परंपराओं को सहेजे आधुनिकता की डगर पर बढ़ रहा है मेरा गांव कुन्नमकुलम

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जॉब जकारिया, यूनिसेफ के छत्तीसगढ प्रमुख

कहते हैं कि हर व्यक्ति का एक गांव होता है और वह चाहे जहां भी चला जाए गांव की पहचान साथ लिये चलता है। कुछ लोग इस पहचान को पीछे छोड़ आते हैं तो कुछ इसे सहेजे हुए गांव की परंपराओं का हिस्सा बनते हैं और ऐसे ही किसी परंपरा किसी परंपरा का हिस्सा बनने मैं 30 साल बाद अपने गांव गया था। तो आईये आपको लिए चलता हूं केरल के त्रिशूर जिले में अपने गांव कुन्नमकुलम में जिसका मलयालम में अर्थ है पहाड़ियां और तालाब और साझा करता हूं उस गांव की कहानी जो कई मायनों में अनूठा है जहां परंपराओं, रीति-रिवाजों और संस्कार की जड़े काफी गहरी है और मुझे अपनी जड़ों पर गर्व है।

धार्मिक आधार पर आबादी का विश्लेषण करें तो गांव कुन्नमकुलम ईसाई बहुलता वाला गांव कहा जा सकता है। हमारे गांव के ‘अंगाड़ी’ (बाजार) क्षेत्र में लगभग 99% निवासी सीरियाई ऑर्थोडॉक्स ईसाई हैं। हमारे लिये यह जानना भी जरूरी है कि ऑर्थोडॉक्स ईसाई कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट नहीं हैं। वे रूस,ग्रीस, आर्मेनिया और मिस्र के ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों के समान हैं। भारतीय ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों का धार्मिक मुखिया (जिसे ‘पैट्रिआर्क’ कहा जाता है), इराक (अब लेबनान में) में रहते हैं। मेरे पूर्वज पहली शताब्दी में ईसाई बने, जब यीशु मसीह के शिष्यों में से एक सेंट थॉमस ने उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया। गांव में अब 18 चर्च हैं।

1789 में गांव कुन्नमकुलम में बड़ी संख्या में अन्य जगहों से लोग आए थे। इसके पीछे मुख्य वजह टीपू सुल्तान द्वारा उनके घरों पर आक्रमण करना और बड़ी संख्या में चर्चों को जला देना था। इस माहौल में जब वे उस जगह को छोड़कर इस ईलाके में आये तो स्थानीय राजा ने उन्हें आश्रय और भूमि दी। उन्हें मकान, गिरजाघर के लिए जमीन भी दी। साथ ही कोच्चि के राजा साक्थान थंपुरन ने उन्हें चर्च के रूप में इस्तेमाल करने के लिए एक मंदिर भी दिया था। यह अभी भी एक हिंदू मंदिर की तरह बना हुआ है। इस लिहाज से देखें तो खुशी होती है कि गांव में कितनी धार्मिक सहिष्णुता है !

त्योहार और रीति-रिवाजों के लिहाज से भी हमारा गांव कुन्नमकुलम खास महत्व रखता है। जैसा कि मैने बताया कि मेरे गांव में ईसाई अलग हैं, क्योंकि वे प्रार्थना, शादी और दैनिक जीवन में कई हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। वे केरल के मंदिरों की तरह ही तेल के दीये का उपयोग धार्मिक प्रयोजनों के लिए करते हैं। चर्चों और सभी समारोहों में तेल के दीये का इस्तेमाल किया जाता है। हमारे यहां क प्रमुख त्यौहार ओणम, ‘पिंडी पेरुन्नल’ और क्रिसमस हैं।

‘पिंडी पेरुन्नल’ त्योहार से पहचाना जाता है मेरा गांव
‘पिंडी पेरुन्नल’ 2000 साल पुराना त्योहार है, जो केवल मेरे गांव कुन्नमकुलम में ही मनाया जाता है, जहाँ ‘पिंडी’ (केले के पेड़ का तना) तेल के दीयों से रोशन होता है। बड़ी बात यह है कि लगभग 30 साल बाद, मैं केरल के कुन्नमकुलम में 2000 साल पुराने “पिंडी पेरुन्नल” उत्सव के लिए घर आया। यह त्योहार दिवाली के समान है, जहां हर घर एक ‘पिंडी’ (केले के पेड़ का तना) खड़ा करता है और इसे 5 और 6 जनवरी को तेल के दीयों से रोशन करता है। तेल के दीयों की जगह अब बिजली की बत्तियों ने ले ली है। फिर भी, जब मेरे गांव के सभी 5,000 घरों में दीप जलाए जाते हैं तो यह एक दृश्य बहुत ही मनमोहक होता है। यहूदी और हिंदू रीति-रिवाजों से प्रभावित त्योहार, 2000 साल पहले जॉर्डन नदी में यीशु मसीह के बपतिस्मा का प्रतीक है।

मंदिरों की तरह सजते है चर्च
इतना ही नहीं गांव कुन्नमकुलम में चर्च के त्योहारों को भी मंदिर के त्योहारों की तरह मनाया जाता है, जिसमें हाथी और ‘पंचवाद्यम’ (5 वाद्ययंत्रों का ऑर्केस्ट्रा, आमतौर पर मंदिरों में इस्तेमाल किया जाता है) के साथ मनाया जाता है। गांव में कुछ चर्च उत्सवों में 20 से 30 हाथियों की परेड होती है, जो मंदिरों में खास तौर विशेष अवसरों के लिए रखे जाते रहे हैं और इन्हें पर्व त्योहार में किराये पर भी दिया जाता है। चर्च फेस्टिवल में एक हाथी का किराया करीब 1-2 लाख रुपए होता है। चर्च के त्योहार इतने महत्वपूर्ण हैं और इनकी धूम इतनी होती है कि न सिर्फ केरल के बल्कि विदेशों में रहने वाले के प्रवासी (विशेषकर मध्य पूर्व के देशों में) चर्च के त्योहारों में भाग लेने के लिए वार्षिक अवकाश लेते हैं और इस मौके पर अपनी उपस्थिती दर्ज कराते हैं।


लाइन-हाउस की है गांव की पहचान
मेरा गांव कुन्नमकुलम लाइन-हाउस के लिए मशहूर है। ‘अंगड़ी’ की 20 गलियों में 2,000-लाइन वाले घरों में से केवल 3-4 हिंदू परिवार हैं और कोई मुस्लिम परिवार नहीं है। अधिकांश घर 100 साल पुराने हैं और कुछ ही कंक्रीट या नए घर हैं। लाइन-हाउस बिना जगह या घरों के बीच थोड़ी सी जगह के साथ बनाए जाते हैं। यह लोगों को सुरक्षा और सुरक्षा प्रदान करता है और भाईचारा का प्रदर्शन करता है ओर इसे बढ़ावा देता है। लेकिन इस तरह के लाइन हाउस का नुकसान यह है कि इसमें कार पार्किंग के लिए जगह नहीं है। इसी तरह के लाइन-हाउस पलक्कड़ और तिरुवनंतपुरम में ‘अग्रहरम’ (तमिल ब्राह्मणों के घर) में देखे जा सकते हैं।

‘अंगड़ी’ क्षेत्र में जनसंख्या अब कम हो रही है, क्योंकि कई लोग बड़े शहरों में चले गए हैं। बाजार क्षेत्र की सड़कों को एक क्रॉस की तरह डिजाइन किया गया है। उन्होंने इसे आक्रमणकारियों से बचाने के लिए इसे डिजाइन किया था। यदि भूले से भी कोई आक्रमणकारी यहां आ जाता है तो आक्रमणकारी यहां भूलभुलैया की तरह फंस जाएगा।
यदि गांव कुन्नमकुलम के लोगों के आर्थिक गतिविधियों की बात की जाये तो गांव कृषि प्रधान कम और व्यवसाय प्रधान ज्यादा कहा जायेगा। मेरा गांव (अब एक छोटा शहर) एक बड़ा व्यापार केंद्र है, और अधिकांश घर में भी दुकानें हैं। कुन्नमकुलम भारत में नोटबुक का सबसे बड़ा उत्पादक है। यह छपाई के लिए भी प्रसिद्ध है। दुर्भाग्य से, यह समय के साथ यह नकली माल के लिए बदनाम भी होता गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि गांव के व्यापारी, जो केरल में स्टेशनरी के सामानों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं, देश के अन्य हिस्सों में बने नकली सामानों की आपूर्ति भी करते हैं। इतना ही नहीं कुन्नमकुलम भारत में एक प्रमुख सुपारी (पान में प्रयुक्त) उत्पादक है। सुपारी पाकिस्तान सहित कई देशों को निर्यात की जाती है।

बदलाव के विभिन्न पड़ावों से गुजरता मेरा गांव अमृत पाली

गांव के सामाजिक व शैक्षणिक जीवन की बात की जाये या स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं की बात हो तो गांव कुन्नमकुलम को तरक्की पसंद माना जा सकता है। भले ही मेरा गाँव छोटा है, बावजूद इसके गांव में पढ़ाई लिखाई का प्रबंध बेहतर है। इस छोटे से गांव में 8 हाई स्कूल (ज्यादातर चर्च द्वारा प्रबंधित) और 4 अस्पताल हैं। सरकारी हाई स्कूल और सरकारी अस्पताल 1800 के मध्य में शुरू हुआ। गांव में वाईडब्ल्यूसीए भारत में सबसे पुराने वाईडब्ल्यूसीए में से एक है। खेलकूद की गतिविधियों की बात की जाये तो गांव का लोकप्रिय खेल बास्केटबॉल है। मेरे कई ग्रामीण वर्षों से राज्य बास्केटबॉल टीम के सदस्य थे।

मेरे गांव में एक और भी खासियत है 6 फूटर क्लब। अब आप सोचेंगे कि ये 6 फूटर क्लब क्या है। तो यह मेरे गांव की विशेषता है कि गांव कुन्नमकुलम में 6 फूट के कई लोग मिल जायेंगे। इसी को देखते हुए गांव में 6 फीट से ऊपर के लोगों का एक विशेष क्लब भी है। मेरे सहित मेरे सभी रिश्तेदार 6 फीट प्लस हैं। इस अनूठी घटना के लिए कोई भी तर्कसंगत स्पष्टीकरण देने में सक्षम नहीं है,बल्कि सुखद संयोग ही कहा जा सकता है।

पैतृक गाँव चमथा के लिए अपनी जवाबदारी

हमारा बचपन

जहां तक राजनीतिक सचेष्टता का प्रश्न है इससे पहले अंगड़ी क्षेत्र के 90% लोगों ने चुनाव में कांग्रेस को वोट दिया था। लेकिन अब स्थिती बदली हुई सी दिखती है और लोगों के राजनीतिक निष्ठाओं में बदलाव स्प्ष्ट दिखाई देता है। अब बदल गया है।
गांव में पर्यटन और विरासत केंद्र बनने की क्षमता है। आइयाल गांव, जहां ईसा पूर्व के रोमन सिक्के और प्राचीन गुफाएं मिली थीं, मेरे गांव से केवल 10 किलोमीटर दूर है।
(वर्तमान में यूनिसेफ छत्तीसगढ़ के प्रमुख हैं।झारखंड/तमिलनाडु/केरल में यूनिसेफ के प्रमुख रहे हैं।  पूर्व निदेशक शिक्षा भारत सरकार।)

पैतृक गॉंव चमथा में बीते बचपन के दिन भी क्या दिन थे

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