कथा बरास्ते विकास शहरीकरण की भेंट चढ़ते गांव की

सुमन कुमार सिंह कलाकार/ कला लेखक

पने गांव को याद करने से पहले तो बनता है अपने आप से एक सवाल। क्या दशकों से किसी महानगर में रहते-रहते हमारा गांव हमारे अंदर कहीं बसता भी है या वह कहीं गुम हो चुका है ? तो जवाब तो यही बनता है कि मन के किसी कोने में वह बसता तो है लेकिन सिर्फ स्मृतियों में। वह भी कुछ आधी-अधूरी सी। आधी-अधूरी इसलिए कि भले ही साल में एक-दो बार वहां जाना तो होता है, लेकिन वहां जाकर सिर्फ परिजनों से औपचारिक मुलाकात तक ही सीमित होकर रह जाता है। वह भी बेगूसराय नगर निगम का वार्ड नंबर-07 का वह हिस्सा जो कभी कहलाता था ग्राम- पोस्ट: इटावा -डुमरी, भाया: रिफाइनरी टाउनशिप, जिला: बेगूसराय। जो लगभग पिछले पांच दशक से अधिक समय से अपना या कहें कि अपने परिवार का ठिकाना बना हुआ है। जहां रहते हुए स्कूली पढाई से लेकर महाविद्यालय तक की अपनी पढ़ाई हुई। और वहीं से कलाकार बनने के सपने ने पहुंचाया कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटना। इसके बाद का इरादा तो यही था कि पटना से वापसी के बाद जिंदगी का बाकी हिस्सा बितेगा, उसी गांव, समाज और शहर में।

लेकिन नियति ने ला पटका दिल्ली जैसे महानगर के एनसीआर कहे जाने वाले उस हिस्से में; जहां रहते-रहते अपनी जमीन से बस कटते ही चले गए। हालांकि इस वर्तमान बसावट वाले अपने इस कस्बाई हिस्सा बन चुके गांव से ज्यादा लगाव तो अब भी बेगूसराय के ही उस हिस्से से है जो अपना जन्मस्थान तो है ही, पुरखों की जमीन भी है। उन पुरखों की जो कभी राजस्थान के किसी गांव से आकर यहां बसे, और सोलंकी राजपूतों के चार गांव बसा डाले, जहाँ अन्य तमाम जातियों के साथ मिलकर रहते रहे। गंगा के किनारे बसा यह गांव यानी ग्राम: हसनपुर, पोस्ट: परमानन्दपुर, परगना: मस्जिदपुर, थाना: बलिया लखमीनिया कहलाता है। जो अब भी अपने इसी नाम से जाना तो जाता है लेकिन लगभग प्रत्येक तीन-चार दशक पर इसकी चौहद्दी बदलती रहती है।

अब चौहद्दी बदलने वाली यह बात महानगर अथवा देश के किसी अन्य हिस्से में बसने-रहनेवालों को भले ही कुछ अजीब सा लगे। लेकिन बिहार या उत्तरप्रदेश के उन लोगों या गांवों की यही नियति है जो अवस्थित हैं किसी न किसी नदी के किनारे। जहां साल दर साल बाढ़ जैसी विभीषिकाओं के साथ-साथ हर दो-चार दशक के बाद नदी के कटाव के कारण दर-बदर होना जिनकी नियति है। और अजूबा यह कि ऐसी किसी त्रासदी को लेकर प्रभावितों के अलावा कहीं कोई चिंता देखी-सुनी नहीं जाती हो। सिवाय स्थानीय स्तर पर कटाव पीड़ितों के पुनर्वास की कुछ ढपोरशंखी सरकारी घोषणाओं के। अगर मामला कुछ बड़े स्तर पर हुआ तो अधिक से अधिक होता यही है कि कुछ स्थानीय नेताओं द्वारा जिला व प्रखंड कार्यालय पर कुछ धरना प्रदर्शन या विधानसभा में एकाध सवाल-जवाब।

लेकिन सच्चाई तो यही है कि अंतत: इन कटावपीड़ितो को छोड़ दिया जाता है अपने हाल पर ही। तो कुछ ऐसा ही था वह गांव हसनपुर जहां अपना जन्म हुआ।

गंगा किनारे का वह इलाका तब लगता था कि शायद दुनिया की सबसे खुबसूरत और सुरक्षित जगह यही है। गांव के इकॉनोमी की बात करें तो सबकुछ निर्भर था बस खेती-बाड़ी पर, अलबत्ता आस-पास के अन्य गांवों से यह गांव कुछ खास अगर था तो सिर्फ इसलिए कि यहां कुछ घर बनियों के भी थे। उस दौर के उनकी दुकानों को आज के जमाने का सुपर -स्टोर ही कहा जा सकता है। यहां लालाजी के पास रोजमर्रा की जरूरतों का सामान तो मिलता ही था। शादी विवाह व त्यौहारों से लेकर से लेकर तेरहवीं तक की सारी सामग्री उपलब्ध थी। यहं तक कि दुकान के एक कोने में एक अदद सिलाई मशीन के साथ हाजिर रहते थे दर्जी भी। इसके अलावा मोची से लेकर धोबी, बढ़ई, जुलाहा,नाई सभी जातियों के लोग रहा करते थे। गांव वालों में इस बात की ठसक भी देखी जा सकती थी कि हमारे यहां तो सबकुछ है, यानी किसी चीज के लिए किसी अन्य गांव के मुंहताज नहीं। ज्यादा जरूरत हुई तो बलिया बाजार और लखमीनिया स्टेशन, जिसकी दूरी थी ढाई कोस उन दिनों।

यह उन दिनों इसलिए कह रहा हूं कि तब यह गांव गंगा के कुछ ज्यादा करीब था, लेकिन अब गंगा कुछ ज्यादा करीब आ गई यानी पुराने बसावट वाली जगह पर और गांव दो छोटे-छोटे टुकड़े में बंटकर कुछ और नजदीक खिसक आया है उस बलिया बाजार की तरफ जो पहले प्रखंड मुख्यालय हुआ करता था। खेती की जमीन जब लगभग तीन दशक पहले नदी यानी गंगा माता की गर्भ में समा गया तब शुरू हुआ पलायन का दौर। साथ ही नदी की धारा बदलने से जो जमीन बाहर निकली, उसको लेकर शुरू हुआ खूनी संघर्षों का दौर भी। तब के खूंखार अपराधी अधिक यादव और कैलू यादव के गिरोह एवं उनके प्रतिद्वन्दी गिरोहों के आपसी मारकाट की दास्तां आज भी यहां के निवासियों के जेहन में है। अलबत्ता इस पलायन के दौर की एक अच्छी बात यही रही कि घर के पुरूष खासकर युवा सदस्यों ने तो रोजी-रोजगार के चक्कर में शहर का रूख किया किन्तु बाकी लोग वहीं बचे-बसे रहे। अपनी पुरानी बसावट से थोड़ा इधर-उधर होकर, और इन सबों के बीच बचाए रखा दुर्गापूजा की उस परंपरा को भी जिसकी शुरुआत सत्तर के दशक में हुई थी। किन्तु इसमें जो कुछ बदला वह यह कि प्रत्येक वर्ष मंचित होने वाले नाटकों या बाहर से बुलाए जानेवाली नाट्य मंडलियों का सिलसिला टूट ही गया। वैसे भी बिहार के गांवों में नाटकों के मंचन की परंपरा हो या आल्हा और रामलीला की धूम सबकुछ इस आधुनिकता और विकास की भेंट चढ़ चूका है।

लगभग सत्तर की दशक में जब अपना परिवार बेगूसराय के डुमरी में आ बसा तब इसका एक कारण तो यही था कि पुश्तैनी गांव पर मंडराता कटाव का खतरा। साथ ही एक दूसरा कारण था पिताजी की सरकारी सेवा और हम पांच भाई-बहनों की पढ़ाई-लिखाई भी। अलबत्ता इसके लिए बेगूसराय बाजार से लगभग एक डेढ किलोमीटर की दूरी के इस गांव के चयन की दो मुख्य वजह थी, जिसमें एक तो यह कि पिताजी को शहर में रहना पसंद नहीं था तो दूसरा था कि पिताजी के कॉलेज के दिन यहीं बीते थे; क्योंकि यह पिताजी का ननिहाल था। तब इस गांव को जिन बातों का गुमान था उसमें से एक तो शहर-बाजार के नजदीक रहने का, तो दूसरा था गांव में गंगा-जमुना तहजीब की मौजूदगी का। यानी आसपास के गांवों में शायद सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी यहीं थी। तब की स्थिति इतनी तो थी ही कि दुर्गापूजा पर आयोजित नाटकों में मुस्लिम समाज के लोग अगर भूमिका निभाते थे तो ताजिए के अवसर पर हाजिर रहते थे हिन्दू समाज के लोग। यहां तक कि मुहर्रम का ताजिया अगर किसी हिन्दू के दरवाजे तक किसी कारण, खासकर बिजली की तारों की वजह से नहीं पहुंच पाए तो उसका समाधान यही निकलता था कि ताजिए की ऊंचाई अगले बरस कम कर दी जाए। किसी बच्चे की तबियत अगर बिगड़ जाए तो मस्जिद के मुल्ला जी की फूंक शर्तिया इलाज मानी जाती थी दोनों समुदायों के बीच। वैसे तो तमाम जातीय, सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक गोलबंदियां के बावजूद इस परंपरा के निशान यहां अब भी मौजूद हैं। किन्तु संबंधों की वो गहराई थोड़ी कम से कमतर तो हो ही रही है। दूसरा बड़ा बदलाव जिसका असर इस गांव के ताने-बाने पर पड़ रहा है, वह है शहरीकरण की वजह से गांव की जमीनों की कीमत में आया उछाल। जिसको एक दुष्परिणाम जहां भुमाफियायों के उदय के तौर पर देखा जाता है। वहीं अच्छी बात यह है कि शहर का एक हिस्सा बन जाने की वजह से जहां बाजार का विस्तार यहां तक हुआ है वहीं कुछ बेहतर शिक्षा संस्थान भी खुल गए हैं। ऐसे में ग्रामवासियों या कहें कि वार्ड नंबर सात के निवासियों के पास भूमाफिया बनने के अलावा अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने का विकल्प भी है। क्योंकि शहर का सबसे बेहतर कहे जाने वाला गणेशदत्त महाविद्यालय तो पहले से ही इस पंचायत के मुहाने पर था ही।

 

 

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