बदल गया है सामुदायिक जीवन

डॉ अनामिका

मेरा जन्म चीन से युद्ध के समय हुआ था। उस समय की घटनाएं याद नहीं हैं। एक-दो दृश्य याद हैं। भैया हमको कहते थे कि चाइनीज है। मेरी नाक चपटी थी, इसलिए चिढ़ाते थे। हमको याद है कि नेपाल के बॉर्डर से आती थी एक बूढ़ी औरत, स्मगलिंग की साड़ियां लेकर। कुछ दूसरे सामान भी लेकर आती थी। छोटी-छोटी घड़ियां, खिलौने आदि लेकर आती थी। उस समय वे चीजें हमारे यहां नहीं बनती थी। बॉर्डर के पार बीरगंज वगैरह से लेकर आती होगी। लेकिन गांव के बड़े लोग कहते थे कि चीनी सामान मत खरीदना, देशद्रोह है। फिर बांग्लादेश-युद्ध का समय आया। तब ब्लैकआउट होता था। बताया गया था कि अगर कुछ हो तो टेबल के नीचे छिप जाना है। तब बडे लोग रेडियो पर बीबीसी से समाचार सुनते थे।

उस समय लड़कियां पुतुल से खेलती थी। बंगाल में प्रसिद्ध है पुतुल खेला। पुरानी साड़ियों बनाते थे पुतला, उसमें नाक-कान-आंख सब बनाया जाता था सिलाई करके। वह बुढ़िया भी लाती थी, विदेशी टाइप की बार्बी डॉल। बार्बी डॉल और उस पुतुल के चेहरे में फर्क रहता था। बार्बी डॉल अति स्त्री लगती है, मतलब उसके चेहरे पर ममता कम लगती है और वह जो छोटी-सी गुड़िया होती थी, उसमें बहुत ममता होती थी साड़ी पहनकर बैठी हुई। उसको देख कर लगता था कि कोई बैठा है। बार्बी गुड़िया में मशीन जैसा भाव रहता है। पुतुल की याद हमको बार बार आती है। मुझे लालसा होती है कि कोई पुतुल बना कर देता।

एक चीज हमारे जमाने में होती थी रोल्ड गोल्ड, सोने की तरह दिखता था। उसके गहने आते थे। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि देखो यह सब चीजें मत लेना, चाइना से आता है। अब देखते हैं कि चीन से हमारे जो संबंध है, उसमें यह बात बेमानी हो गई है। चीन का बॉर्डर खुल गया है। स्थितियां बदल गई हैं। दुश्मनी का भाव खत्म हो गया है। अब दुश्मनी के रुप में चीन का नाम कम आता है, पाकिस्तान का नाम ज्यादा आता है। पढ़े-लिखे लोग कहते हैं कि दुश्मनी खत्म हो जाए। हमको एक घटना याद हैं। हमारे एक बाबा थे पिता जी के चाचा नागेंद्र बाबा वकील थे। उन्होंने कहा कि देखो आज बेगम अख्तर ऐसी ठुमरी गायी कि पाकिस्तान से जो झगड़ा था, खत्म हो गया। ठुमरी के बोल थे-कह न सकूं मैं दिल की बतियां, आजा बलम जी हमारे द्वारे सारा झगड़ा खत्म हो जाए। साहित्य और संगीत का असर होता है। दुश्मनी राजनीतिक होती हैं। लेकिन जनता के मन में यह रहता था कि ये झमेले खत्म हो जाए, शांति से रहे।

हम लोगों ने कभी बंदूक नहीं दी बच्चों को, लेकिन अभी बच्चे बंदूक से खेलते हैं। यह परिवर्तन हो गया है खिलौनों की प्रति, उससे भी परिवेश में हिंसा बढ़ी है। हमारे मां-बाप ने हम लोगों की टाइटल नहीं रखी। लेकिन समाज अपनी गति से बढ़ता रहा। कुछ बुरा, कुछ अच्छा होता रहा। जातिवाद टूटने के बारे में यह कह सकते हैं कि शहरों में बहुत सारे लोग जाति से बाहर शादी करते हैं, इसको अब तो स्वीकृति हो गई। पहले हुक्का-पानी बंद हो जाता था। यह बढ़िया बात हुई है। पहले इस तरह के संबंध रख लेते थे लेकिन विवाह नहीं करते थे। गांव में ऐसे बहुत से लोग थे जिनके बारे में ऐसी बातें होती थी। लेकिन वह औरत गांव नहीं आती थी। लोग नौकरी वगैरह करने जाते थे बंगाल और लौटकर नहीं आते थे। अंग्रेजी हुकुमत में ढेर सारे लोगों को पकड़ कर मॉरिशस और दूसरी जगहों पर काम करने के लिए भेज दिया जाता था। लेकिन यहां औरतों को लगता था कि वहां बंगाल की जादूगरनी है, सुग्गा बनाकर पोस लेती है। पहले और अभी की स्थिति में फर्क है। अब काम करने कहीं भी जाने से औरतें नहीं रोकती।
पहले माता-पिता से बात करते थे, अब सब के पास मोबाइल है। बहुत मजेदार बातें होती हैं। स्त्रियां मोबाइल पर अपने पति से कैसे हो, से पहले कहां हो पूछती हैं। चिंता रहती है कि विस्थापित आदमी कहां है, पता नहीं। कई बार मैं बाजार में देखती हूं किसी का फोन आता है तो बाजार में बैठा आदमी, कॉफी पी रहा है, सामान खरीद रहा है, पर बोलता है कि अभी ऑफिस से निकलने में बहुत टाइम लगेगा। यह भी नहीं सोच रहा कि अगल-बगल का आदमी क्या सोचेगा। आज मोबाइल के युग में हर आदमी पूछता है कि कहां हैं। इस तरह की बहुत सारी चिंताओं में वृद्धि हो गई है।
मिथिला के गॉंव खाली हो गए हैं क्योंकि वहां कोई नौकरी या काम नहीं है। छोटे बच्चे हैं, लेकिन स्कूल-कॉलेज भेजने की चिंता नहीं है। इंतजार यह है कि वह कब बाहर जाकर कमाने लायक होगा। बाहर सब के सब फुटपाथ पर रहते हैं लेकिन आते हैं यही। रंगदारी टैक्स देकर रहते हैं लेकिन रहते हैं यहां क्योंकि वहां पर बात होती है कि परदेस कमाने गया है बच्चा तो परिवार का दायरा बढ़ जाता है। घर का जोगी जोगड़ा तो होता ही है, बाहर चला जाएगा तो गांव का सिद्ध हो जाएगा। इसलिए विस्थापन के आयाम हैं और बचपन के गांव का एक दृश्य याद हैं। पढ़ने वाले बच्चे प्रतियोगिता दर्पण या कुछ ऐसी चीजें लेकर छत पर बैठ जाते थे और घंटा जोड़कर पढ़ते रहते थे। अब गांव में उस तरह का पढ़ने वाला दिखाई नहीं देता जो पढ़निहार बच्चा है वह बाहर चला जाता है-पटना, दिल्ली चला आता है।

हम लोगों को साझा मातृत्व मिला है। सिर्फ अपनी मां की गोद में नहीं रहे। मोहल्ला भर में बच्चा घूमता था, दूध भी कोई मां पिला देती थी। समझ में नहीं आता था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही मां हों। हमने बहुत सी भाषाओं की लाज रखी है क्योंकि बहुत सी भाषाओं का दूध मिला हुआ है। हिंदी में बहुत सी भाषाएं हैं। इस तरह वह साझा मातृत्व बहुत कुछ दे गया। पूरा मोहल्ला घर था, कोई अतिथि आ गया अचानक और कुछ नहीं है तो दूध बगल से आ जाता था। कप टूटी हो तो मोहल्ले से आ जाती थी। लोग यात्रा करके आते थे तो खाना भी बन के आ जाता था। किसी की मृत्यु के समय तो आता ही था 13 दिन। लेकिन अब तो तेरह दिन शोक भी नहीं मनाते। गांव में यह सम्मिलित जीवन, सामुदायिक जीवन कम हो गया है। शाम को भी लोग टीवी में ही लगे रहते हैं या कंप्यूटर में। यह एक मायावी संसार है जिसमें सभी डूबे रहते हैं।

सामुदायिक जीवन पूरी तरह बदल गया है। पहले घर में कुछ बनता था तो बगल वाले के यहां जाता था। क्रोशिया से कोई कुछ बनाता था तो सबको दिखाता था। यह भाव, साथ लेकर चलने वाला भाव कम हो गया है। जो विस्थापित स्त्रियां हैं जिनके पति कमाने गए हैं। उनके बीच बहनपा का अलग तरह से विस्तार हुआ है।

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पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लेकिन ढंग यही है कि फलना की दुल्हन खड़ी है, बहू खड़ी हैं और पति उसको सपोर्ट करके अपनी सत्ता कायम करता है। अभी भी बहुत कम ऐसी महिलाएं होंगी जो पति से अलग वोट दें। पति से पूछ कर ही वोट देती है और पंचायत में चुनकर भी जाती हैं तो पूछ कर ही चलती हैं। यह जरुर है कि लड़कियां पहले की तुलना में ज्यादा पढ़ रही है। आज आमलोग भी चाहते हैं कि बच्चा 11वीं 12वीं तक जरुर पढ़े। यह बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है। जब हम लोग दिल्ली आए थे, तो मां-पिताजी ले जाते थे। लेकिन आज बिहार की बहुत सारी लड़कियां लॉज में चार-चार, पांच-पांच की टोली बनाकर रहती हैं। हमारे माता-पिता को इतना भरोसा नहीं था। पहले हॉस्टल नहीं मिला तो रहना ही नहीं घर चली वापिस। वह सोचते थे कि इनको कोई ठग लेगा। अब माता पिता सोचते हैं कि मेरे बच्चे को कोई रोक नहीं पाएगा। उनका यह विश्वास बढ़ा है। हमारे समय में इतना विश्वास नहीं था।
बाकी परिवर्तन दलितों के बारे में अच्छा हुआ है। पहले उनका कप अलग होता था, चाय मिलती थी लेकिन अलग कप में और वे लोग स्टॉल पर नहीं बिठाए जाते थे। कोई नया कपड़ा पहन के सामने से गुजरे तो लोग उसको डांट देते थे। किसी का पूरा नाम पुकारा नहीं जाता था। यह सब बदला है। त्यौहार का भी ढंग बदल गया है। होली के समय गाना होता और बहरूपिया आते। हमारे यहां चाची को गॉंव के नाम से बुलाते थे-डुमरा वाली चाची, रांची वाली चाची, छपरा वाली मामी, स्त्रियां अपने किचन में एक नई भाषा लेकर आती थी और कहानियां, किस्से भी लेकर आती थी।
प्रतिष्ठित कवयित्री, प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय।

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