वैशाली के गराही ग्राम पंचायत और उसके आसपास के जल स्रोतों का ऑडिट..दूसरा भाग

डॉ. शंभु कुमार सिंह

जैसाकि पहले भाग में वर्णन किया गया है, गराही ग्राम पंचायत में जल स्रोतों की कोई कमी नहीं रही। हालांकि इस पंचायत में कोई नदी नहीं बहती है परंतु नदी जैसा ही नजारा बरसात में चौरों का होता था। मोहिउद्दीन पुर गराही और चक हुदहुद गांवों के पश्चिम उत्तर पानी का भराव होता था जो बहसी होते हुए उत्तर पश्चिम को छूता था।

इसी जल विस्तार में बहसी पुल पर मछली की जाली लगी रहती थी और तब किस्म किस्म की मछलियां हमें खाने को मिलती थी। यह इस इलाके के मछुआरों के लिए रोजगार का भी एक साधन था। हम रोज देखते थे कि मलाहिनें सर पर मछली की टोकरी लिए हमारे गांव सहित आसपास के गांवों में बेचने आ जाती थी। इससे उनकी अच्छी कमाई भी हो जाती थी। देशी और ताजा मछलियों की भिन्न भिन्न किस्में हमें खाने को मिल जाती थी। मछली खाने के साथ कुछ उकारू लड़के मार भी खा जाते थे अपने अविभावकों से। कारण वही , “हे मलाहिन कोन मछरी ,……!” पर ऐसी घटना कभी कभार ही हो पाती थी। वैसे भी हमारे गांव के लड़के बहुत ही शालीन होते थे तो यहाँ इस तरह की बातें न के बराबर होती थी।

गांव का विद्यालय ….गराही ग्राम पंचायत

मछलियों में छोटी मछलियों की तादात ज्यादा होती थी। गैंची, सिंघी,पोठिया,गरई, टेंगड़ा,बोआरी,नैनी,कतला, बचवा, रोहू आदि मछलियां गांव में ही खाने को मिल जाती थी। हमारे गांव एक दो ऐसे थे जो लेते तो थे आधा किलो या पाव भर मछली पर मलाहिन से एक मंगनी भी मांगते थे। मंगनी मिल जाने पर एक चंगनी भी मांगते थे। अब यह कहानी भी विलुप्त हो गयी। पर यह मंगनी कांड होता बहुत रोचक था। मछली खाने के पूर्व एक अलग स्वाद की सृष्टि करता था। ….गराही ग्राम पंचायत

बिंदेश्वरी सिंह का कुआं ....गराही ग्राम पंचायत
शिवधारी सिंह का कुआं ….गराही ग्राम पंचायत

 

गराही ग्राम पंचायत  के सबसे सुंदर एक कुआं के मालिक थे शिवधारी सिंह । वह सुबह सुबह ही नहाते थे और केवल नहाते ही नहीं थे वरन जोर जोर से मंत्रोच्चार भी करते थे। कुछ शब्द तो हमसबों को अब भी याद है। एक छेदी सिंह भी थे उनका स्नान भी बहुचर्चित था। उस पर फिर कभी लिखूंगा। यह भी लिखूंगा कि कैसे एक कुआं सामाजिक समरसता का भी स्रोत होता है। यह भी कि तब दलित कैसे पानी पीते थे जिनको कुआं नहीं होता था?
चौरों में पानी होने से धान की फसल के साथ ईंख की अच्छी खेती होती थी। तब गोरौल चीनी मिल भी खुला हुआ था तो किसानों को इससे भी आय हो जाती थी। हम बच्चों को चीभने हेतु ऊँख भी मिल जाता था। यहां भी जो शरारती बच्चे होते थे वे ईंख ढ़ोते बैलगाड़ियों के पीछे से ईंख खींच खूब चीभते थे। हमारे गांव के दो आदमी ईंख मिल केलिये काम करते थे उनमें एक किरानी साहेब थे। किरानी साहेब मतलब रामविलास सिंह। छोटा कद पर बुद्धि बड़ी। दूसरे व्यक्ति थे हरेकिशुन सिंह । शरीर से पहलवान। तो हरेकिशुन सिंह से हमें देसरी स्कूल से आते उल्टलहा बड़ के नीचे तौल केंद्र से ईंख मिल जाता था।

 

पोखर तो एक गराही ग्राम पंचायत के कमालपुर में ही था जिसे हम कमालपुर पोखरी कहते थे । वह अब दलितों के द्वारा अतिक्रमित है और लगभग खत्म हो चुका है। अब वहां बथान है ,घर है ,दुआर है, जो नहीं है वह पोखरी नहीं है। इसी पोखर स्थानीय लोग छठ करते थे। यहीं दशहरा में विसर्जन हेतु हम कलश ले आते थे। एक और बात होती थी, विसर्जन के दिन ही दसई की समाप्ति होती थी तो कीड़ा हजरा की भूत बैठकी का विसर्जन यहीं होता था। गरीबचन हजरा का दल भी यही आता था। बाद में जत्तन ठाकुर का बड़का बेटा भी भूत की बैठकी करने लगा और उसकी भी बैठकी का विसर्जन इसी पोखरी होने लगा। पर अब न वो ओझा गुनी हैं ,न भूत बैठकी होती है और अब वह पोखर भी तो नहीं है जो कितने ही ओझा गुणी को अपनी गोद में डुबकी लगाते भूत को भगाने का साक्षी बना । एक तरह से इन पोखरों की समाप्ति न केवल जल संकट को बढ़ायी वरन ग्रामीण संस्कृति के एक बहुत ही रोचक पहलू के विलुप्त होने का भी कारक बनी। 

हमारे गांव से छठव्रती मंझीपुर पोखर जाते थे जो उफरौल चौक के सटे पहले है। उफरौल चौक गाजीपुर चौक के नाम से ज्यादा प्रचलित है। खैर ,क्यों प्रचलित है इस नाम से यह यहां मुद्दा नहीं है। तो बात करें पोखर की ही! मंझीपुर पोखर बड़ा था और इसके चारों किनारों पर लगभग दस गांव के छठ व्रती वहाँ छठ पूजा हेतु जाते थे। अब क्या स्थिति है बहुत सही सही जानकारी नहीं दे पा रहा हूँ क्योंकि मेरी माँ की मृत्यु के बाद मैं कभी उस छठ घाट नहीं गया। पर वह पोखर भी अतिक्रमित है। उस पोखर से हमारी न जाने कितनी बचपन की यादें जुड़ी हुई हैं। इस पर फिर कभी लिखूंगा । यह भी लिखूंगा कि लंका टोला के पूरब जो एक पोखर है उसकी हालत अभी क्या है? तब तक के लिए विदा दीजिये पर यह जरूर सोचिएगा कि विश्व की सबसे मूल्यवान धरोहर जल की हमने क्या दुर्गति कर दी और क्यों कर दी?
साथ ही यह भी विचारियेगा कि सभ्यता ,संस्कृति ,प्रकृति और जीवन के पोषक विभिन्न जल स्रोतों को हम धीरे धीरे कैसे नष्ट कर दिए?

…कमश: जारी।

वैशाली के गराही ग्राम पंचायत और उसके आसपास का जल स्रोतों (कुआं) का ऑडिट

 

 

 

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