गांव ने जितना दिया..उसकी तुलना में गांव के लिए कहां कुछ कर पाई

मृदुला सिन्हा

आज मैं सोचती हूं कि अपने गांव की कितनी ऋणी हूं मैं, उसकी तुलना में गांव के लिए कहां कुछ कर पाई। फिर भी मैंने कुछ सकारात्मक जरुर किया है।

किसी भी महिला से जब कोई पूछता है तुम्हारा गांव कहां है, तो वह पहले अपने मायके का नाम बताती है, फिर कुछ रुककर ससुराल का नाम लेती है, चाहे उसकी उम्र 80 वर्ष ही क्यों न हो जाए। मेरा मायका कांटी थाने में छपरा गांव है और ससुराल का गांव सीतामढ़ी रोड पर मटिहानी है। एक साधारण किसान परिवार में मेरा जन्म हुआ था। मेरे पिता पढ़े-लिखे होने के कारण हाई स्कूल में शिक्षक थे। जब इलाके की अधिकांश लड़कियों ने स्कूल का नाम भी नहीं सुना होगा, तब मेरे शिक्षक पिता ने मुझे एक आवासीय स्कूल में भेजा। बेटी के भविष्य के सुनहरे सपने देखने वाले पिता ने मैट्रिक पास करने (1958) के बाद गाँव से छः मील दूर शहर मुजफ्फरपुर के महंथ दर्शनदास महिला काॅलेज में मेरा नामांकन करवाया और छात्रावास में रहने की व्यवस्था की।
1959 में मेरा विवाह हुआ। तीन दिनों के ससुराल प्रवास में कुछ भी नहीं देख-समझ पाई थी। घर के अंदर ही घूंघट में रहना पड़ा। अपना घर-आंगन नहीं देखा। घर के सदस्यों को ठीक से नहीं पहचाना। गांव-घर क्या देखती। उसके बाद से अक्सर गांव आना-जाना लगा रहा। मेरा घर मुसहरपट्टी से सटा हुआ था। सुबह-सुबह दो वर्ष से लेकर आठ-दस वर्ष की आयु के नंग-धडंग बच्चे दरवाजे और आँगन में खड़े हो जाते थे। कड़ाके की ठंड में भी न पांव में चप्पल, न शरीर पर कपड़ा, न सिर पर टोपी, मां या बाप के पुराने छिद्रदार कपड़े के टुकड़े ओढ़े सब इधर-उधर भागते फिरते थे। महिलाओं और पुरुषों के षरीर पर भी कम से कम कपड़े। कमर से लेकर घुटने से थोड़ा नीचे तक की साड़ी में महिला शरीर को कितना ढंक सकती थी। पुरुषों के शरीर पर भी कभी कमर पर गमछा बंधा हुआ या छोटी धोती, कमर से ऊपर पूरा शरीर बिना वस्त्र के। ज्यादातर लोग काले-कलूटे। दुनिया छोड़ने की उम्र तक कभी उलझे बालों में कंघी नहीं चली थी।


विवाह के बाद मैं पुनः छात्रावास में चली गई। छुट्टियों में मेरे लेक्चरर पति बंगाल से आते थे और मैं भी छात्रावास से ससुराल जाने के लिए तैयार रहती थी। पंद्रह किलोमीटर बाद पीच रोड से उतरकर कच्ची सड़क से जाने के लिए बैलगाड़ी लगी रहती थी। सड़क भी उबड़-खाबड़। बैलगाड़ी पर बैठने में भी डर लगता था। कभी-कभी तो बैलगाड़ी से उतरकर पैदल चलने लगती। घर पहुंचकर अपने कमरे में लेटकर मेरा रोना शुरू हो जाता। वह दो किलोमीटर की यात्रा बहुत भयावह थी। तब गांव में बड़े और छोटे, धनी और गरीब, सवर्ण और अवर्ण में बड़ा फासला था। शोषण था यह तो मैंने किताबों में पढा, गोष्ठियों में सुना लेकिन मेरे गांव की स्मृतियों में ऐसा व्यवहार नहीं है। आज सुनने को जब मिलता है कि महिलाओं का शोषण होता था, मजदूरों को भरपेट अन्न नहीं तो मुझे अपना वह गांव याद आता है। वह दृश्य जब एक गर्भवती मजदूर की पत्नी मेरी दादी सास से मजदूरी में अन्न लेने आती थी। प्रतिदिन जब उसका पति मेरे दरवाजे से हल-बैल लेकर खेत पर चला जाता था, वह मजदूरी लेने मेरे आंगन में आती थी। जिस रात्रि को यह खबर आई कि वह मजदूर महिला प्रसव वेदना में है तो मेरी सास ने धुले कपड़े, सरसो का तेल और पता नहीं क्या-क्या उसके घर भिजवाया। यह था रिश्ता मजदूर और मालिक में, धनी और गरीब में। शायद इसीलिए मैं राज्यपाल बनकर भी सबसे छोटे कर्मचारियों से दोस्ताना ढंग से बात करती।


गांव में मजदूरों के परिवारों की सदस्य-संख्या बढ़ती गई। उनकी बढ़त के अनुसार गाँव की जमीन नहीं बढ़ी। कहाँ कमाते, क्या खाते। बाहर जाने के वे अभ्यासी नहीं थे। एक दिन मेरे खेत में काम करने वाला एक मजदूर मेरे पति के आगे गिड़गिड़ा रहा था-‘‘मालिक हमरा चार आना दे दू। हम बाहर कमाए जायब।’’ धीरे-धीरे गांव के मजदूरों को गाँव से बाहर का रास्ता दिखने लगा। सर्वप्रथम एक, फिर दो, फिर पांच, देखते-देखते गाँव के हर घर से नौजवान पंजाब, हरियाणा खेती के काम के लिए जाने लगे। उन्हें अच्छी मजदूरी मिलने लगी। चार-पांच महीने बाद लौटते तो बच्चों और पत्नी के लिए कपड़े, कुछ बर्तन-बासन खरीद लाते। एक छोटा रेडियो अवश्य साथ होता। उनके घर भी बाजार पहुँचने लगा। और उनके शरीर पर कपड़ा आने लगा। सरकारी मदद से घर भी बने, जानवर मिले, बहुत परिवर्तन आया। बच्चे स्कूल जाने लगे। धीरे-धीरे आए परिवर्तन से मैं रू-ब-रू होती रही। मैं आज भी वर्ष में तीन-चार बार गांव जाती हूं।

साठ वर्ष बीत गए। इस बार भी मेरे आँगन में प्रवेश करते ही बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं आकर चारों ओर खड़े हो गए। सबके शरीर पर पूरा कपड़ा, पांवों में हवाई चप्पल देखकर मन प्रसन्न हो गया। पूछने पर पता चला सभी बच्चे स्कूल जाते हैं। उनको सरकार से साइकिल मिलती है, कपड़े और किताबें भी। जिन घरों में पंजाब से खरीदा रेडियो बजता था, उन घरों में अब टेलीविजन है। देश-विदेश की खबर देखते हैं। एक 16-17 वर्ष की लड़की को देखकर एक औरत से पूछा-‘‘यह कौन है?’’ उसने कहा-‘‘पोती है।’’ मैंने कहा-‘‘अब इसकी शादी करोगी।’’ उसने कहा-‘‘टेलीविजन पर बोलअई छई, 18 वर्ष के पहिले बियाह कइला पर मतारी-बाप जेल जतई।’’ और भी बहुत कुछ पूछा। उनकी जानकारियां बढ़ गई हैं। जिनके घरों में बरसात में चूल्हा ही नहीं जलता था, उन घरों में अब गैस का चूल्हा जल रहा है। हर घर में बिजली है।


गांव के सामाजिक विकास ने जातियों के बीच ऊँच-नीच और असमानता का भाव समाप्त कर दिया है। जिन जातियों के लोग कुर्सी या चौकी-खटिया पर नहीं बैठते थे, दरवाजे पर चप्पल-जूता पहनकर नहीं आते थे, मालिक कहलाने वालों के साथ कुर्सी पर बैठ रहे हैं। पुरानी पीढ़ी के लोगों में थोड़ी झिझक है, नई में बिल्कुल नहीं। विभिन्न प्रकार की असमानता में एक विशेष समानता देखी गई। जिन महिलाओं के सिर पर लम्बा घूंघट रहता था, वे अब सिर उघाड़ कर चलने लगीं हैं। कई लड़के-लड़कियों (दोनों गाँव के) के अपनी इच्छा से विवाह करने की खबरें भी सुनाई पड़ी। इसे माता-पिता और गांववासियों द्वारा सहर्ष स्वीकार किया।


रामबृक्ष बेनीपुरी जी (नाना) के नाती महंत राजीव रंजन दास अपनी माँ प्रभा बेनीपुरी के गोद में और मृदुला जी। श्री बेनीपुरी जी की गोद में मृदुला जी के बड़े पुत्र नवीन सिन्हा

इस बार गांव गई तो परिवार में पूजा थी। आँगन के चुल्हों पर चाय, नास्ता की व्यवस्था थी। मजदूरी करने वाली तीन-चार महिलाओं ने वह संभाल रखा था। बारी-बारी से एक या दो मजदूर महिलाएं कोने में जाकर मोबाइल पर बात करने लगती। पूछने पर पता चला कि वे पंजाब, हरियाणा, हैदराबाद या अन्य शहरों से लेकर विदेश मजदूरी करने गए अपने पति-बेटों से बात करती थीं। उनमें से एक-दो महिलाओं के बच्चे दूसरे शहरों में उच्च शिक्षा के लिए भी गए हैं। पुरानी पीढ़ी के बचे हुए मजदूरों को आज भी अपने मालिकों से सर्दियों में गर्म सॉल या कंबल लेने की अपेक्षा है। नई पीढ़ी को नहीं। आर्थिक स्वावलंबन के साथ उनका स्वाभिमान भी बढ़ा है।


मेरे बचपन में फटे-चिटे और साधारण लिबास में लिपटे लोग व्यवहार में बहुत बड़े थे। उनके व्यवहार से ही मेरे अंदर दुनिया को देखने की दृष्टि का बीजारोपण हुआ। मेरे घर के बगल की वह झोपड़ी जिसके चूल्हे पर कभी चावल-दाल और सब्जी एक साथ नहीं बनती थी, रोटी पक गई या चावल पक गया बस। रोटी पर नमक-मिर्च और भात-माड़ में नमक डालकर खाते हुए सामो माय को अघाते हुए देखना सुखद ही नहीं लगता था, वरन अपने घर से चावल, दाल, दो प्रकार की सब्जियाँ, पकौड़ा, आचार और दही खाकर उनके सामने खड़े होने पर उनका भोजन देखकर मुँह में पानी भर आता था। कभी-कभी सामो माय अपनी थाली से निकालकर एक-दौ कौर मेरे मुँह में भी डाल देती थी।
सामो माय ने अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी पर चढ़ाने के लिए लौकी का एक छोटा-सा पौधा लगाया। प्रतिदिन उसमें पानी डालती। छोटे पौधे से एक दिन एक बेल फूटी। वह बहुत खुश हो गई। प्रतिदिन उस बेल को झोपड़ी के टट्ट से लगाकर खड़ा करती, संवारती। अपने कमर तक आने के बाद उसमें पतली सी रस्सी बांधकर लकड़ी के सहारे छप्पर पर अंटका दिया। अपनी एक भी संतान आगे-पीछे नहीं थी, लौकी के बेल को आगे बढ़ते देखना क्या कम आनंददायक था। ऊपर आने पर वह बेल बहुत जल्द लतर गई। उसमें फूल भी आने लगे। प्रतिदिन सुबह सामो माय उसे निहारती थी। एक दिन उसमें छोटा सा फल भी दिखा। सामो माय ने शीघ्र उसे पत्तों से ढक दिया। लौकी का बच्चा स्वस्थ था। बहुत तेजी से बढ़ता गया। एक दिन सामो माय ने मेरे पिताजी के चरवाहे को बुलाकर लौकी कटवाया। आंचल में ढ़ककर झोपड़ी के अंदर ले गईं। सब्जी बनाईं। इस बीच मुहल्ले में यह समाचार फैल गया था कि सामो माय के घर आज लौकी की सब्जी बनेगी। लोगों ने संतोष की सांस ली कि आज सामो माय भरपेट सब्जी और भात खाएगी। थोड़ी ही देर में सामो माय अपने आंचल में कुछ छुपाए अपनी नन्हीं काया को झटकाती मेरे आँगन में पहुंची।

मेरी माँ ने पूछा-‘‘यह क्या है?’’ वे बोली-‘‘झप्पर पर का लौकी आज तोड़ लिया। सब्जी बनाई हूँ। रामेश्वर (मेरे भैया) के खाने के लिए ले आई हूँ। यह लो और कटोरी खाली कर दो। दूसरे आँगन में जगदम्बा के खाने का भी समय हो गया। एक कटोरी सब्जी उसे भी दे आती हूँ। तुम्हारा चरवाहा रामफल लौकी तोड़कर दिया है। उसके लिए भी सब्जी रख दूंगी।’’ मेरी माँ चिल्लाई-‘‘ये सब लोग हर रोज तीन-तीन सब्जियाँ खाते हैं। आप स्वयं खा लो न। आपका हिया भी जुड़ा जाय।’’ वे हंसती हुई कटोरी लेकर अपने घर की ओर चली गईं। बहुत खुश थीं सामो माय। लौकी फलने और सब्जी के लिए नहीं। अपनी झोपड़ी के चारों ओर खड़े सम्पन्न घरों में सब्जी पहुंचा आने की खुशी थी उन्हें।


विवाह के बाद बाढ़ वाले इलाके में ससुराल जाती रही। वहाँ पंचा नाम की एक सेविका थी। उसे बचपन से ही बढ़ते देखा। उसके जीवन में कोई खुशी के क्षण नहीं आए। लेकिन उसे हमेशा हंसते ही देखा। वह विधवा होकर भी हंसती रही। बुढ़ापे के करीब आ गई। एक बाढ़ में उसका सबकुछ चला गया। घर भी बह गया। कुछ नहीं बचा। मैं सदा की तरह उसके लिए खाने का सामान, कपड़े, कुछ बर्तन लेकर गाँव गई थी। मैंने कहा-‘‘मैं स्वयं उससे मिलने उसके घर जाऊँगी।’’ जब मैं वहां पहुंची तो घर के स्थान पर गड़े एक खम्भे (बाँस) से टिककर बैठी वह हुक्का पी रही थी। किसी ने मेरे आने की सूचना दी। अब तो उसके मुंह में वह चमकते दांत भी नहीं थे। वह मुझे अपने बांहों में भरकर हंसने लगी। बहुत देर तक हंसती ही रही। उसकी दुःस्थिति पर भला मैं कैसे रो सकती थी। पंचा क्यों हंसी? जब कभी धन के लिए आपाधापी में दौड़ते हुए लोगों को देखती हूँ, धन प्राप्त करने के लिए चिंता-शोक में डूबे हुए लोगों से मिलती हूँ, पंचा हंसती हुई सामने आ जाती है। मैं तनाव मुक्त हो जाती हूँ।

एकबार एक पत्रकार ने पूछा-‘‘आपके जीवन में सबसे अधिक सुख का क्षण क्या रहा ?’’ मुझे एक मिनट भी नहीं लगा। मेरी स्मृतियों के भंडार से निकल आए कई हँसता हुआ दृष्य। जीवन के वे अनुभव पीछा नहीं छोड़ती हैं। मैं संतुष्ट हूँ कि संसार में ऐसे पात्रों का मुझे सानिध्य मिला। कवि ने तो गौ, हाथी, घोड़ा और रतन धन को भी संतोष धन से छोटा बताया है। मैं नहीं कह सकती कि मैं उन पात्रों की तरह पूर्णरूपेण संतोषी हूँ, परंतु अपनी दुनियावी लालसाओं की बढ़त को लगाम लगाने में वे स्मृतियाँ अवश्य सक्रिय हो जाती हैं।


ससुराल परिवार से 60 वर्षों का संबंध है। उस बड़े आंगन में पांच कमरे थे। चारों तरफ ओसारा, हर ओसारे पर एक बुजुर्ग महिला बैठी थी। अपनी-अपनी खटिया पर बैठे-बैठे अपने गांव, देश-दुनिया की एक संगोष्ठी हो जाती थी। तब मैं कॉलेज के द्वितीय-तृतीय वर्ष की छात्रा थी। बड़े ध्यान से उनकी बातों को सुनती-परखती-संजोती जाती थी। तब मुझे कहां पता था कि मायके और ससुराल के मेरे वे स्वजन मेरी कहानियों के पात्र बन जाएंगे। फटे-चिटे वस्त्रों में लिपटी हुई महिलाएं कितनी भव्य लगती थी। इसीलिए तो आज भी पांच सितारा होटलों में किसी बड़ी संगोष्ठी में भाग लेते हुए महिलाओं की समस्याओं का समाधान ढूढ़ने में सीधे-सीधे अपने गांव के ओसारे की संगोष्ठी की याद आ जाती है।

बड़े शहरों में महिलाएं अक्सर पूछती हैं कि सीता ने राम को माफ किया कि नहीं। मेरी ईया महिलाओं के बीच बैठकर बड़े ही सधे स्वर में गाती थी -सीता धरती में गईली समाय मुखहूं नहीं बोलली। यह पंक्ति उस समय की है जब सीता धरती में समा रही थीं और राम सीते-सीते पुकार रहे थे। मां की अश्रुधारा बहती थी। उसका ऐसा भाव संपूर्ण ग्रामीण समाज के जनमानस पर सीता और राम को समकक्ष बैठा लेता हैं, तभी तो सीता राममय होते हैं।

सियाराम मय सब जग जानी, करहीं प्रणाम जोरी जुग पानी।


गांव जाने पर मुझे दिखता है कि आज गांव में खान पान, रहन-सहन, पहनावा, मकान बहुत कुछ बदल गया। शायद ही किसी दरवाजे पर गाय, बैल, भैंस दिखते हों। गांव वालों ने गोत्र, जाति, देश की सीमाओं से बाहर जाकर बेटे-बेटियों द्वारा रिश्ते बनाने जैसे परिवर्तन को स्वीकार कर लिया है। बहुत बड़ा परिवर्तन, बहुत कुछ बदला-बदला सा दिखता है। मेरी नानी, मेरी मां, मेरी बेटी और उसकी बेटी। महिलाओं की पांच पीढ़ियों में कितना अंतर, कितना बदलाव, पर बदला तो कुछ भी नहीं है। यह बदलाव तो बाहरी है। पांचों के अंदर ममता की कभी नहीं सूखने वाली धारा है और यह आज भी गांव में दिखता है।
मायके का गांव शहर के नजदीक था, लेकिन गिनती के पक्के मकान थे। बाकी घरों में आर्थिक स्थिति के अनुसार कहीं खपड़ा, कहीं घास फूंस की छत। गांव के बीचों बीच कच्ची सड़क जाती थी। विभिन्न जातियों के अलग-अलग मुहल्ले थे जिन्हें टोला कहा जाता था। घर में कोई भी यज्ञ हो, सभी जाति के लोगों की भूमिका अवश्य होती थी। सबके काम बंटे हुए थे। एक भी जाति का व्यक्ति नाराज हो जाए, विवाह या जनेउ का रस्म बंद होने लगता था। डोम यदि डाला और दउरा लेकर नहीं आए तो परिछावन कैसे। नाई और ब्राहम्ण के हाथों में तो सब कुछ होता था।

आज मैं सोचती हूं कि अपने गांव की कितनी ऋणी हूं मैं, उसकी तुलना में गांव के लिए कहां कुछ कर पाई। फिर भी मैंने कुछ सकारात्मक जरुर किया है। गांव के नौजवानों को नौकरी दिलवाना, बीमारों को उचित सहायता करना, बेटी और बहुओं के लिए उदाहरण बनना। समय—समय पर गरीबों को बेटी के विवाह के लिए अपनी कमाई का अंश भेजना, सर्दी काटने के लिए वस्त्र और रजाई देना। मेरे घर के सामने फटे-चिटे वस्त्र में जो महिला रहती थी, उसके बेटे पुलिस बैठा को सरकारी नौकरी दिलवाई और उसके दोनों बेटे इंजीनियर और डॉक्टर हैं।


गांधी 150, देश के 150 गांव की कहानी के लिए मृदुला जी से उनके गांव को लेकर बातचीत

आज भी मैं बचपन में सुने कुछ गीतों की पंक्तियां अपने अंदर उभरे भावों को प्रगट करने के लिए अचानक गुनगुनाने लगती हूं। मेरे पास बैठे मेरे पति भी साथ देते हैं और चारों आंखों से एक साथ धाराएं बहती हैं। मुझे कभी-कभी लगता है कि यह जलधार ही मेरी जीवनी शक्ति को सींचती रहती है। जीने का संबल देती है। मैंने कभी भी उन गीतों को, उन पात्रों को अपना जीवन साथी बनाने का प्रयास नहीं किया लेकिन बचपन में डाले हुए गुण दोष के बीजों के समान मेरे अंदर ये सारे पात्र समाहित हैं और मेरे साथ ही यहां से जाएंगे। साहित्य के माध्यम से मैंने उन्हें पन्नों पर उकेरा है। पाठकों के मुख से यह सुनकर आश्चर्य होता है कि उनकी भी दादी और मां वैसी ही थीं। बिहार के गांव जैसे ही गोवा का गांव था। वहां के लोग थे, रस्म-रिवाज, खानपान। इसका अध्ययन कर मैं इस निष्कर्ष पर आई कि अनेकता में एकता हमारे जीवन की तस्वीर है। अच्छी लगती है यह अनुभूति। मन बार-बार बल से भर जाता है। कितना बड़ा है हमारा देश, कितनी महान है हमारी संस्कृति।
पूर्व राज्यपाल, गोवा। साहित्यकार। लोक-साहित्य में गहरी रुचि।

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