गाँव गोधनी ने दिया पुनर्जीवन

 राजुरकर राज

मेरा गाँव गोधनी. बहुत छोटा सा गाँव है. कोई दो-ढाई सौ घरों का गाँव. महाराष्ट्र की उत्तरी सीमा से बहुत करीब. बैतूल जिले की मुलताई तहसील से महाराष्ट्र के अमरावती की ओर दक्षिण में जाने वाली सड़क पर प्रभात पट्टन कस्बे से पश्चिम की ओर तीन किलोमीटर दूर. अभी कुछ साल पहले ही सड़क से जुडा है. कुछ साल पहले ही मिडिल स्कूल भी खुला. कुछ सालों में ही कुछ पक्की दीवारों के घर बने हैं. मेरा घर अभी भी मिटटी की दीवारों और खपरैल वाला ही है.
गाँव में था, तो गाँव की महत्त्व नहीं समझ पाया था. शहर आने के बाद महसूस हुआ की कुछ नहीं बहुत कुछ छूट गया है. ख़ास तौर पर तब, जब उन्सठ साल की उम्र में गंभीर बीमार हुआ और राजधानी के बड़े अस्पताल ने घोषित कर दिया कि अब दो-तीन महीने और सेवा कर लीजिये. बहुत संभावना हैं नहीं. तब मेरी चचेरी बहन संगीता ने जबरन मुझे गाँव ले जाने की जिद की. बड़े भाई यादोराव जी ने भी कहा कि अंतिम संस्कार तो गाँव में ही करेंगे. गाँव जाना ही पड़ा. कहूँ, कि कार में डाल कर ले गई संगीता. तब छोटे भाई राजू ने आयुर्वेदिक वैद्य के पास अंतिम विकल्प के रूप में प्रयास करने का कहा. छः महीने रहा गाँव में. और मैं एक चमत्कार की तरह अभी पुनर्जीवन का सुख ले रहा हूँ.

 

मेरे  गाँव गोधनी की अपनी कोई ठीक-ठीक बोली-भाषा नहीं है. ये गाँव न पूरी तरह विदर्भ का हिस्सा है, न महाकौशल का. आसपास के कुछ गाँवों को मिलाकर इस इलाके को लोग घाटपट्टी का नाम देते हैं. हम जो बोली बोलते हैं, वह मराठी जैसी है, पूरी मराठी भी नहीं. हिंदी तो बिलकुल भी नहीं. आजकल लोग अब शहरी प्रभाव के कारण हिन्दी बोलना शान की बात मान रहे हैं. अपने को पढ़ा-लिखा बताने की गरज से हमसे अपनी बोली छोड़कर हिन्दी में बतियाते हैं, और हम अपनी बोली में बात करना चाहते हैं. अपनी छोटी उमर में जब हम पढ़ने लिखने शहर निकल गए, तब चिट्ठी-पत्री हिन्दी में लिखते थे. गाँव में कोई सभा-समारोह होता है, तो संबोधन-उद्बोधन हिन्दी में ही होता है. लिखाई-पढ़ाई हिन्दी में ही होती है. शादी-विवाह में तो आजकल वहाँ भी शहर की तरह ही फ़िल्मी रंगत छाने लगी है, पर जब पूरा देसीपन था, तब वहाँ रस्मो-रिवाज़ में जो गीत गाये जाते, उनमे कुछ घाटपट्टी की बोली में होते, तो कुछ हिंदी-बुन्देली के शब्द मिलाकर.

उन दिनों पाँचवी तक तो स्कूल गाँव में था. मेरी पढाई वहीं शुरू हुई. फिर गाँव गोधनी से लगे कस्बे प्रभात पट्टन जाना पड़ा. फिर बैतूल. और फिर गाँव के लिए मैं परदेसी हो गया. मेरी दादी कहती थीं ‘घर छोड़ा, आँगन परदेस हो जाता है’. कोई पैंतालीस साल पहले दादी ने टीन का एक छोटा-सा सन्दूक, एक दरी, अपने हाथों से सिली एक कथडी और दो-तीन भगोने दिए थे, जब बैतूल आया था पढ़ने. और सब तो अब नहीं हैं, लेकिन टीन का सन्दूक अभी भी मैंने सम्भालकर रखा है. उसे देखकर मैं अभी भी भावुक हो जाता हूँ.
प्रभात पट्टन की पढाई तक तो मेरे लिए पढाई करना कम और खेत में काम करना अधिक ज़रूरी माना जाता. पहले डीज़ल इंजन से सिंचाई होती थी, तब तक तो कुछ ठीक था. फिर कुछ दिनों बाद गाँव में घरों के लिए तो नहीं, खेतों के लिए बिजली लाइन आ गई तो कभी दिन तो कभी रात में सिंचाई करनी पड़ती. चौबीस घंटे बिजली तो आज भी नहीं मिलती, तब भी ऐसा ही था. ठण्ड के दिनों में रात-बिरात सिंचाई करना मजबूरी थी. ठण्ड में पजामा घुटनों तक खोंसकर जब सिंचाई करते तो ठण्डे पानी और मिटटी के कारण पाँव और हाथ की उंगलियाँ फटने लगती. कडकडाती ठण्ड और फटी उंगलियाँ रुला देती, पर पिता जी और दादाजी के आदेश परे मुझे और बड़े भाई को बारी बारी से जाना ही होता. तब मैं सोचता था कि क्या नसीब में यही कीचड़-मिट्टी है?

प्रभात पट्टन से गाँव जाते हैं तो मेरे गाँव गोधनी से बिलकुल सटी हुई नदी है ‘अम्भोरा’. कोई बारह-पन्द्रह किलोमीटर दूर बसे गाँव अम्भोरी से निकली इसलिए उसका नाम अम्भोरा है. मेरा घर इस ओर से गाँव का सबसे पहला ही ही है सो ‘अम्भोरा’ बिलकुल पास ही है, पूरब की ओर कोई ढाई-तीन सौ गज दूर. बरसात के दिनों में कई बार तो बाढ़ का पानी घर में घुस जाता है. एक बार तो इतनी भारी बाढ़ आई कि एक ओर की दीवार ही ढह गई थी.

 

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हम छठी कक्षा से पढ़ने के लिए प्रभात पट्टन जाते. हमारे घर से स्कूल की दूरी कोई पाँच-छह किलोमीटर थी. जाने-आने के लिए कोई साधन-सुविधा नहीं. कच्चे रस्ते से जाना होता था. बरसात के दिनों में भारी कीचड. गाय-बैलों के जाने आने के कारण उनके खुरों से बने गड्ढों में पानी भर जाता जो हमारे चलते समय पिचकारी की धार की तरह छूटता और कपडे खराब कर देता. तब उससे बचने के लिए अपनी हाफपेंट और शर्ट उतारकर किताब के झोले में रख लेते और पट्टन स्कूल पहुँचने से पहले पड़ने वाले नाले पर रुककर हाथ-पाँव धोकर पेंट-शर्ट पहनकर स्कूल जाते. पर बहुत मज़ा था. खासकर जब स्कूल से लौटते में मालूम होता कि नदी में बाढ़ है, पार कर पाना मुश्किल है, तो आसपास के खेतों से मूँगफली उखाड़कर खाने और बाद में खेत मालिक की डाँट-डपट का अलग ही आनन्द था. अधिक बाढ़ हुई और बहुत समय हो जाय तो कपडे की पोटली में रोटी-अचार या रोटी-बेसन गठियाकर गाँव गोधनी की ओर से हमारे पास इस पार फेंका जाता और हम सभी दोस्त पिकनिक जैसा मज़ा लेते.

अब गाँव गोधनी में साधन-सुविधायें आ गई हैं. पहले पूरे गाँव में पांच-सात घरों में ही रेडियो हुआ करता था, अब तो हर घर में टेलीविज़न हो गया है. मिट्टी के चूल्हे तो अब कुछ ही घरों में बचे हैं. तब ज्वार, बाजरे और मक्के की रोटी मजबूरी में खाते थे, अब शहर जैसा चलन हो गया है. गुड की चाय अब गाँव में नहीं मिलती. नयी पीढ़ी अब शहरी हो जाना चाहती है, जबकि पुरानी पीढ़ी के कुछ गिनती के लोग हैं अभी भी, जो यादें ताज़ा कर लेते हैं. गाँव में नदी से कुछ ही दूर हमारे घर के उत्तर में बहुत बड़ा पेड़ है इमली का, बहुत पुराना. इतना पुराना कि हमारे दादाजी भी कहा करते थे कि उन्होंने भी इसे इतना ही बड़ा देखा है. कहते हैं कोई ढाई-तीन सौ साल पुराना हो सकता है. इस पेड़ के बहुत बड़े-से तने से सटा हुआ हनुमान जी का मंदिर है. उसके चारों ओर बहुत बड़ा चबूतरा. इतना बड़ा कि वक्त-ज़रूरत कोई सौ-सवा सौ लोग एक साथ बैठ सके. वहीँ ‘गोठान’ है, जहाँ रोज़ सुबह गायें इकट्ठी होती हैं और चरवाहा एक साथ उन्हें चराने ले जाता है. इसी गोठान पर होली-दीवाली के उत्सव होते हैं. पन्द्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी पर झंडावंदन होता है. भागवत-भजन होते हैं.

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लम्बी बीमारी के बाद डॉक्टर की दवा, परिवार की सेवा और गाँव गोधनी की आबो-हवा ने मुझे पुनर्जीवन दिया है. तमाम असहमतियों के बावजूद मुझे गाँव अच्छा लगता है. पिछले आठ-दस सालों में गाँव कुछ ज्यादा ही याद आता है. तीन-चार महीनो में एकाध बार पिताजी से मिलने के निमित्त गाँव जाने का अवसर खोज लिया करता था. पाँच महीने पहले आकाशवाणी की लम्बी नौकरी के बाद सेवानिवृत्त हुआ हूँ. अब कुछ ज्यादा ही मन रमने लगा है. भोपाल में अपने घर से शुरू किये दुष्यन्त कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय की ज़िम्मेदारी पूरे समय गाँव में नहीं रहने देती. संग्रहालय अब घर से निकलकर बड़े भवन में चला गया, धरोहर अधिक और गतिविधियाँ तेज़. इसलिए लम्बे समय तक बाहर रहना संभव नहीं, पर जब-तब मौका देखकर निकल ही जाता हूँ. गाँव, घर, दोस्त सबका अपना आनन्द तो है ही. भोपाल में रहना मेरी ज़रुरत न होती तो मैं अब तक पूरी तरह गाँव का वाशिन्दा हो चुका होता.

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