उसे बुलाने भेजते। घर में छोटा होने के कारण मुझे भी भेजा जाता। कई सालो से यही परंपरा चली आ रही थी। एक बार चले जाने के बाद खेत बटाई पर लेने को इच्छुक किसान (जिनमें अधिकांश कोईरी जाति के होते थे) अपना काम धाम छोड़कर हमारे दरवाजे पर आ जाते थे। पर धीरे-धीरे एक ऐसा भी समय आया जब लक्ष्मी की की कृपा प्राप्त किसान बुलाने जाने पर कहते, अपने बाबा को भेज दीजिए! ऐसी घटनायें एक बार नहीं अनेकों बार हई। बटाई पर जमीन लेने की गरज उनको नही रही, जमीन बटाई पर देने की हम लोगो की मजबूरी थी वरना खेत परती रह जाते! यही हाल हमारे गांव के दूसरे सवर्ण कहे जाने वाले भूधारी परिवारों का भी था। हालांकि यदि समाजशास्त्रीय दुष्टिकोण से देखा जाए तो यह सामंतवादी व्यवस्था के अर्द्ध पूंजीवादी व्यवस्था में रूपांतरण तथा उत्पादन संबंधों में सकारात्मक बदलाव की पूर्व पीठिका थी।

 

 

अमृत पाली गांव में ब्राह्मणों के घरों को छोड़ दें तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा कुर्मी, यादव, कोईरी और चौरसिया बिरादरी का था। ओह पार यानी रेल लाइन के उत्तर में भूमिहार बिरादरी का एक घर था। घर क्या था, हवेली थी। उन्हें काफी धनी मानी माना जाता था। उनकी जमीनें गंगा के दियारें में थीं तथा बिजनेस से भी बहुत अच्छी आय हो जाती थी। उनका उठना-बैठना गांव के किसी के साथ नहीं के बराबर था। शायद वो किसी को अपनी बराबरी का नहीं समझते थे। कैसे समझते ? उनके घर आयी एक बारात में घुड़दौड़, उंट दौड़ और हाथी दौड़ देखने के लिए पूरा गांव ही नहीं आसपास के लोग भी उमड़ पड़े थे। भीड़ में मैं भी शामिल था। बारात क्या थी फौज की छावनी थी ! तीन दिनों तक जश्न और खाना-पीना चलता रहा था। छोलदारियों में प्रभु वर्ग बनारस से मंगाई गयी बाई जी का डांस देखकर मुदित होता रहा था। मूलत: वह पूरा ताम झाम उनके सामंत होने का परिचायक था। मेरे गांव के वरिष्ठ जन महीनों तक बारात को लेकर चिमगोईयां करते रहे। स्त्रियां चटखारे लेकर याद करती रहीं।
इन जाति-बिरादरियों के अलावा अन्य जातियों के भी छुटपुट घर थे। दलित वर्ग में रविदास बिरादरी के कुछ घर थे जिनकी महिलाएं गांव भर में बच्चों के जन्म के समय दाई का काम करती थी। सामान्यत: नवजात शिशु अपने जन्म के बाद दूध का पहला घूंट अपनी माता के स्तन से नहीं अपितु इन्हीं दाईयों के स्तर से पीता था। मेरे बाबा बताते थे कि मुझे भी दूध का पहला घूंट मेरी दाई मां जिन्हें गोवर्धन बो कहा जाता था, ने अपने स्तन से पिलाया था। इन बिरादरियों के अलावा लोहार, बढ़ई, कुम्हार, नाई बिरादरी के एक-एक घर और गोंड बिरादरी के तीन-चार घर भी थे। धोबी बिरादरी गांव में नहीं था किंतु कपड़ा धोने का काम बगल के सहरस पाली के धोबी परिवार किया करते थे। दीवाली के समय मिट्टी के दीए और कई तरह के बर्तन कुम्हार के यहां से आ जाता था। कुम्हार परिवार को गांव के पोखरे से अच्छी मिट्टी मिल जाती थी। हल-फाल का काम लोहार और लकड़ी का छोटा मोटा काम बढ़ई के जिम्मे था। बाल काटने तथा शादी-ब्याह एवं अन्य धार्मिक संस्कारों के समय नाई आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। शादी-

ब्याह, कथा-श्राद्ध के लिए बगल के रघुनाथ पुर से जजमनिका ब्राह्मण आते थे। अनाज भूनने का काम गोंड महिलाएं भनसार में करती थी, जिसके लिए गांव के बगीचे से उन्हें पर्याप्त सूखे पत्ते उपलब्ध हो जाते थे। इस प्रकार मार्क्स के ”एसियाटिक मोड आफ प्रोडक्शन” की स्थापना के अनुरूप हमारा गांव दैनन्दिन मामलों में लगभग आत्मनिर्भर था। अन्य आवश्यकताओं के लिए बलिया शहर तो था ही।

सन 1967 के अकाल ने मेरे गांव अमृत पाली की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की चूलें हिला कर रख दिया था। खेत सूखे पड़े थे। एक छटांक अनाज तक पैदा न हो पा रहा था। कुएं से ढेकली चलाकर कितनी जमीन सींच जा सकती थी और आखिर कितने दिनों तक? सिंचाई के लिए नलकूप नहीं थे। मुश्किल से एक या दो निजी नलकूप थे। परंतु धरती की कोख लगातार खाली होती जा रही थी। धरती की कोख में जमा पानी इंद्र देवता की बेरुखी के चलते खत्म हो जाने का खौफ गांव पर तारी होने लगा था। क्यों न होता? कुएं ही पेयजल के एक मात्र स्रोत बच गए थे। माल-मवेशियों को भी वही जल पिलाने की मजबूरी थी। सरकारी चापाकल तो था नहीं। जिनके घरों में अपने चापाकल थे वे भी सूखने लगे थे। अनाज के बिना आदमी कुछ दिनों तक जी सकता था परंतु पानी के बिना जीवन की कल्पना की जा सकती है भला? और बिचारे मवेशियों का क्या होता? वैसे भी ढेकली से कुछ साग सब्जी के अलावा कुछ और पैदा हो पाना संभव नहीं था। जिनके घरो में अनाज थे कुछ दिनों तक उनका काम चला। परंतु जहां खेतों से साल भर खाने का अनाज न पैदा होता हो, वहां संचित अनाज कितने दिनों तक चल पाता?

जिनके पास सरकारी या प्राइवेट नौकरी थी उनके घरों में चूल्हा जलने की कोई खास समस्या नहीं आयी, किन्तु खेती पर आश्रित परिवारों के समक्ष फाकाकशी की नौबत आ गयी। जो भूमिहीन मजदूर या सीमांत-छोटे किसान थे, उनके लिए इधर-उधर मजदूरी कर अपना भरण-पोषण करना अपेक्षाकृत ज्यादा आसान था। हां, अगर काम न मिला तो बात दीगर थी। कथित संभ्रांत वर्ग की दशा थोड़ी भिन्न थी। इज्जत जाने के डर से मजदूरी वे कर नहीं सकते थे और खाने को अन्न नहीं होने के बावजूद मुस्कुराने को अभिशप्त थे- किसी को भनक न लग जाये कि बाल बच्चे भूखे हैं। मेरे परिवार की दशा यही थी।

भूख ने घर में डेरा डाल रखा था। कोई चारा जब न रहा स्त्रियों के गहने बिकने लगे। सुनारों की बन आयी। सबने मजबूरी का फायदा उठाकर एक सौ की चीज के पचीस-पचास दाम लगाए। परिवार के मुखिया क्या कहते? जितना मिलता उससे कुछ दिनों का राशन आ जाता। राशन क्या था? लाल जोन्हरी (शायद अमेरिका से आया था) या खुदिया चावल (जिसे सामान्य दिनों मे जानवरों को खिलाया जाता था) का भात नमक के साथ या हल्दी तथा मेथी का छौंक लगाकर बना मेथी जाउर! यही हमारा मुख्य भोजन बना रहा। अकाल ने जिस विपन्नता का दंश हमें दिया था उसकी टीस हम लोग सालों साल झेलते रहे। विपन्नता हमारे संयुक्त परिवार का स्थायी भाव बन गयी। शायद यही हाल गांव के अधिकांश घरों का था। परंतु “इज्जत” जाने के डर से कोई इसकी चर्चा नही करता था।

आज की तारीख में यह सोचकर मेरी तकलीफ बढ़ जाती है, और वह भी बिहार में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में लंबे समय तक काम करने के कारण कुछ ज्यादा ही, कि उस भीषण अकाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने आम जनता को अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाने के लिए अकेला छोड़ दिया था। सरकार की ओर से आम जनता को राहत पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी। बिहार में आपदाओं के आने पर राहत की पूरी व्यवस्था की जाती है। संभव है उस समय यहां भी वही हाल हो। वैसे इसमें दो राय नहीं हो सकती कि जनतांत्रिक ढंग से चुनी गयी एवं लोक कल्याणकारी सरकार का यह परम दायित्व है कि वह आपदा में जनता की पूरी मदद करे। यूपी में तब मेरे गांव अमृत पाली को कोई सहायता न मिली। हॉ, सुनने में आया कि तहसील से तकावी(लघुकालीन फसल ऋण) मिल सकती है। मेरे गांव के किसान, जिसमें मेरा परिवार शामिल था, जमीनों के कागजात लेकर भागे-भागे तहसील पहुंचने लगे। तकावी  मिली जरूर लेकिन उसका कुछ भाग घूस के रूप में पटवारी से लेकर कानूनगो-तहसीलदार को खिलाने के बाद! अब फसल ऋण का पानी बिन सून खेतों मे क्या उपयोग होता ? कुछ और दिनों तक लाल जोन्हरी और खुदि या चावल का भात हम लोग खा सके।
शहर का वार्ड होने के बावजूद मेरे गांव के दक्षिणी हिस्से की गलियां कच्ची थीं। वहां गर्मियों में धूल उड़ा करती और बरसात में कीचड़-कादो के कारण चलना मुश्किल होता। रही सही कसर चरने के लिए जाने वाली गायें, भैंसे, बछड़े, पाड़ियां आदि पूरी कर देते। कीचड़ इतना मथ जाता कि पांव रखने की जगह न बचती। हम लोग प्राय: कीचड़ सने पैरों से स्कूल की राह नापते। कदमतला रोड से गांव को जोड़ने वाली सड़क का भी वही हाल था। उत्तरी हिस्से की आबादी काफी कम थी। वहां की हालत इधरे से भी बुरी थी। जब शहर के वार्ड का यह हाल था तो जिला परिषद की आबादी बेहतर जीवन कैसे जी सकती थी। आबादी कम होने के कारण कष्ट झेलने वाले भी कम थे! बिजली बत्ती हमने बचपन में अपने देखा ही नहीं। शाम होते ही पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता। कहीं-कहीं ढ़िबरी या लालटेन की टिमटिमाहट दीख जाती। सात-आठ बजते न बजते गांव नींद के आगोश में डूब जाता। नीरवता कभी-कभी ट्रेन की सीटी की आवाज से टूटती। ट्रेनों के गुजरने से लोग समय का अनुमान लगाया करते। ट्रेनों के नाम थे..दस बजिया, दो बजिया या चार बजिया। जितने बजे किसी ट्रेन को बलिया स्टेशन से गुजरना था, उसका नाम भी उसी के अनुसार होना था। ढ़िबरी या लैंंप या लालटेन की रोशनी में हमने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई गांव में रहकर पूरी की।

 

गांव का अपना प्राथमिक विद्यालय बहुत बाद में अस्तित्व में आया। हम लोग कदमतला रोड के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते थे। कक्षा तीन के बाद मैं सन् 1964 में पिताजी (स्व) दीनानाथ मिश्रा के पास अजमेर चला गया जहां वे सी आर पी एफ में कार्यरत थे। वहां र​हकर मैंने कक्षा चार पास किया। लौटने के बाद दर्जा पांच मैंने भृगु आश्रम के प्राइमरी स्कूल से पूरा किया। सुयोग से नगर पालिका द्वारा आयोजित एक परीक्षा में अव्वल आने से मुझे मध्य विद्यालय में पांच रूपये का वजीफा मिलने लगा। मध्य विद्यालय तक की मेरी पढ़ाई भृगु आश्रम के ही म्युनिसिपल बोर्ड जूनियर हाई स्कूल में हुई।

उन दिनों मिडिल के दर्जा आठ की परीक्षा जिलास्तरीय बोर्ड द्वारा ली जाती थी। मेरे अंक काफी अच्छे थे। तब गवर्नमेंट इंटर कॉलेज (जी आई सी) जिला बलिया के सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों में शुमार किया जाता था। जानकारों की राय से मैंने दाखिले के लिए वहां आवेदन दिया। अच्छे अंकों की बदौलत दर्जा नौ मेरा एडमिशन वहां हो गया। मिडिल के जिला टॉपर सहित अच्छे अंक पाए जिला भर के अन्य दसियों छात्रों ने मेरे साथ वहां दाखिला लिया थ जिन्हें छात्रावास आवंटित हुआ था। कॉलेज शहर के अंतिम छोर पर गंगा के समीप स्थित था। मैं अपने गांव से रोज 3-4 किमी पैदल चल कर स्कूल जाया करता था। मेधावी छात्रों का पसंदीदा कॉलेज होने के कारण वहां आपसी प्रतिस्पर्धा काफी तगड़ी थी। हाई स्कूल के सभी छात्रों की नजर मिडिल के टॉपर घनश्याम गुप्ता पर लगी रहती थी। शिक्षक भी उस पर विशेष ध्यान दिया करते थे। लेकिन जब दर्जा दस की बोर्ड परीक्षा का परिणाम निकला, बिचारे गुप्ता जी काफी पीछे रह गए और सर्वाधिक अंकों के साथ मैं डिस्टिंक्शन से पास हुआ। मेरी धाक जम गयी।

डिबेट में भाग लेने के कारण पहले कुछ लोग जानते थे, अब पूरा कॉलेज मुझे पहचानने लगा। छोटे शहर के उस कॉलेज में बनी पहचान का अपना अलग नशा होता है। नशे की तासीर मेरे गांव में भी फेलने लगी। मेरी गिनती होनहार छात्रों में होने लगी। अपने गांव का मैं इकलौता विद्यार्थी था जो जी आई सी जैसे प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ता था और इतने अच्छे नंबरों से पास हुआ था। मुझे उत्तर प्रदेश सरकार का पचास रूपये माहवारी का मेरिट स्कॉलरशिप मंजूर हो गया। इसके बाद मैनें पीछे मुड़कर नहीं देखा और यूपी बोर्ड की 1972 की इंटर की परीक्षा में भी मैं अपने कॉलेज में फस्र्ट आया। पिता जी की नौकरी और मेरिट स्कॉलरशिप की बदौलत मैं आगे की पढाई के ​लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय चला आया।

 

 

यूनिवर्सिटी आ जाने के बाद मैं केवल छुट्टियों में घर आ पाता था। सन् 1980 में भारतीय पुलिस सेवा और 1982 में प्रशासनिक सेवा में चले जाने के बाद घर आना कम होता चला गया। जब मैं आता, गौर करता कि गांव में विकास की बयार धीरे-धीरे बहने लगी थी।

सत्तर का दशक गांव में बदलाव की कहानी लिख रहा था। कच्ची सड़क पर खड़ंजा बिछाने की शुरुआत होने लगी थी। पहले कदमतला रोड से हमारे गांव को जोड़ने वाली कच्ची सड़का का नंबर आया। फिर धीरे-धीरे खडंजा वार्ड नंबर दो में शामिल हिस्से की गलियों तक पहुंचा। दीगर बात है कि गलियां कुछ जगहों पर इतनी संकरी हैं कि उनसे होकर कोई मोटर गाड़ी नहीं निकल सकती। संभवतया: खड़ंजा करण का काम नगर पालिका के ठेकेदारों के भरोसे छोड़ दिया गया था, गलियों की उपयोगिता उसके लिए बेमानी थी। बिना गलियों के चौड़ीकरण के खड़ंजा बिछाने से धूल और कीचड़ से मुक्ति जरूर मिल गयी किंतु यदि अतिक्रमण हटा कर तथा जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त भूमि का अधिग्रहण कर खडंजा बिछता तो गांव के एक सिरे से दूसरे तक आवागमन की सुविधा बढ़ जाती। अभी भी गाड़ियां गांव के किनारे खड़ी कर गांव के अंदर प्रवेश किया जाता है। अस्सी के दशक में गांव में बिजली आ गयी। सामथ्र्यवान लोगों ने कनेक्शन ले लिया। किंतु गरीब परिवार जिनमें बिल चुकाने की क्षमता नहीं थी, उसी ढिबरी-लालटेन के सहारे रह गए। फिर पानी के नल लगने लगे। यानी कुएं की जरूरत बि​ल्कुल खत्म हो गयी। पुराने चापाकल भी धीरे-धीरे बंद हो गए। गांव अमृत पाली देर से ही सही बदलने लगा था। 1990 का दशक आते-आते बदलाव के कई सकारात्मक नतीजे दिखने लगे।
बदलाव का पहला नतीजा यह रहा कि खेती पर निर्भरता कम होने लगी। कई घरों के लड़के पढ़ लिख कर रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाने लगे। कई सरकारी या निजी क्षेत्र में काम करने लगे। कोईरी परिवारों के कई लोग पहले से शहर के सेठों के यहां मुनीम का काम करते थे। उनमें से कुछ ने अपना खुद का व्यवसास खोल लिया तथा अपने परिवार एवं बिरादरी के युवकों को भी उसमें काम दे दिया। रविदार बिरादरी के कई युवकों ने रिक्शा चलाकर अपनी आजीविका चलानी शुरू कर दी। हर जाति बिरादरी के लोग अपने बच्चों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान देने लगे।
बदलाव का दूसरा नतीजा यह देखने को मिला कि कई खेतों में नलकूप और उसके साथ आटा पीसने और तेल पेड़ने की मशीनें लग गयीं। ​पहल स्त्रियों को जांता पर आटा पीसने या दाल दलने का श्रम करना पड़ता था। तेल पेराने कदमतला रोड जाने की मजबूरी थी। अ​ब स्त्रियों को उस श्रम से मुक्ति मिल गयी और तेल पेराने दूर जाने की आवश्यकता नहीं रही। नलकूप लग जाने से सब्जी उत्पादन में ढेकुल से पानी पटाने की आवश्यकता नहीं रही, फलत: सब्जी के उत्पादन का रकबा बढ़ा। जब उत्पादन बढ़ा तो सकल उत्पादन भी बढ़ा और साथ में आमदनी भी बढ़ी।

एक महत्वपूर्ण परिघटना रही मेरे गांव के उत्तर में रेलवे लाइन के पार जिले के पहले कॉन्वेंट की स्थापना। जिस जमीन पर कान्वेंट खुला वहां गांव का पोखर तथा बगीचा हुआ करता था। कुछ जमीन ग्राम सभा की थी। निजी जमीन बिना मुआवजा दिए सरकार ने ले ली। ग्राम सभा की जमीन भी ​कलेक्टर ने किसी तरह ले लिया। कोई पादरी उस कान्वेंट का संचालक था। थोड़ा हो हल्ला मचा लेकिन स्कूल के नाम से धीरे-धीरे शांत हो गया।

बगीचे का कुछ हिस्सा हमारे परिवार का भी था। पर हम लोग शांत रहे। पर कान्वेंट का असर यह रहा कि उसमें पढ़ने के लिए अफसरों के बच्चों के साथ शहर के रईसों के बच्चे भी स्कूल बस से आने लगे। अब स्कूल बस कच्ची सड़क पर कैसे चलती? साथ ही कान्वेंट में पढ़ने वाले नौनिहाल बिना बिजली बत्ती और पंखे कैसे मन लगाकर पढ़ाई करते? रेलवे लाइन के पार मेरे गांव के उत्तरी हिस्से (जो जिला परिषद में पड़ता था) की सड़क का खड़ंजा करण हो गया एवं बिजली के तार दौड़ गए। कालांतर में कदमतला रोड से मेरे गांव अमृत पाली को आने वाली सड़क का कालीकरण भी हो गया! सोचता हूं काश कि मेरे बचपन में वह कान्वेंट खुल गया होता तब हम धूल-धक्कड़, कीचड-कादो और ढिबरी-लालटेन की अस्वास्थ्यकर रोशनी से बच गए होते!

21 वीं सदी आते-आते मेरे गांव की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में गुणात्मक परिवर्तन होने लगा। देहात में बसे संपन्न लोगों में शहर में रहने की इच्छा बढ़ने लगी। यह स्वाभाविक था क्योंकि किसी भी शहर में शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और मनोरंजन आदि के साधन और अवसर देहातों के मुकाबले बेहतर होते हैं ​और जिसे हम ”क्वालिटी आफ लाइफ” कहते हैं उसका देहात से कोई मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसलिए देहातों में बढ़ती समृद्धि के समानांतर वहां बसे लोगों का शहरों की ओर खिंचाव, जिसे अंग्रेजी में माइग्रेशन कहते हैं, होना लाजमी है। ऐसा दुनिया भर में होता आया है।

पश्चिम के विकसित देशों में तो प्राय: गांव, जैसा कि हम अपने देश में देखते हैं, विलुप्त हो गए हैं और आबादी का बड़ा हिस्सा छोटे-बड़े शहरों में ही रहता है। यूं कहें कि पहले के गांव शहर बन गए हैं तो यह ज्यादा सटीक होगा। फलत: बलिया शहर और आसपास बसने के इच्छुक लोगों की तादाद बढ़ने लगी। इस बढ़ती तादाद के कारण बसावट के लिए भूमि की मांग तेजी से बढ़ी और उसी अनुपात में जमीन की कीमतों में उछाल आने लगा। मेरे गांव अमृत पाली में भी बसने के इच्छुक लोग न जाने कहां-कहां से खीचे चले आने लगे जिससे जमीनों की कीमतें तेजी से बढ़ी। फिर क्या था जिनके पास जमीने थीं उन्होंने खेती को तिलांजली दे जमीनें बेचनी शुरू कर दी। आज की तारीख में परती के अलावा उपजाऊ मानी जानेवाली भूमि में मकान बन गए हैं या बन रहे हैं। लहलहाती फसलों वाले खेत धीरे—धीरे कंक्रीट के जंगल में तब्दील होते जा रहे हैं। मकान तक पहुंच पथ है नहीं यह चिंता का विषय नहीं है। मैं इसे बेतरतीब या गैर योजनाबद्ध शहरी विकास कहता हूं। न सड़क, न नालियां, न जल या बिजली का कनेक्शन बस मकान बनते चले जा रहे हैं। बसने वाले मानते हैं कि शहर का वार्ड हैं आज न कल सब हो जाएगा।

और जमीन मालिक? वे अच्छी रकम पा कर मगन हैं। पुराने की जगह अपना नया मकान बनवा रहे हैं। कईयों ने किराया पर देन के लिए को​ठ​रियां बनवा दी हैं। फसल उगाने जैसे कठिन काम की जगह मकान किराए पर उठाना ज्यादा मु​फीद लगता है। लेकिन पुरखों की जमीन बेचकर मिले पैसे का एक दुष्प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। वो ये है कि शराब, गुटका और नशे का इस्तेमाल बढ गया है। पहले नशा बुरा माना जाता था। अब वह मूल्य बोध दरक रहा है। नशा खुल्लम-खुला चल रहा है। जब सारी जमीनें ​बिक जाएंगी तब क्या होगा कि चिंता नहीं सता रहीं। प्रेमचंद के कहानी के पात्र घिसू की तरह वे आज को पूरी शिद्दत के साथ जीना चाहते हैं। जिनके पास बेचने को जमीन नहीं है, वे मेहनत मजदूरी या दुकान-दौरी से आजीविका कमा रहे हैं। अच्छा है शिक्षा के कारण कमासुत पुत्रों की संख्या बढ़ रही है। नारी शिक्षा भी बढ़ी है, परंतु बहुत कम बेटियां नौकरी कर रही हैं। स्वस्थ लक्षण है कि कमासुत बहुओं की मांग बढ़ती जा रही है।
मेरा गांव अमृत पाली वाकई बदल रहा है। बदलाव बेहतरी की बयार लाए यही शुभेच्छा है।

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