
मानिक चौक गांव के बारे में बताने से पहले यहां दो वाक्या का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। वर्ष 2011 का जनवरी का महीना था। एक सज्जन ने अपने गांव के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि उनका गांव अमुक पंचायत में पड़ता है। यह सुनकर मैं कुछ सेकेंड के लिए आश्चर्यचकित हो गया। सामने वाले ने मेरे चेहरे पर विस्मय का भाव पढ लिया और मुझसे पूछा सर आप किस सोच में पड़ गए। मैंने उन्हें बताया कि जब-जब कोई मुझे अपने गांव के अमुक पंचायत में पड़ने के बारे में बताता है तो मुझे कुछ समय के लिए रूकना पड़ता है। सज्जन ने उत्सुकतापूर्वक इसका कारण पूछा। मैंने बताया कि मैं जिस गांव से आता हूं उस गांव में तीन पंचायत है। ‘पंचायत के अन्दर में गांव‘ एवं ‘गांव के अन्दर में पंचायत’ इसी उधेड़-बुन से कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूं। सामने बैठे सज्जन को भी एक गांव में तीन पंचायत के बारे में जानकर उस गांव की महत्ता का पता चला।
2012 का छठ का समय था। मैं मुजफ्फरपुर जिला के किसी गांव से गुजर रहा था। किसी चीज की आवश्यकता पड़ने पर मैंने उस गांव के एक व्यक्ति से बाजार के बारे में पूछा। उस व्यक्ति ने मुझे बताया कि इस गांव में बाजार नहीं लगता है। यहां के निवासी बगल के गांव से सामान खरीदते हैं जहां हफ्ता में तीन दिन बाजार लगता है। यह मैं आश्चर्य से सुन ही रहा था कि सामने वाले ने मुझसे आश्चर्य का कारण जानना चाहा। मैंने बताया कि हमारे गांव में प्रतिदिन बाजार लगता है। उन्होंने कहा कि आप जरूर मानिक चौक के होंगे।
उपर्युक्त दोनों वाक्या का जिक्र मानिक चौक गांव की विशालता एवं महत्ता को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। मैं इसी गांव के दक्षिणवारी टोला का स्थायी निवासी हूं जो महान राज्य बिहार के सीतामढ़ी जिले के रून्नी सैदपुर प्रखंड में पड़ता है। सीतामढ़ी माता सीता की जन्म स्थली है। वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि इस गाँव में बीस से अधिक टोला है। इसी गांव से मैंने प्राथमिक शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। मेरे सहपाठी में से अनेक सीतामढ़ी शहर, मुजफ्फरपुर जिला एवं नेपाल से भी थे। स्कूल के छात्रावास में अनेक मास्टर साहब एवं विद्यार्थी रहते थे। यह तथ्य इस गांव में शिक्षा के महत्व एवं शिक्षा की स्थली होने का परिचय देता है।
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मानिक चौक गांव में सामाजिक सौहार्द्र एवं साम्प्रदायिक सद्भाव इतनी की किसी को जातियों एवं धर्माे के अन्तर के बारे में पता ही न चले। हाई स्कूल के हेडमास्टर अरमान साहब, अंग्रेजी के शिक्षक जावेद जी पूरे गांव में उतने ही लोकप्रिय थे जितने संस्कृत के विद्वान शिक्षक पंडित श्री तारानाथ झा जी, गणित के शिक्षक पाठक जी एवं जगन्नाथ जी, विज्ञान के शिक्षक घनश्याम जी एवं धर्मप्रकाश जी, सभी विषयों के ज्ञाता पृथ्वीराज जी, हिन्दी के शिक्षक जगन्नाथ जी, मिड्ल स्कूल के शिक्षक ठाकुर जी, मंडल जी आदि। जब किसी का तबीयत खराब होता तो वेदों के ज्ञाता पंडित श्री लक्ष्मीकांत झा के लयबद्ध मंत्रोच्चारण से असीम आनंद की प्राप्ति होती थी। मौलवी साहब की देशी चिकित्सा का लाभ सभी ग्रामवासी उठाते थे। दाहा (तजिया) के आयोजक सभी बच्चों को दाहा के चारों ओर घुमाते थे ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो। गांव में एक ही जगह प्रसिद्ध महारानी स्थान पर वृहत स्तर पर दुर्गापूजा का आयोजन होता है जिसमें सभी ग्रामवासी पूरे उत्साह से भाग लेते है। छठ पूजा में गांव के सभी लोग सम्पूर्ण गांव की सफाई करते हैं एवं असीम भक्ति-भाव से पूजा करते हैं। विश्वकर्मा पूजा हो या श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सभी पूरे उत्सवी मूड में रहते हैं। मेला गाछी में जाडे के महीने में लगने वाले विशाल पशु मेला में आस-पास के सभी ग्रामवासी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
गांव में आज से चालीस साल पहले एक बड़ी पानी टंकी का निर्माण हुआ था। करीब आधी सदी से वहां बिजली है। सड़क मार्ग से यह चारों ओर से जुड़ा हुआ है। हाल के वर्षों में यह रेलवे लाईन से भी जुड़ गया है। गांव में कई प्राथमिक विद्यालय, मध्य विद्यालय एवं उच्च विद्यालय है। लड़कियों के लिए भी उच्च विद्यालय है। कई निजी विद्यालय भी खुले हुए हैं। मेरे समय में मास्टर साहब सब कोई भी प्रश्न पूछने पर तत्क्षण उसका समाधान करते थे। आधी पढ़ाई आपकी रोड पर ही हो जाया करती थी चूंकि हर चौक-चैराहे पर शिक्षा पर चर्चा चलती रहती थी। गांव के लोगों की भाषा उत्कृष्ट होने के कारण बच्चों में संस्कार आता था। अगल-बगल के सभी गांवों के लोग अपना परिचय इसी गांव से देते हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक रूप से यह एक समृद्ध गांव है। इस गांव के लोग देश दुनिया में उच्च पदों को सुशोभित कर रहे हैं।
एक बात और! बाल्यावस्था में ही सत्य की परिभाषा, गंगा की महिमा, इन्द्रियों पर नियंत्रण इत्यादि से सम्बन्धित शिक्षा इसी गांव में विद्वानों द्वारा दी जाती रही है जो आज के समय में अत्यन्त प्रासंगिक है।
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अन्त में एक और वाक्या का जिक्र। 2001 में छठ के समय मैं घर गया था। उस समय हमारे पटना विश्वविद्यालय में छुट्टी थी। दिल्ली एवं सूरत में कमाने वाले मानिक चौक के ग्रामवासी भी अपने गांव आ रहे थे। गांव से दो किलोमीटर पहले इस गांव के तीन लोगों को कुछ लोगों ने लूटने की कोशिश की। तीनों ने किसी तरह लूटने वालों को नियंत्रण में ले लिया एवं उन्हें पीटने का प्लान बना रहे थे। तभी तीन में से किसी एक ने बाकी दोनों को रोकते हुए कहा कि इससे हमारे गांव की बेइज्जती होगी एवं तीनों ने लूटनेवालों को छोड़ दिया। इस कथा का जिक्र मेरे सामने किसी दवा की दुकान पर हो रहा था। यह है इस गांव की महानता एवं यहां के लोगों का उच्च संस्कार। आज भी यह विद्यमान है एवं आशा है भविष्य में भी बरकरार रहेगा।
(लेखक लोकेश कुमार झा बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित पदाधिकारी हैं। वर्तमान में बिहार सूचना केन्द्र, नई दिल्ली के सहायक निदेशक हैं।)











