ब्रांड और विज्ञापन के पीछे सरपट भागता गांव

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डा.मीरा मिश्रा

मुन्नू से उसकी सखी केश्वरी का हाल पूछा। उसने बताया कई सालों से उसकी भेंट नहीं हुई है। मैंने उसके घर चलने को कहा। वह उदास हो गयी। अब मियांटोली में लोगों का आना जाना कम हो गया है। जबसे नयी सरकार आयी है सबके अंदर हिंदू मुस्लिम की भावना घर कर गयी है। अब वो भैया भौजी वाले रिश्ते सब अतीत की बातें हैं। कोई किसी पर विश्वास नहीं करता। मिंयांटोली के कुछ पुराने घर खंडहर हो चुके हैं। कुछ पर ताले जड़े हुए हैं । जो बचे हैं वे अन्दर से बन्द ही रहते हैं। मुझे यह देखकर बड़ा दुख हुआ कि मेरा गाँव जिसकी साझी संस्कृति पर मुझे गर्व था अब हिंदू मुसलमान में बंट गया है। मुझे नहीं मालुम बारी में अब ताज़िये निकलते हैं या नहीं।
घूमते हुए अपने घर के बगल के सामने खड़ी हो गयी। पहले वहाँ एक लंबे बरामदे से जुड़े हुए हुए दो कच्ची मिट्टी के कमरे बने हुए थे। जिसमें एक में झगडू काका अपनी दुधारू गाय भैंस बांधते थे और दूसरा खाली रहता था जो राहगीरों के लिये धर्मशाला और बच्चों के लिये खेलने के काम आता था। उसको हम बंगला कहते थे। बंगले के सामने बड़ी सी सहन थी जिसमें कच्ची जूट से बुनी कई चारपाइयां और चौकियाँ पड़ी रहती थीं। शाम होते ही उत्तर टोला के बच्चे और बूढ़े बूढियों का वहाँ जमघट लग जाता।

 

जब झगड़ू काका और इया जिंदा थे तब की बात ही निराली थी। कुँए पर ढेकुली लगी हुई थी और उनके अहाते में खूब सारी सब्ज़ियाँ होती थीं। उनके पास अपनी बैलगाड़ी भी थी जो बहू बेटियों को बेल्थरा रोड रेलवे स्टेशन से लाने के अलावा गोबर की कम्पोस्ट खाद ढ़ोने के काम भी आती थी। गाँव में लगभग सभी लोगों के दरवाज़े पर गाय,भैंस के अलावा बैल भी होते थे जिनके पास थोड़ी बहुत जमीन होती थी। काका अपने अहाते में अन्य सब्जियों के साथ जामुनी रंग के एक-एक किलो के गाजर भी उगाते थे जिसे उनकी दूध देने वाली गाय और भैंसें खाती थीं। दूध, दही का बहुत अधिक प्रचलन था। गाँव में यादवों के घर की औरतें मटके में दही लेकर घूम-घूम कर बेचती थीं। उन दिनों जोगी,फकीर भीख माँगने वाले गरीब पंडित, गीत गाने वाली नेटुआ समाज की भीख माँगती औरतें गाँव में बहुत दिखायी देती थीं। शाम होने पर कई बार कुछ पंडित बंगले पर ही अपनी आसनी जमा लेते। वहीं वे उपले पर अपने लिये लिट्टी चोखा और दाल बनाते और भोजन के बाद लोगों को खूब भजन सुनाते। मिंयाटोली में एक पहलवान थे जो बहुत अच्छा आल्हा ऊदल गाते थे। इया के सौजन्य से बंगले के बरामदे में उनकी कई बार महफिल सजती। गन्ने का ताज़ा रस जब पेरकर घर आता तो उसमें मलाई वाली दही डालकर इया अक्सर बच्चे बूढ़े सभी को बड़े प्यार से पिलातीं। हमारे बचपन की अधिकांश शामें वहीं खेलते झूमते कहानियाँ सुनते गुजरती।

 

अब बंगले की जगह पक्का मकान बन गया है जिसमें खूब बड़े गेट लगे हुए हैं। अंदर कमरे में सोफा लगा हुआ है और दीवाल के सामने बड़ी सी टीवी । हमलोगों को खड़ा देखकर झगड़ू काका के पोते की बहू हमारे पास आ गईं। हम वहीं उनकी सीढ़ियों पर बैठकर पुरानी बातें याद करने लगे परंतु उन्होंने न तो अपने गेट की सांकल खोली ना ही चाय पानी के लिये पूछा।उनके घर के अहाते में शुद्ध लेबरा नस्ल का काला कुत्ता जरूर भौंक भौंक कर हमारी कुशल क्षेम पूछ रहा था। उनका वह अहाता जिसमें कभी खूब सब्जियॉं होती थीं जंगली घासफूस और कूड़े से भरा हुआ अपने भाग्य को कोस रहा था।

 

कुँआ अब भी मौजूद था जिसे उन्होंने अपने घर के कूड़ा करकट का डंपिंग यार्ड बना रखा था। यह हाल गाँव के सारे कुंओं का था क्योंकि हर घर में हैंडपंप लगा हुआ था। कुछ बस्तियों में सरकारी पंप भी थे। पूरे मिश्रान में इक्का दुक्का गायों को छोड़कर कोई पशु दिखायी नहीं दिया। पशुओं के बथान और नाद सभी सपाट ईंटों के खडंजे से ढँके दिखे।अब सबके पाँवों में जूते चप्पलें आ गयी थीं इसलिये नरम मुलायम दूब की जगह लोग खडंजे वाली पक्की गलियों को ज़्यादा पसंद करने लगे थे।

जवाहर रोजगार योजना में गाँव की हर खाली जगह को खड़ंजे से ढक दिया गया था जो मुखिया की ईमानदारी को दर्शा रहा था। परंतु मेरा प्रकृति प्रेमी हृदय तो कुछ और चाहता था। उसे वह पाकड़ का मजबूत कद्दावर दरख़्त याद आ रहा था जिसके नीचे गन्ना पेरने वाली मशीन लगी हुई थी और बगल में गुड़ बनाने वाला बड़ा सा चूल्हा जिसपर लोहे का बड़ा कड़ाह कार्तिक माह की एकादशी से लेकर चैत बैशाख तक चढ़ा रहता था। उसे हर घर के दरवाजे पर नीम के बड़े-बड़े पेड़ याद आ रहे थे जिसकी ताजा टहनियाँ तोड़कर दातुन बनायी जाती थी। अब तो गाँव में पेड़ कहीं-कहीं दिखायी दे रहे थे जबकि मेरे बचपन में हर घर के सामने कोई न कोई पेड़ जरूर होता था।दातुन की जगह अधिकांश घरों में टूथपेस्ट का चलन हो गया है।

मेरी बड़की भौजी लाठी टेकती हुई आकर हमारे पास बैठ गयीं। अस्सी के आसपास उनकी उम्र होगी। अम्मां के समय की अब वही एकमात्र बुजुर्ग बची हुई हैं। वो भी अक्सर बीमार रहती हैं। उनकी आँखों में हम लड़कियों के लिये छलकता प्यार बार-बार आंसू बनकर उमड़ पड़ता था। सच कहूँ तो माँ पिता के गुजरने के बाद मैं भौजी से मिलने ही गाँव आयी हुई थी। भौजी पके आमों की श्रेणी में आ गयी हैं। कौन जाने कब टपक पड़ें। ईश्वर उनको लम्बी आयु दें।

भौजी की बात करते ही मुझे उनका वही रूप याद आता है जिसे मैंने बचपन में देखा था। लंबी चौड़ी गौरवर्णीय काया,बड़ी-बड़ी आँखें ,माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी,मधुर आवाज़ और सदा मुस्कुराता चेहरा। किशोर होते देवर और ननदों के लिये भौजाइयाँ ही तो जीवन के गूढ़ ज्ञान के दर्शन कराती थीं। उनकी प्यार भरी गालियाँ और छेड़छाड़,होली की हुड़दंग और तीज त्योहारों की उमंग कितनी भली लगती थी। हम छोटे बच्चों के लिये बड़ी भौजाइयां एक ऐसी माँ का रूप लिये होती थीं जिनसे बिना डरे झिझके हम एक दोस्त की तरह अपनी सारी बातें आराम से कह सकते थे। उस समय भौजी को भाभी कहने का प्रचलन शुरू हो चुका था परंतु हमें भौजी कहना ज़्यादा अच्छा लगता था।मैं तो पाँचवीं कक्षों बाद ही गाँव से शहर चली गयी। जब लौटी तब सबके चूल्हे अलग हो गये थे। परंतु भौजी का प्यार हमेशा एक जैसा बना रहा। आज भी वो मुझे बबुनी कह कर ही बुलाती हैं।
अभी हम बातें कर ही रहे थे कि उनकी पोती उनके हाथ में कोई टेबलेट पकड़ा गई।
मेरे पूछने पर उन्होंने बताया ,
ब्रूफेनवा है बबुनी। जब बदन में बहुत दर्द होता है यहीं दुकान से मँगवा लेती हूँ।
मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। पूछने पर पता चला गाँव की किराने की दुकान में ब्रूफेन,क्रोसीन,डाइजीन से लेकर तमाम तरह के प्रचलित ऐन्टीबायोटिक्स भी बिक रहे थे।

मुझे याद आया मेरे बचपन में कोई बीमार पड़ता था तो बगल के गाँव चन्दायल के यूनानी अस्पताल में चला जाता था। वहाँ एक बड़े अच्छे मुस्लिम डाक्टर थे जो सबका इलाज करते थे। अस्पताल का सुंदर परिसर बना हुआ था जिसमें डाक्टर और नर्स का भी घर था। पूरे कैम्पस में मालती लता और तरह तरह के विदेशी गुलाब लगे हुए थे। आठ बिस्तरों वाला वह यूनानी दवाखाना पूरे अठगांवा के लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल करता था।ज़रूरत पड़ने पर डाक्टर साहब गाँव में लोगों के घर भी मरीज को जाकर देख लेते थे।अब झोलाछाप डाक्टर हर गाँव में इलाज करते मिल जायेंगे। आज भी उस इलाके में कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर लोग मरीज को मऊ के फातिमा अस्पताल अथवा बनारस ले जाते हैं। जिनके पास पर्याप्त रुपये होते हैं वे बेल्थरा रोड में दुकानें खोलकर बैठे प्राइवेट अस्पतालों का रुख करते हैं।

अब गाँवों में छोटी मोटी बीमारियों में लोगों को काढ़ा,सौंफ,अजवायन की जगह डाइजीन और ब्रूफेन की लत लग चुकी है। वैसे भी गाँवों में बड़े उपभोक्ता वर्ग और उसकी जेब को देखते हुए कम्पनियाँ अपने उत्पाद बना रही हैं। अब गाँवों के लोग पाउच में मिलने वाले शैम्पू से बाल धोते हैं। गाँव की हर दुकान पर माला की तरह पान पराग तम्बाकू साबुन शैम्पू क्रीम सब पाउच में कम दाम में मिल जायेंगे। अब उनकी गुणवत्ता पर किसे ध्यान है। बस ब्रांड का नाम होना चाहिये जिसके बारे में लोग टीवी के विज्ञापनों से ज्ञान प्राप्त कर ही चुके हैं।

मैंने पिछली बार बंधा के पास गुमटी पर जब एक औरत को पान पराग और तम्बाकू के खतरों से आगाह करते हुए न बेचने का आग्रह किया तो वह नाराज होकर तुनकते हुए बोली,
‘बिटिया तुम तो मेरी रोजी रोटी पर लात मार रही हो। मेरी इस छोटी सी दुकान पर सबसे ज्यादा वही तो बिकता है।’
उन्हें इस बात से कोई लेना देना नहीं था कि गाँव के लड़के नशे की लत से बर्बाद हो रहे हैं। मुझे बुरा तो बहुत लगा परंतु यह देखकर खुशी भी हुई कि समय के साथ गांव की औरतों ने चलना सीख लिया था। घर चलाने के लिये अब बनिया समाज ही नहीं अन्य जातियों की औरतें भी किसी न किसी रोजगार से जुड़कर अपना पैसा कमा रही हैं। पहले पिछड़ी जातियों की कुछ औरतें अपने जातिगत व्यवसाय के हिसाब से सब्ज़ी,दही ,खरबूज तरबूज,ककड़ी आम,मछली सिर पर रखकर गाँव में घूमकर बेचा करती थीं । अब वे सड़क के किनारे अपनी झोंपड़ियों में खइनी, तंबाकू से लेकर लिट्टी-चोखा, चाय,समोसा, पकौड़े इत्यादि भी बेच रही हैं। मुझे अपने बचपन की चूड़िहारिन और मनिहारिन चाची की याद आ गयी। भौजी ने बताया चूड़िहारिन चाची अपने गरीबी के दिन बहुरने के बाद दिल्ली में इंजीनियर बेटे के पास रहने लगी थीं। वहीं उनका इंतकाल हो गया। मनिहारिनें जो सिर पर बक्सा लिये औरतों के साज शृंगार का सामान बेचने आती थीं वे भी अब नहीं आती हैं।

गाँव के अगल बगल दो पक्की सड़कें बन गयी हैं जिसपर जीप के साथ साथ बसें भी चलने लगी हैं ।गाँव की लड़कियाँ और बहुएँ अब जीप में बैठकर आधे घंटे में बेल्थरा रोड चली जाती हैं। वहाँ ब्यूटीपार्लर में मेकअप से लेकर हर तरह के जरूरी सामान उन्हें आसानी से मिल जाते हैं।गाँव की लडकियां वैसे भी मेहनती होती हैं। वे आपस में भी एक दूसरे की भौंहें बना देती हैं, मेंहदी लगा देती हैं। टीवी ने हमारे गाँव के लोगों का रहन सहन भी बदल दिया है।

मेरा ‘गांव’-मेरा ‘देस’

मैं भौजी के घर खाना खाकर फिर भतीजियों के साथ बैठकर गाँव को याद करने लगी। आज मुझे अम्मां ताजी के साथ साथ बड़की माई बहुत याद आ रही थीं। वो बच्चों को बहुत प्यार करती थीं। मेरे संयुक्त परिवार वाले घर में सबसे उम्रदराज थीं इसलिये मलिकाइन कहलाती थीं। गाँव में जब भी चनाजोर गर्म, गुड़ की पट्टी, लकठा,इमरती तथा बुढ़िया के बाल,बेचने वाले ,बाइस्कोप दिखाने वाले आते थे, माई तुरंत अपने आँचल की गाँठ खोलकर हमें पैसे दे देती थीं। पैसा नहीं होने पर हम डलिया भर अनाज से भी अपनी मनपसंद मिठाइयाँ खरीद लेते थे। माई हमलोगों को रोज कहानी सुनाती थी।वही हमें मेला भी दिखाने ले जाती थी। हम मेले में घड़ी,चश्मा, पानी वाली गेंद और बांसुरी जरूर खरीदते थे। चैत में सोनाडीह में पन्द्रह दिनों तक मेला लगता था। गाँव के लिये मेले मनोरंजन के साथ साथ अपने जरूरत की चीजें खरीदने और बेचने के लिये उपयोगी थे। माई हम बच्चों की जान थी। लड़कियों के लिये गोधन,पिंडिया,की तैयारी से लेकर सावन में नागपंचमी में झूले डालने में भी खूब रुचि लेती थी।

उस समय शादी ब्याह में बरात तीन दिन तक रुकती थी। लड़कियों की शादी में पूरा गाँव सहयोग करता था। जिनके घर दूध देने वाले जानवर थे वे एक दिन का दूध शादी वाले घर में मुफ्त में देते थे। सब्जी बोने वाले सब्जी का इंतजाम करते। खाना पीना टोले की महिलायें मिल-जुलकर बनाती थीं।शादी विवाह के लगन आमतौर पर गर्मी के महीने में उस समय ज़्यादा होते थे जब किसान रबी की फसल घर लाकर निश्चिंत रहता था। शादी के विधि विधानों में गाँव के सभी लोगों की भागीदारी होती थी। गांव का हरिजन जब डुगडुगी बजाता था तभी मानर (ढोलकी)पूज कर शादी के सभी शुभ कार्यों की शुरुआत होती थी। बढ़ई जो आम का पीढ़ा लाता था उसी पर दूल्हा दुल्हन बैठते थे। कुम्हार के बनाये हाथी घोड़े मंडप में रखे जाते थे। दूल्हा दुल्हन डोली में चढ़कर मुख्य सड़क पर खड़ी गाड़ी तक जाते थे। मुन्नू ने बताया अब गाँव में भी शहर की तरह सिर्फ एक दिन वाली शादी होती है।जयमाला होता है। कैटरर आकर खाना बनाते खिलाते हैं। शादी विवाह बस दिखावे का उत्सव बन कर रह गया है। वो धागा जिससे गाँव का हर वर्ग जुड़ा होता था अब अगड़ी-पिछड़ी,हिन्दू-मुस्लिम कई टुकड़ों में बंट चुका है।धर्म और जाति के नाम पर अब गाँवों में भी राजनीति होने लगी है। गाँव की गंगा जमुनी संस्कृति भी पानी और मिट्टी की तरह प्रदूषण का शिकार हो चुकी है।

बदलाव के विभिन्न पड़ावों से गुजरता मेरा गांव अमृत पाली

शाम का धुँधलका छाने लगा था मेरी बहन बीना जो मऊ में रहती थी मुझे जल्दी चलने के लिये कई बार बोल चुकी थी। मैं घरों की छत के ऊपर उठने वाले उस धुंए की लकीर का इंतजार कर रही थी जो मेरे बचपन में चूल्हे जलने का संकेत देती थीं। मुझे इक्का-दुक्का छोड़कर किसी घर के ऊपर वह धुँआ दिखायी नहीं दिया। हाँ, कुकर की सीटी जरूर सुनायी दी। बच्चों के चहकने की जगह टीवी पर बजते फिल्मी गानों का शोर सुनायी दिया।

अम्मां नहीं थीं इसलिये हम दोनों बहनें बिना खोंइछा भरे ही रुँधे गले से अपने गाँव से विदा हो लिये। भौजी गले लग कर खूब रोयी और मुझे भी रुलाती रहीं। मेरा गाँव अब पहले से बहुत खुशहाल है। लोगों का रहन-सहन खान-पान सबकुछ बदल गया है। औरतें घूँघट नहीं करतीं,बाजार जाकर खुद सामान ख़रीद लाती हैं । अब बेल्थरा रोड जाने के लिये आठ किलोमीटर पैदल नहीं चलना पड़ता। सब कुछ हैं परंतु मुझे तो अपने बचपन का वो बताशा,पटउरा,सजाव दही,बीजू आम और अम्मां के हाथ की बनी हथरोटिया ही याद आती है। उसकी जगह समोसा और पकौड़े तो कभी नहीं ले सकते। मेरा गाँव अब मेरा नहीं भौजी के पोते पिंकू का गाँव ज्यादा लगता है।

(डा.मीरा मिश्रा के गांव चैनपुर की कहानी की दूसरी व अंतिम कड़ी। लेखिका दिल्ली तथा पटना में सरकारी एवम् ग़ैरसरकारी संस्थाओं में कार्य करने के साथ साथ सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों से जुड़े आलेख,कविता एवं कहानी लिखती रहीं हैं।हंस,कथा,इन्द्रधनुष,आह्वान ,इत्यादि पत्र पत्रिकाओं में कहानी एवम् कविताएँ प्रकाशित।’चे ग्वेवारा की बोलीविया डायरी’ सहित तीन पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद। अनामिका प्रकाशन से’ प्रीत तुम्हीं संग ‘नामक कहानी की पुस्तक अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है।कविता की दो पुस्तकें प्रकाशन की प्रक्रिया में।)

मेरा गाँव स्मृतियों के पन्नों में…

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