
एक बार तो मुझे लगा कि अनीश भाई (फिल्म निर्माता अनीश रंजन) पगला गए हैं। मुंबई की चकाचौंध भरी जिंदगी से दूर मेघालय के एक वीरान पहाड़ पर नया प्रयोग करने पहुंच गए। वह भी पहाड़ पर खेती करना। जिस पहाड़ तक पहुंचना मुश्किल है, वहां पर आधुनिक तरीके से बिना खाद और दवा के उपयोग के खेती करने की सोचना रूमानी सोच नहीं तो और क्या है। पहाड़ पर खेती के लिए सैंकड़ों मजदूर की जरूरत होगी। ट्रैक्टर चाहिए, और ढेर सारा पैसा भी। रूमानी सोचना जितना आसान है, उसे जीना उतना ही कठिन। लेकिन कुछ लोग नवीनतम प्रयोग के लिए ही पैदा होते हैं।
यह बात भले ही फिल्मी लगे, लेकिन है बिल्कुल असली कि अजय देवगन, मनोज वाजपेयी, फिरोज खान, तब्बू, अनुपम खेर जैसे स्टार कलाकारों को लेकर अब तक दिल पर मत ले यार, दंश, कैश, समेत करीब छह फिल्में बनानेे वाला बालीवुड का एक फिल्मकार मेघालय के एक वीरान और दुर्गम, लेकिन मनोरम पहाड़ पर जाकर जीवन का असली फिल्म बना रहा है। वह फिल्म भले ही प्रेक्षागृह के दर्शकों के लिए नहीं होगी, क्योंकि यह एक प्रयोग है पूंजी की मदद से प्रकृति और समाज के बीच समरसता पैदा करने की। वह शख्स जंगल के बीच जाकर खेती कर रहा है, जहां तक पहुंचने के लिए लगातार नब्बे मिनट तक पहाड़ी पर पैदल जाना पड़ता है।
वह जगह गुवाहाटी से दूर नहीं है, लेकिन वहां तक पहुंचना आसान भी नहीं है। बारिश के मौसम में वहां जाना तो और भी मुश्किल है, क्योंकि पक्की सड़क को छोड़ने के बाद इकलौती बरसाती सड़क है, जिस पर कोई वाहन नहीं जा सकता। सड़क नाला में परिणत हो जाती है और पानी का तेज बहाव कदम को डगमगा देते हैं। उस जगह तक जाने के लिए गुवाहाटी-शिलांग रोड पर बर्नीहाट से आगे बढ़ने पर बीस माइल नामक स्थान से दायीं तरफ मुड़ना पड़ता है और करीब सोलह किमी तक जाने के बाद लाइलाथ नामक जगह पर गाड़ी छोड़ देनी पड़ती है। शिलांग से दो-तीन बसें वहां तक आती-जाती हैं। वहां पर एक चाय दुकान है, जहां पर खाने-पीने की जरूरी चीजें मिल जाती हैं। वहीं पर उमथना नदी पूरी मस्ती में बहती है और नीचे की तरफ गिरती है। इस वजह से पानी गिरने की तेज आवाज अनवरत आते रहती हैं। कुछ-कुछ दूर पर पहाड़ी नाले आकर उनमें मिलते जाते हैं। जिसके किनारे कई शौकिया मछली पकड़ने वाले बंशी लेकर बैठे नजर आते हैं, क्योंकि उस नदी की मछलियां स्वादिष्ट होती हैं।
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उस कैंप को गांव के लोग कंपनी कैंप कहते हैं। कैंप में सोलर लैंप से रात में रोशनी की व्यवस्था की गई है। बांस के बने घर के ऊपर ‘लाल टीन की छत’, निर्मल वर्मा के उपन्यास के लोकेशन की याद दिलाती है। उस पहाड़ी तक पानी लाने के लिए सामने के एक और अधिक ऊंचे पहाड़ से गिरने वाले झरने में पाइप लगाया गया है। जहां से पाइप के सहारे पानी नीचे जाकर बिना किसी पंप की मदद से ऊपर आता है। यह आर्किमीडिज के सिद्धांत ‘पानी अपना सतह ढूंढ लेता है’ पर आधारित व्यवस्था है। उसे शुद्ध करने के लिए सामान्य वाटर फिल्टर लगा दिया गया है, क्योंकि अन्य फिल्टर को चलाने के लिए बिजली नहीं है। सोने के लिए बांस के खंभे पर ही बांस की खपच्चियों को बिछा दिया गया है। साथ ही बांस का डाइनिंग टेबुल बना दिया गया है। शौचालय का भी अच्छा इंतजाम है। बांस के टाट से उस जगह को घेर दिया गया है। उसी तरह थोड़ा नीचे, लेकिन नदी के ठीक बगल में मजदूरों के लिए कमरे बना दिए गए हैं। कुछ औरतें पास के गांव से काम करने आती हैं। वैसे वहां पर सस्ते दर पर मजदूर उपलब्ध हैं, लेकिन अनीश मनरेगा की दर से मजदूरी देते हैं क्योंकि यह उनका मिशन है, व्यवसाय नहीं।
अनीश रंजन कहते हैं कि वे पूंजी की मदद से प्रकृति और समाज के बीच समरसता पैदा करना चाहते हैं, जबकि पूंजी लाभ के लिए प्रकृति का दोहन करती है। लोभ से समाज टूटता है। लेकिन यहां मकसद प्रकृति और ग्रामीणों के सहयोग से आर्थिक संभावना तलाशना है। जिसमें आय के साथ मजदूरों और पास के लोगों का भी भला हो। उन्हें रोजगार मिले, लेकिन प्रकृति को न्यूनतम क्षति हो। वे बोलते हैं कि ऐसे प्रयोग की सफलता का कोई फार्मूला नहीं है। लेकिन आगे चलने से कोई रास्ता जरूर निकलेगा। वे पास के गांव से एक-दूसरे को सहयोग करने का एक समझौता करेंगे। अपने मजदूरों का एसोसिएशन भी बनाना चाहते हैं। उनका मकसद साफ है। उन्हें आर्गेनिक खेती करने का जुनून सवार हुआ है।
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दुर्गा पूजा के दौरान वहां जाने का मौका मिला। गुवाहाटी से गाड़ी से लाइलाथ तक पहुंचा। तब तक बारिश आरंभ हो चुकी थी। वहां से आगे का सफर पैदल तय करना था। बारिश से बचने को कुछ भी नहीं था। खैरियत यही थी कि रात में पहनने के कपड़े पोलिथीन में थे जिसे मैंने कंधे पर टांगने वाले थैले में डाल रखा था। बारिश से सर को बचाना था, इसलिए चाय दुकानदार से मैंने पोलिथीन का एक बैग मांग लिया और उसे सिर में लपेट लिया। करीब डेढ़ घंटे तक बारिश हुए रास्ते पर बांस की लाठी के सहारे जब मुख्य कैंप पहुंचा तो पहाड़ पर रात उतरने लगी थी। लेकिन अच्छी बात यही थी कि अंधेरा होने से पहले अनजान पहाड़ी रास्ते का सफर पूरा हो चुका था। मच्छरों से बचने के लिए धुआं कर दिया गया था। बांस के खंभे पर टंगे डाइनिंग टेबुल पर हमलोगों ने खाना खाया और मच्छरदानी लगाकर बिछावन पर बैठ गया। सोलर लाइट की रोशनी में सबकुछ दिख रहा था लेकिन कुछ पढ़ना संभव नहीं था।
घर से ब्रश ले जाना भूल गया था, इसलिए सामने खड़े पेड़ की एक पतली डाली को तोड़कर दतवन बना लिया। जब तक गांव में रहे, कभी ब्रश और टूथपेस्ट का इस्तेमाल नहीं किया। रोज सुबह नीम की डाली तोड़कर दतवन बना लेता था। जिभिया भी उसी को दो भाग में फाड़कर बना लेता था। कभी खेत जाने पर बबूल की डालियां तोड़ लाता था। जब झाड़खंड के मधुपुर में रहता था तो सखुआ की डाली से दतवन बना लेता था। जंगल में तो दतवन की कमी ही नहीं थी। लेकिन शहर में दतवन मिलते नहीं हैं। इसलिए ब्रश से दांत साफ करने की आदत पड़ गई। इसलिए उस रोज दतवन से अरसे बाद मुंह धो रहा था कि सामने पहाड़ के ऊपर लालिमा दिखी। सामने के पेड़ों पर अलग-अलग तरह के फूल दिख रहे थे। कहीं लाल, कहीं पीला और कहीं सफेद। लगा शायद धूप उगेगी।
(लेखक रविशंकर रवि दैनिक पूर्वोदय के संपादक हैं और पत्रकार, फिल्मकार व प्रयोगधर्मी किसानी अनीश रंजन के मित्र हैं।)
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