कदम-कदम पर कुओं का शहर कहे जाने वाले पटना में ढूंढ़े नहीं मिलते कुएं

अमरनाथ झा

पटना: बरसात के दिनों में जलभराव के कारण जब वर्तमान पटना में नारकीय स्थि​ती हो जाती है और कई-कई दिनों तक सड़क पर पानी जमा रहता है तो याद आता है कुओं का शहर पटना से जुड़ा अतीत और उससे जुड़ी सुखद स्मृतियां। तब शायद यह अंदेशा बहुत कम लोगों को होता होगा कि इसी पटना शहर का जल संभरण को लेकर अतीत में बहुत ही बेहतरीन व्यवस्था रही होगी और पटना को कुओं का शहर कहा जाता रहा होगा। लेकिन कहते हैं कि वर्तमान के आईने में जब अतीत को देखेंगे तो दर्पण में सुखद इतिहास झांकने लगता है और हमें याद दिलाता है कि हमने अपने अतीत को बिसरा कर क्या कुछ खोया है। इसी पृष्टभूमि में टटोलते हैं पटना के जल संभरण की व्यवस्था से जुड़े अतीत को और पटना शहर के कुओं को।
कुओं का शहर पटना
जैसा की उपर कहा गया कि पटना को कुओं का शहर कहा जाता था। यहां कई मुहल्लों के नाम कुओं के नाम पर है। कहते हैं कि मौर्य सम्राट अशोक ने अनेक कुओं का निर्माण कराया था। इनमें अगमकुआं सबसे प्रसिध्द है जिसे मौर्यकाल से भी पहले का बताया जाता है। सम्राट अशोक के समय उसके आसपास कई निर्माण हुए। इस कुएं का स्थानीय जन-समुदाय के बीच धार्मिक महत्व है और यह अभी तक सही सलामत बचा है। अन्यथा सैकड़ों कुओं का अतिक्रमण हो गया है और उनका नाम भर बचा है, निशान मिट गया है।


अगमकुआं की प्रसिद्धि
अगमकुआं की प्रसिध्दि के कई कारण हैं। पहला तो ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के कारण है। इसे मौर्यकाल से भी पुराना माना जाता है। ब्रिटिश शोधकर्ता लारेंस वाडेल ने इसके बारे में विस्तार से लिखा है। उसने 1902-03 की रिपोर्ट में लिखा है कि सम्राट अशोक बौध्दधर्म में दीक्षित होने से पहले यहां कैदियों को नारकीय यातना देता था। बाद में इस स्थान पर शाही कसाईखाना था। उसने इस जैन कथा का उल्लेख किया है कि पाटलीपुत्र के किसी राजा ने सुदर्शन नामक जैन मुनि को इस यातनागृह में फेकवा दिया था। पर अगली सुबह उस मुनि को कमल के फूल पर बैठा हुआ देखा गया। कनिंघम ने भी इस स्थान का उल्लेख किया है। उसने 1879-78 की अपनी रिपोर्ट में अगमकुआं के आसपास यक्ष की प्रतिमा मिलने का उल्लेख किया है। उसने निकट में देवी माता का मंदिर होने का उल्लेख भी किया है। इन सारे विवरणों से अगमकुआं का निर्माण कब हुआ और किसने कराया, यह पता नहीं चलता।
लोक मानस में इसके साथ जुड़ी कई किवंदतियां रची-बसी हैं। जिनका उल्लेख नाडेल ने भी किया है। कुआं के पास में ही शीतला माता का प्राचीन मंदिर है जिन्हें बड़ी चेचक की देवी माना जाता है। पहले चेचक होने पर लोग इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने आते थे। आज भी आसपास के लोग यहां पूजा करते हैं जिससे उनके घर में चेचक का प्रकोप नहीं हो।                              ….कुओं का शहर
जुड़ी हुई हैं कई पुरातन मान्यताएं 
इस तरह की मान्यताएं अगमकुआं के साथ भी जुड़ी है। कहते हैं कि पेट की बीमारियां इसका जल छिड़क देने से ही ठीक हो जाती है। जटिल बुखार होने पर भी लोग इसके जल छिड़कने से ठीक होने की बात कहते हैं। कुष्ट रोगी इसके जल से स्नान करते हैं। लोग कहते हैं कि जब कुष्ट का कोई इलाज नहीं था, तब इसी जल से स्नानकर अनेक रोगी निरोग हुए हैं। लेकिन इस पवित्र जल को कोई पीता नहीं। अगमकुआं के आसपास के पूरे इलाके को पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।  ….कुओं का शहर

माता गुजरी का कुआं
गुरु गोविंद सिंह जी की जन्मस्थली तख्तश्री हरमंदिर साहिब में उनके जन्मस्थल के पास ही एक चार सौ साल से भी अधिक पुराना कुआं है जिसे माता गुजरी का कुआं कहा जाता है। इससे एक कथा जुड़ी हुई है। कहते हैं गुरुजी के जन्मस्थान के पास ही माता गुजरी जी का कुआं है, जिसका पानी उनके जन्म के वक्त मीठा हुआ करता था। पास-पड़ोस व दूर-दराज के लोग भी इससे जल लेने आते। बाल गोबिंद पानी ले जाती औरतों के घड़े को गुलेल से ढेले मार कर तोड़ देते। माता जी ने रोज-रोज की शिकायतें सुन कर अभिशाप दे डाला कि कल से कुएं का पानी ही खारा हो जाये। माता जी के अभिशाप से पानी खारा हो गया। अब परेशान पीड़ित महिलाओं ने विनती की कि वे अपना शाप वापस ले ले। माता जी ने कहा, जाओ एक दिन यह स्थान बहुत बड़ा तीर्थ बनेगा। यहां देश-विदेश से तीर्थ यात्री आयेंगे और इस कुएं का पानी मीठा हो जायेगा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और आज भी इस कुएं का पानी मीठा है। सिख श्रध्दालु इस कुएं के जल को अमृत जल कहते हैं और अमृत पान के दौरान इसी कुआं के जल का उपयोग किया जाता है। यह कुआं कभी नहीं सूखता है और इसका जल मीठा है। इतना ही नहीं सिख श्रध्दालु इसका जल विदेशों में भी ले जाते हैं। कुआं हरमंदिर साहिब के दरबार साहिब के परिसर में ही स्थित है। कुओं का शहर
नहीं मिलता कदमकुआं का कोई निशान
कदमकुआं के नामकरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। इतिहासकार इसके नामकरण पर दो तरह का विश्लेषण करते हैं। एक के मुताबिक इस इलाके में एक विशाल कदम का पेड़ था। इसके नीचे में ही एक बड़ा-सा कुआं था, जिसके कारण इसे कदमकुआं कहा गया। दूसरी मान्यता के मुताबिक मौर्यकाल में कुआं बनाने का प्रचलन था। प्राचीन काल के कई रिंग वेल का भी साक्ष्य प्रदेश के अलग-अलग जगहों से मिला है। इतिहासकारों का कहना है कि इस क्षेत्र में कई कुएं थे। “कदम-कदम पर कुआं” से इसका नामकरण कदमकुआं के रूप में हुआ। कदमकुआं में जयप्रकाश नारायण रहते थे और उस जमाने की कई संस्थाएं हैं। पर वह कुआं जिसके नामपर यह मुहल्ला बसा है, वह खोजने से नहीं मिलता। यही हालत मखनिया कुआं की है।                                          ….कुओं का शहर

मगध महिला महाविद्यालय में 2000 वर्ष प्राचीन कुआं

एक कुआं पटना के अशोक राजपथ पर गांधी मैदान के निकट स्थित मगध महिला महाविद्यालय में खुदाई के दौरान एक कुआं मिला जो दो हजार वर्ष पुराना है। चक्र कूप या रिंग वेल तकनीक पर यह कुआं बना है। जानकारी मिलने पर जब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की टीम 9 जनवरी वर्ष 2015 की सुबह वहां पहुंची तो जांच के बाद पता चला कि यह रिंग वेल टेराकोटा ईंटों से बना है। इस बारे में आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के सुपरिंटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट एचए नायक के मुताबिक कुआं लगभग 2000 साल पुराना है। यह कुषाण काल का है। इस तरह के रिंग वेल के अवशेष वैशाली राजा विशाल के गढ़ और राजगीर स्थित घोड़ा कटोरा में भी मिले हैं।
पता नहीं कहां है मखनिया कुआं
पीएमसीएच के पास एक मुहल्ला है मखनिया कुआं। लेकिन वह प्रसिध्द कुआं कहां था, इसका पता नहीं चलता। कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि पीएमसीएच के सामने ही वह बड़ा कुआं था। उसे अतिक्रमित कर लिया गया और पाटकर वहां दुकानें बना दी गई। इनके अतिरिक्त भी पटना के कई मुहल्लों के नाम कुओं से जुड़े हैं। जैसे-चुनौटी कुआं,बटाऊ कुआं, जमनी राय का कुआं, मोटा कुआं। यह सारे पटना सिटी इलाके के मुहल्ले हैं।                                                                                                                                                  ….कुओं का शहर
पटना सिटी के कुएं
पटना सिटी इलाके के कई घरों में आज भी कुएं हैं और जल संकट के समय जब चापाकल और नलकूप सूखने लगते हैं तब इनके पानी से ही काम चलता है। नलकुपों के ठप्प होने पर मोटा कुआं, बटाऊ कुआं, सिटी स्टेशन के दक्षिणी छोर पर स्थित कुआं, मेहंदीगंज के कुएं पर पानी लेनी लेने वालों की भीड़ लग जाती है। चकारम मुहल्ले में एक पुराना कुआं है जिसे बड़ा कुआं कहा जाता है। कुछ साल पहले तक लोग इस कुएं का पीने का पानी लेने के लिए उपयोग करते थे। बताते हैं कि इस कुएं के चार कोनों से चार तरह का पानी निकलता था। एक तरफ के पानी से दाल जल्दी पकती थी, दूसरी तरफ का पानी बहुत ठंडा था तो तीसरी तरफ का पानी काफी मीठा और चौथी तरफ का पानी सामान्य था। कहा जाता है कि इस कुएं के भीतर करीब 40 फीट नीचे एक दूसरे कुआं है। इसे सम्राट अशोक के बनवाए सैकड़ों कुओं में से एक माना जाता है।                                                                                                                                          ….कुओं का शहर
चैनपुर इलाके में प्राचीन विशाल कुआं
गंगा से सटे चैनपुर इलाके में भी एक प्राचीन विशाल कुआं मौजूद है। बरसात के दिनों में इसका जलस्तर इतना बढ़ जाता है कि हाथ बढ़ाकर पानी निकाल लिया जाए। इसके किनारे सुंदर चबूतरा बना है जहां गांव के बड़े-बुजुर्ग बैठक करते थे। पर अब इस कुएं की हालत खराब है। पानी में गंदगी भर गई है क्योंकि कुएं की नियमित उडाही नहीं होती।

सबलपुर का बावली कुआं 

फतुहा से तीन किलोमीटर दूर है ऐतिहासिक सबलपुर गांव। यहां एक ऐतिहासिक प्राचीन कुआं है। लोग इसे बावली कुआं के
नाम से जानते हैं। बावली कुआं के बगल में सीढ़ी घर बना है,जिसके जरिए इस विशाल कुएं के अंदर प्रवेश किया जा
सकता है। स्थानीय लोगों के अनुसार ये सीढ़ियां कभी हमारे पूर्वजों को चार मंजिल नीचे की ओर ले जाती थीं। कुएं के बगल में मिट्टी के धंस जाने से नीचे का रास्ता बंद हो गया है। आज हम केवल इसकी दूसरी मंजिल तक ही जा सकते हैं। सीढ़ी से उतर कर चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। गैलरी मेें बने स्तंभों के साथ-साथ कुएं के अंदर के सारे काम में पत्थर का उपयोग किया गया है। शेष दोनों मंजिलें पहले जैसी ही हैं। नीचे की और तीसरी मंजिल तक आते-आते पानी की सतह नजदीक जाती है। उपेक्षा के कारण कबूतर,चमगादड़ और सांप-बिच्छू से
भरे कुएं का यह रहस्यमय मार्ग भी एक दिन बंद हो जाएगा। कुएं के बाहर तीन फीट लंबाई-चौड़ाई का एक वर्गाकार शिलाखंड जमीन पर उपेक्षित पड़ा है। इस शिलाखंड पर ज्यामितीय आकार में एक रहस्यमयी नक्शा भी बना है। रहस्यमयी नक्शे के बारे में स्थानीय लोगों के बीच कई कहानियां हैं। बुजुर्गों के अनुसार यह नक्शा उस गुप्त खजाने का है,जो इस कुएं में छिपा हुआ है। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह विष्णु का श्रीयंत्र या मांगलिक यंत्र भी हो सकता है। क्योंकि,बगल में ही ऐतिहासिक प्राचीन विष्णु मंदिर है,जिसे बिहार का एकमात्र विष्णु मंदिर भी कहा जाता है। बावली कुआं  और मंदिर के बीच पत्थर से निर्मित एक और प्राचीन कुआं है। कुएं में पांच फीट गहरे एक पत्थर पर देवनागरी लिपि में खोदकर कुछ लिखा हुआ है,जो शोध का विषय है। बावली कुआं की तरह का कुआं राजस्थान में देखने को मिलता है।

                                                                                                                                                        ….कुओं का शहर

अगली कड़ी में पढ़े तालाबों के शहर पटना में विलुप्त होते तालाबों की कहानी।

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