पैतृक गाँव चमथा के लिए अपनी जवाबदारी

अंजनी कुमार सिंह, सेवानिवृत्त आईएएस पूर्व मुख्य सचिव, बिहार

र व्यक्ति की एक कहानी होती है। उस कहानी में एक घर और गाँव होता है। मेरे पैतृक गाँव का नाम है चमथा। धार्मिक किंवदंतियों के अनुसार त्रेता युग में मिथिला के राजा महाधिराज राजा जनक यहाँ गंगा स्नान करने के लिए आते थे। यहीं से गंगाजल राज दरबार में जाता था। उसी से जानकी अर्थात माता सीता भगवान परशुराम द्वारा प्रदत्त शिव के धनुष को और जहाँ शिव का धनुष रखा हुआ था उस स्थान को गंगा जल से साफ करती थी। चमथा के पवित्र गंगा घाट को राजा जनक घाट के रूप में भी जाना जाता है।
अंग, मिथिला और मगध– इन तीन प्राचीन प्रदेशों का संगम स्थल है चमथा। ऐसी मान्यता भी है कि द्वापर युग में अंगराज कर्ण इसी मार्ग से हस्तिनापुर जाते थे।

विद्यापति धाम मंदिर परिसर

मेरे गाँव के बगल में सबसे प्रसिद्ध स्थान है विद्यापति नगर। यहाँ पर भगवान शंकर का एक बहुत बड़ा मंदिर है।
“बर सुख पावल तुअ तीरे
छोड़इत निकट नयन बह नीरे
कर जोरी विनय करहूं विमल तरंगे
पुनः दर्शन देहु पुनमती गंगे।”
किंवदंति है कि महाकवि विद्यापति जब वृद्ध हो गये तो उनकी इच्छा हुई कि वे गंगा में ही शरीर त्याग करें। तब महाकवि ने अपने पारिवारिक जनों से ये आग्रह किया कि वे उन्हें चमथा ले चलें। पारिवार के सदस्यों ने महाकवि के आग्रह को देखते हुए उन्हें गाजे-बाजे के साथ लेकर चमथा के लिए विसपी से चले। तत्कालीन मऊ बाजिदपुर, वर्तमान में विद्यापति धाम आए तो अपने परिवार के लोगों से बोले कि राहगीरों से पूछो कि यहाँ से गंगा घाट की दूरी क्या है। उन्हें पता चला कि दूरी ढाई कोस है।

विद्यापति धाम का उगन महादेव का शिवलिंग

उन्होंने कहा कि हम इतनी दूर से आए हैं और माँ गंगे अब क्या इतनी दूर नहीं आयेंगी? बताया जाता है कि महाकवि विद्यापति जी ने माँ गंगा की स्तुति की। उन्हें लगा कि वह अपना शरीर त्याग करने के लिए इतने दूर से विद्यापति नगर आये हैं, तो क्या गंगा मईया उनकी इच्छापूर्ति के कुछ दूर नहीं आ सकतीं?
कहा जाता है कि महाकवि की भाव विह्वलता को देखते हुए माँ गंगा प्रकट हुईं और महाकवि से बोलीं, बोलो क्या मांगते हो। महाकवि ने कहा– हे माँ, अंत समय जब मैं आपको स्मरण करूँ तो आप मुझे एकबार दर्शन दे दें।

ऐसी मान्यता है कि गंगा रातोंरात कलकल करती हुई चमथा से रौता होते हुए मऊ बाजिदपुर आयीं और महाकवि को सदेह लेकर वापस चली गयीं। महाकवि ने वहाँ अपना शरीर त्याग किया। महाकवि विद्यापति ने अपनी अनमोल कीर्ति की रचना यहीं गंगा के चमथा घाट पर की थी। यह भी कहा जाता है कि महाकवि जब भी गंगा स्नान के लिए आते थे तो पहले मां गंगा को प्रणाम कर लेते थे तब स्नान करने के लिए गंगा के पवित्र जल में प्रवेश करते थे। एक दिन प्रणाम करना भूल गये और गंगा स्नान कर लिए। गंगा स्नान करने के बाद महाकवि को अपनी गलती का एहसास हुआ और वे रोने लगे उसी क्रम में महाकवि ने जो रचा उसे गंगा स्तुति के नाम से जाना जाता है।

 

विद्यापति धाम मंदिर का मुख्य द्वार

महाकवि विद्यापति के बारे में एक और प्रसिद्ध कथा है कि विद्यापति के साथ उगना नाम का एक सेवक रहता था। एक बार उन्हें जोरों की प्यास लगी और उस समय उगना वहाँ नहीं था। विद्यापति उद्विग्न होकर उसे खोजने लगे। कहा जाता है कि जब उगना के वियोग में महाकवि पागल हो गये। हर हमेशा ‘उगना रे मोड़ कतय गेलअ’ का वियोग-गीत गाने लगे। महाकवि का शरीर धीरे-धीरे निष्क्रिय होने लगा। तब उगना ने आकर उन्हें जल ग्रहण कराया, जो वास्तव में गंगाजल था। उसके बाद उगना वहीं से अदृश्य हो गया। बताते हैं कि उगना और कोई नहीं भगवान शंकर ही थे, जो महाकवि विद्यापति के ध्यान और प्रेम को देखकर उनके सेवक के रूप में काम कर रहे थे।

आज भी कार्तिक पूर्णमास का मासिक मेला कल्पवास के रूप में चमथा में लगता है, जहाँ बिहार के कोने-कोने से श्रद्धालु आकर गंगा-सेवन करते हैं। सावन पूर्णमास, महाशिवरात्रि, अक्षर नवमी, चैत वारनी आदि अवसरों पर लोग गंगा स्नान करने के लिए चमथा घाट आते हैं और विद्यापति धाम, थनेश्वर धाम आदि स्थानों पर गंगा जल ले जाकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं। गंगा नदी के कटाव के कारण आज गंगा की मुख्य धारा की दूरी अधिक हो गयी है। जहाँ आवागमन की अच्छी सुविधा नहीं है। इस कारण पहले जैसे श्रद्धालुओं की यहाँ भीड़ नहीं जुटती है।

गाँव की भौगोलिक स्थिति की बात की जाये तो चमथा गंगा और उसकी सहायक बाया नदी के मध्य बसा हुआ है। यह दक्षिण से गंगा और उत्तर से बाया नदी से घिरा है। यह चार जिलों के तीन लोकसभा और तीन विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। वर्तमान समय में चमथा में बेगूसराय जिले की तीन पंचायत—चमथा-1, चमथा-2, चमथा-3, समस्तीपुर जिले की बाजिदपुर पंचायत का तीन गाँव और पटना जिले के पंडारक थाना क्षेत्र का एक गाँव पड़ता है। इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इस गाँव को चार जिले—पटना, समस्तीपुर, बेगूसराय और वैशाली छूते हैं इस प्रकार बिहार के चार जिलों का संगम है मेरा गाँव। कुल आबादी लगभग 90 हजार है। कहा जाता है कि बोली और भाषा ढाई कोस पर बदलती है। सो यहाँ की बोली भी अलग-अलग है। दक्षिण भाग में मगही से मिलती-जुलती बोली है तो उत्तरी भाग में बज्जिका और अंगिका की मिश्रित बोली इस्तेमाल होती है।

अंजनी कुमार सिंह का पैतृक घर

गाँव में मेरा घर बेगूसराय जिला के बछवाड़ा थाना में पड़ता है। चार जिलों का माथा यानी ‘सिर’ होने के कारण इसका मूल नाम ‘चौमथ’ अथवा ‘चौमाथा’ रहा होगा। शब्द कालांतर में घिसते हैं और रूपांतरित होते हैं। चौमथ भी घिसकर बाद में चमथा हो गया होगा। चमथा चौमठ का ही अपभ्रंश नाम माना जाता है। किवदंती है कि यहां के गंगा घाट पर ऋषि यों ने एक यज्ञ किया जिसमें चार मठ बनाए जिससे इस गांव का चौमठ नाम पड़ा। जिसे कालांतर में चमथा कहते हैं।

इस गाँव के गंगा किनारे की जमीन हर साल कट जाती है और कुछ भाग तो गंगा के दक्षिण निकलता है। इसलिए कुछ जमीन पटना जिले में आती है। जमीन के इस तरह से कट जाने और दूसरी तरफ निकलने की क्रिया को गंग-शिकस्त और गंग-बरार कहते हैं।

हमारे घर के आगे बाया नदी बहती है। उस नदी पर एक पुल है। उस पुल की भी एक कहानी है। बगल के जिले में नरहन नाम की जगह है। नरहन की रानी लक्ष्मी कुँवरी हर साल चमथा घाट पर कार्तिक स्नान के लिए आती थीं। उन्हें हर बार नाव से बाया नदी पार करना पड़ता था। रानी को काफी असुविधा होती थी। एक बार वह गंगा स्नान करने के लिए आयीं तो मल्लाह ने पार उतारने में विलंब कर दिया। रानी वापस लौट गयीं और बोलीं जबतक पुल नहीं बना देंगे तबतक पार नहीं करेंगे। इस असुविधा को दूर करने और लोगों के आवागमन को सुगम बनाने के लिए रानी ने बाया नदी पर सन् 1913 में पुल का निर्माण कराया। इस पुल का नाम ही भरनेड़ पुल है। जिसके टूट जाने के कारण नया पुल बना। चमथा के नये पुल का निर्माण हो या चमथा में विद्युत विभाग का ग्रिड और पावर हाऊस का निर्माण, इन सबके निर्माण में एक अधिकारी के रूप में और विशेष रूप से ग्रामीण के रूप में हमारा योगदान रहा है।

खेतिहरों का गाँव है चमथा
मेरे गाँव के अधिकांश लोग किसान हैं। यहाँ गेहूँ, मक्का, तंबाकू, मिर्च, गन्ना एवं सब्जी की अच्छी खेती होती है। पहले यहाँ गन्ना, चना, दलहन, चीना ,मरुआ, सामा, लाल मिर्च, तीसी, अरंडी आदि परम्परागत फसल भी होती थी। जो धीरे-धीरे समाप्त हो गयी। विकास के बढ़ते कदम ने यहाँ के किसानों को नकदी फसल की खेती के लिए भी प्रेरित किया। यही कारण है कि अब यहाँ के किसान हरी मिर्च, जिसे लोंगिया मिर्च कहते हैं, की खेती बढ़-चढ़कर करने लगे हैं। आलू, हरा मटर, बैगन, गोभी आदि सब्जी की खेती भी अब होने लगी है। गेहूँ, मक्का की खेती तो होती ही है। खेती को रोजगार के रूप में अपनाकर आज कई परिवार इससे अपनी जीविका चला रहे हैं।

गाँव में यादवों और राजपूतों की संख्या बड़ी है। खेती और पशुपालन का कार्य बड़े रूप में होता है। गाँव का दूध बिकने के लिए बाहर जाता है। दो नदियों के बीच बसे होने के कारण यहाँ मछली पकड़ने का काम भी बड़े पैमाने पर होता है। बाढ़ में खेती की जमीन डूब जाती थी और गरीबों के घर भी। कुछ लोग नदी पाट में ही बस गये थे। उन्हें तो और भी दिक्कतें थीं। लोग बाढ़ के दो महीने के लिए अनाज, जलावन आदि की व्यवस्था कर लेते, ताकि बाढ़ के समय दिक्कत न हो। सब्जियों को भी सुखाकर रख लिया जाता। आम का अमावट बना लिया जाता।

पैतृक गाँव चमथा  की अधिकांश जमीन राजपूतों के पास थी। उनमें से कई काफी धनी थे। धीरे-धीरे गलत आदतों के कारण और कम उद्यमी होने के कारण राजपूतों की काफी जमीन बिक गयी, जिसे यादवों और सब्जी पैदा करने वाले विंद लोगों ने खरीदा। बचपन में मैंने देखा है कि बड़े किसान अपने खेतों में काम करने के लिए मजदूरों के परिवारों को जमीन देकर बसा लिये। एक बार जब जमीन पर बस गये तो काम कराने का पहला अधिकार उस किसान का होता था, जिन्होंने उन्हें बसाया है। काम करने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी कारण से कर्ज के जाल में फँस जाते। उन्हें बेटी की शादी, बीमारी आदि के लिए कर्ज लेना पड़ता था। सूद काफी ज्यादा होता था। इस लेन-देन का हिसाब के लिए लंबी लाल कपड़े की कवर बही ‘पुस्तिका’ होती, जिसमें मूल और सूद का हिसाब रखा जाता। एक बार जिस व्यक्ति का नाम उस बही में आ जाता, वह शायद ही अपने जीवन भर में बही से निकल पाता।। भूस्वामी और मजदूरों का संबंध बड़ा विचित्र था। एक तरफ यह गारंटी थी कि मजदूरों का कोई जरूरी काम रूकेगा नहीं, लेकिन दूसरी तरफ सच्चाई थी कि इसके लिए उन्हें जमीन मालिक के संग पूरी जिंदगी गुजारनी पड़ती थी।

चमथा का एक पुराना दरवाजा

बाढ़ के समय जब पूरा गाँव पानी से घिर जाता तो शौच आदि के लिए प्रत्येक परिवार में एक या दो नाव होती थी। मुझे पानी, नदी, मछली और प्राकृतिक चीजों से बहुत प्रेम था। हमारे पास अपनी अलग नाव थी, जिसे लेकर मैं खेतों की रखवाली भी करता था। गाँव में झिंझरी की प्रथा थी। इस प्रथा में परिवार के सदस्य भोजन आदि बनाकर नाव पर नदियों में घूमा करते। औरतें गीत गातीं और फिर भोजन होता। चाँदनी रात में नौका विहार का आनंद अद्भुत था। रात की नीरवता, चाँद की शीतलता, महिलाओं का समवेत स्वर में गीत गाना, बहती ताजी हवा और नाव के नीचे सरसराता नदी का पानी-सब मिलकर हमारे बाल मन को एक अलौकिक दुनिया में ले जाते।

पैतृक गाँव चमथा  के लोग बाढ़ से सामंजस्य बनाकर उसमें रहना सीख गये थे। अपने घरों की सुरक्षा के लिए चारों तरफ केले के तनों को काटकर एक घेरा बना दिया जाता, ताकि पानी की लहरें घर की दीवारों पर कम प्रभाव डाल सकें। कुएँ और चापाकल पानी में डूब जाते थे। पीने का पानी गर्म कर पिया जाता था। गरीबों के लिए यह समय रोज मछली-भात खाने का होता था, क्योंकि मछलियाँ प्रचुर मात्रा में और काफी सस्ती दर पर मिल जाती। बाढ़ का एक बहुत बड़ा फायदा यह भी होता था कि पानी के साथ नयी मिट्टी आती, जो नयी परत के रूप में खेतों पर छा जाती। इससे गेहूँ और अन्य रबी की फसल बिना कोई रासायनिक खाद के काफी अच्छी होती। आठवें दशक से पहले चमथा में प्रति वर्ष गंगा की बाढ़ आती थी। बाढ़ आने के बाद भी यहाँ की भूमि रबी फसल के साथ-साथ भदई फसल भी देती थी। आठवें दशक में गाँव की दक्षिणी सीमा को रिंग बांध से बाँध दिया गया, जिसके कारण बाढ़ आना कम हो गया है। हालाँकि बाढ़ के कारण जो भदई फसल अच्छी होती थी वह कम हो गयी। अब पूरे क्षेत्र में सामान्यतया तीन फसलें हो जाती हैं।
पहले चमथा के लोगों को किसी भी तरह की खरीदारी के लिए बाजिदपुर बाजार जाना पड़ता था। अब चमथा में भी नया और पुराना पुल के बीच बाजार बन गया है। जहाँ ग्रामीण जीवन की जरूरत के सारे सामान मिल जाते हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन और पैतृक गाँव चमथा  
गाँव के इतिहास को टटोलें तो स्वतंत्रता आंदोलन में चमथा के भगवान सिंह, रामचरण भगत, परोहन सिंह, घूरण सिंह, रामसकल सिंह, कमलेश्वरी सिंह, अक्लेश्वरी सिंह, बुझावन सिंह, अनंत सिंह आदि लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। सन् 1920 के असहयोग आंदोलन में भगवान सिंह ने अपने साथी रामचरण भगत के साथ भाग लिया था।  श्री दून बहादुर सिंह जिन्हें लोग कैप्टन साहब भी कहते थे का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। उस समय विदेशी कपड़ों का परित्याग और स्वदेशी अपना नें का होर चल पड़ा था। कैप्टन साहब के नेतृत्व में लोग चमथा से तेघरा जाते थे वहीं आंदोलन होता था।

आज़ादी की लड़ाई में राष्ट्रीय विद्यालयों की अहम भूमिका रही है। राष्ट्रीय विद्यालयों में देशप्रेम की भावना को जागृत किया जाता था। बेगूसराय जिला, तत्कालीन मुंगेर जिला के तेघरा थाने में चमथा, बीहट, मंसूरचक, बछवाड़ा और मधुरापुर गाँवों में राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना की गयी थी। चमथा में राष्ट्रीय विद्यालय की कमान श्री भगवान सिंह को सौंपी गयी। यहीं से क्रांतिकारियों ने ‘चिनगारी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। चिनगारी में क्रांतिकारियों की रचनाओं को प्रमुखता से छापा जाता था।

सिंह निषाद नारायण उच्च विद्यालय

 शिक्षा के क्षेत्र में पैतृक गाँव चमथा  में  पहले प्राथमिक और मध्य विद्यालय था। यहाँ के छात्र और छात्राओं को मैट्रिक की पढ़ाई के लिए विद्यापति नगर तत्कालीन उच्च विद्यालय मऊ बाजिदपुर उत्तर जाना पड़ता था। गाँव से स्कूल की दूरी अधिक होने के कारण लड़कियों की शिक्षा का स्तर काफी कम था। मैं विद्यापति उच्च विद्यालय में पढ़ता था। स्कूल मेरे घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर था। हमारे पास स्कूल जाने के लिए साइकिल थी। उस समय बहुत कम लोगों के पास साइकिल हुआ करती थी। हमारा उच्च विद्यालय जन सहयोग से स्थापित किया गया था। इसे चलाने के लिए एक प्रबंध समिति थी। हमारे विद्यालय में पढ़ाई के साथ-साथ एक घंटी श्रमदान की होती थी। श्रमदान में बच्चे विद्यालय के भवन-निर्माण के लिए ईंट ढोते या खेल मैदान की साफ-सफाई करते। जन-सहयोग से विद्यालय का धीरे-धीरे काफी बड़ा और सुंदर भवन बन गया था। बाद में इस विद्यालय का सरकारीकरण हुआ। विद्यालय में खेल, वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिता आदि कार्यक्रम होते थे ताकि बच्चों का सर्वांगीण विकास हो। पहले सातवीं-आठवीं कक्षा में ही साइंस या आर्ट्स चुनना होता था। सभी चाहते थे कि मैं साइंस पढूँ। लेकिन मुझे गणित पसंद नहीं था। इसलिए आर्ट्स चुना। वहीं से मैंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। 72 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए।

मैं अपने स्कूल की फुटबॉल टीम का गोलकीपर था। हमारी टीम आस-पास के स्कूलों से बेहतर थी। हमारे कई खिलाड़ी जिले की टीम में भी खेलते थे। विद्यालय में सरस्वती पूजा बड़े धूमधाम से होती थी। बगल के मैदान पर दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता। उस समय कई दिनों तक रामलीला का कार्यक्रम चलता रहता। हमलोग गर्म कपड़ों में देर रात तक रामलीला का आनंद लेते। उस समय रामलीला के महिला पात्र भी पुरुष होते थे।

बचपन में मुझे जासूसी उपन्यास पढ़ने का शौक था। उस समय कर्नल विनोद और कैप्टन हमीद का जासूसी उपन्यास बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय था। हम उसे कॉपी के बीच रख कर पढ़ते थे। एक बार माँ ने पकड़ लिया। बोली, पढ़ाई करते हो या उपन्यास पढ़ते हो। हालाँकि माँ हमें बहुत मानती थीं। एक बार होली में मैं बीमार था, लेकिन माँ ने चुपके से पुआ और मीट लाकर खाने को दिया।

उस समय घर से स्कूल जाते वक्त प्रतिदिन एक चवन्नी मिलती थी। चवन्नी यानी पच्चीस पैसे। उस पैसे से स्कूल में टिफिन होने पर दुकान से नाश्ता खरीदकर खाते। उन दिनो टिफिन होने पर घर से खाना बनाकर ले जाने की परंपरा नहीं थी। स्कूल के बाहर एक दुकान थी, जहाँ मुढ़ी, चूड़ा, पकौड़ी के अलावा तरह-तरह की नमकीन और मिठाई मिलती थी। एक चवन्नी में इतना कुछ हो जाता जो दोस्तों के साथ मिल बाँटकर खाने के लिए पर्याप्त होता था। बाद में चवन्नी पर एक फिल्मी गाना भी बना जो काफी लोकप्रिय हुआ। अब तो चवन्नी चलन में नहीं है।
पैतृक गाँव चमथा  में हमलोगों के घर पर उच्च विद्यालय के एक शिक्षक रहते थे। गुरुजी का नाम श्री फूलेन्द्र नारायण सिंह था। वे हमें दिन में स्कूल में और शाम में घर में पढ़ाते थे। शाम की पढ़ाई खेलकूद के बाद हाथ-पाँव धोकर, ‘रघुपति राघव राजा राम’ की प्रार्थना से शुरू होती। हमलोग लालटेन के चारों ओर बैठकर पढ़ते थे। घर की दीवारों पर महापुरुषों जैसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि की तस्वीरें टंगी थीं। मुझे याद है, एक चचेरे भाई थे विजय जिन्हें पढ़ाई में मन नहीं लगता था। पढ़ाई के समय उंघने लगते। गुरुजी बड़े सख्त थे। दीवारों पर टंगी खूँटी से उनकी टिक्की बाँध देते। हमारे एक और प्रिय गुरुजी थे—श्री रामचंद्र मिश्र प्रभाकर। वे रोसड़ा समस्तीपुर के रहने वाले थे। उन्होंने हमारी हिंदी सुधारी। रविवार की शाम रामायण पाठ होता था। सभी पर्व-त्योहार काफी धूमधाम से मनाये जाते थे।

चम​था के निवासी व स्थानीय पत्रकार राकेश कुमार सिंह

हमारे घर पर रहने वाले शिक्षक परिवार के सदस्य की तरह थे। परिवार के प्रमुख निर्णयों में अपना विचार देते थे। बड़े वाले चाचा यानी बाबूजी बड़े लंबे-चौड़े और सरल स्वभाव के थे और बच्चों में काफी लोकप्रिय थे। दूसरे वाले चाचा कड़े स्वभाव के थे और जब हम ज्यादा मिट्टी में खेलते तो हमारी पिटाई भी होती। उस समय एक अच्छी बात थी कि खेत में काम करने वाला मजदूर भी अगर हमलोगों की किसी शैतानी की सूचना घर में देता तो पूछताछ होती और कभी-कभी पिटाई भी होती।
मैं पढ़ने में अच्छा था इसलिए मुझे एक अलग से कमरा रहने और पढ़ने के लिए मिला हुआ था। मेरे कमरे में एक रेडियो भी था जो उस समय के लिए मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय साधन था। रेडियो पर हम सभी गाने सुनते और बिनाका गीतमाला का काफी इंतजार करते थे। हमारे परिवार में अधिकांश लोग मांसाहारी थे, लेकिन मांस-मछली पकाने का चूल्हा अलग था और स्थान भी। उस समय घर में अंडा या मुर्गी नहीं पकाया जाता था। मुझे अंडा पसंद था इसलिए मैंने परिवार के एक डॉक्टर से चाचा को कहलवा रखा था कि मुझे रोज एक अंडा खाना चाहिए ताकि मेरी पढ़ाई ठीक से चल सके। उस समय बुद्धि को तेज करने वाली फॉसफोमिन नाम की एक दवा भी होती थी, जो मुझे पीने के लिए मिलती थी। चूँकि अंडा घर में नहीं बना सकता था, इसलिए इसे अलग केतली में घर के पीछे बगीचे में उबाला जाता था। उस समय गाँव में हिंदू लोग मुर्गी नहीं पालते थे न ही अंडे का उत्पादन करते थे।

उगण त्रिवेणी महाविद्यालय

आगे चलकर सन् 1967 में श्री देवेन्द्र प्रसाद सिंह और श्री दून बहादुर सिंह ने पैतृक गाँव चमथा  में एक उच्च विद्यालय की स्थापना की, ‘सिंह निषाद नारायण उच्च विद्यालय।’ आज यह उच्च विद्यालय +2 स्तर का हो गया है। अब पैतृक गाँव चमथा में  दो महाविद्यालय है– सिंह निषाद नारायण रामावतार महाविद्यालय और दूसरा उगण त्रिवेणी महाविद्यालय। दोनों महाविद्यालय लगभग चार दशक से यहाँ शिक्षा की ज्योति जलाये हुए हैं। इसी महाविद्यालय से निकलने वाले श्री शैलेन्द्र कुमार सिंह ने पहले भारतीय वायुसेना में काम किया और आज जज हैं। गाँव में डिग्री कॉलेज को मान्यता मिले, इस दिशा में मेरे द्वारा पहल की गयी। डिग्री कॉलेज की स्वीकृति भी मिली। कुछ वर्ष तो चला लेकिन डिग्री कॉलेज चलाने वाले संचालक इसे नहीं चला सके। बिहार की राजनीति में चमथा के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात की जाये तो चमथा के लिए यह गौरव की बात है कि बिहार के बछवाड़ा विधान सभा का प्रतिनिधित्व करने का सुअवसर यहीं के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के श्री अवधेश कुमार राय को मिला। उन्होंने कई बार इस इलाके का प्रतिनिधित्व किया। हालाँकि विधायक रहते हुए जो विकास चमथा में होना चाहिए, वह नहीं हो सका।

चमथा का श्री गांधी पुस्तकालय
15 अगस्त 1947 को आज़ादी के दिन ही यहाँ के बुद्धिजीवियों ने पैतृक गाँव चमथा में श्री गांधी पुस्तकालय की स्थापना की। आरंभ में यहाँ सोवियत रूस, जापान, अमेरिका से भी पत्र-पत्रिकाएँ आती थीं। तत्कालीन मुंगेर जिले और वर्तमान बेगूसराय जिले में इसका अपना अलग स्थान था। बेगूसराय जिला जब बना उसके बाद जिले में इस पुस्तकालय का दूसरा स्थान था। यहाँ बिहार के मुख्यमंत्रियों में बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह, बिन्देश्वरी दूबे, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, भागवत झा आज़ाद, जगन्नाथ मिश्रा भी भ्रमण कर चुके हैं। कैथी लिपि में हस्तलिखित रामायण है जिसकी रचना श्री सर्वदेव सिंह ने की थी। जब पुस्तकालय पुराने भवन में था तो सुचारू रूप से चलता रहा। स्थापना काल से इसके प्रथम पुस्तकालयाध्यक्ष श्री जगदीश सिंह के नेतृत्व में इस पुस्तकालय का संचालन बेहतर तरीके से हुआ। आगे चलकर इसमें गिरावट आयी। अपने छात्र जीवन में मेरा नाता भी इस पुस्तकालय से रहा है। आज रखरखाव के अभाव में पुस्तकालय की पुस्तकों को दीमक खा रही है और बेहतर स्थिति तो नहीं ही कही जा सकती. इसे नये सिरे से सँवारे जाने की जरूरत है ताकि नयी पीढ़ी को इसका लाभ मिल सके।

पैतृक गाँव चमथा के कहानी की पहली कड़ी। क्रमश: जारी….

बदलते हुए गांव में ढ़ीली पड़ती संबंधों की गांठ

 

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