
गांव “इनारबरवां” से बाबा जी की चिट्ठी आई थी। मां चिट्ठी पढ़ कर मुझे देती हुई बोली, बाबा जी तुम्हारे बारे में पुछ रहे हैं। लो पढ़ कर तुम भी जबाब लिख देना। जब मैं उन्हें चिट्ठी भेजूंगी तो साथ में तुम्हारी चिटठी भी पत्र रख दूंगी। मैं खुश हो गई और झट चिट्ठी पढ़ना शुरू किया-बड़की दुल्हिन के साथ शुरू हुआ पत्र, आशीर्वाद और कुशल क्षेम से आगे बढ़ता गया। मेरी इसमें ज्यादा रुचि ना थी। मेरी नजरें तो अपना नाम ढूंढ रही थी।
ये बाबा जी भी ना, अलग से मुझे चिट्ठी ना लिख सकते थे, झल्लाती हुई मेरी नजरें एक लाइन तक पहुंची- “दुल्हिन देखअ का हो ता, ये महीना में फेर से सीलिंग के केस ला पटना जाएके बा।” मैं चकित कि मेरे घर वाले केस लड़ रहे हैं? क्या किया है बाबा जी ने? अब तक कुछ फिल्मों के माध्यम से मैं यह जान गई थी कि केस कोई बुरा काम करने पर ही होता है। मैं परेशान। अब चिट्ठी आगे पढ़ने में रुचि कहां रही? डरी हुई मैं मां को ढूंढने लगी, पर मां तो लंच के बाद ऑफिस जा चुकी थी।
मां का ऑफिस कालोनी में ही एक तरफ था। मैं वहां पहुंच गई। लंच के लिए बाकी स्टॉफ भी इधर-उधर ही थे। मैंने मां से पूछा,”मां बाबा जी पर केस हो गया है,अब क्या होगा?” मां मुस्कुराते हुए मुझे बोली, घबड़ाने की कोई बात नहीं। ये तो जमीन का केस है। कुछ नहीं होगा बाबा जी को। तुम जाओ घर और अपना जबाब लिख कर रखना। कुछ महीनों बाद जब बाबा जी आए तो उनसे मैंने केस के बारे में पूछा। उस वक्त मैं छठी क्लास में थी तो बाबा जी ने मेरे समझने जितना ही मुझे बताया। साथ ही इस किस्से में बाबा जी ने विनोबा भावे का भी जिक्र किया। विनोबा भावे जिन्होंने भूदान आंदोलन चलाया था और इसमें वे सफल भी हुए। भूमि मांगने वे मेरे गाँव भी पहुंचे और मेरे पूर्वजों ने स्वेच्छा से भूमिदान भी किया।
नियति ने मेरी मां को पिता और मां दोनो के रोल के लिए चुना। तीस-बत्तीस की उम्र, माता-पिता, सास-ससुर और पति के प्यार में झूलने वाली लड़की कब पति के गुजरते हीं दो बच्चों के साथ इतनी निडर बन गई कि दुनिया उसकी दुश्मन बन गई।
तब बड़े घर की लड़कियां नौकरी नही करती। समाज क्या कहेगा?
नौकरी की जगह भी ऐसी की आफिस में अकेली महिला। शिव भक्त पर सांपों से डरने वाली मेरी मां कब समाज के सांपों को इग्नोर करना सीख गई ये याद नही। तमाम ऊंच-नीच और फिर भी हिम्मत के साथ दो बच्चों को पालती मां कब समय से पहले बूढ़ी बनती जा रही है इसका भी पता तब नही चला।
समय का चक्र बदलता है और वही बड़ा समाज, परिवार उसे स्वीकार कर लेता है। घर में अब बड़की दुल्हिन लगभग बड़े बेटे की जगह ले चुकी है।
याद है मुझे जब मैं मुहल्ले के दूसरे बच्चे को देख खूब रोई थी कंधे पर सवारी करने को। मां से पूछने लगी कि मेरे पापा कहाँ है? मुझे भी कंधे पर घूमना है।
सुनकर वो शायद अंदर से टूट गई हो पर हिम्मत नही हारी।
बेटी का रोना-पीटना देख शर्मा आंटी उससे कहती हैं, ”बड़ा ज़िद्दी बाड़ी लभली”
पर मेरी मां छः मीटर की साड़ी में लिपटी, दुबली-पतली काया की मालकिन मुस्कुराते हुए कहती है,”आओ हम घुमा दे अपनी बेटी को”
मां बेटी को दुलारते हुए कोशिश करती है कंधे पर बिठाने की कि, पर बेटी पापा की ज़िद किए हुए है।
इसी बीच कोई साधू बाबा मुहल्ले में दक्षिणा लेने आते है। माँ-बेटी को देखते है और कहते हैं, “ मईया कुछ आटा- चावल बाबा के लिए ला दो, भगवान भला करेगा।”
माँ घर में जाती है और एक डिब्बा चावल लाकर साधू बाबा को दे देती है। झोली में चावल रखने के बाद साधू बाबा कहते हैं, ”लाओ मईया हम तुम्हारी बेटी को घुमा देते हैं।”
मां कुछ नही कहती बस मुस्कुराते हुए देख रही है अपनी बेटी को साधू के कंधे पर सवार। बेटी की हँसी माँ के मुँह पर खिल रही है। वो शर्मा आंटी से कहती है, ”मेरी ज़िंदगी में भगवान है शरमाईन, वो ना मेरा और ना मेरे बच्चों का मनोबल कभी नही टूटने देंगे।”
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मेरा गांव “इनारबरवां”
मेरा गांव “इनारबरवां” पश्चिमी चंपारण का एक ऐसा गांव जो बाढ़-पानी की तमाम विपदाओं के बाद भी अडिग रहा। एक तरफ मसान नदी की बाढ़ तो दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं का अकाल, यही थी यहां के लोगों की नियति। उसपर डाकुओं का कहर इस गांव के लिए अभिशाप था या वरदान यह समझने में मैं हमेशा भ्रमित रही। दीये-लालटेन की रोशनी में टिमटिमाते गांव इनारबरवा के लोग अपने साहस से रौशन थे। एकता में बल वाली कहावत पूरी तरह से सार्थक करते थे लोग। पर गांव से बाहर निकलना शाम के पांच-छह बजे से ही बंद हो जाता। इसके कई कारण थे। पहला तो मेरे गांव में कोई सड़क नहीं थी। दूसरा, मसान नदी पर कोई पुल नहीं होने की वजह से नदी पैदल अंदाज लगा-लगा कर पार करना होता। हम बच्चों को तो बड़ा मजा आता इसमें, पर मां हर बार भुनभुनाती, मुंह मारो ई गांव के या फिर बाबू जी के मती मारी गई थी जो इस गांव में मेरा ब्याह किया आदि-आदि। तीसरा, सड़क और नदी की वजह से कोई सवारी नहीं होती तो पैदल यात्रा ही एक साधन होता। बैलगाड़ी जरूर थी पर इसकी संख्या बहुत कम थी, हर बार उपलब्ध नहीं हो पाती।
बस या कोई सवारी पकड़ने के लिए हमलोग लगभग छह-सात किलोमीटर दूर पैदल जाते। ऐसे में मां की हालत खराब होती। कई बार उनके पैर सूज जाते। गुस्से में भनभनाती हुई घूंघट ठीक करतीं और कहती, अब इस गांव में फिर कदम नहीं रखूंगी। फिर भी हम हर बार छठ पूजा में गांव पहुंच जाते। सबसे मजेदार बात तो यह होती कि अगर किसी की शादी के समय नदी में पानी भरा होता तो दूल्हा अपने कपड़े उतार कर इस पार आता या फिर कोई उसे अपने कंधे पर बिठा कर नदी पार कराता। जिस किसी ने भी कंधे पर बिठा कर किसी को नदी पार कराई हो, वह हमेशा कहता रहता कि अगर हम ना होते तो ब्याह ना होता, हम ना होते तो फलां मर गए होते वाले किस्से चलते रहते। चौथा कारण, मेरा गांव में गन्ने की खेती का होना। मेरे गांव की प्रमुख फसल गन्ना और धान हैं। अब ईख के घने-बड़े पौधों के बीच डाकुओं का अड्डा बन जाता। वे इसी ताक में रहते कि गोधूलि में कोई इधर से गुजरे। ऐसे में अगर गांव के किसी व्यक्ति को जाना भी होता तो खेतों में दो-चार लोग को साथ लेकर जातें। उनके साथ बंदूक भी जाता, फिर भी कुछ दुखद घटनाएं हो चुकी हैं गांव में। कम यात्राओं का पांचवां और आखिरी कारण यह था कि तब इच्छाओं की इतनी लम्बी कतार नहीं थी। लोगों को जिस चीज की जरूरत होती थीं, वे जैसे-तैसे गांव में ही पूरी हो जाती थी।
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गांव ने जितना दिया..उसकी तुलना में गांव के लिए कहां कुछ कर पाई
गांधी जी के विचारों का असर था या फिर साधन कम होने से लोग कम या ज्यादा संतुष्ट रहते थे। गांव “इनारबरवां” में ही अनाज के बदले क्रय-विक्रय हो जाता। मेरे होश तक गांव में एक दुकान खुल गई थी जिसमें जरूरत के सभी समान मिल जाया करते थे। कपड़े, गहने, सीमेंट, खाद-बीज आदि के लिए रामनगर जाना पड़ता। गांधी जी के विचारों का असर ना भी हो तो बेरोजगारी, कम आमदनी और परिवहन सुविधा के कारण भी लोगों ने अपनी आवश्यकताएं सीमित कर ली थी। मेरे चाचा जी के अनुसार मूल समस्या यातायात ही रही। इसकी वजह से कई लोग आठवीं बाद पढ़ नहीं पाए, रोजगार के लिए बाहर नहीं जा पाए। कई बीमार लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल सका। शादी-विवाह आदि में भी समस्या रही। वैसे उनके अनुसार ये समस्याएं 1985 से 1998-99 के बीच कुछ ज्यादा रही। इससे पहले मेरे घर पर कुछ सौ गायें, कई जोड़े बैल, कई घोड़ों के साथ एक मोर आदि थे। ऐसे में मेरे बाबा और चाचा आगे की पढ़ाई के लिए घोड़े से जाया करते। बाद में बेतिया रहने लगे। घर की महिलाएं भी कभी पैदल यात्रा नहीं करती ,बैलगाड़ी की सवारी तो थी ही। बाद में बढ़ते परिवार, परिवार का विभाजन और गांव से बाहर रोजगार और बसने के चलन में सब कुछ धीरे-धीरे खत्म होता गया।
अब मैं अगर नए भारत में अपने गांव के विकास की बात करूं तो जहां तक मुझे याद है 2001-02 में मेरे गांव “इनारबरवां” में बिजली आ गई थी। यह बात अलग थी कि बिजली रहती नहीं थी और हर घर से जुड़ी नहीं थी। मेरे गांव के आगे बहती “मसान” और पीछे हमसब की दुनियां। मेरी मां , मेरे परिवार के लोग, मेरा गांव हर साल बाढ़ की इस त्रासदी को झेलता है। यह भी कहा जा सकता है कि मेरा गांव तो बरसों से बाढ़ सहने मे अब निपुण हो गया है। उसे बहुत ज़्यादा जान की चिंता नही होती। हां, फसलों के जाने का दुःख सबसे ज्यादा होता है। अगर बाढ़ से बच गए तो साल भर परिवार का पेट कैसे भरेगा ये चिंता ज़रूर होती है। हालांकि गाँव-देहात की यहीं तो खूबसूरती है कि यहा भूखे कोई नही मरता…..दया रूपी दी हुई बाढ़ पीड़ित राशि से कुछ नही होता। गांव के लोग उससे मोबाईल फोन और रंगीन टीवी खरीद लेते है। देश के अन्य गांवों की तरह ही हमारे गांव में भी इधर कुछ वर्षों से बाढ़ में हुए नुकसान का मुआवजा मिलने लगा है जिससे लोग टीवी और फोन लेने लगे हैं।
बरसों बाद ही सही, सरकार का ध्यान इस गांव पर गया और गांव की सबसे बड़ी जरूरत “पुल” का निर्माण करीब नौ करोड़ रुपए की लागत से हुआ। पर वह सरकारी घोटाला और मिलावटी तंत्र के हत्थे चढ़ गया। पुल करीब सात-आठ साल पहले ही बना, आज दम तोड़ रहा है। पुल टूटने के कगार पर है, पर सरकारी तंत्र का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा। ग्रामीणों के दबाव में एक-आध छोटी बैठकें हुई, वे नाकामयाब रहीं। भगवान का नाम लेकर लोग पुल से गुजर रहे हैं और हमारी सरकार इंतजार कर रही है किसी भीषण हादसे की।
गरीबी रेखा से नीचे जिन लोगों को दो रुपए किलो चावल मिल रहा है, वे उसे गांव के बनिया से दस रुपए किलो पर बेच दे रहे हैं। आज भी मेरे गांव में करीब 30-40 प्रतिशत खरीद-फरोख्त अनाज से ही होता है। कई-कई गाय-भैंस वाले गांव में अब गाय के दूध के लिए मिन्नते करनी पड़ती है। दो-चार गाय वाले भी क्या करें, किसे दूध दे किसे ना दे।
सड़क और पुल हो जाने से गांव में कई मोटरसाइकिल हो गए हैं। एक आध झाझा (डीजल पम्प से चलने वाली गाड़ी) के साथ दो टेम्पू भी चलने लगे हैं। टमटम पहले भी थे आज भी कुछ हैं पर वे अब गांव “इनारबरवां” तक छोड़ देते हैं। पहले की तरह नदी पार नहीं उतारते। एक दो लोगों ने गाड़ी भी रख ली है तो अब सवारी की पहले जितनी दिक्कत नहीं। एक बस भी चलती है सुबह छह बजे पटना के लिए। पहले की तुलना में अब गांव में पक्के घरों की संख्या बढ़ी है। इसमें कुछ सहयोग तो सरकार का है, कुछ पलायन का। गांव के जवान दिल्ली-पंजाब हरियाणा जाने लगे हैं। कुछ तो चेन्नई तक पहुंच गए है। जब वे गांव आते हैं तो उन्हें देख कर अच्छा लगता है। पंद्रह से बीस-बाइस के बीच के ये नौजवान जब हाथ में मोबाइल और कमर से नीचे खिसकती जीन्स पहन कर गांव में घूमते हैं तो उनके मां-बाप भड़क उठते हैं। वे यहां कुछ दिनों की छुट्टी मनाने आतें हैं, पर मां-बाप की इच्छा होती है कि वे जब तक हैं, उनके साथ खेतों में हाथ बंटाएं। पर अब इनसे यह कहां होता, तो गाली खाते हैं।
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गांव की यात्रा में निर्मला से मुलाकात
पिछली बार जब गांव “इनारबरवां” जाना हुआ तो ठंढ़ का मौसम था। फरवरी की ठंढ और मसान किनारे बसा मेरा गांव। आधे दिन कुहा-और हल्की धूप से आंख मिचौली खेलते बीत जाता। हमलोग रजाई में दुबके खिड़की के पीछे से बाहर की दुनिया चलते देखते।
मेरे घर के सामने कुम्हार लोगों का घर है। उनकी पांच-छह पट्टी में कुल मिला कर करीब चालीस-पचास लोग होंगे। एक को छोड़ कर बाकी के घर फूस के ही है। दुआर के नाम पर ईटाकरन वाली सड़क है उनके पास। उसी के किनारे उनका जर-जलावन, भूसा-पतहर, बकरी-गाय सब डेरा जमाए रहते। कई बार तो धीरे-धीरे गोईठा-गोबर-पतवार और जानवर खसकते-खिसकते सड़क पर आ बैठते। सड़क रूपी दुआर के एक कोने पर दिन भर घूर (आग) लगा रहता।
सुबह-सुबह एक खेप घूर ताप कर खेत की ओर निकल चुका होता। दूसरी खेप महिलाओं और बच्चों की होती जो दिन भर वहीं आते-जाते डेरा जमाए रहते। इनके बच्चों की शोर से जब हम लोग अपनी आदत के मुताबिक 9 बजे तक भुनभुनाते हुए जगते, तब तक इनका एक बार दाल-भात से नाश्ता हो गया रहता। महिलाएं घर-बाहर, चूल्हा-चौका कर के निश्चिंत हो गई रहती। अपने देश में रह रहे उनके घर के कुछ पुरुष गाय- भैंस, चोकर -लादी-गोबर आदी का काम निबटा कर किसी दूसरे काम में लग गए होते।
इन्हीं घरों में सबसे किनारे वाला घर निर्मला का है। टाटी-फूस का बना घर, चिकटी मिट्टी से पोता हुआ बड़ा सुंदर लगता। उसके ऊपर शायद निर्मला ने ही लाल रंग से कुछ फूल-पत्तियां बनाई होगी जिनका रंग अब समय की मार से फीका पड़ चुका है। सारे कुम्हार पट्टी में एक निर्मला को ही थोड़े दुआर की जगह हैं जिसे वो बहुत साफ-सफाई से रखती है।
दुआर के कोने में एक नाद गाड़ा हुआ, जिसे वो दुआर बुहारने के बाद साफ करती। उसमें घास-भूसा मिला कर बछड़ा को वहां बांध आती।
मवेशी के नाम पर निर्मला के यहां एक बछड़ा और कुछ बकरियां है। नाद के किनारे बंधा बछड़ा जब घास खाने में आना-कानी करता तो निर्मला थोड़ा और भूसा ला कर उसमें मिलती और बछड़े को कहती,” हेन… खाली भूसे खईबू ?
कहाँ से आई एतना?”
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मुझे उसकी बात पर हंसी आ जाती और खिड़की के पीछे से उसे टोकती,” का हो निर्मला, काहे भोरे-भोरे बछड़ा के डांटतारु ?”
हंस कर उसने कहा, ”दीदी अभी भोरे बा? जा के टाईम देखी टाईम, नव-दस से कम ना बजत होई।”
देह-धुआ से ठीक-ठाक निर्मला पर रानी रंग का सलवार-क़मीज़ बड़ा सुंदर लगता। गहरी सांवली काया पर सफ़ेद मोतियों से दांत झक से लगते। तेल लगे बालों में टेढ़ी मांग निकाल कर बनाई उसकी चोटी कई बार मोड़-मोड़ कर रबड़ लगाई होती। उसे देख कर लगता कि बाल हमेशा बनाई हुई है। एक लट भी इधर-उधर नही। उसके कानों के पीतल के छोटे-छोटे फूल उसके मुख की चमक को दुगना कर देती।
मेरे बेटे को देखते ही कहती, ”ये बाबू… ये बाबू कहां रहल हो ?
आवअ बकरी देखाई … चल घुमा लाई…” और मेरा बेटा उसे देख कर इतना खुश होता जैसे कोई स्वप्न परी उसके सामने हो। मेरा बेटा सत्यार्थ उर्फ़ मीर मस्ताना निर्मला को देख कर खूब खुश हो जाता। मस्ताना की तरह उसकी बातों पर हँसता-ताली बजाता।
मेरी माँ मेरे बेटे की खुशी देख कर कहती , ” निर्मला बबी हमरा नाती पर जादू कर देले बाड़ी।”
इतना सुनते हीं निर्मला हेसने लगती। मेरे बेटे को और प्यार करने लगती और कहती , ”हो… ई त हमारा बकरी के फेर में बाड़न खाली, का हो बाबू ऊहा बकरी ना मिले?”
बातचीत के बीच में माँ ने कहा, “अगले साल से तो निर्मला यहां नही होगी तब मेरा नाती किससे खेलेगा इतना?
इतना सुनते ही निर्मला शर्मीली हंसी के साथ कहती है, ”चाची जी, ना नू रहेम नू दू साल ईहा… ब्याह के बाद दोंगा होई हमार।”
निर्मला की शादी तय हो गई थी। ये कोई प्रेमचंद की निर्मला नही जो दहेज के कारण किसी अधेड़-दोहाये से ब्याही जा रही हो। एक शाम निर्मला ने मुझे अपने होने वाले पति की तस्वीर दिखाई थी। चेहरे पर झिझक की हल्की छाप लिए नीली टी-शर्ट में एक बीस-पचीस साल का लड़का है। देखने में गोरा-चिट्टा, सुंदर नैन-नक्श, मैट्रिक पास किया हुआ। लड़का चंडीगढ़ किसी धागा की कंपनी में काम करता है। निर्मला को इससे ज़्यादा की चाह ना थी और वो बहुत खुश थी।
मैं बहुत खुश थी इस निर्मला को देख कर जो अपने जीवन साथी की तस्वीर देख-देख कर लाल हुए जा रही थी। हल्की-हल्की जीवन भरी मुस्कान उसके चेहरे पर खेल रही थी…
तुम सदा सुखी -सौभाग्यवती रहो निर्मला।
धीमी रफ्तार से बदल रहा है मेरा गांव
मेरे गांव में निश्चित तौर पर बदलाव हुआ है पर उम्मीद से थोड़ी कम। इस बदलाव ने बहुत कुछ बदल दिया है। अब लोगों का मेलजोल कम हुआ है। गांव में मजदूर मिलना कठिन हो गया है। महिलाएं अब पहले की तरह एक साथ बैठ कर सिलाई-बुनाई के साथ गीतों का आदान-प्रदान नहीं करती। अब तो उनके पास सीरियल की सास-बहू और उसके चौथे-पांचवें पति के मरने का रोना है। अब मेरे गांव में कोई सामूहिक नाटक नहीं होता जो कभी छठ पूजा के अगले दिन हुआ करता था। इसी नाटक में पहली बार मैंने भारत माता की छवि अपनी फुआ में देखी थी। ‘नमक का दारोगा’ मैंने पहली बार तब मंच पर देखा था जब मेरे घर नमक की बोरी आया करती थी। अब सब कुछ नमक के बाजारीकरण जैसे शुद्ध होने की चाह में छोटे पैकेट में बंद हो गया है।
इंडियापोलिस, अमेरिका। इनारबरवां, पश्चिम चंपारण। बसंतपुर, सीवान में गांधी पुस्तकालय का संचालन, लेखिका। मनलहरी प्रकाशित।






















