प्रधानाध्यापक के प्रयास से बदल गयी गांव के प्राथमिक विद्यालय की सूरत …

मनीष अग्रहरी

फूलपुर: एक तरफ जहां सरकारी स्कूलों के नाम से ही बच्चे और उनके ​अभिभावक कन्नी काटने लगते हैं लेकिन उसी सरकारी विद्यालय में जब नौकरी पाने की बात हो तो लाखों लाख प्रतियोगी शामिल होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या है कि सरकारी स्कूलों की साख गिर रही है लेकिन उसी विद्यालय में नौकरी पाने की आकांक्षा अधिकांश छात्रों की होती है। ये कहानी ​किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं है बल्कि कमोबेश सभी प्रदेशों में सरकारी स्कूलों का यही हाल है। लेकिन कहते हैं न कि गुदरी में लाल पैदा होते हैं और कभी कभार गूलर पर भी फूल खिलता दिखाई देता है। तो आईये आपको एक ऐसे ​विद्यालय की ओर लिए चलते हैं,जहां एक प्रधानाध्यापक ने स्कूल की तस्वीर बदल दी है।
परिषदीय विद्यालयों की समाज में गिरती साख के बीच कुछ शिक्षक इस मिथक को तोड़ने के यत्न में है। वे अपने व्यक्तिगत प्रयास से विद्यालयों की आंतरिक,बाह्य संसाधनों को कान्वेन्ट के बराबर ला खड़ा कर दिये है। अलबत्ता इसमें उनकी जेबें तो ढीली हुई ही साथ ही नूतन प्रयास में अथक प्रयास भी करना पड़ा। कुछ इसी के सापेक्ष कार्य हुआ है प्रयागराज जनपद के फूलपुर विकास खंड अंतर्गत, चंदौकी गांव के परिषदीय विद्यालय में जहां प्रधानाध्यापक मिथलेश यादव ने अपने सहयोगी शिक्षकों के साथ पूरे विद्यालय का कायाकल्प कर दिया है।
कहते हैं ​न कि जब किसी की साख पर आंच आना शुरू होता है तो लोगों का विश्वास घट जाता है। कुछ ऐसे कहा जा सकता है परिषदीय विद्यालयों के बारे में। यद्यपि गत चार पाँच वर्षों में शासन ने काफी कुछ बदलाव लाने का प्रयास किया है। मिशन कायाकल्प के तहत विद्यालयों में भौतिक वातावरण को बदला गया है।खोती हुई साख और विश्वास को बहाल करनें में कुछ शिक्षक भी आगे आये है।जिन्होने अपनी तनख्वाह से विद्यालयों को कान्वेन्ट और प्राइवेट विद्यालयों के बनिस्बत ला खड़ा किया है। ऐसे ही प्रयास के लिये जाना और सराहे जा रहे है फूलपुर विकासखंड के प्राथमिक विद्यालय चन्दौकी के शिक्षक।

मिथलेश यादव, प्रधानाध्यापक

क्या खास है विद्यालय में –
*चार वर्षों से प्रति वर्ष लगभग बीस हजार रुपये अपनी तनख्वाह से शिक्षक विद्यालय में खर्च करते है।
*लगभग सभी प्राथमिक विद्यालय के बच्चे टाटपट्टियों पर बैठा करते है।लेकिन इस विद्यालय के बच्चे प्राइवेट विद्यालयों की तरह डेस्क बेंच का उपयोग करते है।

*दीवालों पर प्रिंट रिच इतना भरा पड़ा है कि देखने वालों की नजर नही उठती।
*शिक्षिकाओं ने खुद कूंची उठाकर दीवालों पर प्रेरणास्पद चित्र उकेरे है।
*टीएलएम का भंडार है विद्यालय।सभी कमरों में विषय संबंधी टीएलएम अत्यधिक मात्रा में है।
*वेस्ट मटेरियल से सुंदर सजावटी सामान बनवाए जाते है।जिनकी संख्या किसी प्रदर्शनी से कम नही है।
*कक्षा कक्ष की सभी दीवालें अलग अलग रंग की है जो बच्चों को खूब लुभाते है।
*कक्षा एक के बच्चों के लिये रंग बिरंगे खिलौने उन्हे रिझाते है।
*जिस प्रकार हम अपने घरों में खिड़कियों और दरवाजों पर पर्दे टांगते है।ठीक वैसे ही इस साल यहाँ पर्दे लगा दिये गये है।

शिक्षक के प्रयासों की हो रही है सराहना
हाल ही में जब विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने विद्यालय के आंतरिक भाग की फोटो को सोशल मीडिया पर डाला तो वह वायरल हो गया।लगभग एक दर्जन लोगों ने उसे शेयर किया और ढाई सौ लोगों ने कमेंट डाला।बीएसए भदोही,,बीईओ लालगंज,बीईओ सुरियावां,बीईओ अभोली जैसे गैर जनपदों के अधिकारियों ने बधाई दी।

टीम वर्क का है नतीजा
विद्यालय को सजाने संवारने में प्रभारी प्रधानाध्यापक मिथिलेश कुमार,सहायक अध्यापिका क्षमा मिश्रा व सहायक अध्यापिका शालिनी पटेल के टीम वर्क को पूरे ब्लॉक में सराहना मिल रही है। यह पूछे जाने पर कि उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कहां से मिली, प्रधानाध्यापक कहते हैं कि उन्हें यह प्रेरणा स्वर्गीय रामकुमारी, जो पहले फूलपुर ब्लाक के ही सराय अब्दुल मलिक गांव के प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका थीं, उन्हीं से मिली है। वे बताते हैं कि उस दौरान वे स्वर्गीय रामकुमारी के साथ बतौर शिक्षा मित्र कार्यरत थे। जब 2014 में ये चंदौकि गांव में प्रधानाध्यापक बने तो मिशन में जुट गए। बड़ी बात यह है कि विद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी न होने से शिक्षक स्वयं विद्यालय की साफ, सफाई करते है और उन्हें इस कार्य में साथी शिक्षकों का भरपूर सहयोग मिलता है।

यदि मिथिलेश यादव और उनके सहकर्मी शिक्षकों की शैक्षणिक पृष्टभूमि की बात की जाये तो प्रधानाध्यापक मिथलेश को छोड़कर बाकी सब शहरी परिवेश के है। मिथलेश एमबीए भी है, सहकर्मी शालिनी पटेल एम कॉम है, क्षमा मिश्रा बीएससी है। साथ में सभी बी एड है। विद्यालय में 70 फीसदी पेंटिंग जैसे रचनात्मक कार्यों को शिक्षिका, शालिनी पटेल ने खुद ही किया है सिर्फ 30 फीसदी पेंटिंग पेंटर से बनवाया गया।

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