सोन नदी के कछार पर बसा मेरा गांव खंडोल

चन्द्रबिन्द सिंह (शिक्षक ,लेखक एवं कवि)

मेरा सौभाग्य है कि मेरा जन्म एक ऐसे गांव खंडोल में हुआ जहां लगभग महिलाएं भोजपुरी बोलती हैं और लगभग पुरुष मगही। इस नाते पुरुषों द्वारा बोली जाने वाली मगही पर भोजपुरी का और स्त्रियों द्वारा बोली जाने वाली भोजपुरी पर मगही का प्रभाव देखा जा सकता है। कुछ पुराने लोगों का मानना है कि यहां की भाषा सोनतिरिया है। अर्थात उन गांवों की भाषा जो सोन नदी के तीर पर बसे हैं और भोजपुर में होते हुए भी जहां मगही बोली जाती है। हमारा गांव खंडोल  भी भोजपुर जिले में सोन नदी के पश्चिमी किनारे पर बसा है। सोन नदी पर अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कोईलवर पुल से लगभग बीस किलोमीटर दक्षिण। भौगोलिक दृष्टि से यह भोजपुर जिले में पड़ता है जिसका मुख्यालय आरा में है, पर सोन नदी को पार करते ही हम पटना जिले में पहुंच जाते हैं जहां मगही बोली जाती है। भोजपुर में दो ऐसे गांव हैं जहो भोजपुरी कम और मगही ज्यादा बोली जाती है। दोनों सोन नदी के पश्चिमी किनारे पर क्रम से बसे हुए हैं। एक हमारा गांव खंडोल और दूसरा फुलाड़ी। दोनों संदेश थाने में पड़ते हैं और संदेश विधानसभा क्षेत्र भी है।

हमारे गांव के लगभग सामने नदी के उस पार पटना जिले में दो गांव हैं- काब और निसरपुरा। दोनों सोन नदी के पूर्वी किनारे पर बसे हुए हैं। काब और निसरपुरा के लोग कहते हैं कि हमारे पूर्वज फुलाड़ी के बाशिंदे थे। इन चारों गांवों में सभी जातियों के लोग हैं परंतु सबसे बड़ी आबादी भूमिहार जाति के लोगों की है। लोगों का ऐसा मानना है कि काफी पहले भूमिहार जाति के चार भाई थे, जिनके वंशज इन गांवों में आकर बस गए थे।

इस संदर्भ में एक कहावत भी  गांव खंडोल में खूब प्रचलित है –
शीत से बसंत भयो
बसंत के सुत चार
चारों से चार-चार भयो
बढ़ने लगे अपार ||

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि गांव खंडोल में बसने वाले का नाम खडग सिंह था और फुलाड़ी में बसने वाले का नाम फूल सिंह, जिनके नाम पर इन गांवों के नाम क्रमशः खंडोल और फुलाड़ी पड़े। उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा मगही थी। परिणाम स्वरूप चारो गांवों की मातृभाषा मगही है। आज भी इन गांवों के लोग एक दूसरे को गोतिया मानते हैं। यहां तक कि लोगों की आपस में भाई-बंधी चलती है अर्थात इनके बीच का संबंध भाई जैसा है। ये लोग एक दूसरे के गांवों में शादियाँ तक नहीं करते हैं। ऐसी मान्यता सिर्फ भूमिहार जाति के लोगों में ही हैं बाकी जातियों में नहीं। इस संदर्भ में मेरे गांव की एक और खास विशेषता है, वह यह कि हमारे गांव के लोग अपनी लड़कियों की शादी सोन नदी के उस पार के गांवों में ही करते हैं । उनका मानना है कि सोन के इस पार करने से लड़कियां विधवा हो जाती हैं,परंतु आज के नये दौर और कुछ मजबूरियों के कारण इस नियम के बहुत सारे अपवाद देखने को मिल रहे हैं। तीन गांवों को मिलाकर मेरा गांव पंचायत हैं। खंडोल फुलाड़ी और सरैया। सरैया पहले खंडोल का टोला हुआ करता था पर अब गांव है। यहां सबसे बड़ी आबादी मल्लाहों की है।

मेरा जन्म 1975 में हुआ, जन्म के पहले से ही मेरे गांव खंडोल में हाई स्कूल और प्राइमरी स्कूल दोनों थे । आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिस प्राइवेट हाई स्कूल की स्थापना 1972 में की गई थी वह आज भी प्राइवेट ही है। इसकी स्थापना गांव के कुछ समृद्ध किसानों द्वारा की गई थी। विद्यालय भवन का निर्माण जिस भूमि पर किया गया है वह भूमि हमारे गांव के एक कायस्थ श्री राम लखन लाल द्वारा दान में दी गई थीं वर्तमान में विद्यालय के पास सिर्फ उतनी ही जमीन है जितने में उसका भवन और प्रांगण है। विद्यालय प्रबंधन हेतु दी गई बाकी जमीन उन किसानों के पास ही रह गई जिनकी थी। पंचायत का यह इकलौता हाई स्कूल था।

गांव खंडोल में एक बड़ा शिवालय है जो सैकड़ों वर्ष पुराना है। उसके सैकड़ों वर्ष पुराने होने का एक प्रमाण है यह भी है कि उसमें 21 महंतों की अलग-अलग पिंडियां स्थापित हैं जो संभवतः उनकी चिता -भस्म पर बनाई गई हैं। आज भी उस मठ के पास लगभग चौवन बीघे जमीन है। यह मठ तो हमारे गांव में है परंतु यह गुरु- स्थान बेलाऊर (गांव) का है। बेलाऊर वाले इस मठ के महंत को पूजते थे। लोग बताते हैं कि चालीस -पचास साल पहले तक उस गांव के लोग बैल और घोड़े पर अनाज लादकर यहां पहुंचाने आते थे। मैं बताता चलूं कि ‘बेलाऊर’ वही गांव है जहाँ के रणवीर बाबा के नाम पर रणवीर सेना का गठन हुआ था। हमारे गांव का गुरु-स्थान राजीपुर में था जो सोन नदी के उस पार पटना जिले में है।

नब्बे के दशक तक होली के दिन होली गाने की शुरुआत गांव खंडोल के शिवालय से ही होती थी। शाम होते ही गांव के बच्चे बूढ़े सब नए-नए कपड़ों में वहां एकत्रित हो जाते थे। झाल -मंजिरे के साथ पांच ताल गाने के बाद फिर गायन- टोली क्रम से गांव के अलग-अलग घरों के सामने रुकती और गाती थी। उक्त घरवाले उस होली की टोली में अपनी इच्छा अनुसार कुछ प्रसाद वितरित कर दिया करते थे। गांव काफी बड़ा है जिसके कारण यह क्रम दो से तीन दिनों तक चलता था, परंतु इसका समापन हमेशा लंगड़ा महादेव के पास ही होता। लंगड़ा महादेव हमारे गांव के एक और छोटे मंदिर का नाम है। लंगड़ा महादेव उनका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वहां एक शंकर भगवान की मूर्ति हैं जिनकी एक टांग टूटी हुई है। दुर्भाग्यवश होली उत्सव की यह परंपरा नब्बे के दशक के बाद धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। इस परंपरा के कमजोर पड़ने के पीछे कई कारण थे। एक बड़ा कारण नक्सल आंदोलन भी था।

उन दिनों भोजपुर जिले में नक्सल आंदोलन जोरों पर था। लगातार नरसंहार हो रहे थे। शुरुआती दौर में तो ऐसे नरसंहार माले समर्थित दस्ताओं द्वारा किए जा रहे थे, परंतु आगे चलकर इसकी प्रतिक्रिया में रणवीर सेना अस्तित्व में आता है। फिर दोनों तरफ से नरसंहार का दौर प्रारंभ होता है। बात-बात पर आर्थिक नाकेबंदी, फसलों को जलाने और हत्या की घटनाएं होने लगी थी। परिणाम स्वरूप खेती सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई। खलिहान सिकुड़ते चले गए, जबकि यह सच है कि इस इलाके में ज्यादातर छोटे जोत वाले ही किसान थे।

मेरे गांव खंडोल में जिस परिवार के पास सबसे ज्यादा जमीन थी वह हमारे गांव के दशकों पहले निर्वाचित मुखिया श्री अवधेश सिंह थे। उनके पास कुल साठ बीघे जमीन थी परंतु परिवार बहुत बड़ा था। आज की तारीख में उनकी जोत सिमटते-सिमटते इतनी छोटी हो गई है कि उससे परिवार का गुजर-बसर करना भी मुश्किल हो गया है। बाकी लोगों की स्थिति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। यह बात दूसरी है कि परिवार में यदि कोई नौकरी वाला हो गया है तो निश्चित रूप से उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आए हैं। जिनके घरों में कोई सरकारी नौकरी नहीं है उन्हें मजबूर होकर आज गुजरात और पंजाब या किसी अन्य राज्य में मजदूरी करने जाना पड़ता है। पते की बात यह है कि ऐसा ज्यादातर सवर्ण जातियों में ही हुआ है। बाकी जातियां वैसे ही कमा-खा रही हैं जैसे पहले। नक्सल प्रभावित होने के बाद लोगों ने रात्रि के समय गांव में निकलना भी बहुत कम कर दिया था और इसका असर होली आदि जैसे त्योहारों पर भी पड़ा।उ स जमाने में हमारे गांव में प्रत्येक वर्ष कम से कम तीन -चार नाटकों के मंचन हुआ करते थे। लोग कई-कई दिनों तक इसकी रिहर्सल किया करते थे। पर नक्सल आंदोलन से उत्पन्न डर ने इस परंपरा को भी निगल लिया। बहुत सारे लोगों ने इस डर से मुक्ति पाने के क्रम में शहरों का रुख किया और आरा एवं पटना जैसे शहरों में जाकर बस गए।


गांव खंडोल में एक पुरानी कचहरी है। लोगों का मानना है कि यह मुगल काल की है। अंग्रेजों के जमाने में यहां तहसीलदार बैठा करता था। जमीन से संबंधित कर की वसूली यहीं से की जाती थी। जमींदारी के दौर में हमारे गांव पर दो लोगों का अधिकार था। आधा गांव आरा निवासी आमिर चंद जैन के हिस्से में था और आधा गांव किसी ब्राह्मण जमींदार के हिस्से में। ब्राह्मण जमींदार का नाम लोगों को मालूम नहीं है। लोग बस इतना जानते हैं कि वह बाबाजी थे। बाबा जी शायद पटना में रहते थे। आगे चलकर बाबा जी ने बगल के ही एक गांव जिसका नाम सिरकीचक है वहां के एक मुसलमान बदरू मियां से अपनी जमींदारी बेच दी थी।
२००२ के आस पास गांव में कई परिवर्तन आए। बजबजाती नालियां लगभग पक्की हो गईं। यहाँ तक कि २०१० के बाद मेरा गांव लालटेन युग से निकलकर बिजली युग में प्रवेश कर गया। अब तो गांव की गलियां और सड़कें भी पक्की हो गईं हैं अन्यथा एक जमाना था जब हमारे गांव के बगल वाले गांव सरैया में गंदगी के कारण प्रत्येक वर्ष कॉलेरा जैसी बीमारी फैलती थी जिससे सिर्फ उस गांव में पंद्रह से बीस लोगों की मृत्यु हो जाया करती थी। विगत एक वर्ष में तो बिहार सरकार की जल –नल योजना के तहत घर-घर तक पानी आपूर्ति भी की जा रही है।

इस नयी शताब्दी में गांव ने ऐसी करवट ली कि सब कुछ बदल गया। पक्की सड़कें , पक्की गलियां , पक्की नालियां , बिजली का आना इत्यादि गांवों के लिए क्रांतिकारी बदलाव थे। अब तो घर- घर में नल-जल योजना के तहत पानी की टोंटी भी लग चुकी है। अब किसी महिला को भी शौच के लिए घर से बाहर नहीं निकलना पड़ता है। घर -घर में शौचालय का निर्माण किया जा चुका है। परंतु दुर्भाग्य यह कि इस विकास के साथ -साथ गांव ने बहुत कुछ खोया भी है। एक समय था जब गांव खंडोल के चारों तरफ दूर दूर तक बगीचे थे। थोड़ी सी दूरी से भी गांव दिखाई नहीं देता था। अब बगीचे की बात तो दूर शायद ही कोई पुराना पेड़ बचा है। जिस गांव को बगीचे चारों ओर से ढके हुए थे , आज वह गांव नंगा खड़ा है। उसे आप अब दो किलोमीटर दूर से भी देख सकते हैं। उस इलाके में आहर, नहर,तालाब के साथ साथ कुंए की समृद्ध परंपरा थी। आज की अंधी दौड़ में यह परंपरा भी विकास की भेंट चढ़ गई। परिणामस्वरूप भूजल काफी तेजी के साथ नीचे खिसकता जा रहा है। वर्षों पहले सोन नदी से बालू की निकासी सिर्फ कोइलवर पुल के पास से होती थी जबकि आज शायद ही कोई जगह बची है जहां से बालू की निकासी न होती हो। नदी का इस तरह यह निर्मम दोहन पूरे इलाके को एक ढूह में बदलता जा रहा है। अगर जल्दी ही इस पर विचार नहीं किया गया तो धान का कटोरा कहे जाने वाले इस इलाके को राजस्थान का मरुस्थल बनते देर नहीं लगेगी।

प्रेमचंद का गांव….”लमही” ढूंढ़े नहीं मिलते होरी.. धनिया.. घिसू और माधव

 

 

 

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