डॉ. शंभु कुमार सिंह
पटना: गराही ग्राम पंचायत के जल स्रोतों के संदर्भ में पहले दो किस्तों में आपको बताया गया कि गराही ग्राम पंचायत अवस्थित जल स्रोतों की पूर्व और वर्तमान स्थिति क्या है? आप उसे पढ़ जान सके होंगे कि जीव जगत का सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक उपादान जल की कितनी दुर्गति हमने अपने गांवों में की है। तीसरी क़िस्त में हम जल प्रबंधन की अपने क्रियाकलापों को इंगित करते बावड़ी और सड़क किनारों के गबडों को विशेषरूप से रेखांकित करेंगे।
हम गराही गांव को कमाल पुर, मुकुंदपुर गराही, मोहिउद्दीन पुर गराही, चकबाजो मलाही,हुदहुद पुर,बंगड़ा, चकमलही, मेथुरा पुर गांवों का एक समुच्चय कह सकते हैं। वास्तव में ये गराही ही हैं मूल रूप से जो बाद में टोलों में बंट गए होंगे और गांव कहलाने लगे होंगे। ये सभी गांव इतने छोटे—छोटे हैं कि सभी को मिला कर जब एक गराही ग्राम पंचायत बनता है तब लगता है कि यह एक संपूर्ण गांव ही है।
गराही ग्राम पंचायत के मुकुंदपुर गराही और कमाल पुर के बीच से एक बड़ी सड़क गुजरती है। यह सड़क देसरी रेलवे स्टेशन से महुआ तक जाती है हालांकि यह देसरी से दक्षिण भी विस्तारित है और महुआ से भी आगे गयी हुई है। मुकुंद पुर गराही इसी सड़क के सटे पूर्व दिशा अवस्थित है और इस सड़क के ही ठीक पश्चिम कमालपुर गांव है। सड़क एक जमाने में बहुत चौड़ी हुआ करती थी। तीन लेन में थी और कच्ची थी। सड़क के दोनों ओर खन्ता था जिसे हमलोग सड़क किनारे की बड़ी नाली कह सकते हैं या गबड़ा भी। इस गबड़े में बरसात का पानी भरा रहता था। कभी—कभी तो सालों भर। यह गबड़ा या नाला तब रेन वाटर हार्वेस्टिंग का बहुत ही स्वाभाविक तरीका था। पानी छितराता नहीं था और नालों में गिर भूगर्भ में चला जाता था। यही कारण था कि तब हमारे गांव या आसपास जमीन के बहुत कम नीचे ही पानी मिल जाता था।
गराही ही में बहुत छोटे बड़े गबड़े थे। एक बावली भी थी बल्कि अभी भी है जिसका अतिक्रमण नहीं हुआ है और कूड़ों,कचरों तथा जंगल-झाड़ से जो अभी भरी हुई दिखाई देती है। देसरी महुआ सड़क से गराही दो सड़क से कनेक्ट होता है जो गांव के आवासीय क्षेत्र के उत्तर और दक्षिण से है। इसी दक्षिणी कनेक्टिंग सड़क के उत्तर बंसवारी से सटे बावली है। इस बावली में तब छह महीने से ज्यादा पानी भरा रहता था जिसमें कभी कभी उड़ीस से मुक्ति पाने के लिए गांव के लोग अपनी खटिया या चौकी डुबोएं रहते थे। कुछ लोग गाय भैंस भी नहला दिया करते थे। लेकिन अब यह सूख चुकी है और इसमें सपनेउर और खटास को विचरते देख सकते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि गराही ग्राम पंचायत के सड़क किनारों के ये नालें किधर गायब हो गयें? तो आइए ,चला जाये सीधे सड़क पर ही। चूंकि हमारा गांव अब न गांव रहा न शहर तो यहां आपको थोड़ा थोड़ा गांव भी मिल जाएगा और थोड़ा शहर भी। उसी का परिणाम है कि सड़क की दोनों तरफ अनगिनत दुकानें खुल गयी हैं। इन दुकानों में खैनी,पान,चूना, कचरी,पकौड़ी,मिठाई, फल, कोल्ड ड्रिंक, बोतल बंद पानी , गुटखा , कुरकुरे , लेज जैसे पॉलिथिनी पाउच में भरे अनगिनत उत्पाद आपको मिल जाएंगे। सड़क भी अब तीन लेन से एक लेन में तब्दील हो गयी है और पक्की हो गयी है।
सड़क पर चमचमाती कारें दौड़ती नजर आती हैं। टेम्पो भी धुंआ छोड़ता नजर आता है। जिस सड़क किनारे कभी नालों में पानी हुआ करता था वहां पान और खैनी की पीक सुशोभित है। कहीं कहीं पॉलिथिन के पाउचों की ढेर लगी हुई है। लोग दुकान आदि कर कुछ हद तक आर्थिक रूप से सबल हुए हैं पर पर्यावरण के स्तर पर कमजोर। लोगों का ध्यान अभी इस पर्यावरणीय संकट की तरफ नहीं जा रहा है। स्वाभाविक ही है क्योंकि आग लगने पर लोगों को निकलती धुंआ कभी कभी दिखाई नहीं देती पर आग की दहकती लपट उन्हें नजर आ ही जाती है। मुझे पता नहीं क्यों अभी से ही आग की दहकती लपट मुझे नजर आ रही है जिसमें हमारी प्रकृति जल रही हैं और हमसब जीव जंतु तड़प रहे हैं !
सोचता हूं,अब भी समय है,आइये एक वैज्ञानिक प्रकृति सौम्य जल प्रबंधन को अपनाएं और अपने भविष्य को सुखमय बनाएं।
(क्रमशः जारी..कृपया प्रतीक्षा करें गराही ग्राम पंचायत के जल प्रबंधन की चौथी और अंतिम क़िस्त की !)
यहां पढ़ें..
वैशाली के गराही ग्राम पंचायत और उसके आसपास के जल स्रोतों का ऑडिट..दूसरा भाग
पहली किस्त यहां पढ़ें…
वैशाली के गराही ग्राम पंचायत और उसके आसपास का जल स्रोतों (कुआं) का ऑडिट




