मेरे बैसवाडे की लोक संस्कृति के कर्ज से उऋृण हो पाना संभव नहीं

शैलेंद्र प्रताप सिंह
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी
गांव की तरफ निकलिये तो सामंती लिहाज से कोई हम सबके सामने चारपाई पर बैठा नही रहता, सब खड़े हो जाते थे पर बैठने के लिये ठीक-ठीक दूसरी सुविधा अनुसूचित जाति के पंची के यहां थी जहां जाकर हम लोग अक्सर बैठ जाते। पंची भले ही पढ़े कम थे पर कढ़े बहुत थे,बहुत ही समझदारी की बाते करते, सामने वह और उनके बेटे नाथी और कभी कभी भाई ताहिर भी जूते बनाते रहते। एक तरह गांव की यह काटेज इंडस्ट्री थी। उन्हे देखना और पंची से बतियाना उस समय मनोरंजन का साधन था। अब गांव की चमड़े के जूते बनाने की यह कॉटेज इंडस्ट्री भी खत्म हो गयी है। …….बैसवाडे की लोक संस्कृति
हफ्ते में करीब—करीब दो बार अली जन चिकवा आ जाते, पूरे गांव के युवाओं की जीभ में मीट का स्वाद अलीजान को देखकर ही आने लगता। पंची के दरवाजे ही बकरा कटता। मेरे बाबा हर बार स्थायी ग्राहक थे ही। हम सब थाली लिये वही जुट जाते। बकरा कटने से लेकर रात खाने तक उत्सव जैसा बातावरण रहता। आस-पास के घरों से भी खूब महक आती।

गांव के बीच नीम के एक बड़े पेड़ के नीचे का बड़ा मैदान गांव का सांस्कृतिक केंद्र था। नीम के नीचे चबूतरा बना था जिसमें कुछ मूर्तियां भी थी। हम सब इसे महरानी नीम कहते थे और यही गांव के तमाम समारोहों/मीटिंगों की केंद्र था। यहीं बाहर से आने वाले जादूगर, सपेरे आदि डमरू बजाते और कार्यक्रम दिखाते थे। यहीं कहारों के यहां होने वाले समारोहों के अवसर पर तमाम नृत्य भी आयोजित होते थे। बचपन में मुझे यह नृत्य बहुत पसंद आते थे। पास के ही बदलू यादव को कभी कभी देवी आती थी, वह आग के किनारे दौड़ने लगते थे। हम बच्चे लोगों के लिये यह सब कौतुहल के और कुछ डर के भी विषय होते थे।            …….बैसवाडे की लोक संस्कृति

गांव के कुछ मौक़े पर सामूहिक प्रयास/आपसी मदद देखने वाली होती थी। गांव की किसी बिटिया की शादी है तो लगता था पूरे गांव की शादी है। मुझे याद है कि अपने ही गांव से नहीं आस पड़ोस के तमाम गांवों से बरातियों के लिये मेरे घर भी चारपाइयां आती थी, दूध आता था, जिसके यहां जो होता है मदद करता था। मुझे याद है पिता जी के साथ साथ आस पास के गांवों से बारात के लिये चारपाई लादने मैं भी गया था और लोग खुशी खुशी चारपाइयां दे रहे थे।
शादियों में जिससे जो भी संभव होता नकद धन न्योते के रूप में भी देता था। न्योता लिखा जाता था ताकि उसके घर की शादी में, कम से कम उतना न्योता तो देना ही देना होता था। ऐसे मौके पर लोग आकर अपना श्रम भी देते थे।
इसी तरह किसी घर में आग लग जाये तो पूरा गांव आकर दौड़ दौड़ कर आग बूझता। ज्यादातर घर कच्चे और छप्पर के होते थे और सबको यह भी डर रहता था कि जल्दी आग न बुझी तो पूरे गांव को समेट लेगी। ऐसी ही एक आग 1974-75 के आसपास गांव में शायद मेरे ही घर से लगी थी जो जल्दी नहीं निपट पायी और धीरे धीरे पूरे गांव में फैल गयी। गाँव की महरानी नीम भी झूम झूम कर जलती बतायी गयी। उस समय मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था। किसी के यहां चेर बदमाश आने का शोर होते ही पूरा गांव मिनटों में उसके दरवाजे पर हाजिर हो जाता था। यह सब मैंने अपनी आंखों से देखा हैं। मेरे बचपन में एक चेर ऐसे ही पकड़ा गया था। यह भी याद है कि ताहिर के घर से एक बार रात में शोर होने पर पूरा गांव लाठियां लेकर तत्काल उनके दरवाज़े पहुंच गया पर पता लगा कि डर की वजह से चिल्लपो हो गयी थी।                                                …….बैसवाडे की लोक संस्कृति
इसी तरह गर्मियों में ज़रूरत के मुताबिक नये छप्पर बनाये / बनवाये जाते, पुराने बदले जाते और शाम होते ही वे नये छप्पर गांव के लोगों द्वारा उठा कर रखे जाते थे। उसमें संख्या बल काफी लगता था। मिनटों में पूरा गांव खड़ा हो जाता था छप्पर उठवाने। बुजुर्ग लोग एक बार छप्पर रखने का तरीका/ योजना तय कर लेते थे और फिर लोग उठाकर धम्म से रख देते थे।
घर की रोजमर्रा की जरूरत की चीजें घर के पुरिखा (मेरे घर में बाबा) द्वारा ज्यादातर लालगंज की बाज़ार से लायी/ मंगवायीं जाती थी। इमरजेंसी में गांव के मेडीलाल गुप्ता के घर में भी रोजमर्रा का छोटा—मोटा सामान मिल जाता था। गांव में कोई दुकान नहीं थी बस वह घर में कुछ सामान रखते और उनकी महिलायें भी सामान दे देती थी। हम बच्चे बिना पैसे के भी गेहूं और धान देकर जरूरी सामान और कम्पट आदि ले आते थे।
किसी के घर अचानक कोई ज़रूरत आ जाये, कोई मेहमान आ जाये तो तत्काल अड़ोस पडोस से भी तेल,घी, मसाले, दाल, चावल, जैसी भी जरूरत हो, हर मदद मिल जाती थी।

पूरा गांव पुरूष प्रधान था। महिलायें घर गृहस्थी और बच्चा पालन में व्यस्त रहती थी। गरीब घर की महिलायें जरूरत पर हमारे घरों और खेतों में मेहनत मजदूरी भी कर लेती थी। मैंने पड़ोसी रामदयाल लोध को अपनी पत्नी को पीटते हुये भी बचपन में देखा था। महिलाओं की इस तरह की पिटाई को एक तरह से समाज की स्वीकृत सी मिली थी। इन सबके बावजूद मैंने गांव में कुछ मित्रों मरजानी (कृष्णा सोबती जी के उपन्यास) चरित्र की महिलायें भी देखी जिन्हे अपने शरीर पर नाज था, गांव के मनचलों को उपकृत करने में उन्हे कोई संकोच नहीं था और वह अपने इस कृत्य के लिये शर्माती भी नहीं थी वरन लगता था कि अंदर ही अंदर खुश है। ऐसा उनके चेहरे से परिलक्षित भी होता था।                                                                                                                                 …….बैसवाडे की लोक संस्कृति

मेरा गांव अब वह गांव है ही नही जिसे मैने बचपन में जिया है। वहां धूल मिट्टी, कीचड़ और गोबर की अब वह आदिम गंध भी वहां नहीं बहती है। नयी पीढ़ी ने पढ़ाई कर इधर—उधर नौकरी को तरजीह दिया, तमाम पक्के घर बन गये, सब अपनी रोज़ी रोटी में व्यस्त हो गये है। कस्बाई संस्कृति का छोटा रूप गांव में भी दिखने लगा है। गांव के गलियारे की जगह पक्की सड़क आ गयी है जिस पर मोटर साइकिलें, कारे, ट्रैक्टर दौड़ रहे हैं। सब कुछ बदल गया। धीरे-धीरे हाथी की चाल चलता चलता गांव, मेरे देखते ही देखते सरपट दौड़ने लगा और ऐसा दौड़ा कि अब अपना वह मेरे बचपन का गांव मुझे ढूंढ़े नहीं मिलता।     

मेरे एक अजीज मित्र ने एक बार पूछा था कि बैसवाडे में ही तमाम विभूतियां जैसे निराला जी, महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी, नंद दुलारे बाजपेयी जी, राम विलास शर्मा जी, शिव मंगल सिंह सुमन जी क्यो पैदा हुए तो मेरा तत्काल उत्तर था, मेरे बैसवाडे की लोक संस्कृति। मेरे गांव और जवार की लोक संस्कृति का कर्ज मेरे ऊपर भी है। ऋण अदायगी के लिये मैं खूब गांव जाता रहता हूं। आगे मैने यह तय भी किया है कि हर साल जनवरी—फरवरी अपना ज्यादातर समय गांव में ही गुजारूंगा।                                              …….बैसवाडे की लोक संस्कृति

(लेखक परिचय: बैसवाड़ा रायबरेली के गांव रणमऊ में जनवरी 1954 को पैदा हुआ। हाई स्कूल गांव के पड़ोस के कालेज से ही । वर्ष 1974 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की और उसी वर्ष पी पी एस में चयनित हुआ। IPS ( 89 ) की वरिष्ठता प्राप्त कर सात जिलों में पुलिस अधीक्षक, मेरठ , सहारनपुर और मुरादाबाद रेंज का पुलिस उप महानिरीक्षक। वर्ष 2013 में IG रेलवे इलाहाबाद के पद से रिटायर हुआ। गांव रणमऊ की कहानी की तीसरी व अंतिम कड़ी।)

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