पहाड़ के आंगन में जिंदगी का लोकेशन…. गांव उमसोफाई में अनीश रंजन के प्रयोग

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रविशंकर रवि, संपादक दैनिक पूर्वोदय

एक बार तो मुझे लगा कि अनीश भाई (फिल्म निर्माता अनीश रंजन) पगला गए हैं। मुंबई की चकाचौंध भरी जिंदगी से दूर मेघालय के एक वीरान पहाड़ पर नया प्रयोग करने पहुंच गए। वह भी पहाड़ पर खेती करना। जिस पहाड़ तक पहुंचना मुश्किल है, वहां पर आधुनिक तरीके से बिना खाद और दवा के उपयोग के खेती करने की सोचना रूमानी सोच नहीं तो और क्या है। पहाड़ पर खेती के लिए सैंकड़ों मजदूर की जरूरत होगी। ट्रैक्टर चाहिए, और ढेर सारा पैसा भी। रूमानी सोचना जितना आसान है, उसे जीना उतना ही कठिन। लेकिन कुछ लोग नवीनतम प्रयोग के लिए ही पैदा होते हैं।
यह बात भले ही फिल्मी लगे, लेकिन है बिल्कुल असली कि अजय देवगन, मनोज वाजपेयी, फिरोज खान, तब्बू, अनुपम खेर जैसे स्टार कलाकारों को लेकर अब तक दिल पर मत ले यार, दंश, कैश, समेत करीब छह फिल्में बनानेे वाला बालीवुड का एक फिल्मकार मेघालय के एक वीरान और दुर्गम, लेकिन मनोरम पहाड़ पर जाकर जीवन का असली फिल्म बना रहा है। वह फिल्म भले ही प्रेक्षागृह के दर्शकों के लिए नहीं होगी, क्योंकि यह एक प्रयोग है पूंजी की मदद से प्रकृति और समाज के बीच समरसता पैदा करने की। वह शख्स जंगल के बीच जाकर खेती कर रहा है, जहां तक पहुंचने के लिए लगातार नब्बे मिनट तक पहाड़ी पर पैदल जाना पड़ता है।

बिहार में गंगा मुक्ति आंदोलन के दिनों से अनीश प्रयोगधर्मी रहे हैं और एक पत्रकार के रुप में असम आए थे। बाद में फिल्म बनाने बंबई चले गए। पूर्वोत्तर का लोकेशन उनकी फिल्मों को आकर्षित करता रहा है। दंश फिल्म की पटकथा ही मिजो बागी नेता लाल डेंगा की जिंदगी पर आधारित है। लेकिन अब पूर्वोत्तर का लोकेशन उनकी निजी जिंदगी को भी भा गया है। इस फिल्म का लोकेशन मेघालय के खासी हिल्स की उन पहाड़ियों पर, जहां तक मैदान के लोग नहीं जा पाए हैं। उस लोकेशन के करीब कोई गांव तक नहीं है। बिजली नहीं है, मोबाइल का नेटवर्क नहीं हैं और न ही अन्य आधुनिक सुविधाएं। नमक और माचिश लाने के लिए कम से कम तीन किमी दूर की बस्ती में जाना होता है। ऐसा इसलिए भी है कि उन जनजातियों की जरूरत काफी सीमित हैं और बाजार से ज्यादा वे अपनी जरूरत की चीजें जंगल से ले आते हैं। बावजूद उसके वहां पर एक मस्ती है, ठंडी हवा हर वक्त बहती है। पहाड़ियों से उतरने वाली नदियों का नेटवर्क पूरी तरह व्यवस्थित है। वहां पर पहाड़ के ऊपर पहाड़ है। एक पहाड़ को पार करते ही दूसरा पहाड़ रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है। बादलों और धूप के खेल में पहाड़ के आकाश तक फैले कैनवास पर बनने वाली आकृतियों के रूप और रंग हर क्षण बदलते रहते हैं। बादल दिनभर खेलते हैं। बांस के झुरमुट से निकलने वाली हवा रात के सन्नाटे में एक विशेष कंपन पैदा करती है तो सुबह सूरज के उगने के पहले से पक्षियों की तरह-तरह की आवाज से जंगल का संगीत गूंज उठता है।

वह जगह गुवाहाटी से दूर नहीं है, लेकिन वहां तक पहुंचना आसान भी नहीं है। बारिश के मौसम में वहां जाना तो और भी मुश्किल है, क्योंकि पक्की सड़क को छोड़ने के बाद इकलौती बरसाती सड़क है, जिस पर कोई वाहन नहीं जा सकता। सड़क नाला में परिणत हो जाती है और पानी का तेज बहाव कदम को डगमगा देते हैं। उस जगह तक जाने के लिए गुवाहाटी-शिलांग रोड पर बर्नीहाट से आगे बढ़ने पर बीस माइल नामक स्थान से दायीं तरफ मुड़ना पड़ता है और करीब सोलह किमी तक जाने के बाद लाइलाथ नामक जगह पर गाड़ी छोड़ देनी पड़ती है। शिलांग से दो-तीन बसें वहां तक आती-जाती हैं। वहां पर एक चाय दुकान है, जहां पर खाने-पीने की जरूरी चीजें मिल जाती हैं। वहीं पर उमथना नदी पूरी मस्ती में बहती है और नीचे की तरफ गिरती है। इस वजह से पानी गिरने की तेज आवाज अनवरत आते रहती हैं। कुछ-कुछ दूर पर पहाड़ी नाले आकर उनमें मिलते जाते हैं। जिसके किनारे कई शौकिया मछली पकड़ने वाले बंशी लेकर बैठे नजर आते हैं, क्योंकि उस नदी की मछलियां स्वादिष्ट होती हैं।

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वहां से पहाड़ी रास्ते में लगातार पैंतालीस मिनट (तीन किमी) पैदल चलने के बाद उमसोफाई बस्ती आती है। जहां स्थानीय जनजाति के लोग रहते हैं। यह गांव भी उमथना नदी के किनारे बसा है। बारिश की वजह से सड़क मार्ग से गांव तक पहुंचना मुश्किल होता है क्योंकि वाहन जाने लायक पुल नहीं है, लेकिन पास में ही लोहे के तार पर झूलता हैंगिंग ब्रिज है। बरसात में लोग इस पुल से नदी को पार करते हैं। जब पानी नहीं हो तो इस मार्ग से जिप्सी गाड़ी गुजर सकती है। उस बस्ती को पार करने के बाद पहाड़ी रास्ता दुर्गम हो जाता है। पहाड़ की कच्ची लाल मिट्टी पर चढ़ाई मुश्किल होती है। हर तरफ फिसलन और जोंक के चढ़ जाने का डर। उसी मार्ग पर लगातार पैंतालिस मिनट चढ़ने के बाद अनीश भाई का कैंप नजर आने लगता है। जिसके लिए झाड़ियों को साफकर रहने लायक जगह बनाई गई है।

उस कैंप को गांव के लोग कंपनी कैंप कहते हैं। कैंप में सोलर लैंप से रात में रोशनी की व्यवस्था की गई है। बांस के बने घर के ऊपर ‘लाल टीन की छत’, निर्मल वर्मा के उपन्यास के लोकेशन की याद दिलाती है। उस पहाड़ी तक पानी लाने के लिए सामने के एक और अधिक ऊंचे पहाड़ से गिरने वाले झरने में पाइप लगाया गया है। जहां से पाइप के सहारे पानी नीचे जाकर बिना किसी पंप की मदद से ऊपर आता है। यह आर्किमीडिज के सिद्धांत ‘पानी अपना सतह ढूंढ लेता है’ पर आधारित व्यवस्था है। उसे शुद्ध करने के लिए सामान्य वाटर फिल्टर लगा दिया गया है, क्योंकि अन्य फिल्टर को चलाने के लिए बिजली नहीं है। सोने के लिए बांस के खंभे पर ही बांस की खपच्चियों को बिछा दिया गया है। साथ ही बांस का डाइनिंग टेबुल बना दिया गया है। शौचालय का भी अच्छा इंतजाम है। बांस के टाट से उस जगह को घेर दिया गया है। उसी तरह थोड़ा नीचे, लेकिन नदी के ठीक बगल में मजदूरों के लिए कमरे बना दिए गए हैं। कुछ औरतें पास के गांव से काम करने आती हैं। वैसे वहां पर सस्ते दर पर मजदूर उपलब्ध हैं, लेकिन अनीश मनरेगा की दर से मजदूरी देते हैं क्योंकि यह उनका मिशन है, व्यवसाय नहीं।

अनीश रंजन कहते हैं कि वे पूंजी की मदद से प्रकृति और समाज के बीच समरसता पैदा करना चाहते हैं, जबकि पूंजी लाभ के लिए प्रकृति का दोहन करती है। लोभ से समाज टूटता है। लेकिन यहां मकसद प्रकृति और ग्रामीणों के सहयोग से आर्थिक संभावना तलाशना है। जिसमें आय के साथ मजदूरों और पास के लोगों का भी भला हो। उन्हें रोजगार मिले, लेकिन प्रकृति को न्यूनतम क्षति हो। वे बोलते हैं कि ऐसे प्रयोग की सफलता का कोई फार्मूला नहीं है। लेकिन आगे चलने से कोई रास्ता जरूर निकलेगा। वे पास के गांव से एक-दूसरे को सहयोग करने का एक समझौता करेंगे। अपने मजदूरों का एसोसिएशन भी बनाना चाहते हैं। उनका मकसद साफ है। उन्हें आर्गेनिक खेती करने का जुनून सवार हुआ है।

खूबसूरत पहाड़ी पर बनाए खेतों को लेकर अनीश के कई सपने हैं ताकि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकें। बाद में भीड़भाड़ से दूर के प्रकृति नजारे को पसंद करने वाले पर्यटकों को भी बुलाने की योजना है, लेकिन फिलहाल तो वे अपने यूनिट के सदस्यों की मदद से आर्गेनिक सब्जी उगाने के अभियान में लगे हैं। पहाड़ की झाड़ियों को साफकर खेती लायक तो बनाया गया है, पर बड़े पेड़ों को यथावत रखा गया है। पत्थरों को बैठने की जगह के रूप में लगा दिया गया है। अभी कई लोग वहां पर काम करते हैं। तब हल्दी और अदरख की फसल लगी थी। कच्ची हल्दी के ढेर जगह-जगह दिख रहे थे। काफी केले भी थे।

अनीश रंजन की इस असली फिल्म के यूनिट के सदस्य और किरदार मजदूर हैं। औरत-मर्द और खेलते-कूदते उनके बच्चे। आमंत्रित किरदार के रूप में उस इलाके के राजा (मेघालय में राजा का दरबार आज भी लगता है), गांव प्रधान और अन्य ग्रामीण आते रहते हैं। मेघालय में राजा का भले ही प्रशासनिक अधिकार नहीं है, लेकिन वहां की सामाजिक व्यवस्था में राजा का महत्व है। भूमि की खरीद-बिक्री में राजा की सहमति आवश्यक है। हर क्षेत्र के राजा हैं, लेकिन बड़ा राजा शिलोंग में रहते हैं और उनका दरबार भी लगता है। वैसे हर छोटा राजा का भी अपना मंत्रिपरिषद है। बर्नीहाट इलाके के राजा केनसियाम हमारे सामने जींस और शर्ट में प्रकट हुए।

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दुर्गा पूजा के दौरान वहां जाने का मौका मिला। गुवाहाटी से गाड़ी से लाइलाथ तक पहुंचा। तब तक बारिश आरंभ हो चुकी थी। वहां से आगे का सफर पैदल तय करना था। बारिश से बचने को कुछ भी नहीं था। खैरियत यही थी कि रात में पहनने के कपड़े पोलिथीन में थे जिसे मैंने कंधे पर टांगने वाले थैले में डाल रखा था। बारिश से सर को बचाना था, इसलिए चाय दुकानदार से मैंने पोलिथीन का एक बैग मांग लिया और उसे सिर में लपेट लिया। करीब डेढ़ घंटे तक बारिश हुए रास्ते पर बांस की लाठी के सहारे जब मुख्य कैंप पहुंचा तो पहाड़ पर रात उतरने लगी थी। लेकिन अच्छी बात यही थी कि अंधेरा होने से पहले अनजान पहाड़ी रास्ते का सफर पूरा हो चुका था। मच्छरों से बचने के लिए धुआं कर दिया गया था। बांस के खंभे पर टंगे डाइनिंग टेबुल पर हमलोगों ने खाना खाया और मच्छरदानी लगाकर बिछावन पर बैठ गया। सोलर लाइट की रोशनी में सबकुछ दिख रहा था लेकिन कुछ पढ़ना संभव नहीं था।

थका था, इसलिए आधी रात तक जगने की आदत के बावजूद अनीश भाई से बात करते हुए दस बजे ही सो गया, लेकिन सुबह पांच बजे मंदिरों में हाथ से बजाने वाली घंटियों की आवाज के साथ नींद टूटी। मुझे लगा कि शायद पास किसी मंदिर में कोई पूजा कर रहा है। बाहर निकलकर देखने लगा तो एक मजदूर ने बताया कि यह घंटी की आवाज नहीं, किसी चिड़िया की आवाज है। कुछ देर बाद पता चला कि यह एक विशेष प्रकार के झिंगुर की आवाज है। हर तरफ से पक्षियों की अलग-अलग तरह की आवाज एक निश्चित सुर और अंतराल पर आ रही थी। दूर से किसी पहाड़ी झरने की आवाज। शायद जंगल का संगीत यही था।

घर से ब्रश ले जाना भूल गया था, इसलिए सामने खड़े पेड़ की एक पतली डाली को तोड़कर दतवन बना लिया। जब तक गांव में रहे, कभी ब्रश और टूथपेस्ट का इस्तेमाल नहीं किया। रोज सुबह नीम की डाली तोड़कर दतवन बना लेता था। जिभिया भी उसी को दो भाग में फाड़कर बना लेता था। कभी खेत जाने पर बबूल की डालियां तोड़ लाता था। जब झाड़खंड के मधुपुर में रहता था तो सखुआ की डाली से दतवन बना लेता था। जंगल में तो दतवन की कमी ही नहीं थी। लेकिन शहर में दतवन मिलते नहीं हैं। इसलिए ब्रश से दांत साफ करने की आदत पड़ गई। इसलिए उस रोज दतवन से अरसे बाद मुंह धो रहा था कि सामने पहाड़ के ऊपर लालिमा दिखी। सामने के पेड़ों पर अलग-अलग तरह के फूल दिख रहे थे। कहीं लाल, कहीं पीला और कहीं सफेद। लगा शायद धूप उगेगी।

(लेखक रविशंकर रवि दैनिक पूर्वोदय के संपादक हैं और पत्रकार, फिल्मकार व प्रयोगधर्मी किसानी अनीश रंजन के मित्र हैं।)

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