
अम्मां के गुजरने के 6 साल बाद 2019 में मैं अपनी बहन बीना के साथ अपने गाँव चैनपुर गई थी। मुझसे मिलने मेरी दो भतीजियाँ भी अपनी ससुराल से आ गयी थीं। मैं दिनभर गाँव की सुनसान गलियों में अपनी यादों में बसे उस गाँव की चहल पहल को तलाशती रहीं जो न जाने कहाँ गुम हो गयी थी। माँ पिता के जाने और भाइयों के शहर में बस जाने के बाद एक बूढ़े भैया रह गये हैं जो घर में टिमटिमाते दिये की तरह रोशनी पकड़ कर अंधेरे से लड़ने की पुरजोर कोशिश करते रहते हैं। मेरे घर के अगल बगल दोनों घरों के दरवाजों पर ताले लटके हुए थे। कुछ अन्य घरों में लोग थे परंतु उन्हें गाँव की बेटी के मायके आने से अब कोई फर्क नहीं पड़ता। सभी अनजाना सा भाव लिये अपनी दुनियाँ में व्यस्त दिखे।
मेरी बड़की भौजी अपनी झुकी कमर के सहारे कुशल क्षेम पूछती हुई हमारे लिये चाय नाश्ते का प्रबंध कर रही थीं। बचपन से जुड़ी यादों के पिटारे में से कई चेहरे काल कवलित हो चुके थे। जो थे वे अधिकांश नये थे। मैं स्मृतियों के पन्नों में उस गाँव को ढूँढ रही थी जिसमें मेरे बचपन का कुछ हिस्सा गुजरा था। गाँव वही था,गलियाँ भी वही थीं परंतु गाँव की जिस सोंधी महक से मेरा वास्ता था उसका दूर दूर तक पता नहीं था। कई जगह भूगोल भी बदला दिखा तो कई जगह कुछ नये इतिहास बिखरे मिले।यादों के पन्ने पलटती मैं अपने गाँव के खेत खलिहान ,नदी बथान घर आँगन हर जगह घूमने लगी।
नदी की मुख्यधारा हर पाँच दस साल पर अपनी सीमा बदलती रहती है। कभी यह उत्तर की ओर देवरिया जिले की सीमा की ओर रुख कर अपना कटाव जारी रखती है तो कभी हमारी तरफ। इसके दियारे में जिन लोगों के खेत हैं वे सरयू से दिशा बदलने की प्रार्थना करते रहते हैं क्योंकि कटाव होने से उनके खेत सरयू की जलधारा में समाकर बालू से ढँक जाते हैं । दियारे में जिन खेतों में बाढ़ नयी मिट्टी छोड़ जाता है उनमें उन दिनों शकरकंद,गन्ना ,अगहनी धान,तिन्नी,तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी इत्यादि की अच्छी पैदावार होती थी। मुझे आज भी गाँव के भरसांय में पकाये हुए शकरकंद की सोंधी महक और चीनी सी मिठास अपनी ओर खींचती रहती हैं जिसका स्वाद लिये बरसों बीत गये।

अम्मां जब जीवित थीं तो एक बार मुझे अपने साथ नदी और बडकी बारी (आम का बड़ा बगीचा) दिखाने ले गयी थीं। नदी में उस समय पानी बहुत कम था जिसके कारण पंप नहर की मशीनें जंग पड़ी खराब हो रही थीं। नहर सूखी हुई थी और कुछ किसान जिनकी जमीनों पर मुट्ठी भर मुआवजे देकर सरकार ने ये नहरें बनायी थीं सूनी आँखों से विकास के इस कड़वे यथार्थ को निहार रहे थे। बांध के उस पार कब्रिस्तान के बगीचे के उत्तरी मुहाने पर मेरे बचपन में एक विशाल पीपल का पेड़ होता था जिसकी उभरी हुई खुली मोटी जड़ों पर हम बडकी माई के साथ नदी स्नान करने के बाद खेलते थे। तब नदी की एक जलधारा उसके पास से होकर गुजरती थी। मुझे वहाँ न तो नदी दिखायी दी न ही वह पीपल का पेड़। उसके बगल में मेरे गाँव के कोइरी जाति के लोगों ने अमरूद का बगीचा लगा रखा था। अम्मां को देखते ही कुछ औरतें पहचान गयीं और मेरे लिये अमरूद तोड़ कर ले आयीं। नदी मिट्टी काटते हुए गुलौरा के देवीमाई स्थान तक पहुँच चुकी थीं परंतु उसकी मुख्यधारा बालू छोड़कर बहुत दूर चली गई थी। हमलोग नदी की सीमा से लौटकर बांध होते हुए अपने बगीचे की ओर लौट चले।

बांध के इस पार एक दशहरी आमों का नया बगीचा दिखायी दिया। अम्मां ने बताया उसे मिंया टोली के एक मुस्लिम परिवार ने पाँच साल पहले लगाया था।अम्मां से बातें करते करते मैं बडकी बारी में शीघ्र ही पहुँच गयी। बडकी बारी पूरी तरह वीरान थी। हमारे बीजू आम के विशाल बगीचे में अब सिर्फ़ एक दो पेड़ दिखायी दे रहे थे। सारे पेड़ जिनके रूप रंग गंध स्वाद सब अलग होते थे, बूढे होकर आँधी पानी की भेंट चढ़ चुके थे। उनके साथ—साथ पेड़ों से जुड़े तरह तरह के भूत प्रेत भी न जाने कहाँ चले गये जिनकी कहानियों से डरते और रोमांचित होते हुए मेरे बचपन के कुछ साल बीते थे।नये जमाने में अब बीजू आमों की जगह लोग दशहरी,लंगड़ा,मालदह इत्यादि कलमी आमों के ही पौधे लगाते हैं। हमारी बारी में इमली और महुये का भी पेड़ था। अब तो इमली, महुआ, जामुन, बेर, कैथा, कटहल, बडहल, कदंब इत्यादि के पेड़ गाँव में भी कोई नहीं लगाता। बाजार ने बगीचों की शक्लें भी बदल दी हैं। ब्राह्मण टोले के बगीचे की पूरी जमीन पर अब खेती होने लगी है।
नदी के दियारे में अब गरमा सब्जियों के साथ गोल देशी परवल की खेती होने लगी थी। मैंने बचपन में जिस नदी को देखा था उसका स्वरूप काफ़ी बदला हुआ था। पहले उसके दियारे में गन्ने की एक खास फसल होती थी जो अपेक्षाकृत कम मीठी होती थी। उसे छोटी ईख कहते थे। उसका गुड़ दवाइयों के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था। कम उपज और खास देखभाल के कारण अब गन्ने की वह किस्म लगभग विलुप्त प्राय है। बड़ी ईख का गुड़ थोड़ा नमकीन होता था। गुड़ के नमकीन स्वाद और गहरे भूरे रंग से लोग पहचान जाते थे कि यह दियारे के गन्ने का गुड़ है। तिन्नी का छोटा चावल व्रत के समय इस्तेमाल किया जाता था। नदी के बालू वाले विशाल दियारे में क्रिसमस ट्री की तरह झउवा की घनी झाड़ियाँ होती थीं जो जलावन और पशुओं के चरने के काम आती थीं। आज भी वे झाड़ियाँ यत्र—तत्र दिखायी दे रही थीं।

मेरे गाँव में ब्राह्मणों के अलावा मुसलमान ,धोबी नाऊ ,नोनियाँ ,अहीर ,कुम्हार, लोहार, बढ़ई, गोंड, गडरिया, बनिया, तेली, हरिजन, मल्लाह, कोइरी, तुरहा, माली लगभग सभी जातियों के घर थे। कह सकते हैं बारहो वर्ण हमारे गॉंव में थे। उस समय तीन चार घरों को छोड़कर सबके घर मिट्टी के बने हुए थे जिसके साथ साथ झोपड़ी भूसा रखने वाले खोंप और पशुओं के बथान लगभग हर जगह देखे जा सकते थे। गाँव के चारों ओर छोटे—बड़े तालाब थे जिन्हें बड़की गड़ही तथा छोटकी गड़ही के नाम से पुकारा जाता। ये गड़हियां घर बनाने के लिये मिट्टी उपलब्ध कराने के अलावा गाँव की सुरक्षा और कुँओं के पानी को रीचार्ज करने का काम भी करती थीं। गड़हियों के किनारे बांसों के झुरमुट लगाये जाते थे जो किनारे की मिट्टी को बांधकर रखने के अलावा घर बनाने के लिये बांस भी मुहैया कराते थे। कई गड़हियों को पाटकर लोगों ने अपनी झोपड़ियाँ अथवा घर बना लिये थे जबकि कुछ बड़ी गड़हियां अब छोटी गड़ही में तब्दील हो गयी थीं। उस समय गाँव के घरों में शौचालय बनाने का प्रचलन प्रायः नहीं था। ऐसे में महिलाओं को निवृत्त होने के लिये बंसवारी और सूखी गड़ही बड़ी मुफ़ीद जगह होती थी। गाँव में यह देखकर सुखद लगा कि अब अधिकांश घरों में अपने शौचालय थे। सड़कों के किनारे,बंसवारी और गडहियां शौचमुक्त साफ़ सुथरी दिखायी दे रही थीं।
मेरे पिताजी श्री देवता मिश्र बताते थे कि जब उनके पुरखे देवरिया के रेवली गाँव से भागकर यहाँ आये तो उन्होंने सरयू की बाढ़ से बचने के लिये बड़े बड़े तालाब खोदे।उसकी मिट्टी से ऊँची जगह बनाकर वहाँ घर बनाया तथा आसपास के जंगलों की सफाई कर खेत। गाँव के उत्तरी सिरे पर मिश्रान टोला है जो उत्तर और दक्षिण दो टोलों में विभक्त है। पूरब की ओर मियां टोली है जिसमें मुस्लिम समुदाय की बड़ी आबादी रहती है। गाँव के पश्चिम और दक्षिण में अन्य समुदायों के लोग रहते हैं। गाँव में पंडितजी लोगों के पास उस जमाने में बांध के इस पार दोमट मिट्टी वाले बहुत उपजाऊ खेत होते थे जिनमें रबी के समय गेहूं, जौ, मटर, केराव, लतरी, अरहर, गन्ना, चना, सरसों, राई, तीसी ,तथा खरीफ में सांवां,टाँगुन, कोदो,पीले नारंगी, कत्थई और लाल दानों वाली मकई,मडुआ, सनई ढांचा,साठी और अगहनी धान लगभग सभी फसलें होती थीं। साग सब्ज़ियाँ भी खूब होती थीं। मेरे पिताजी सन 71 में आर्मी से रिटायर्ड होकर हरित क्रांति के दौर में जब गाँव लौटे तो उन्होंने सबसे पहले अपने खेत में आई आर एट नामक हाइब्रिड धान लगाया जिसकी बंपर पैदावार हुई थी। उस दौर में मेरे चाचा पिताजी के ममेरे भाई योगेंद्र मिश्रा जो मऊ जिले के पहाड़ीपुर गांव से हैं, जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे,वे धान और गेहूं की नयी किस्में भेजते थे और ताजी खेतों में प्रयोग करते थे।
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यदि अपने गॉंव चैनपुर की और लौटूं तो ब्राह्मण लोग खेतों में हल नहीं चलाते थे इसलिये कुछ खेत देकर गरीब भूमिहीन परिवारों के युवकों को अपना हलवाहा बना लेते थे जो खेती के सारे काम देखते थे। घर के सभी बच्चे हलवाहों को उम्र के हिसाब से काका चाचा भैया कहकर बुलाते थे।उन्हें बहुत इज्जत के साथ घर की महिलायें खाना परोसती थीं। खाने के बाद वे खुद अपना बर्तन धोकर रख देते थे। मेरा गाँव अन्य गाँवों की तरह पूरी तरह आत्मनिर्भर था। खेती किसानी से लेकर घर गृहस्थी के बहुत सारे जरूरी सामान गाँव में ही उपलब्ध थे। जो नहीं मिलते थे वे सीयर के बाजार या अगल-बगल के गाँवों में लगने वाले साप्ताहिक हाटों में मिल जाते थे।
गाँव में हर घर की बनावट पूर्वांचल की खास सीधी-सादी शैली वाली थी जिसमें घर के बीचोंबीच एक आँगन उसको चारों ओर से घेरे बारामदा और बारामदे में खुलते छोटे छोटे कमरे होते थे जिनमें अनाज रखने की बड़ी बड़ी मिट्टी की डेहरी होती थी। डेहरी दरवाजे के पास ही होती थी जो कमरे के अंदरूनी हिस्से को प्राइवेसी देने का काम करती थी। अन्दर छोटी खिड़की वाला अंधेरा सा कमरा होता था जिसमें बहुओं के मायके से मिली बड़ी सी खाट बिछी होती थी। तब हर बड़े व्यक्ति का अपना एक कमरा होता था और बच्चों की अपनी चारपाई या चौकी जिसे गर्मियों में आँगन या बाहर नीम की छाँव तले डालकर खुले आसमान के नीचे सोने का लुत्फ उठाया जाता था। मच्छर शायद उस समय बहुत कम थे या लोगों को उसके काटने का एहसास नहीं होता था। लोग बाहर या आँगन में बड़े चैन की नींद सोते थे।अब गाँव में एक दो घर छोड़कर सबके घर ईंट सीमेंट के बन गये हैं। डेहरी की जगह अल्यूमिनियम और लोहे के बड़े बड़े कंडाल आ गये जिनमें लोग अनाज रखते हैं। हर घर में बिजली है टीवी है, हर हाथ में मोबाइल है।
मै ख्यालों में खोयी घर के खिड़की दरवाज़ों में अपने माँ पिता के साँसों की गर्माहट तलाशती स्मृतियों के पन्ने पलटती रही। बीच-बीच में मुन्नू भी बचपन के कई वाकये सुनाते हुए मुझे गाँव के अतीत की गलियों का भ्रमण कराती रही। मैं इस बार छ:साल पर गाँव लौटी थी। शादी के बाद लड़कियों के दो गाँव हो जाते हैं परंतु जिस गाँव में माँ पिता के स्नेह की छाँव में आप दुनिया को पहली बार देख समझ रहे होते हैं वह ताउम्र आपको अपनी जड़ों से बांधे रहता है। हम स्त्रियाँ चाहे जितनी उदारता दिखायें हमारे हृदय में तो सदा मायके का गाँव ही धड़कता है। कभी-कभी सोचती हूँ काश आजादी के बाद विकास के पहिये का रुख हमारे गाँवों की ओर हुआ होता तो आज इक्कीसवीं सदी में गांव इस तरह वीरान उजड़े दयार नजर नहीं आते। प्रेम,सौहार्द, एक दूसरे के लिये अपनत्व, सुख-दुख में एक दूसरे का साथ,गंगा जमुनी तहज़ीब और सीधा सादा निष्कपट,निश्छल ग्राम्य समाज आज इतना आत्मकेन्द्रित,बँटा हुआ,इर्ष्यालु,दिखावटी और परेशान दिखायी नहीं देता। पलायन को कुछ हद तक तो रोका ही जा सकता था।
मैं बीना के साथ अपने गाँव की उस प्राइमरी पाठशाला को देखने निकल गयी जिसमें मैंने दूसरी से पाँचवीं क्लास तक पढ़ाई की थी। उसी समय गाँव को करीब से देखा था। बाद में गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाना होता था। मेरी पढ़ाई की शुरुआत पूना के आर्मी स्कूल से हुई थी। शादी के बाद दो चार दिन के अलावा कभी गाँव में ज्यादा दिन रहना नहीं हुआ। जब मैं पढ़ती थी तब गाँव के स्कूल में एक ही कमरा होता था और एक उसका बारामदा परंतु अब इसमें कई कमरे बन गये हैं। लड़के और लड़कियों के अलग- अलग स्कूलों के नाम हैं परंतु जगह वही पुरानी थी। उस समय प्राइमरी स्कूल हमारे आम के घने बगीचे में इमली के पेड़ के पास बना हुआ था। पहली से तीसरी कक्षा के बच्चे आम के पेड़ के नीचे घर से लायी गयी बोरियों पर बैठकर पढ़ाई करते थे जबकि चौथी पाँचवीं के स्कूल के अंदर। अब वहाँ एक भी पेड़ नहीं है। स्कूल में बच्चों की संख्या भी बहुत कम थी। भैया से पूछने पर पता चला अब गाँव के अधिकांश बच्चे गाँव में खुले प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। जो बहुत गरीब हैं दस रुपये फीस नहीं भर सकते उन्हीं के बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं। वैसे सरकारी सुविधा लेने के लिये कई बच्चों के नाम उनके रजिस्टर में भी दर्ज हैं। मुझे स्कूल के अहाते को देखकर पव्हारी पंडीजी याद आ गये जो बच्चों को गोलाई में बैठाकर जोर-जोर से पहाड़े याद करवाते थे और जरा सी भी चूक होने पर हरे बांस की छड़ी पीठ पर बरसाने से भी नहीं चूकते थे। उन्हीं की मेहनत थी या छड़ी का डर आज भी मुझे सारे पहाड़े और हिंदी की कवितायें अच्छी तरह याद हैं। अब मेरे गाँव के अगल-बगल दूसरे गाँवों में मिडिल और हाई स्कूल खुल गये हैं। इससे लड़कियों को भी आगे पढ़ने की सहूलियत हो गई है। हालाँकि शिक्षा का स्तर बहुत नीचे गिर गया है।

मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि गाँव के सभी तबके अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक हैं। पिछड़े वर्ग का मेहनतकश समुदाय जो पहले भूमिहीन था आज बटाई अथवा लगान पर कई लोगों की जमीनें लेकर खेती करके असली किसान की भूमिका में आ गया है। वह अपने बच्चों को स्कूल तो भेजता ही है ट्यूशन भी कराता है। परंतु जो बच्चे अधिक पढ़-लिख जाते हैं उन्हें किसानी रास नहीं आती क्योंकि उन्हें खेत में काम करने में शर्म आती है और किसानी बहुत घाटे का काम लगता है। वे उसकी जगह शहर में ठेला लगाना ज्यादा पसंद करते हैं अगर सरकारी नौकरी नहीं मिली तो। पढ़े-लिखे कई युवक जिन्हें न अपने खेतों में रुचि है न किसानी में, रोजगार के अभाव में शराब और राजनीति का शिकार होकर दिन रात खाट तोड़ते हुए कुंठित पड़े रहते हैं। यह स्थिति ब्राह्मण टोले में ज्यादा दिखायी दी ।
मेरे घर में मेरी मिडिल स्कूल पास दादी के कारण सबकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। मेरे ताजी, अम्मां दोनों बहुत प्रगतिशील विचारों के थे। उन्होंने हम सबको बिना भेदभाव किये बाहर भेजकर उच्च शिक्षा दिलवायी। दादी के पिताजी फारसी के बहुत बड़े विद्वान थे। मेरे पिताजी के बचपन तक उत्तरप्रदेश के स्कूलों में हिंदी के साथ साथ उर्दू की तालीम भी दी जाती थी। शायद यह भी एक वजह थी जिसके कारण उस समय हिन्दू मुस्लिम दोनों समुदायों में बहुत आत्मीयता थी। लोग एक दूसरे को चचा, भैया,भौजी कह कर संबोधित करते थे। तीज-त्योहार शादी ब्याह में लोग एक दूसरे के घर आते जाते थे,तोहफों का आदान-प्रदान भी होता था। कई हिन्दू भी ताज़िये खेलते थे और ईद के अवसर पर उनके यहाँ से हमारे यहाँ सूखी सिवइयां भी आती थीं। मेरी बड़की माई हम लड़कियों को कुछ मुस्लिम घरों में कशीदाकारी सिखाने के लिये ले जाती थीं। गाँव के अधिकांश परिवार निम्न मध्यवर्ग से ताल्लुक रखते थे। मुसलमानों के अधिकांश खेत दियारे में होते थे । कटाव होने पर कई बार उनके घरों में फाकाकशी की नौबत आ जाती थीं परंतु गाँववालों के सहयोग से सबका काम आसानी से चल जाता था। मुझे उनकी एक बात बहुत खलती थी। लड़कियाँ दो तीन कक्षा तक पढ़ने के बाद दस बारह साल की होते ही घर में कैद हो जाती थीं। उनके घूमने-फिरने पर पाबंदी लग जाती थी और सोलह सत्रह तक होते-होते घर में अपने ही किसी रिश्तेदार के यहाँ उनका निकाह हो जाता था। मिंयाटोली की मस्जिद में मदरसा भी चलता था जिसमें उर्दू भाषा लिखने-पढ़ने के साथ-साथ क़ुरान की तालीम दी जाती थी। बच्चे झूमते हुए क़ुरान की आयतें दुहराते थे।
मेरे गाँव के साथ-साथ उस इलाके में रहने वाला हर मुस्लिम समुदाय एक खास तरह की भोजपुरी बोलता है जो उनकी अपनी विशेष पहचान है। गरीबी और अशिक्षा के बीच युवा होते कई नौजवान बम्बई दिल्ली जाकर छोटा-मोटा व्यवसाय करने लगे। धन कमाकर वे अपने गाँव लौटते और जमीनें खरीदते ,नया घर बनवाते। कुछ लड़के दुबई और अरब अमीरात भी गये ।सरयू के क़हर से न तो उन्होंने हार मानी न ही ज़मीन से रिश्ता तोड़ा। आज उनके पास अपनी ज़मीनें हैं क़िले की तरह बड़े बड़े घर भी हैं परंतु जिस मेहनत और लगन से वे दियारे में शकरकंद और गन्ना उपजाते थे वह ग़ायब है। कई घरों के लोग शहरों में जाकर बस गये जिसके कारण उनके मकान खंडहर हो गये। अब खेती के सारे काम मशीनें और हलवाहे करते हैं। उनके कुछ खेत जिनमें बहुत अच्छी फसलें होती थीं परती पड़ी हुई थीं। कई लोगों ने बेल्थरा रोड में अपने घर बना लिये हैं। उनके बूढे माँ बाप भी वहीं रहते हैं जिनकी सूनी आँखों में अकेलेपन और गाँव से बिछड़ने का दर्द आसानी से पढ़ा जा सकता है।बच्चे और बड़े पढ़ाई और अपने कामों की व्यस्तता के बाद टीवी और मोबाइल में अपनी दुनियाँ तलाशते हैं परंतु बुजुर्ग गाँव से जुड़ी यादों से अपनी बूढ़ी हड्डियों में जान डालने की कोशिश करते रहते हैं।










