पैतृक गॉंव चमथा में बीते बचपन के दिन भी क्या दिन थे

अंजनी कुमार सिंह, सेवानिवृत्त आईएएस पूर्व मुख्य सचिव, बिहार

वैसे तो मेरा जन्म 1958 में सीवान जिला के रघुनाथपुर के पुलिस क्वार्टर में हुआ लेकिन पूरा बचपन पैतृक गॉंव चमथा में बीता। पिताजी स्व. रामराज सिंह पुलिस अफसर थे और मेरे जन्म के समय रघुनाथ पुर में पोस्टेड थे। माँ शिवदुलारी देवी गृहिणी महिला थीं। मैं चार भाई और एक बहन में दूसरे नंबर पर था। बड़े भाई अश्विनी कुमार सिंह गाँव में खेती करते थे, जो अब नहीं रहे। हमलोगों का संयुक्त परिवार था। पिताजी तीन भाई थे। दो भाई गाँव में रहते थे। हमारे घर में आज के हिसाब से एक अजीब नियम था। बच्चे अपने चाचा के साथ रहते और पढ़ते थे, माता-पिता के साथ नहीं। इस कारण परिवार में बहुत प्रेम था, इसी नियम के कारण मेरे माता-पिता के शहरों में रहने के बावजूद हम अपने गाँव में चाचाओं के साथ रहते थे। अपने बच्चों के लिए अधिक प्यार दिखाना या प्यार करना सही नहीं माना जाता था।

सबसे बड़े चाचा, जिन्हें सबलोग बाबूजी कहते थे, घर के मालिक थे। पैसे का हिसाब-किताब दूसरे वाले चाचा, जिन्हें सब लोग दादा कहते थे, रखते थे। दूसरे वाले चाचा के लड़के मेरे पिता जी, जिन्हें सब लोग लाला कहते थे, के यहाँ रहते और पढ़ते थे। संयुक्त परिवार होने के कारण बच्चों की अच्छी संख्या थी।

गाँव में दैनिक मजदूरी दो रूपया या दो सेर अनाज था। बहुत लोगों से जैसे नाई, लोहार, बढ़ई आदि के काम का नगद पैसा नहीं दिया जाता, बल्कि फसल होने पर उन्हें उत्पादन का हिस्सा मिलता था। जब अनाज, फल या सब्जी पैदा होकर घर आता तो उसका पहला हिस्सा ब्राह्मणों को दिया जाता था। उस समय रास्ते में मिलने पर या घर आने पर ब्राह्मणों को प्रणाम करने की परंपरा थी, भले ही वे उम्र मं़ छोटे हों। यह मुझे आश्चर्यजनक लगता था। छुआछूत की प्रथा थी, लेकिन धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। नये बच्चे जो स्कूल और कॉलेजों में पढ़ रहे थे वे छुआछूत को कम मानते थे। उनके साथ खेलने वाले बच्चों में सभी समुदाय के बच्चे होते थे।

हमलोगों के घर में अस्त्र-शस्त्र चलाने की और सही उम्र में सीखने की परंपरा थी। उस समय प्राय: चिड़ियों का शिकार होता था और उसी से हमलोग निशानेबाजी सीखते। बड़े लोगों की पहचान जमीन की मात्रा और अस्त्र-शस्त्र की संख्या से होती थी। हमलोग का परिवार गाँव के दस बड़े और धनी परिवारों में से एक था। मेरे दो चचेरे भाई मुझसे पहले नौकरी में आये। उनमें से एक ने मेरे पिता की मृत्यु के बाद मेरे कॉलेज के दिनों में मेरी आर्थिक सहायता भी की।
हमारे स्कूल के अधिकांश बच्चों ने बड़े शहर नहीं देखे थे और न ही ट्रेन आदि की यात्रा की थी। पिताजी पुलिस महकमे में थे और उनकी पोस्टिंग शहरों में हुआ करती थी। मैं छुट्टियों में अपने पिता के यहाँ चला जाता, इसलिए हम रेलगाड़ी, कार आदि से घूम चुके थे। छुट्टी में जब पिताजी के पास जाता तो माँ बड़े मन से हमारे लिए खस्सी बनाती। शहर जाने पर बहुत सारे फिल्में देखता। छुट्टी के बाद लौटकर उन फिल्मों की कहानियाँ और गीत सहपाठियों को बहुत इतराते हुए सुनाता।

पिताजी से जुड़ी कई यादें हैं। हमलोग अपने पिताजी से सीधे बात नहीं करते थे, या यों कहें, आँख मिलाकर बातें नहीं करते थे। जो भी कहना होता था, माँ के माध्यम से होता था या किसी दोस्त के मार्फत। जबतक वे बुलाते नहीं थे, हम उनके पास नहीं जाते थे। वे खाने के बाद सिगरेट पीते, लेकिन मुझे सिगरेट की गंध बिल्कुल पसंद नहीं थी। अभी भी नहीं है। वे शाकाहारी हो गये थे, लेकिन कोई भी उनके साथ मेज पर मांस खा सकता था। वे वॉलीबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे। डीलडौल भी लंबा चौड़ा। मुझे उनके साथ भी खेलने का मौका मिलता था। एक बार की बात है। हमलोग वॉलीबॉल खेल रहे थे। अभी दस-पंद्रह मिनट का खेल बाकी था। थाने पर एसपी साहब आ गये। पिताजी खेलते रहे। गेम पूरा होने के बाद ही वे एसपी साहब से रू-ब-रू हुए।

जब पिताजी रेलवे में इंस्पेक्टर थे, तब पहली बार मुझे दानापुर-हावड़ा ट्रेन में एसी फर्स्ट क्लास में यात्रा का अवसर मिला। वे शंकर भगवान के भक्त थे। जहाँ भी गये, मंदिर बनवाया। बाँका और कहलगाँव में भी मंदिर बनवाया। मुजफ्फरपुर में पोस्टेड थे, तब गरीब स्थान जाते थे। वहाँ पास में मजार पर भी जाते थे। वे धार्मिक तो थे लेकिन कर्मकांडी नहीं थे। प्राय: शाम में मंदिर जाकर ध्यान किया करते थे।

एक बार की बात है। मेरे बड़े भाई साहब कक्षा में फेल हो गये। उन्हें पढ़ने में मन नहीं लगता था। कोई और अभिभावक होते तो उस दिन उनकी कुटाई-पिटाई हो सकती थी। लेकिन पिताजी ने हौसला बढ़ाने के लिए एक मशहूर शेर कहा—
‘गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में. वो तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटने के बल चले।’
पिताजी बहुत उदार स्वभाव के थे। गरीबों की मदद के लिए सदैव तत्पर रहते थे। मुझे याद है, हमारे आवास पर एक लड़का रहता था। वह पढ़ने में अच्छा था, लेकिन अत्यंत गरीब परिवार से था। उसके पिता दूध बेचकर किसी तरह गुजर-बसर करते थे। मेरे पिताजी ने उसकी पढ़ाई पूरी करने में मदद की। बाद में वह लड़का ऑडिट ऑफिसर बना।
यादें पटना कॉलेज की और जेपी मूवमेंट की
गाँव से मैट्रिक करने के बाद पटना कॉलेज में दाखिले के लिए आवेदन किया। पटना कॉलेज में इंटरमीडियट कोर्स में नामांकन लिया। मुझे वह दिन याद है, जब मैं पहले दिन कॉलेज में प्रवेश किया। एडमिशन लिस्ट और क्लास रूटिन एक साथ टंगे थे। पहले दिन ही पाँच-छह दोस्त बन गये, जो आखिर तक बने रहे। पटना कॉलेज कला संकाय का एक प्रतिष्ठित कॉलेज था। बिहार के बेस्ट स्टूडेंट यहाँ दाखिला पाते थे। दीवारों पर लिखा था, ”बिहार में जो भी श्रेष्ठ है, वह पटना कॉलेज का है।” हम इसे पढ़ते और गर्व से भर जाते। हम उस पटना विश्वविद्यालय में थे, जो कभी ईस्ट का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था। मेरे लिए जैक्सन हॉस्टल में कमरा एलॉट हुआ।

मैं कॉलेज में ही था कि वर्ष 1974 का जेपी मूवमेंट शुरू हो गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति के लिए अभियान चलने लगा। उस समय मैं इंटरमीडियट का छात्र था। उम्र यही कोई सोलह-सत्रह की रही होगी। जयप्रकाश जी द्वारा युवाओं एवं विद्यार्थियों से आह्वान किया गया था कि वे इस अभियान का हिस्सा बन समाज में परिवर्तन लायें। हमारा समाज जात-पात, धर्म-सम्प्रदायवाद, भ्रष्टाचार जैसी कुरीतियों से भरा था। इन कुरीतियों को मिटाकर एक नये समाज की संरचना करनी थी। संपूर्ण क्रांति अभियान पटना एवं पटना विश्वविद्यालय में बड़ी तेजी से फैला और धीरे-धीरे यह पूरे राज्य और देश के अन्य राज्यों तक गया। सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक कुव्यवस्था से त्रस्त युवा एक परिवर्तन चाहता था।

जैक्सन छात्रावास

जैक्सन छात्रावास में अभियान को गति देने के लिए बैठकें होतीं और समाज के अन्य वर्ग से संपर्क कर उन्हें इस अभियान का हिस्सा बनाने के लिए प्रेरित किया जाता। एक दिन तय हुआ कि छात्रावास के सभी लोग अपने-अपने गाँव जायेंगे और गाँव के आसपास के क्षेत्रों के लोगों को संपूर्ण क्रांति से जोड़ेंगे। आगे की पढ़ाई जारी रही और 1980 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में चयन हुआ और बिहार कैडर भी मिला। नौकरी के दौरान गाँव आना-जाना तो कम ही हुआ, लेकिन गाँव हमेशा जेहन में बना रहा है। जहाँ भी रहा वहाँ गाँव के साथ अपने रिश्तों को जीता रहा और गाँव की तरक्की में अपने हिस्से की जवाबदारी निभाने की कोशिश रही।

चमथा गांव के युवा अविनाश चंचल की राय

अविनाश चंचल

21वीं सदी का गाँव मजेदार है। बहुत से परिवार में लड़कियां पहली बार मैट्रिक बोर्ड दे रही हैं। पढ़ने के लिए वे अपने घर में लड़ रही हैं। साइकिल से बाजार-शहर सब जा रही हैं।
मोबाइल ने क्रांति लायी है। रेडियो बीते जमाने की बात हो चली है। अब घर-घर टीवी आने लगा है। दूरदर्शन नहीं केबल चैनल है। दुनिया-जहान की लोगों को खबर है। लगभग हर दूसरे-तीसरे घर में मोटरसाइकिल खरीदा जाने लगा है। मनरेगा और भोजन का अधिकार जैसी योजनाओं ने मजदूरों के जीवन-स्तर को बदल कर रख दिया है। ठीक है योजनाओं में जबरदस्त भ्रष्टाचार है। लेकिन इसी मनरेगा ने गाँवों में मजदूरी बढ़ायी है। अक्सर कथित ऊंची जातियों के लोग आपको इन प्रगतिशील योजनाओं का विरोध करते दिख जाते हैं।
उनको गुस्सा है बंधुआ मजदूरी खत्म हो गया। गाँव में स्कूलों की संख्या बढ़ी है। गरीब बच्चों को स्कॉलरशिप दिया जा रहा है।
गाँव के पुराने लोग बताते हैं- पहले गरीब के बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। आज वे सरकारी अस्पताल में पैदा होते हैं। डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध है। महिलाओं को चक्की नहीं पीसनी पड़ती, उसके लिए गली-गली आटा मिल है। पानी के लिए एक किलोमीटर दूर किसी के कुंए पर नहीं जाना पड़ता, अब घर-घर सरकारी हैंडपंप है।

गरीब शहर जा रहा है। नौकरियों में जा रहा है। मेहनत-मजदूरी करके लौटकर छोटे-छोटे जमीन खरीद रहा है और अपना जीवनस्तर बेहतर कर रहा है।
अपने बच्चों को पढ़ाने की चिन्ता कर रहा है। उनको कानून की समझ है। पंचायत चुनाव में महिलाओं-दलितों-पिछड़ों को आरक्षण है। भले अभी महिलाओं के पति ही चुनाव-पोस्टर पर दिखते हैं, लेकिन इसी बहाने हजारों सालों से घर में कैद औरतें घर की दहलीज लांघ रही हैं। एक चुनाव-दो चुनाव के बाद वैसा वक्त भी आने वाला ही है जब ‘मुखिया पति’ पोस्टर से गायब होंगे। सवर्ण जातियों में इस बदलाव को लेकर गुस्सा है। अभी उनकी स्थिति खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे जैसी है। उनके लिए तो जितनी जल्दी इस बदलाव को समझ लें, उतना अच्छा है।
कानून और संविधान ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को बहुत मजबूत बनाया है और उसमें आर्थिक पहलू को भी जोड़ा है।

शहरी नजरिए से देखें तो ये सब हो सकता है छोटी-छोटी बातें हैं, लेकिन करोड़ों बहुजन के जीवन में असल परिवर्तन आया है। सवर्ण जाति के लोग इन सब परिवर्तनों से चिढ़ते हैं। उनकी शिकायत है- जमाना खराब हो गया है। घोर कलियुग आ गया है, जबकि बहुजनों के लिए ये असल सुराज है। इस सुराज के असल हीरो अंबेडकर हैं, उनका लिखा संविधान है।

भले हमारा समाज, गाँव आधा भी नहीं बदला है। अभी बहुत कुछ बदलना है। बहुजनों की हिस्सेदारी और मजबूत होनी है। उन्हें नये मकाम बनाने हैं। लेकिन इन सब चुनौतियों के बीच इन छोटे छोटे बदलावों को दर्ज करना जरुरी है।

(चमथा गॉंव के कहानी की दूसरी व अंतिम कड़ी।)

पैतृक गाँव चमथा के लिए अपनी जवाबदारी

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