सुरवारि टोला से सैदपुर मठिया तक (झौवा पंचायत) के कुएं-तालाब का ऑडिट

 

हरेन्द्र प्रसाद सिंह
 जल और जीवन अभिन्न हैं। मानव और कुएं का संबंध आदिकाल से प्रमाणित होता है। जल बिन जीवन की कल्पना व अस्तित्व असंभव है। जल प्रकृति की अनुपम देन है। अमृतसो, वह भी पर्याप्त। आदिकाल से मानव जल स्रोतों के निकट अपना आश्रय बनाकर रहता आया है। नदी-समुद से दूर जब मानव बसने को मजबूर हुआ तो गड्ढे, पोखर, तालाब और घर-मकान के निकट कुएं की ईजाद हुई।
सुरवारि टोला से सैदपुर मठिया तक यानी पश्चिम गाछी से नोनिया टोली तक लगभग 40 कुएं थे। उनमें से आधे के जल पान का अनुभव है। किस कुएं का पानी कैसा है ये हम बता देते थे। इस गांव के कुएं नामी थे जिनमें बड़का दलान,लगनदेव स़िह दलान,बसराज सिंह ,बिदेशी स़िह,झोंटी,डा मौऱगसाह, मु. गंगजली और सैदपुर मठिया के कुएं खास प्रकार के थे। इन कुओं में कुछ के जगत पक्के ,चौड़े गोल थे,मजबूत थे जिनसे घरों की जलापूर्ति के साथ-साथ सिंचाई भी होती थी।कूड़,मोट फिर रहट चला करते थे। कूड़ से नहाने का मजा कुछ और था। जाड़े की सुबह ठंढा और गर्मी के दिन-दोपहर को ठंढा पानी देनेवाले ये कुएं अस्तित्व खो चुके हैं। कुछ कुएं को भर दिया गया, कुछ को स्थायी रुप से ढंक दिया गया।

आत्मीय लगाव अपने गांव के कुएं से

यदि अपने जीवन यात्रा की बात करूं तो मैंने जीवन के 70 बसंत देखें हैं, जिसमें आरंभिक 24—25 वर्ष गांव में ही अनवरत व्यतीत हुए। कुएं से पानी भरना,नहाना, कपड़े साफ करना और राहगीरों को पानी पिलाना नित्य कर्म था। सन! 1960 ईस्वी में कलमी आम का बगीचा मेरे अग्रज ने लगाया। मुझे प्रा​त: उठकर कुएं से पानी भर—भर कर पटाने का कार्य मिला जिसे मैनें सहर्ष स्वीकार। 20-25 बाल्टी पानी भरना और उससे आम के पेड़ों को पटाना मेरा नित्य कर्म हो गया। बड़का दलान के कुएं से यह कार्य मैं वर्षों करता रहा। बगीचा तैयार हो गया जिसमें मालदह आम, अमरूद लीची, नींबू, कटहल के पेड़ फलों से लद जाते थे।
अफसोस! 1971 ई की विनाशकारी बाढ़ ने बगीचे का सत्यानाश कर दिया। सिर्फ एक मालदह आम और लीची के पेड़ बच गये जो आज भी फल रहे हैं और गांव-टोले के लोग चखकर आनंदित होते हैं। यह बड़का दालान के कुएं के जल की ही देन है। जब भी उन पेड़ों को देखता हूं तो वह कुआं स्मृति-पटल पर उभर आता है। लगभग 10 घरों की जलापूर्ति उसी कुएं से होती थी-मुनी बबा के कुएं से। उसी कुएं में मेरे हम उम्र कृपाल की मौत डूबने से 1962 में हो गई थी। वह पानी निकालने गया, उसे मृगी आ गई उसे मृगी का रोग था और कुएं में गिर गया। लोगों के आते-आते वह काफी पानी पी चुका था। उसे निकाला गया, चाक पर नचाया गया, डॉक्टर बुलाया गया, किंतु वह तो स्वर्ग सिधार चुका था। उस कुंए की की बहुत सी यादें हैं-वर्णनातीत।

आम के मौसम में हम दो तीन साथी रात में आम चुनने बड़े बगीचे में जाते, चुनते, थैला भर-भर लाते। रखवालों की लालटेनें चुपके से उठाकर सतपटिया गाछी के कुएं में डाल देते थे। हमलोग कभी पकड़ में नहीं आये- इस शरारत में। कोई शक भी नहीं करता था क्योंकि हम पढ़ने में अच्छे थे, खेलने कूदने में अच्छे थे, बात-व्यवहार में अच्छे थे। झौवा बाजार वाले मु. गंगजली के कुएं में दुर्गा पूजा के अवसर पर आयोजित नाट्य समारोह में, एक दर्शक अद्र्ध निंद्रा में कुएं में गिरा और चल बसा। शव दूसरे दिन निकाला गया। वह व्यक्ति चैनपुरवा गांव का था। पृथ्वीराज चौहान नाटक के दृश्य चल रहे थे। उस समय मैं चौ​थी कक्षा में पढ़ता था और आगे बैठकर नाटक देखता था।

झौवां पंचायत में मात्र एक पोखरा है राम जानकी मंदिर का। बचपन में हम नहाते, तैराकी सीखते। फिर पीपल की चढ़कर तालाब के जल में छलांग लगाते, डूबा-डूबी, छुआ-छुई खेलते। जल में सांस रोककर डूबे रहने की प्रतियोगिता खेलते, खीरी का फल खाते, साधु जी से प्रसाद लेकर खाते हुए घर लौटते। कितने आह्लादकारी दिन थे, उस बचपन के,लड़कपन के। उसी पोखरा के तट पर दोल्हापाती खेलते हुए गिरे मुंह के बल। नीचे ईंट के टुकड़े थे। ठीक आंख के नीचे चोट लगी, खून बहा। साथियों ने कॉपी से कागज फाड़कर साट दिया और हमलोग अपना—अपना बास्ता उठाकर स्कूल चले गये। उस चोट की दाग आज भी मेरे बांयी आंख के नीचे अमिट है। यह दाग पोखरा तालाब की याद ता कयामत दिलाता रहेगा।
राम-जानकी मंदिर ,सुरवारि टोला का एक तलाब है जिस पर कई बार सरकारी योजना के तहत लाखों खर्च हुए किन्तु तालाब गड्डा बनकर ही रह गया। यह ग्रीष्म में जलविहीन ही रहता है। यहां दोनों छठ—पूजा बोरिंग चलाकर की जाती है। अभी वर्तमान विधायक द्वारा एक छोटा घाट बनाया गया है 2020 में। जैसा कि उपर बताया कि कभी हम बच्चे सालों भर उसी तालाब में नहाते थे, तैराकी सीखते थे, डूबा-डूबी खेलते थे। दिघवारा प्रखंड में मात्र तीन तालाब हैं… झौवां, हराजी और मानूपुर। फिर भी ये हाल है। जनप्रतिनिधियों को सिर्फ पैसो़ं से मतलब रहता है। यह दुःखद और चिंतनीय है। सरकारी माल,उनका माल। ठगे ग्रामीण, आवाक्।
हर घर-नल-जल योजना बिछा है। घर-घर हैंड पाईप जल-साधन है। हर घर में हैंडपंप लगता गया। कुएं परित्यक्त होते गए। दो वर्ष पहले नल-जल-योजना की शुरुआत हुई। जल-मीनार बने,पाईप ​बिछी ,मोटर चला, एक दो दिन जल आया वह भी सुबह आधा घंटा,शाम आधा घंटा। इस लिहाज से नल में जल सुरवारि टोला में छलावा बनकर रह गया। महीनों-महीनों एक बूंद भी किसी को नहीं मिला,न मिलता है। शिकायत निरर्थक।
कभी-कभी तो लगता है और यह दृष्टिगोचर भी होता है कि ऐसी सरकारी योजना से तो पारंपरिक कुएं ही अच्छे थे। लोग अपने अपने मुहल्ले के कुएं का साल में एक बार उराह(सफाई)मिलकर कर लेते, ब्लिचिंग पाऊडर ,पोटास डाल देते थे और स्वच्छ जल का उपयोग करते थे। हर घर नल-जल योजना को कहा जा सकता है,’देवकुर गइले दूना दुःख।’
जल दोहन से और जनसंख्या वृद्धि से जल स्रोत नीचे 80—100 चला गया है जबकि यह 25 से3 0 फुट पर था। प्रकृति को तकलीफ तो आप को भी तकलीफ।
यादें बहुत हैं। क्या लिखूं, क्या याद करूं? क्या बिसरूं? अस्तु मेरे गांव के तालाब, कुएं तब थे, अब नहीं हैं। प्रतिष्ठा और कीर्ति के प्रतीक कुएं और तालाब लुप्त प्राय: है। पूर्वजों की सोच और कीर्ति को शत नमन करते हुए वर्तमान की आधुनिकता का आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ लेखन को विराम।

 

आंसू से मुस्कान तक, धूप से छांव तक… जारी है झौवा गांव की यात्रा

 

धनंजय मासूम

कुछ यादें ऐसी होती है जो हर उम्र में और हर परिस्थिति में ज़िंदगी की परवरिश करती है। गांव का बचपन निराला होता है और उस समय की शरारतें किसी सूफ़ी मन की चंचलता जैसी होती है। मेरे अपने बचपन की कुछ स्मृतियां जो आज भी करती है मेरी परवरिश!
…बचपन मेरा जवान हुआ
माटी के संग खेला कूदा और सयान हुआ
बचपन मेरा जवान हुआ ।

लिबास बदन का तार-तार
रूहें ठहाके मार-मार
अमीरी को ललकार किया
पोखरा के घाट पे
शोख़ ठाठ-बाट साकार किया।।
जब मंदिर की घंटी बजी
मन गूंज-गूंज अज़ान किया
बचपन मेरा जवान हुआ …
माटी के संग खेला कूदा और सयान हुआ
बचपन मेरा जवान हुआ।

घर के आंगन में सेंध मार के
पपीता शरीफा आम चुराया
जैसे कंजूस की जेब से
थोड़ा सा उपहार चुराया।।

पकड़े गए , पीटे गये ,
कान पकड़ के खींचे गए
नही करेंगे फिर दोबारा
दशरथ बचन भी दिए गए
लेकिन …. जो सूरज …
अगले दिन जब चढ़ के सर पे आया
शरारत फिर बलवान हुआ …
बचपन मेरा जवान हुआ …
माटी के संग खेला कूदा और सयान हुआ
बचपन मेरा जवान हुआ ।।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *