परदेशी मन को देश से जोड़े रखता है मेरा गांव ”चिकनौटा”

सुरेंद्र नाथ तिवारी, न्यू जर्सी, यू एस ए

मेरे गांव ”चिकनौटा’‘  में उस वक्त शिक्षा नाम मात्र की थी। मेरे अपने टोले में केवल एक परिवार, कपिलदेव भैया का परिवार, मैट्रिक से ज्यादा पढ़ा था, कुछ दुसरे लोग शायद मैट्रिक तक पढ़े थे। कपिलदेव भैया स्वयं कितना पढ़े थे, मालूम नहीं पर वे शायद अंचलाधिकारी थे; लोग उन्हें सी औ (सीओ) साहब कहते थे। उनके छोटे भाई बाबूनन्द सिंह उस वक्त आसपास के गांवों में सबसे अधिक पढ़े लिखे थे उन्होंने केमिस्ट्री से एमएससी की थी | वे सिंदरी की इंडियन फ़र्टिलाइज़र कारपोरेशन में केमिस्ट हो गए थे। यह उस ज़माने के चम्पारण के लिए बहुत बड़ी बात थी। बाबूनन्द भैया जितने पढ़े लिखे थे; उतने ही सज्जन। वे मेरे सदा आदर्श रहे हैं। उनके अपने और चचेरे भाई लोग हाई स्कूल तक शायद पढ़े थे। उनमें से एक, रूपदेव भैया ने, अपने दालान पर एक टूटीफूटी रैक में कुछ किताबें रख रखीं थीं। उन्हें इसका बड़ा शौक था। यह थी मेरी पहली लाइब्रेरी | पुस्तकालय की लत मुझे और मेरे कई हमउम्र मित्रों को इसी से पड़ी। गांव में कोई स्कूल नहीं था। हाई स्कूल 5 मील दूर सुगौली में था, वहीं पढ़ने जाना पड़ता था। यह दूरी भी अशिक्षा का एक बड़ा कारण रही होगी। प्राइमरी स्कूल छपरा बहास में था जो हमारे लिए कोई डेढ़-दो मील का रास्ता था। मैं शायद उस स्कूल में एकाध महीने ही गया होगा; जब बाबूजी मुझे पढ़ने के लिए मुजफ्फरपुर पहली बार ले आये होंगें। जब लौटकर जाता था गांव तो देखता था कि मेरे गांव के सहपाठी मिट्टी सानकर, स्लेट पर लिखने का भाठा (खल्ली ) बनाते थे। मुजफ्फरपुर वाले स्कूल में भी यही क्रम था। बाद में बड़का टोले में एक प्राइमरी स्कूल कोई दो कमरों का खोला गया।

तब गांव ”चिकनौटा”  में मवेशी बहुत थे। बैल एकमात्र साधन थे हल जोतने के…जिसके घर में जितने बैल वह उतना ही बड़ा काश्तकार। किसी परिवार की रईसी का पता उसके दरवाजे या दालान पर बैलों की संख्या और बेर्ही की संख्या से लगता था। बेर्ही, अनाज रखने की बांस और मिटटी से बनी कोई 7-9 फ़ीट ऊेची और करीब 5-6 फ़ीट व्यास वाली बेलानाकर भंडार होती हैं। जहां तक मुझे याद है; उस जमाने में मेरे गांव में गाय केवल अहीर लोगों के पास थी। आम गृहस्थ, चाहे वह अमीर हो या गरीब, आम तौर पर गाय नहीं रखता था। शायद गायों की देखरेख की कला आम गृहस्थों को नहीं आती थी। जब कोई सम्बन्धी या जजमान किसी को छोटी सी बछिया दान में देता, तो वह अहीर लोगों के पास भेज दी जाती ताकि वे उसी देखरेख कर सकें। आम गृहस्थ के घर भैंस रखी जाती थी दूध दही के लिए। थोड़े अच्छे खाते-पीते गृहस्थों के यहां एक से ज्यादा भैंस भी होती थीं। बकरियां बहुतों के घर में होती थीं। उनका दूध भी प्रचलित था; पर भैस का दूध ज्यादा प्रचलित था। वह मोटा होता है; दही बड़ी अच्छी तरह जमती है; मोटी छाल्ही निकलती है; घी के लिए एकदम ‘परफेक्ट’। मैं उसी दूध-घी पर बड़ा हुआ हूं।

 

मुझे अच्छी तरह याद है अपनी दादी द्वारा तैयार किया हुआ घी। मेरे पारिवारिक चौकोर घर के बाहर, एक दालान की तरह था; जिसमें दादी रहती थी। मैं घर का सबसे बड़ा लड़का था, तीन बच्चों के मरने के बाद मेरा जन्म हुआ था; अत; मैं दादी का, जिसे हम सब ‘बड़की ईया’ कहते थे, विशेष स्नेह-भाजन था। कहते हैं मैं उसके साथ ही रहता, खाता , खेलता, सोता था। वह मुझे सबसे ज्यादा स्नेह देती। कहते हैं, बुढ़ापे के कारण उसे नींद नहीं आती थी, तो जाड़े के दिनों में वह भूसे की बोरसी, यानि अंगीठी, जला लेती और उसी की आंच से अपनी छोटी सी कुटी गर्म रखती और दूध देखती रहती। उस बोरसी पर रात भर भैंस का दूध औंटाता रहता, धीमी धीमी आंच पर। सुबह में खूब मोटी पीली छाल्ही हो जाती ऊपर। वह सुबह में उसका माखन बनाती, घी बनाती। इस क्रम में तरल घी निकाल लेने के बाद मिटटी की हांड़ी में जो खखोरी , या खुरचन बच जाती थी, उसमे मिश्री मिलाकर खाना जीवन का एक बहुत ही खुशनुमा क्षण होता था… वह स्वाद आज भी जेहन में, जीभ पर, यूं ही सुरक्षित है। बड़की ईया के घी और स्नेह का मेरे रोम रोम में प्रभाव इस बात से जाहिर होता है कि; 1980 में, मैंने ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी की एम एस की थीसिस उसे ही समर्पित की थी क्योंकि उसी वर्ष मेरी उस ममतामयी पितामही का निधन हुआ था। कई मित्रों ने भी बताया है कि उनके भी सम्बन्ध अपनी दादियों से ऐसे ही ममतामय थे।

मवेशियों की बात चली है तो बता दें कि मेरे इलाके में इक्का दुक्का ही घोड़े और हाथी दिखते थे। बारातों में घोड़े जरूर आते थे; पर किसी बड़े गांव से बारात आती तो उसमे किराये के या अपने लोगों के हाथी होते। मेरे गांव में, जैसा मैंने ऊपर लिखा है, शायद कमला बाबू के यहां हाथी था, हथिसार भी। मेरे गांव में घोड़े एक दो परिवारों के यहां ही थे; उसमे एक राम प्रसाद काका थे। मेरे कुलगुरु एक बालेशर दूबे जी थे, जो कहते हैं दक्षिण में छपरा जिले से आते थे, वे घोड़ी पर आते थे। उनकी छोटी घोड़ी की स्मृति मुझे है, पर वे छपरा (सारण) जिले से आते थे इस पर विश्वास नहीं होता। क्योंकि छपरा जिला गंडक नदी के दक्षिण में था। मेरे गांव से गंडक कोई 30 मील दक्षिण तो होगी उसके बाद गंडक पार करनी पड़ती थी। इतनी दूर से नदी पार करके वे आते होंगे; या विश्वसनीय नहीं लगता। तब कोई पुल भी नहीं था।
मवेशियों का बड़ा आदर था। गोवर्धन पूजा के दिन नासी में ले जाकर उन्हें खूब नहलाया जाता। रस्सियां बांटी जाती। मेरे इलाके में पटुआ और खर (लम्बी घास) बहुत होती है। दोनों की रस्सियां बंटती। उन्हें कई रंगों में रंगकर, सुखाकर, घुंघरू, और गले में घंटी जोड़कर, बैलों और भैसों को पहनाया जाता। बैल तो घंटियां पहन कर लगता झूम रहे हों। सब बड़े सुन्दर लगते। मेरे बड़े चाचा खेती-गृहस्थी के कामों में बड़े कुशल थे। ये सब काम उन्हीं के जिम्मे थे। जब तक चारा मशीन नहीं आई थी, वे हांथ से, गंड़ासी से, कुट्टी याने चारा काटते। हम बच्चे उनकी कारीगरी देखते, और रस्सी बंटाई, कुट्टी कटाई की उनकी सफाई पर आश्चर्य करते। बैलों से हमें डर लगता था। पर मेरी भैंस मेरी बड़ी दोस्त हो गई थी। जब मैं आठवीं में पढ़ने के लिए गांव लौट कर आया मेरा काम हो गया था भैंस की देखभाल। मैं स्कूल से सीधा आकर अपनी भैंस लेके उसे चराने निकल जाता। मुझे तब हिंदी कविताओं की थोड़ी समझ होने लगी थी। भैंस चुपचाप चरती रहती और मैं दिनकर जी की रश्मिरथी को जोर जोर से बांचने और समझने का प्रयत्न करता रहता।

गोवर्धन पूजा के बाद आती दीवाली… इस भोजपुरी इलाके में दिवाली को ‘दियरी-बाती ” कहते हैं। कोई खास जलसा मुझे याद नहीं हैं होता था दिवाली में; हाँ घर-दालान लीपे जाते थे जरूर। मैं जब बड़ा हो रहा थे तो मुझे याद नहीं है कि किसी का भी घर ईंट का होगा किसी भी टोले में; सब मिटटी के घर बने थे; बड़े भी; छोटे भी। हरिजनों की फूस (याने लम्बी घास) की झोपड़ियां थीं। दिवाली के तुरत बाद ही, मात्र 6 दिन बाद हम बिहारियों का महापर्व छठ आता है। यह हम सबों के लिए बड़ी आस्था और बड़े आनंद का समय होता था। छठ में पूजे जाने वाले सूर्य देव, जिन्हे हम किसी कारणवश “छठी मैया” कहते हैं, के लिए व्रत रखते थे, मुख्यतः स्त्रियां, पर कुछ पुरुष भी। यह व्रत बड़ा कठिन होता था, तीन दिनों का पवित्र व्रत; बहुत ही अनुशासन पूर्ण। … ज़रा चूक हुई कि छठी-मैया नाराज। एक दिन तो निर्जला; यानि पानी भी पीना मना है। हम बच्चों को उसकी कोई चिंता नहीं थी। हमारा काम होता था प्रसाद आदि से भरी हुई छठ की टोकरी लेकर घाट पर जाना। उस टोले का छठ नदी पर होता था, मेरे टोले का दूसरी तरफ कोई एक मील दूर, बड़ी सड़क वाले तालाब पर। लोग सुन्दर कपडे पहनते, सुहागिनी स्त्रियां लम्बा सा सिंदूर करतीं, एक दिन शाम को हम सब प्रसाद और अर्घ्य की टोकरी; जो भोजपुरी में ” दौरा” कही जाती है, ले कर शाम को हंसते, गाते,तालाब पर जाते। सारे प्रसाद स्थानीय खेतों से होतें | बाजार में खेतों से ताज़ी निकाली हुई, हल्दी, अदरख; मूली, और कोंपलों सहित गन्ना के डंठलों का अम्बार लगा रहता। हर घर में, चाहे वह किसी गरीब हरिजन की झोपड़ी हो या बड़े ठाकुर साहब का विशाल घर; हर वक्त बस गीत ही गीत। पोखरे के घाट पर, घर में, या घाट पर जाते वक्त; बस गीत ही गीत। हमेशा औरतें गाती रहतीं; पूरा वातावरण गीतमय! अब यह पर्व पूरी तरह एक राष्ट्रीय पर्व जैसा हो गया है…राष्ट्रीय क्या, अंतरराष्ट्रीय कहें। यहां अमेरिका में कई बिहारी-बहुल शहरों में छठ धूमधाम से मनाया जाता है। मेरी पत्नी कोई बीस साल तक यहां न्यू जर्सी में भी छठ करती रहीं और नवंबर की सर्द हवाओं के बीच सुबह और शाम को सरदी में ठिठुरती भगवान् सूर्य को अर्घ्य चढाती रहीं। बाद में मेरे छोटे भाई की पत्नी ने गांव में ही छठ ‘उठा’ लिया था यानि इस व्रत की जबावदेही ले ली थी।

गांव ”चिकनौटा” में छठ के बाद होली तक का मौसम तो बड़ा ही सुहावना होता था; शिशिर और वसंत एक साथ… धान कट चुके होते, अगर बाढ़ से धान बच गया तो खलिहानो में धान के बोझों के अम्बार लगे होते; बैल दंवरी कर रहे होते; बड़ा उल्लसित वातावरण होता | गन्ने के खेत अब सर उठाने लगे होते, मसूरी, खेसारी, सरसों, गेहूं के नन्हे अंकुर बड़े होने लगते; रात में तारे उन्हें निहारते निहारते जब सो जाते, तो ओस उन्हें स्नहे-सिक्त कर, सुबह की हवा उन्हें दुलराकर, धीरे धीरे बड़ा कर रही होती। सुबह होते ही अगर आप खेतों की तरफ निकल जांय और सूरज देवता पूरी तरह उगे नहीं हों तो एक नैसर्गिक सुषमा का आभास होता, और अगर गन्नों की बीच की पगडंडी से गुजरें तो ओस झरझराकर आपको स्नेह-सिक्त कर देती। …. मीठी मीठी सर्दी।

… कालिदास ने शिशिर का वर्णन करते हुए लिखा है:
” निरुद्ध्वातायन मन्दिरोदरं, हुताशनो भानुमतो गभस्तय: गुरुनि वासांसि …”
याने आजकल लोग अपने घरों के भीतर खिड़कियां बंद करके , आग ताप कर, धूप खाकर….अपने दिन बिताते हैं।… .यह सब सच होता था। ……..और फिर आती वसंत पंचमी; उस दिन से वसंत की एक तरह से शुरुआत होती, जो 40 दिनों बाद होली पर जाकर ख़त्म होतीं मैंने अपने गावं की २००४ की होली में अंतिम बार भाग लिया था। उस होली की याद आज भी अंर्तमन को गुदगुदा जाती है।

आज भी गांव ”चिकनौटा” के होली के गीतों को कहां भुला पाया हूं? ढोलक, झाल के स्वर व उस पर तन और मन को सराबोर करने वाले होली के गीतों के बोल…
“शिवऽ बबा, रखरी लाल धजा, देखि हुलसे ला हमरो शरीर ….. आहो शिव बबा”
यह भगवान शंकर की प्रार्थना है, शुभ काम ईश्वर की प्रार्थना से ही शुरू होता है, ……हे शिव बाबा, आपकी लाल ध्वजा देख मेरा शरीर हुलस रहा है। …… एक समवेत स्वर उठता:
“हो हो शिवऽ, आ हो शिवऽ।
जैसे जैसे गीत की रफ़्तार तेज होती उसके साथ आवाज भी उंची होती चली जाती, …ढोल, तासे की आवाजों में होली गाने वाले… गाते-गाते, मानो नशे में झूम उठते….
“रउरी लाल धजा, रउरी लाल धजा, देखि हुलसे ला हमरो शरीर” …
लगता, एक तरह का नशा छाया है सबों पर। ऊपर उठते, नीचे उतरते स्वर, जोर जोर से, झाल, मजीरे की आवाजें , तासा पीटने की आवाज | ऐसे कितने गीत…एक रास का गीत जो मुझे अभी भी याद है :
उठ संईयां लीखऽ पाँती, भेजऽ नइहरवा,
डूमक मोरा छुटे हो हो कोहबरवा।
यानि; सईंया (पति के लिये भोजपुरी संबोधन) , मेरे नैहर एक पत्र लिख दो, मेरा झूमक कोहबर वाले कमरे में छूट गया है। (झूमक, यानि कान की बाली, और कोहबर उस कमरे को कहते हैं जहाँ शादी के बाद पति-पत्नी एक दूसरे से पहली बार मिलते हैं।)
या फिर वीरता के गीत, राजा कुंअर सिंह की प्रशंसा में :
बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अबीर…”
……… और ऐसे दर्जनों गीत, भक्ति के, रास-रंग के, वीरता के |

मुझे याद आता है, बचपन में  गांव ”चिकनौटा’ में जगत सिंह और भृगुनाथ सिंह दो भाई फगुआ गाने के लिये प्रसिद्ध थे, उनके बिना फगुआ पूरा नहीं होता था, उसी तरह कैलाश काका और कपिलदेव भैया। अब कोई नहीं रहे।

आज वर्तमान की इस खिड़की से अतीत के उन दिनों में झांकना आनंदमय लगता है। पर जो दृश्य याद हैं वे कुछ धुंधले होते जा रहे हैं; कुछ पूरी तरह समाप्त हो गए हैं, मिट गए हैं, या बदल गए हैं। बदलाव कुछ अच्छे भी हैं; जैसे जहां खरीफ के समय केवल एक धान की फसल होती थी; अब धान की कई नस्लें हैं; दूसरी फसलें भी होने लगी हैं। कृषकों की पहुंच; थोड़ी ही सही; सरकार तक होने लगी है; विभिन्न योजनाओं के तहत; बड़ी सड़क और चौड़ी और ऊंची होने जा रही है, रेलवे लाइन छोटी संकरी मीटर गेज से ब्रॉड गेज हो गयी है, गांव के लोगों का संपर्क बाहरी दुनिया से बढ़ गया है, आदि। अत: पढाई, इलाज, नौकरी आदि की सुबिधायें बढ़ी हैं।

पर मेरे मन में बसी अमराइयां अब नहीं के बराबर हैं, महुआ कट गया है; एक भी मवेशी मेरे टोले में नहीं हैं, न भैस, न बैल; गायें धूल उड़ाती “गो-धूलि” को साकार नहीं करतीं; ट्रैक्टरों की घरघराहट से धान की बालियां घबराती हैं! पर मन में बसा वह वासंती सौंदर्य अभी भी है किसी कोने में छिपा उन दिनों को याद करता है; अस्तु; कालिदास के शब्दों में उस वासंती सौंदर्य को याद करते हुए एक सरल स्वस्तिवाचन से यह आलेख समाप्त करता हूं :
“मलयपवन्विद्ध: कोकिळालापरम्य: सुरभि मधुनिषेकाल-लब्ध गंधप्रबंध:,
विविधमधुप यूथै:वेष्ट्यमान: समन्ताद्भवतु तव वसंत: श्रेष्ठकाल: सुखाय “
अर्थात: मलय के वायुवाला, कोकिल की कूक से जी लुभानेवाला, सदा सुगन्धित मधु बरसाने वाला और चारो ओर भौरों से घिरा हुआ वसंत आपको सुखी और प्रसन्न रखे।

(भारत में सेना के पूर्व कमीशंड अफ़सर, सुरेन्द्रनाथ तिवारी लगभग तीन दशक से यू.एस.ए. में हैं। ओहायो तथा न्यू जर्सी विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग मैंनेजमेंट का अध्यापन के साथ साथ ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी को सिविल इंजीनियरिंग विभाग की सलाहकार समिति के भी सदस्य रहे। संप्रति अमेरिका की ऊर्जा (बिजली, तेल) संबंधित परियोजनाओं के प्रबंधन से संबंधित।
अंतराष्ट्रीय हिन्दी समिति के भूतपूर्व अध्यक्ष, हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति को विदेशों में अक्षुण्ण रखने की दिशा में कार्यरत्त हैं। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की ताज़ा पीढ़ी में भारतीय संस्कृति, भाषा, सभ्यता की महत्ता का प्रचार -प्रसार कर रहे हैं।)

गांव “चिकनौटा” की कहानी की पहली कड़ी

यादों के सरोवर में झिलमिलाता मेरा गांव “चिकनौटा”

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
3,376FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -

Latest Articles