
मैं जब भी महिलाओं से बात करती हूं या उनके साथ काम करती हूं तो अक्सर कहा करती हूं कि, ‘तू बोलेगी, मुंह खोलेगी, तो जमाना बदलेगा।’ आमतौर पर होता है कि महिलायें बोलती नहीं हैं, या उन्हें बोलने से रोका जाता है। लेकिन जैसे ही उन्हें वातावरण मिलता है, तो वो बोलती भी हैं और करती भी हैं, बस उन्हें माहौल चाहिये। इन शब्दों के जरिए अक्सर मैं महिलाओं में आत्म विश्वास भरती हूं। इसके जरिए नारी शक्ति का उभार होता है। ये प्रक्रिया लंबी है।
लेकिन हिमाचल के बेहर बिट्ठल से जुड़ने की प्रक्रिया थोड़ी अलग है। मैं दिल्ली की बेटी हूं लेकिन हिमाचल प्रदेश की बहू हूं। मेरे पति डॉ राजीव सूद दिल्ली में डॉक्टर हैं और पिछले 50 सालों से उनका परिवार दिल्ली में ही रह रहे हैं। हालांकि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के प्रागपुर के क्लोहा गांव के रहने वाले हैं। यानी मेरी ससुराल क्लोहा में है। डॉ साहब अक्सर कहा करते कि देश के अलग-अलग गांवों में जाती हो। वहां महिलाओं के साथ,किसानों के साथ काम करती हो। हमारा भी गांव है क्लोहा। लगभग 13 पीढ़ियों का गरिमामय इतिहास है। एक जमाने में यह विकसित गांव हुआ करता था। पुश्तैनी मकान है। खेती है। आम के बाग हैं। वो अपने बचपन की यादों में मुझे ले जाते कि कैसे उनका समय बाग में बीतता था। कुओं से पानी भरा जाता था। जब तक सास थीं तो वो भी गांव की बात बतातीं। लेकिन पिछले 50 साल से वहां कोई नहीं रहता। गांव पीछे छूट गया और परिवार पलायन कर गया। गांव वीरान हो गया।
डॉ साहब की यह राय थी कि यदि महिलाओं के साथ काम करना है, खेती किसानी से जुड़ा काम करना है। गांव गढ़ना है तो अपने गांव में बदलाव करो। इस लिहाज से देखें तो मैं जो अक्सर कहा करती थी कि ‘तू बोलेगी, मुंह खोलेगी, तो जमाना बदलेगा।’ लेकिन यहां मुझे बोलने, मुंह खोलने की प्रेरणा मेरे पति दे रहे थे। आप कह सकते है कि रामचरित मानस की जामवंत की भूमिका में थे और मुझे मेरी ताकत की याद दिला रहे थे, एहसास करा रहे थे। रामचरित मानस में जामवंत जैसे हनुमान को उनकी वास्तविक शक्ति की याद दिलाते हैं,
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
…जैसे हनुमान के लिए परिस्थितियां आसान नहीं थी लेकिन जामवंत के प्रेरणा से वो आगे बढ़ने को तैयार हुये। ठीक उसी प्रकार हमारे लिए भी परिस्थितियां आसान नहीं थी।
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लेकिन बदलाव की वास्तविक पटकथा और समस्याओं की शुरूआत सही मायने में यहीं से होती है। ससुराल के पुस्तैनी गांव क्लोहा में जमीन भी है। जब मेरे पति ने परिवार वालों से कहा कि रीवा गांव में काम करना चाहती है तो परिवार के लोगों ने हामी भर दी कि कर लो। लेकिन सिर्फ कर लो से बात नहीं बनने वाली थी। ससुराल की संपत्ति का बंटवारा होना बाकी है और बंटवारे का मामला बड़ा पेचीदा होता है। अब मन तो काम करने का बन चुका था। फिर पीछे हटना कहां मुमकिन था। ऐसे में पति के सलाह और उनके सहयोग से कांगड़ा से सटे ऊना जिले के बेहर जसवां पंचायत में 700 कैनाल जमीन खरीदी बेहर बिट्टल में लेकिन जो जमीन हमें दिखाया गया वह बेचा नहीं गया और जब हम जमीन पर कब्जा लेने गये तो हमें इस बात का एहसास हो गया कि हम बहुत बुरे फंसे है। यह जमीन खेती के लायक नहीं है यानी पूरी तरह से बंजर, सरेत्तर,खड्ड हमारे हिस्से आया है। पिछले 50 साल से उस जमीन पर कोई खेती नहीं हुई है। इलाका भी ऐसा की सड़क से कोई संपर्क नहीं। कोई चौराहा नहीं। बेहर बिट्टल गांव के लोगों को भी वहां जाना कबूल नहीं था यानी अमूमन लोग जाते नहीं थे,उपर से जंगली पशुओं, कीड़े-मकोड़ों का भय। जमीन देखकर आंसू निकल रहे थे, और पसीना निकल रहा था। आसपास सिर्फ तीन ही चीज थी। सूखी घांस,कैक्टस और तीसरी मैं। पानी का कहीं नामोनिशान नहीं। ऐसे में एक ही रास्ता था कि अपने सपनों को टूटता देख चुपचाप बूझे मन से दिल्ली वापस लौट आती।
फिर वही बात जेहन में आयी जो मैं अक्सर और महिलाओं में प्रेरणा भरने के लिए दुहराती हूं, ‘तू बोलेगी, मुंह खोलेगी, तो जमाना बदलेगा।’ मैं भी बदलाव के सोच के साथ ही आई थी। जेहन में ख्याल आया, हिमाचली हूं, हिमाचली बहूं हूं। संयोग वश ही सही यहां आई हूं या कहूं नियती के द्वारा बेहर बिट्टल लाई गयी हूं तो पीछे नहीं हटूंगी और दूर दराज के इस अनजान से गावं में कुछ ऐसा करने का प्रयास जरूर करूंगी जो मिसाल बने। यही कारण था कि मैं भागी नहीं, बल्कि यहीं संघर्ष करने का सोचा और जब सोच लिया तो आगे का रास्ता भी खुद-बखुद तो नहीं लेकिन लगातार प्रयास करते हुए बनता चला गया।
स्वाभाविक था मैं दिल्ली से इतनी दूर हिमाचल में आलू प्याज तो लगाने आई नहीं थी। हां खेती करने का सपना मन में जरूर संजोया था। मैं चाहती तो दिल्ली के बाहरी इलाके में जमीन खरीद सकती थी और वहां खेती कर सकती था। लेकिन मैंने यहां आने का फैसला किया क्योंकि हिमाचल एक अच्छी जगह है और हिमाचली अच्छे लोग हैं और इस स्थान से हमारा गहरा नाता है। काम आसान नहीं था। न पानी। न पेड़ पौधे। जमीन को सीधा करने लग जाते तो वर्षों लग जाते। और कोई फसल लगाई नहीं जा सकती थी क्योंकि पानी नहीं था।
हर शहरी का एक गांव होता है, और वो गांव हर परदेशी का ठांव होता है और उस ठांव में होता है एक पीपल का पेड़।
हां यहां भी एक पीपल का पेड़ जरूर था,जिसके पास कोई आता जाता नहीं था। ऐसी धारणा थी कि भूतहा पेड़ है। लेकिन मैने उसी पीपल के नीचे खड़ा होकर पीपल वृक्ष से ही संवाद किया।
पीपल की छांव है, राही की ठांव है,बेहर बिट्टल मेरा गांव है, बेहर जसवां ही मेरा पड़ाव है !
पीपल की पूजा की, आराधना की और कहा कि आपही समर्पित कर आगे का कार्यक्रम आरंभ करती हूं। आप भी लोगों को जीवन देते हैं, आक्सीजन देते हैं, मैं भी आपही के सहारे लोगों के लिए जीवन रक्षक औषधिय पौधों की खेती करना चाहती हूं। इस तरह से उसी पेड़ के नीचे, उन्हीं की छाया में हमारा और हमारे साथियों का बसेरा बना। सबसे बड़ी समस्या पानी की थी क्योंकि बिन पानी सब सून। कहा जाता है न कि आप जब सच्चे मन से किसी कार्य में लग जाते हैं तो पूरी कायनात आपको राह दिखाने के लिए, आगे का रास्ता बनाने के लिए आपके साथ खड़ी हो जाती है।
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आप जब प्रकृति को देते हैं तो प्रकृति भी आपको बदले में भरपूर देती है। हमें एक जगह पर ढ़ाई फूट की परिधी में मिट्टी में नमी दिखी। गांव वालों और अपने सहयोगियों को दिखाया तो उन्हें भरोसा नहीं हुआ। सही है आप चलते तो अकेले हैं लेकिन शुरूआती परेशानियों के बाद, टोक टाक, ना नुकूर के बाद कारवां बनता चलता है। हमने सहयोगियों की मदद से ढ़ाई फुट का गड्ढा खुदवाया। कनीय अभियंता से मिली। उन्हे साथ लिया और उस जगह पर आई, तो उन्होंने कहा कि भगवान ने आपकी सुन ली, यहां तो पानी है। इस तरह से शुरू हो गया नये डगर पर नया सफर। बाकी था सिर्फ अपने सपनों में रंग भरना।
(प्रगतिशील महिला किसान व इंडकेयर ट्रस्ट की प्रबंध न्यासी और कार्यकारी निदेशक रीवा सूद पिछले 30 वर्षों से देश के अलग-अलग क्षेत्रों में आम जनजीवन को प्रभावित करने वाले जमीनी मुद्दों पर कार्य करते हुए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में हाशिए पर रह रहे समाज के सामाजिक, आर्थिकऔर शैक्षणिक विकास के लिए कटिबद्ध हैं।)
शेष अगली किस्त में..क्रमश: जारी।
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