गांव वालों ने कहा प्रधान क्यों नहीं बन जाती…

मैत्रेयी पुष्पा

स्वतंत्रता मिली तब मैं बहुत छोटी थी। मैंने जब होश संभाला तो गांव को देखा जो अलीगढ़ जिला में शिवपुरा है। अलीगढ़ से मथुरा जाने वाली सड़क से चार-पांच किलोमीटर दूर है मेरा गांव। हमारे गांव के जमींदार बनवारी लाल की सात गांवों में जमींदारी थी। उन्हें मैंने देखा नहीं, लेकिन सुना है और मेरी कई कहानियों व उपन्यासों में वे आए हैं। जमींदार न्याय की बात करते थे, इसलिए लोग उनकी बात मानते थे। वे गांधी जी से बहुत प्रभावित थे। अपने मोहल्ले का नाम गांधी चौक रखा था, गांधी चबूतरा बनाया था। सबको बताते थे कि गांधीजी ने क्या किया, हमें स्वराज कैसे मिला।
गांव में सभी जातियों के लोग रहते थे-ब्राह्मण, राजपूत, जाट बहुतायत में थे। दलित भी थे। मेरा घर खटीकों से लगा हुआ था, उससे थोड़ा आगे मुसलमानों के घर थे। मेरे गांव में कभी कोई दंगा नहीं हुआ। जब बंटवारा हुआ तब बनवारी लाल बहुत घबराए, मुसलमान भी घबराए। फिर एक तरकीब निकाली। सारे मुसलमानों के हिंदू नाम रख दिए और इसे एक रजिस्टर में लिखकर रख दिया। मुसलमानों से कहा कि जब भी तहकीकात हो तो हम कहेंगे कि हमारे यहां कोई मुसलमान नहीं है। मेरे गांव के मुसलमानों के नाम आज भी मंगल सिंह, फूलसिंह, लालसिंह आदि है। जब स्वतंत्रता आ गई, जमींदारी टूट गई तो उनको प्रधान बनाया गया।

मेरी मां भी उसी गांव में शिक्षित हुई जो उनकी ससुराल थी। मेरी मां एक गरीब किसान की पत्नी थी। अंग्रेजों के जमाने में किसानों में बहुत गरीबी होती थी। मैंने अपने पिता को देखा ही नहीं, लेकिन मैं पूरे गांव की बेटी थी। ऐसी और भी कुछ लड़कियां थी जिनके बाप नहीं थे। नंबरदार सब के लिए लड़का देखने जाते थे, उनके लिए अच्छे से अच्छे लड़के देखे।मेरा जीवन ऐसा रहा है कि मैं मैच्योर बहुत जल्दी हो गई। उन्नीस साल में मेरी शादी हो गई।
रिश्ते के एक जीजा जी थे, उन्होंने रिश्ता बताया। तो वह फिर यहां चली आईं। मेरे पति ने देखा तो उन्हें भी यही कहा कि मेरी लड़की की मार्क्स शीट यह है, तुम मुझे भी अपना कोई प्रूफ दिखा दो। तुम पढ़ रहे हो मुझे पता है लेकिन मैं झांसी रहती हूं। मां ने मुझे देखने को कहा कि लड़की देख लो वह मेरे जैसी नहीं है। इस पर भी मेरे पति ने कह दिया कि नहीं कोई जरूरत नहीं है। आपने मुझे देख लिया काफी है। इस तरह माताजी ने खुश होकर मेरी शादी कर दी।

मेरे पति को भी देखने नंबरदार गए थे। जब मेरी शादी हुई तो कन्यादान लेने के लिए पूरे गांव ने व्रत रखा था। पूरा गांव सोया ही नहीं दो-तीन दिन। तीन दिन बरात रुकी थी, तीसरे दिन शाम को मैं पति के यहां गई। पूरे गांव के दामाद है डॉक्टर साहब। कहते हैं मैंने ऐसा सद्भाव देखा ही नहीं। लोग आज तक उस शादी को याद करते हैं। जब उनके लड़के चंद्रपाल भाई साहब की शादी हुई तो हम छोटे थे। बहू खादी की साड़ी पहनकर आई, साथ में आया एक गांधी चरखा और कुछ नहीं आया। उस गांधी चरखे पर नाम लिखा था सुराजी देवी, भाभी हैं हमारी।

मेरा भाई नहीं था, इसे लेकर बचपन में मैं बहुत रोती थी। जब लड़कियां राखी बांधती थी तो मैं किसको बांधती। नंबरदार की पत्नी ने कहा कि यह शिवकुमार तुम्हारा भाई हुआ। शिवकुमार मेरी मां को मौसी कहते थे। यह रिश्ता आज तक चला आ रहा है। शिवकुमार की लड़की की शादी हुई तो मुझे बुलाया। मैंने पूछा दहेज भी लेते हो क्या तो बोला कि कैसी बात कर रही है। आज भी उनके परिवार में दहेज नहीं लिया जाता। ऐसे रिश्ते खून के नहीं होते। इसलिए शहर में आज तक मेरा मन नहीं लगा। मैंने सारा साहित्य गांव का लिखा। उसको मैं भूल ही नहीं सकती। एक दूसरे का ख्याल करना यह चीजें सिखाई जाती है।


आज जो कुछ मेरे पास है, वह सारा कुछ गांव का ही दिया हुआ है। शहर से मैंने कुछ नहीं लिया है। यह जो आपको सुना भी रही हूं यह सब मेरे कथा के पात्र ही रहे हैं। उनसे ही मेरी सारी कहानियां और उपन्यास बने हैं। मैंने सोचा था कि मुझे यह जो इतनी कथाएं याद है, इतने गीत याद है मुझे। बहुत लोकगीत याद हैं और बहुत सारी लोककथाएं याद हैं। इनका क्या होगा। इसी ऋण को चुकाने के लिए उपन्यास दर उपन्यास लिखे। अभी तक 11 उपन्यास लिख पाई हूं और मेरे कथापात्र वही हैं मेरे गांव के लोग। यह पात्र अपने आसपास नहीं हैं गांव से आते है। काल्पनिक पात्र खड़ा नहीं कर सकता आदमी ।
मैं काल्पनिक पात्र को गढ़ के वृत्तांत बना दूं वह मेरे बस का नहीं है। जब तक मैं उन पात्रों के साथ रहती नहीं हूं, देखती नहीं हूं या महसूस नहीं करती हूं तब तक लिख नहीं पाती। मैं तो उन्हीं में से एक हूं। मैं उनकी ही लड़की हूं। उनके बीच जाकर बैठती हूं जो मैंने लिखा है, जितना लिखा है, कहानी लिखी है, उपन्यास लिखे हैं और भी चीजें लिखी हैं, उनको ही समर्पित है। उनको मैं याद करती हूं। मेरी शिक्षा उन्हीं अनपढ़ औरतों के साथ हुई है। मुझे दो भाषाएं आती है-बृज और बुंदेलखंडी। दोनों पर मेरा पूरा अधिकार है क्योंकि बृज में पैदा हुई हूं और बुंदेलखंड में रही हूं। मेरी शिक्षा बुंदेलखंड कॉलेज, झांसी से हुई। झांसी में हम गांव में रहा करते थे, तो वहां हम कहां जाते? मेरी मां नौकरी करती थीं और उनकी ड्यूटी गांव में लगती थी। फिर दूसरा उस वक्त लड़कियों के पढ़ने का रिवाज नहीं था। गांव में लड़कों को ही पढ़ाते थे। लड़कियों के लिए अगर पांचवी तक स्कूल है, तो बस उतना ही पढ़ सकती थीं। इससे आगे नहीं। ज्यादा हुआ और अगर गांव में आठवीं तक की सुविधा है, तो आठवीं तक पढ़ाकर लड़की के लिए पढ़ाई खत्म।

लेकिन, मेरी मां ने ऐसा सोचा ही नहीं। उन्होंने मुझसे कहा कि आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए गांव से बाहर जाओ। लड़कियां बाहर पढ़ने जाती नहीं थी। मुझे लड़कों के साथ जाना पड़ता था। मैंने अपनी मां से मना किया, तो उन्होंने साफ कह दिया कि अब जब लड़के ही जा रहे हैं, तो उन्हीं के साथ जाओ। छोटेपन में मैं यहां पढ़ी हूं। लेकिन असली शिक्षा गांव से ही मिली है।
छोटा-सा गांव था 1000 की आबादी वाला, स्कूल भी दूर था। वहां से पढ़कर काफी लोग निकले। हमारे गांव में चौधरी चरणसिंह की रिश्तेदारी थी, जब वे आते थे तो पूरा गांव उनको सुनने जाता था। आज तो भाड़ा देकर लोगों को बुलाया जाता है। तब लोग अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन राजनीतिक चेतना लोगों में थी। सारे मिलकर होली जलाने जाते हैं अकेला कोई नहीं जलाता, मिलकर रंग खेला जाता है। जिसके घर में कोई मौत हुई हो, वहां सबसे पहले जाते हैं। हमारे यहां यह रिवाज है अच्छी हैं।

जब से प्रधानी का चुनाव शुरू हुआ है, उसमें पैसे का लेनदेन शुरू हुआ है। बस यहां से लड़ाइयां शुरू हो गई, खींचतान होने लगी। बहुत चीजें प्रधान के अंदर में आ गई। उसको धन मिल गया, शक्ति मिल गई। फिर बात इससे भी आगे बढ़ी कि मैं खड़ा होउंगा कि तू खड़ा होगा। अगर महिला सीट है तो मेरी बीवी खड़ी होगी कि तेरी बीवी खड़ी होगी। इन बातों पर लड़ाई होने लगी। ऐसी शक्ति और पैसा कि जो स्त्री की सीट है, वह भी इसलिए चाहिए कि हम राज करेंगे। पत्नी की सीट है तो हम राज करेंगे। पहले पैसा नहीं होता था तो गांव में जो सबसे अच्छा आदमी दिखता था उसको चुन लेते थे। उस का व्यक्तित्व अच्छा होना चाहिए, यही ख्याल होता था। यह फ्री सेवा होती थी। इसमें पैसा नहीं था, तब तक बहुत अच्छा चला। मैंने इस पर भी कहानी लिखी थी शतरंज के खिलाड़ी।

पंचायती राज में कई चीजें अच्छी थी, लेकिन बहुत चीजें इतनी खराब हुई कि सारा मानचित्र ही बिगड़ गया। इतना पैसा मिल गया प्रधान को कि अब वह कहां लगा रहा है, कहां नहीं लगा रहा है कुछ ठीक नहीं रहता। कुछ लोग शिकायत करते हैं। कुछ लोग मारपीट करते हैं। प्रधान को पीट रहे हैं। अब स्वार्थ ज्यादा है, लालच बहुत ज्यादा है और सारा कुछ पैसे पर केंद्रित हो गया है। सोचती हूं कि मैं बहुत अच्छे समय पर अपने गांव में रहकर आई। मेरे गांववालों ने तो मुझसे भी कहा कि तुम प्रधान के लिए खड़ी हो जाओ तो मैंने कहा कि मैं तो दिल्ली में रहती हूं, मैं प्रधान बनकर क्या करूंगी। हालांकि मेरी एक बुआ की लड़की है, उनकी शादी बहुत उम्र के आदमी से हमारे फूफा ने कर दी तो हमारी माताजी बहुत गुस्सा हुई थी। लेकिन बहन ने सब कुछ संभाल लिया। छोटी उम्र से ही खेती भी करवाया। फिर जब प्रधान का चुनाव आया तो खड़ी हो गई और जीत गई। प्रधान हो गई। लोगों ने वोट दिए होंगे ना। लोग न्याय चाहते हैं, इंसाफ चाहते हैं लेकिन लालच में इंसाफ होता नहीं। एक कहानी लिखी मैंने फैसला। उसपर दूरदर्शन पर फिल्म बनी चिट्ठी अपनी चलती है व सुमति की चिट्ठी।
कहानी यह है कि एक वोट किस तरह निर्णायक हो जाता है। पति ने सोचा यह तो मेरी पत्नी है, यह तो मुझे वोट देगी ही, दूसरा कहां जाएगी, दूसरों को पटा लें, पर उसी ने वोट नहीं दिया। उसी एक वोट से वह हार गया। तभी बीजेपी एक वोट से हार गई थी। बाद में उस औरत ने बताया कि मैंने तो ऐसा सोचा भी नहीं था कि मैं अपने पति को नहीं दूं। मैं सोच रही थी कि मेरा पति तो जीत ही जाएगा, इतना शक्तिशाली है और यह जो लोहार का लड़का खड़ा हुआ है, वह न्यायकारी है तो उसे ही दो।
जो भी गड़बड़ हो रही हैं, हिंसा हो रही हैं, दंगे हो रहे हैं उसके पीछे पैसा हो सकता है, पैसा-पावर का लालच है। हो सकता है कि यह सब प्रधान के जमाने में होता तो वह भी ऐसा हो जाता पर तब तो वह निर्विरोध चुना जाता था कि अच्छा आदमी है। तब वोटिंग होती नहीं थी, ग्रामसभा बैठती थी और प्रधान चुन लेते थे। सबसे निचली इकाई है ग्रामसभा। पर अब ग्रामसभा की चर्चा ही नहीं करते। गांधीजी जो पंचायती राज लाए तो यही समझ थी। सरकार के जरीए आई पंचायत के जमाने में गांव के सभी लोग ग्रामसभा के मेंबर तो हो गए, लेकिन यह नहीं करते कि ग्रामसभा मिलकर कोई फैसला लें।

जो भी गड़बड़ हो रही हैं, हिंसा हो रही हैं, दंगे हो रहे हैं उसके पीछे पैसा हो सकता है, पैसा-पावर का लालच है। हो सकता है कि यह सब प्रधान के जमाने में होता तो वह भी ऐसा हो जाता पर तब तो वह निर्विरोध चुना जाता था कि अच्छा आदमी है। तब वोटिंग होती नहीं थी, ग्रामसभा बैठती थी और प्रधान चुन लेते थे। सबसे निचली इकाई है ग्रामसभा। पर अब ग्रामसभा की चर्चा ही नहीं करते। गांधीजी जो पंचायती राज लाए तो यही समझ थी। सरकार के जरीए आई पंचायत के जमाने में गांव के सभी लोग ग्रामसभा के मेंबर तो हो गए, लेकिन यह नहीं करते कि ग्रामसभा मिलकर कोई फैसला लें।


बदलाव तो हुआ है, बहुत स्कूल खुल गए, बहुत कॉलेज खुल गए जो तब नहीं थे। टेक्निकल स्कूल गए, तब नहीं थे। उस समय एक लड़की पढ़ने जाती थी, अब तो अनेक लड़कियां पढ़ने जा रही है लेकिन मानवता नहीं बची। जितना भी मैंने लिखा है। सब में यह बात है कि क्या-क्या हो रहा है गांव में। कोई ईमानदार टीचर आ जाता है तो उसे टिकने नहीं देते। प्रधान उसे कहते हैं कि साइन कर दो स्कूल के खाते में और पैसा हम लेंगे। अभी चुनाव आएंगे तो देखिए क्या हाल होता है। राजनीति जिसमें राज और नीति दोनों होना चाहिए पर अब नीति खत्म हो गई है और सिर्फ राज बचा है।

मैं किसान परिवार से हूं। हमारी खेती रही है। खेती में सभी हाथ बंटाते हैं। स्त्री भी बंटाती हैं, जब बुवाई होती है तो सब लगते हैं। अब ट्रैक्टर वगैरह चल गए हैं। उस समय हल थे। आदमी हल चलाता था, औरत बीज डालती जाती थी। रहट वगैरह भी चलते थे, लड़कियां-औरतें पानी निकालती थी। यह सब मैंने चाक उपन्यास में लिखा है। वह कैसे पानी काट रही है, कैसे खेत में जा रही है। फिर फसल आ जाती है। बालियां पक जाती हैं। फिर उसकी कटनी होती है तो आदमी लोग काटते हैं। कुछ लोग बाहर के भी होते हैं। मजदूर होते हैं। काटने के बाद बाली गिर जाती है खेतों में तो हम लोग भी जाते थे बिनने। एक दाना भी बरबाद नहीं होना चाहिए। सारा प्रबंध औरतें करती थी जैसे आलू बोने औरतें आती और डलिया में भर भर के सिर पर लाती। जो पशु होते हैं, उनका चारापानी औरतें ही करती थी।


कहते हैं कि स्त्री आर्थिक रूप से तो कुछ भी नहीं है। मैंने कहा आर्थिक रूप क्या होता है खाली पगार मिल जाना। उसको तो कोई भी छीन सकता है। तुम्हारा पती ही ले लेगा। अनाज जब घर आता है तो उसे देखते हैं, गाय पालते हैं दूध होता है जो सबके हक में होता है। औरतों के पास में है उसको कोई नहीं ले सकता। एक औरत के हाथ में मोबाइल था, हमने पूछा तो उसने बताया कि दूध बेचा और ले लिया। भैंस का काम कर रहे हैं तो कहां से लाएं और यहीं से लिए, इसी घर से पूरे अधिकार से कोई डर नहीं, कोई चोरी नहीं, सब मेहनत का किया हुआ है तो यह उनका आर्थिक पक्ष है। मेरी स्त्री आर्थिक रुप से स्वतंत्र है, उसे कोई तनख्वाह देने वाला नहीं है। खुद ही अपना पगार ले लेती हैं। अब अनाज आता है घर में तो वही रखती है तो पति क्या घर पर पहरा देगा। यहां जो किसान आए थे धरना वगैरह देने, वे अपनी पत्नी को भी साथ में लाए थे, टीवी पर देखा होगा। रात में टिकने की बात थी तो उन लोगों ने वहीं पर गैस जला करके खाना बनाया। सरकार को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। वह पूरी तैयारियां कर आए थे और जहां बैठ जाए वही घर बना लेते है।असल में समस्या यह है कि यह तो गांव जाते नहीं है, देखते नहीं है। इनका एक बना बनाया संसार है प्लेटो का संसार, उससे परे यह जानते नहीं हैं। फूल चाहिए यहां गमला लगा हुआ। खेत कभी देखा नहीं और बच्चों को दिखाते हैं तो गांव तो जाना ही पड़ेगा। मैं शहर का लिख नहीं सकती। मेरी जब कलम चलती है तो मैं उधर का ही लिखती हूं। जब एक-एक चीज, मुहावरे मुझे यहां से लेने नहीं पड़ते। जब तक दर्द नहीं सहो बात नहीं बनती।
प्रसिद्ध लेखिका, अनेक उपन्यास और कहानियां प्रकाशित। दिल्ली।

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