अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है गांव का कुआं

गौतम पांडे,युवा पत्रकार

  • अब दाल पकाने के लिए नही होती है विशेष कुओं की पानी की खोज

कुएं का ठंडा पानी पीपल की छांव रे रुक जाओ परदेसी आज मोरे गांव रे भोजपुरी की स्टार गायिका देवी का ये गीत एक समय लोगों के जुबान से नही उतरता था, अब ना तो देवी के भोजपुरी गाने आते हैं और ना ही गांव का कुआं रहा है ना ही पीपल की छांव है और अब तो पूरा गांव ही परदेशी हो चला है,गांव के हर एक घर का कम से कम एक सदस्य रोजी रोटी के लिए बिहार से बाहर रह रहा है।
एक दौर था जब गांव में पीने के पानी का मुख्य साधन कुआं ही होता था, हर गांव में एक ऐसा कुआं जरूर होता था जिसके पानी से ही दाल सही तरीके से पक पाता था। घर की महिलाएं पानी लाने के बहाने सभी घरों का हाल चाल जान आती थी फिर यही महिलाएं पूरे गांव में सूचनाएं फैलाने का काम करती थी, लेकिन अब गांव को आधुनिकता की हवा लग गई कुएं की जगह समरसेबल ने ले लिया दाल पकाने का जिम्मा जिस महत्वपूर्ण कुएं के पास होता था अब उससे छीनकर ये जिम्मेदारी प्रेशर कुकर को दे दिया गया। ….गांव का कुआं

भगवती मंदिर के प्रांगण में अवस्थित कुआं

बिहार में कुएं का सामाजिक व धार्मिक महत्व भी है। शादी जैसे अन्य महत्वपूर्ण मौके पर समारोह की शुरुआत इनार (कुंआ) पूजा से होती थी। मेरे गांव में एक शिवाला के पास कुआं है जहां पर महिलाएं कुएं से एक हाथ से ही पानी निकालती थी फिर जिसका शादी होने वाला होता है वो लड़का या लड़की हांथ पहले से रखा हुआ लोहे से बाल्टी में रखा हुआ पानी को बीच से काटती या काटता है जिसे पनकट्टी रस्म कहा जाता है. आज भी मेरे गांवों में शादी से पहले कूप पूजन व नगहर भरने की परंपरा कायम है।

गांव के सामाजिक ताने-बाने में रसूख का संकेत भी देते थे परंपरागत कुंवे

एक दशक पूर्व जब पानी की समस्या शुरू होने के साथ भू-जल स्तर गिरने लगा, तब तालाबों की स्थिति में सुधार की प्रशासनिक स्तर पर पहल की गई। इसके तहत मनरेगा से लेकर मत्स्य पालन के नाम पर गांवों में मौजूद तालाबों को दुरुस्त करने का कार्य प्रारंभ किया गया। लेकिन कुआं सरकारी योजनाओं में उपेक्षित ही रह गए। अब सरकार की नजर कुओं की ओर गई है। इसके तहत कुओं के सर्वेक्षण के साथ ही उनकी दशा में सुधार की दिशा में कार्य प्रारंभ किया गया है। ….गांव का कुआं

कुओं का जीर्णोधार के लिए बिहार की राज्य सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम जल जीवन हरियाली अभियान के जरिये राज्य भर के कुओं का सर्वेक्षण कराया था। इस सर्वेक्षण में बिहार में कुल 3,14,982 कुएं मिले थे। राज्य सरकार इनमें से अब उन कुओं का जीर्णोद्धार कराने का फैसला किया है, जो जर्जर और क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

बिहार जैसी सरकार के लिए यह फैसला अनूठा है। क्योंकि एक तरफ सरकार राज्य में सार्वजनिक कुओं के जीर्णोद्धार भी कर रही है, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार पाइप के जरिये हर घर में पीने का पानी पहुंचा रही है। मेरे गांव में कुओं का जीर्णोधार हुआ है लेकिन सिर्फ कुओं में सीमेंट का पाट डाला गया है कहने का मतलब है कुओं के ऊपरी भाग को चमका दिया गया है जबकि कुओं के भूतल में पानी ही नहीं हैं। ऐसे में नीतीश कुमार का महत्वकांक्षी योजना नलजल योजना की तरह ही कुओं का जीर्णोधार वाली योजना भी हवा हवाई साबित हो रही हैं। ….गांव का कुआं

नीतीश कुमार का पूर्व में भी कई फैसले चौकाने वाला रहा है। पहले नीतीश कुमार ने बिहार के सभी पंचायत में सरकारी शराब की दुकान खुलवाए थे उनका तर्क था इससे रोजगार बढ़ेगा फिर कुछ सालों बाद कुमार ने राज्य की आर्थिक स्थिति का परवाह किए बगैर शराब बंदी कर दी।

पहाड़ की तराई वाला कुआं

खुशी की बात ये है कि मेरे गांव अभयपुर, जिला लखीसराय,बिहार में अभी भी कई सारे सार्वजनिक कुएं हैं जिनका इस्तेमाल बखूबी किया जा रहा है लेकिन मैं दो कुओं का जिक्र करूंगा। गांव का सबसे प्रसिद्ध मंदिर मां भगवती मंदिर के प्रांगण में एक कुआं का जिसका इस्तेमाल सदियों से होता चला आ रहा है आज भी देवी मां का स्नान कुएं के जल से ही होता है वही जल भी नीर बनकर सभी भक्तों में बांटा जाता है। ….गांव का कुआं

एक और कुआं है जो पहाड़ की तराई में है जिसका पानी का लगातार सेवन करने से अपच की समस्या से निदान हो जाता है हमेशा कुआं पर लोग आते हैं पीने का पानी अपने घर ले जाते हैं गांव में प्यूरीफायर वाटर घर घर पहुंचाया जाता है एक निजी फर्म के द्वारा उसके बाद भी लोग लंबी दूरी तय करके उस कुएं का पानी लेने आते हैं। गांव के कोरियारी टोला में आज भी एक कुआं है जिसके चारों ओर चक्कर घिन्नी लगा हुआ है जिससे मालूम पड़ता है लोग आज भी कुओं के पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। ….गांव का कुआं

मेरे घर के ठीक सामने वाला कुआं का इस्तेमाल लंबे समय से नही हो रहा है जब में बच्चा था उस वक्त कुआं की रौनक शानदार थी पूरे समाज के लोग कुआं पर पानी भरने आते थे, नहाते थे, जानवरों को पानी पिलाते थे, कपड़े धोने के साथ- साथ पीने का पानी भी लेकर जाते थे। एक बाल्टी हमेशा कुआं पर रखा रहता था ताकि राहगीर पानी पी सकें लेकिन आज सबकुछ बदल गया है,कुआं सुख गया है। कुछ युवाओं ने अपने जेब खर्च से कुआं का जीर्णोधार कराया इसके वावजूद लोग कुआं का इस्तेमाल नही कर रहे हैं, आज हर एक घर में पानी का टंकी लगा हुआ है।
कल तक जो कुआं अपने भाग्य पर इठलाता था आज वो अपनी गौरवशाली इतिहास को देखकर सुस्त पड़ा हुआ है, उसे आज भी इंतजार है फिर से कोई हांथ में बाल्टी लिए पनघट पर आयेगा, पानी भरेगा पानी भरने के दौरान बाल्टी हांथ से छूट जायेगा फिर उसे निकालने के लिए घंटो मशक्कत करना पड़ेगा एक बाल्टी निकालने का प्रयास करेगा तो वहीं जमा भीड़ सलाह देगा, मौज-मस्ती करेगा फिर से कुआं अपने पुराने गौरव की ओर लौट जायेगा।

घर के पास वाला कुआं

गांव के तमाम कुआं के अस्तित्व पर पिछले कुछ समय संकट मंडराने लगा है। कुओं की पर्याप्त देखभाल नहीं होने के कारण गंदगी से पटे कुओं का पानी समाप्ति की ओर है। गांवों में कई पुराने कुओं का पानी पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। कुछ का जल समाप्त होने के कगार पर है। लेकिन अब इनकी स्थिति में सुधार की पहल के बाद गांवों में इन्हें बचाने की उम्मीद बढ़ने लगी है। ….गांव का कुआं

छप …छप . .. छप …..चूं चर मर ..क्यों विलुप्त हो रहे हैं गांव के परंपरागत कुएं

सरकार के स्तर पर कुओं की दशा पर ध्यान नहीं दिए जाने के कारण पिछले कुछ समय से गांवों में स्थित कुएं अब तेजी से पाटने का कार्य किया गया है। बावजूद इसके गांवों में अब भी कुएं बचें हैं। लेकिन इनकाउपयोग सिर्फ धार्मिक आयोजनों तक की सिमटा हुआ है। बचे हुए कुओं की दशा भी वर्तमान समय में इस कदर खराब हो चुकी है कि तमाम कुएं अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते दिख रहे हैं। ….गांव का कुआं

 

 

 

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