
सहरसा शहर से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है खजूरी पंचायत का एक छोटा सा गांव भगवानपुर। स्थानीय लोग भगवानपुर(बनचोलहा)भी कहते है,क्योंकि मधेपुरा सीमा से सटा है मधेपुरा जिला का बनचोलहा। ‘मधेपुरा’ और ‘सहरसा’ का सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण दोनों गांव का नाम एक साथ लिया जाता है। कहा यह भी जाता है कि इस गांव में जुलाहों(बुनकरों) की संख्या अधिक थी इस लिए बनचोलहा नाम पड़ा। इस पंचायत में 5 गांव है, जिसमें से एक हमारा गांव भगवानपुर भी है जिसकी जनसंख्या 3500 के लगभग है। वहीं खजूरी पंचायत के बाकी के गांव है खजूरी,मुसहरनीआ, सपहा और पहाड़पुर।
अपने बनावट व बुनावट में गांव भगवानपुर(बनचोलहा) सर्व समावेशी है और कहा जा सकता है कि जातिगत आधार पर इस गांव में भेदभाव नहीं है। यदि जातीगत आबादी के लिहाज से गांव को देखें तो गांव में सबसे अधिक आबादी यादव समाज की है।लगभग 200 परिवार यादवों के है। उसके साथ-साथ मुसहर जाति के लगभग 150 परिवार वहा रहते है। गांव के केंद्र में राजपूतों का घर हैं जो लगभग 80 परिवार हैं और 2 परिवार नाई और दो परिवार वैश्य के भी है।
तालाब है गांव की पहचान
हमारे गांव में वैसे तो अलग-अलग जातियों का वास है,उनके टोले भी बेशक अलग-अलग हैं लेकिन इन सभी को एकजुट करता है गांव का तालाब और मंदिर। क्योंकि पूरे गांव का पूजा स्थान और जल स्रोत एक ही है और सारा गांव, गांव के बीचो बीच स्थित तालाब और उसी की किनारे बनाये गये मंदिर के इर्द—गिर्द ही बसा हुआ है और ग्रामीणों की निर्भरता भी एक दूसरे पर पहले की तरह ही बनी हुई है। यह संवाद का माध्यम भी है और समाधान का जरिया भी। माना यह जाता है कि लगभग सौ से अधिक वर्ष पहले गांव में जल संग्रहण और पानी की उपलब्धता की समुचित व्यवस्था कैसे बनी रहे इसको ध्यान में रखते हुए पुरखों ने गांव के बीचोबीच तालाब खुदवाया। इस क्रम में ग्रामवासियों ने अपने हिस्से की जमीन इस तालाब के लिए दिया और लगभग दो एकड़ में एक तालाब खुदवाई गई।
यह तालाब गांव के केंद्र में है। बीच गांव में तालाब और उसके पार(तीर,किनारे)लोगों का घर। बड़ी बात यह है कि उन घरों की पहचान तालाब को केंद्र में रख कर ही होती है कि किसका घर किस पार है। जैसे मेरे घर की पहचान आप गांव में ‘पूर्व के पार’से है। अर्थात मेरा घर पूरब के पार पर स्थित है। इस तालाब की खासियत सिर्फ इतनी ही नहीं है। बारहो मास इस तालाब में पानी रहता है और तालाब मछली से अटा रहता है। यानी गांव के विकास में इस तालाब का महत्वपूर्ण योगदान है। किसी भी ग्रामीण के यहां मांगलिक कार्य विशेष रूप से किसी के पुत्री के शादी के लिए मच्छी उपलब्ध कराने के साथ ही, गांव के लोगों के लिए सस्ते दामों पर मच्छी उपलब्ध कराना, इसी के जरिए संभव हो पाता है। इसके पीछे ग्रामीणों की सोच है कि गांव की पुत्री की शादी में थोड़ी बहुत सहयोग सभी ग्रामीण जनों की हो सकें। तालाब का वास्तविक स्वरूप उस वक्त हम सब के सामने आता है जब पूरे गांव के लोग ‘छठ’ के समय इस तालाब पर एकत्रित होते है। उसके पहले सारे गांववासी मिलकर तालाब की साफ-सफाई और छठ पर्व के लिए इसको तैयार करने का कार्य पूरे मनोयोग से करते हें।
गर्मी के समय ‘बालकों’ का झुंड तालाब में तैरते हुए मिल जाएंगे। गांव के सभी बुजुर्गों क साथ- साथ युवा और बालक सभी तैराकी में माहिर है। न सिर्फ लड़के बल्कि बड़ी संख्या में गांव की लड़कियां भी इस तालाब के कारण ही तैराकी सीखने में कामयाब हुई हैं। हालाकि अब स्थिति बदलने लगी है। मुड़कर पीछे देखता हूं और अपने बचपन और स्कूली जीवन की ओर लौटता हूं तो याद आता है कि जब मैं 10 -12 वर्षों का रहा होउंगा तो हमारे भाई-बहन हमें तालाब में नहाने ले जाया करते थे। उनकी कोशिश होती थी कि मैं भी तैराकी सीख लूं। वो हमें अपने कंधे पर बैठाकर तालाब के बीचों बीच ले जाकर जाठ पर बैठा देते और ऐसा करते हुए हमें खूब मजा आता था। यहां तक की घर वापस आने पर माता जी की डांट लगती लेकिन उसका कभी कोई असर हुआ हो यह याद नहीं है। हमारे बड़े भाईयों को यह काम मिलता था कि तालाब से मिट्टी निकाल कर लाए ताकि उस मिट्टी से चूल्हा बनाई जा सकें, और भीत पोती (दीवाल समतल) जा सकें। अब भी मैं गांव जाता हूं लेकिन पहले की तुलना में बहुत कुछ बदला हुआ दिखता है। लोग तालाब में नहाने से बचते दिखाई देते हैं। तालाब में प्रवेश करने से बचने लगे हैं। यहां तक की कई लोग अपने बच्चों को तालाब के आसपास जाने से भी रोकते है। साफ लहजे में कहूं तो अब कोई बड़ा भाई छोटे भाइयों को तैराकी सिखाते हुए नहीं दिखता और न ही अब गांव की महिलायें मकर संक्रांति के दिन तालाब में पुष्प बरसा नहीं करती है। जिस तालाब मे सालों रौनक रहती थी वह अब सुनसान और वीरान दिखाई देता है मानों गांवो की जीवन रेखा खत्म होती जा रही हो। हालांकि छठ व्रत पर फिर से लोग तालाब की साफ सफाई में जुटते हैं और तालाब अपने संपूर्ण स्वरूप में पूरी चहल पहल के साथ खिल उठता है।

हालाकि समय के साथ जिस तरह से देश के अन्य गांव बदल रहे हैं और पलायन के संकट से जूझते हुए गांव वीरान होते जा रहे हैं ठीक उसी प्रकार की स्थिती से दोचार हो रहा हे हमारा गांव भगवानपुर(बनचोलहा)। पिछले एक दशक में गांव की स्थिती बदलने लगी है। गांव के प्रत्येक परिवार से लोग पलायन करके शहर की तरफ जा रहे है। परिणाम स्वरूप गांव में युवाओं की संख्या घट रही है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। विशेष उत्सवों में या शादी विवाह के मौके पर गांव से बाहर रह रहे प्रवासी गांव पहुंच तो जाते हैं लेकिन जब वापस आते हैं गांव फिर से वीरान होने लगता है और जो थोड़े दिन की रौनक होती है वो सिर्फ याद बन कर रह जाती है। अब तो यह सवाल भी खड़ा होता दिख रहा है कि क्या क्या हमारी पीढ़ी ग्रामीण जन-जीवन और पुरखों की विरासत को संभाल कर रख पाएंगी।
स्वाभाविक है इस बदलते हुए गांव में भले ही बदलाव की बयार अन्य गांवों की तरह तीव्र न हो और लोग पुरखों की परंपराओं को हर संभव बचाये रखने की जद्दोजहद और पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं बावजूद इसके कैसे इस बदलाव को परंपरा के साथ तालमेल बिठाते हुए गांव को जीवन बनाये रखा जाये यह चुनौती नयी पीढ़ी के सामने हैं। दार्शनिक अंदाज में कहा तो यह भी जा सकता है कि गांव बदला नहीं है, हम सब बदल गए है।
चाह कर भी उन यादों को पुनः नहीं जी सकते। समय के साथ गांव (भगवानपुर (बनचोलहा की आत्मनिर्भरता खत्म होती जा रही है और हम बाजारू होते जा रहे हैं। नित नयी बढ़ती—बदलती हमारी जरूरतों से न गांव तालमेल बिठा पा रहा है और न ही ग्रामीण। ऐसे में मंदिर का आंगन, गांव का तालाब,पुरखों द्वारा लगाये गये बाग और हमें बेहतर शिक्षा मिल सके इसके लिए घर बाहर हर जगह प्रयास कर बनवाया गया स्कूल छोटा पड़ता जा रहा है। हम अपनी उन्मुक्त उड़ान लिये, घोषित—अघोषित सपनों की बेड़ियां पांव में बांधे सफलता के बहाने गांव छोड़ शहर की ओर रूख कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप गांव का तालाब,गांव का सरकारी स्कूल,गांव के बाग हमसे दूर होते चले जा रहे हें जिसे हम स्मृतियों के सहारे, पकड़े—जकड़े रहना तो चाहते हैं लेकिन वह उतना ही पीछे सरकता जा रहा है और कभी—कभार जब ये प्रवासी परिंदे गांव का रूख करते हैं तो उन्हें नजर आता है सुनसान और वीरान होता गांव, जहां स्मृतियों का धरोहर तो है लेकिन मुट्टी में बांध कर उसे खुद से चिपकाये रखने की हमारी जिजिविषा समय के साथ दम तोड़ती दिखाई देती है। यही कारण है कि हमें गांव बहुत कुछ बदला-बदला सा लगने लगा है और शहर उतनी ही रफ्तार से गांव से आगे निकलता जा रहा है।
(भगवानपुर (बनचोलहा) सहरसा, बिहार के निवासी हैं और वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं।)









