जातीय विविधता के लिहाज से खास पहचान रखता है पैतृक गांव पिपलाज

 

श्रीपाल शक्तावत, वरिष्ट पत्रकार

सार्वजनिक नल ने प्यास बुझाने के जतन शुरू किये ही थे कि पिताश्री के रिटायरमेंट और तीन सौ किलोमीटर दूर अपने पैतृक गांव पिपलाज की तरफ बढ़ने का फरमान आ गया। एक शिक्षक के सेवानिवृत्त होने और अपने गांव जाने के फैसले से पूरा गांव ही नहीं,आसपास की ढाणियां किस तरह दुःखी हो सकती है यह विदाई की वेला में देखने को मिला। हम सब बस में सवार हो अपने पैतृक गांव पिपलाज-अजमेर की तरफ बढ़ रहे थे तो मोहनवाड़ी-झुंझुनू की बस स्टैंड पर कई नम आंखें धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ती बस को देख रही थी। हर एक की एक ही मान्यता थी-मास्टरजी को नहीं जाना चाहिए।
मोहनवाड़ी से सीकर,सीकर से अजमेर,अजमेर से केकड़ी और केकड़ी से पिपलाज। चार अलग-अलग बसों से गांव पहुंचने में हमें पूरे दो दिन लगे। शेखावाटी के रेतीले धोरों से निकल हरे भरे अजमेर मेरवाड़ा में पहुंचते-पहुंचते सब कुछ बदल गया। घास फूस की बनी झोपड़ियों की जगह अब केल्हू (खपरैल) वाले कच्चे घर सामने थे। तो बाजरे की जगह खाने को ज्वार या मक्का रोटी का रूप लिये सामने थी। कई दिन मन उस गांव को छोड़ देने पर तो बिलख ही रहा था, खान पान में आये बदलाव को भी सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पा रहा था। छठी कक्षा में यह चौथी स्कूल थी। खेलते वक्त शेखावाटी की मिट्टी में पांव धंस जाते थे तो यहां गीली काली मिट्टी में जब तब रपट जाते। रपटने का पता चलता तब तक शरीर जमीन पर होता और चीख आसमान में। रेतीले मोहनवाड़ी में पाताल तोड़ कुंओं से नसीब होता तो यहां पिपलाज में पानी दो चार हाथ नीचे ही मौजूद होता। बरसाती नाले या नदी में तो हम रेत को पांच दस अंगुल खींचते और पानी की धार उस गड्ढे में आ जमा होती। रेगिस्तान की वह प्यास मानों यहीं आकर बुझी थी। लिहाजा,रेत खींच पानी को निकलते देखता और हाथों में भर पानी हलक में उतार लेता।

सब कुछ बदल चुका था। लड्ढ़े(ऊंट गाड़ी) की जगह छकड़े(बैल गाड़ी) ने ले ली तो बाजरे की जगह मक्का-ज्वार ने ले ली। खेजड़ी के पेड़ यहां नदारद थे और आम के पेड़ हर कहीं दिखाई देते ।
मोहनवाड़ी में बारिश के बूते एक फसल होती। कहीं ग्वार,कहीं बाजरा लेकिन यहां पिपलाज में एक नहीं,दो फसलें लहलहाती। आंध्रप्रदेश के गुंटूर से आई मिर्च की सबसे बड़ी मंडी पास ही के कादेड़ा गांव में थी और कपास की सबसे बड़ी मंडियों में शुमार केकड़ी हमारा तहसील मुख्यालय। मंडी थी सो कपास और मिर्च उत्पादन में पिपलाज भी पीछे नहीं रहा। इसी दौर में मंडी के आढ़तियों के खरीद के अंदाज़ से रूबरू हुआ तब तक आठवीं कक्षा में आ चुका था। ज्यादा काम कादेड़ा की मिर्च मंडी से ही पड़ा। मिर्चों को बस या बैलगाड़ी में लाद कादेड़ा जाते और जिस भाव बिकती बेचकर शाम तक लौट आते। एक कृषक के पास मंडी में जाने के बाद ज्यादा विकल्प नहीं होते। वहां भी नहीं थे। मिर्चों की ढेरी से आढ़तिये दो-चार मिर्च उठाते और बोली लगा आगे बढ़ जाते। भाव कम हों कि ज्यादा बेचकर हर किसान की तरह मैँ भी लौट आता। तुलाई के बाद पहले पर्ची बनती फिर रकम थमाई जाती। मिर्चों के बदले रकम और किसानों की बेबसी के साथ लौटता तो थक हारकर।

शेखावाटी में आर्य समाज के प्रभाव ने जातीय भेदभाव से मुक्त कर दिया था तो यहां सामंतवाद लोगों की मानसिकता पर जमकर तारी था। हां, एक चीज जो इस जातीय भेद को तोड़ रही थी वह थी खेलकूद प्रतियोगिताएं। खेल के मैदान में न इस या उस का फर्क होता न एक दूसरे के हाथ से मीठा मुंह करने में कोई झिझक होती।

पिपलाज राजकीय सेकंडरी स्कूल

पढ़ाई के दौरान ही खेतीबाड़ी का यहां पहली बार अनुभव हो रहा था। खेतों में जाना और उनमें खो जाना जैसे मन की मुराद पूरी हो जाना था। खारी नदी से कुछ दूर एक खेत में कुंए पर बिजली आ चुकी थी,वहीं छोटे से नाले पर खेती की जमीन में सिर्फ बारिश की ही फसल हो पा रही थी।

इन खेतों में आते-जाते ही रेडियो से एक अलग से रिश्ता बन गया। रास्ते में आकाशवाणी के चर्चित समाचार उद्घोषक रहे श्री रामानुज प्रसाद सिंह या श्री देवकीनन्दन पांडेय की आवाज की नकल करते अंधियारे को चीर खेत तक पहुंचता और रात को बीबीसी के ‘आजकल’ और रेडियो सीलोन के फरमाइशी कार्यक्रम सुनता। यहीं से ललक पैदा हुई अपना और अपने गांव का नाम दुनियां में फैलाने की। लिहाजा,रेडियो पर फरमाइश का सिलसिला शुरू हो गया। रेडियो पर खुद के नाम के साथ गांव का नाम फिल्मी गीतों की फरमाइश या बीबीसी के कार्यक्रमों में नाम आता तो गांव के पोस्टमास्टर श्री घीसा लाल कासलीवाल पूरे गांव में उसके चर्चे पहुंचा देते। रेडियो के लिये लिखने की उस ललक ने कोई दो दशक बाद आकाशवाणी के तीन राष्ट्रीय पुरस्कार और रेडियो के दो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मेरे खाते में लिख दिये।

पिताश्री श्रद्धेय ईश्वर सिंह शक्तावत शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद पूरी तरह किताबी दुनिया में खो गये। जब भी पेंशन लेने जाते साप्ताहिक हिंदुस्तान,धर्मयुग,कादम्बिनी,सर्वोत्तम,रीडर्स डाइजेस्ट,माया और दिनमान जैसी समसामयिक पत्रिकाएं खरीद लाते । वेद प्रकाश काम्बोज,गुलशन नंदा जैसे उपन्यासकारों के उपन्यास ‘हिन्द पॉकेट बुक्स’ के जरिये वीवीपी से मंगवाये जाते। दिन में थोड़ी सी नींद उन्हें तरोताजा करती तो पुस्तकें उनके इर्द गिर्द के दोस्तों की तरह बिस्तर के इधर-उधर होती। हर दिन एक उपन्यास को पढ़कर लेटना उनकी आदत का हिस्सा था तो बाबोसा यानी ताऊजी श्री सज्जन सिंह शक्तावत ‘कल्याण’ सरीखी धार्मिक पुस्तकों में खोये नजर आते। उपन्यास और मनोहर कहानियां,सत्यकथा जैसी पुस्तकों से हमें पर्याप्त दूरी रखनी होती। लेकिन रीडर्स डाइजेस्ट,सर्वोत्तम,कादम्बिनी,धर्मयुग या साप्ताहिक हिंदुस्तान को पढ़ने में कोई मनाही नहीं रही।

बाबोसा और पिताश्री हर शाम नीम के पेड़ के नीचे खाट बिछा कर बैठते और कोई एक सीक्वेंस दिए जाने पर पिताश्री कोई कविता लिख थमा देते। पढ़ने लिखने के इसी माहौल ने कब मुझे भी इस धारा में ढाल दिया,अंदाज़ ही नहीं लगा। पिपलाज में साहित्य के प्रति ये समर्पण कई घरों में दिखता। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक रहे गुरु गोलवलकर जी को अपना आदर्श मानने और उसी अंदाज में दाढ़ी रखने वाले ‘गुरुजी’ ने तो डिंगल में दस हजार दोहों वाला ‘प्रताप हजारा’ भी रच दिया था। गुरुजी यानी श्री देवेंद्र प्रताप सिंह ‘अनुजानुज’ हमारे हिंदी के शिक्षक थे। वंचित वर्ग में जन्मे लोककवि श्री नन्दराम आर्य उस जमाने में रेडियो की शान हुआ करते थे तो बड़े बना के नाम से मशहूर सूर्यनारायण सिंह जी की राजनीतिक कांग्रेसी सत्ता और संगठन में ठेठ राजधानी तक होती।

अपने दो भाइयों तेज सिंह और लक्ष्मण सिंह के साथ पिताश्री ईश्वर सिंह शक्तावत

काकोसा-बड़े चाचा तेज सिंह जी की धमक सामंती अंदाज़ में नजर आती लेकिन देश दुनिया पर उनकी निगाह ‘बीबीसी’ पर हर शाम आने वाले ‘आजकल’ के जरिये होती । वैसे ‘बीबीसी’ से गांव में सबसे ज्यादा ज्ञान किसी ने लिया तो वह थे श्री रामस्वरूप खाती। बढ़ईगिरी करते हुए रामस्वरूप जी ‘बीबीसी’ के जरिये पूरी दुनिया का चक्कर कुछ यूं लगा आते, जैसे गणेश जी ने दुनिया की परिक्रमा की हो। रामस्वरूप दादा की समझ का असर यह कि कांग्रेस के पंचायतराज सम्मेलन में उन्हें देश दुनिया के उदाहरणों के साथ अपनी बात कहते देख तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शिवचरण माथुर तक दंग हो गये। और,श्री रामस्वरूप पूरे इलाके के हीरो हो गए। कांग्रेस के पंचायत राज सम्मेलन में बार-बार समय की और ईशारा करती घण्टी बजती रही लेकिन रामस्वरूप जी ने माइक छोड़ने की बजाय साफ कर दिया कि माइक पहली बार हाथ में लिया है सो बात सुनाये या समझाये बिना माइक वापस लौटाने वाले वो है भी नहीं। अब अस्तित्व को जूझती कांग्रेस को अस्सी के दशक में ही रामस्वरूप खाती नामक उस कार्यकर्ता ने सम्बोधन में साफ कर दिया था कि कार्यकर्ता की अनसुनी कर कांग्रेस आगे बढ़ने के सपने नहीं देखे।
गांव के ही श्री रणवीर सिंह शक्तावत आधुनिक राजस्थान के पहले जागीरी कमिश्नर थे तो उनके पुत्र श्री राजेन्द्र सिंह के चर्चे इस बात पर थे कि अलग अलग विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन उनका शगल बन गया।
गोकुलदासोत शक्तावत बहुल पिपलाज गांव की खास बात थी इसकी जातीय विविधता। उसी दौर में पिछड़े वर्ग के श्रवण जी कुमावत और गोपाल जी दरोगा को लंबे समय गांव ने सरपंच के पद पर बिठाया। मोहनवाड़ी में लोगों का रुझान सेना की तरफ था तो यहां पिपलाज में पुलिस की तरफ। शत्रुशाल सिंह जी की बतौर थानेदार हाड़ौती में धमक थी तो उनके बड़े भाई औंकार सिंह जी अजमेर कलेक्ट्रेट में बतौर रीडर काम और व्यवहार से दिल जीत लेते । प्रोफेसर गजेंद्र सिंह जी शक्तावत ,वीरेंद्र सिंह जी और औंकार सिंह जी पूरे गांव के लिये अजमेर में त्रिदेव की भूमिका में होते तो केकड़ी में ये दायित्व मेरे बड़े भाई यशेन्द्र पाल सिंह जी निभाते।

पिपलाज के ही श्रद्धेय भवानी सिंह शक्तावत का दबदबा रेवेन्यू बोर्ड में जब तक दुनिया में रहे,बना रहा। राजस्थान में किसी का भी रेवेन्यू मेटर हो,रेवेन्यू बोर्ड – अजमेर में पहुंचते ही हर किसी की चाहत होती कि भवानी सिंह जी मुकदमा लड़ें। उनकी इसी परंपरा को अब उनके पुत्र-नारायण सिंह और योगेंद्र सिंह बढ़ा रहे हैं।

ठिकाने के सिरमौरों में से एक भरत सिंह जी आसाम के टी एस्टेट्स में प्रबंधन के चलते चर्चित रहे तो उनके अनुज प्रद्युम्न सिंह जी जयपुर के सिटी पैलेस और वर्ड ट्रेड पार्क के एडमिनिस्ट्रेटर के तौर पर चर्चित बने रहे।
संघर्षों से निकल वंचित वर्ग के राम निंद्रा ही नहीं,न जाने कितने नौजवानों ने सफलता के सोपान तय किये हैं। पिपलाज के डॉक्टर घनश्याम सोलंकी पहले व्यक्ति थे जो डॉक्टर बने और मेवात में अपनी सेवाओं के बूते प्रसिद्ध हुए। उनके पिता गिरदावर थे तो चाचा कल्याण मल जी सोलंकी शिक्षक से सेवानिवृत्ति के बाद आजीवन बस स्टैंड पर आकर यात्रियों की प्यास बुझाते रहे। भगवान सिंह जी रेंजर बने तो दिलीप सिंह जी आबकारी अधिकारी।
लंदन से फैशन डिजाइनर की पढ़ाई कर लौटी रिया शक्तावत ने भी पंचायत सरपंच बन अपनी नई राह तय की। सुमेर सिंह जी नेवी मर्चेंट के बाद मुम्बई में अपनी खुद की गौताखोरों की ऐसी टीम बनाने में कामयाब रहे,जो समंदर से डूबा हुआ सामान निकाल सके।

“सावर का मास्टर और पिपलाज का शक्तावत लंका में भी मिल सकै।” यह कहावत इसलिए इलाके में आम थी क्योंकि सावर के ब्राह्मणों ने शिक्षक और पिपलाज के राजपूतों ने उस दौर में कई अधिकारी, कर्मचारी दिये। यूं तो नीचे की पायदान से बढ़ते हुये रामेश्वर सिंह जी मेड़तिया, नारायण सिंह जी,भगवत सिंह जी भी पुलिस में थानेदार बने लेकिन ज्यादा धमक तब बनी जब हर्षवर्धन सिंह जी सेल्स टैक्स में और राज्यवर्धन सिंह जी पुलिस में सब इंस्पेक्टर बने। दुर्गा सिंहजी थल सेना में थे तो बड़े भाई सत्यपाल सिंह जी वायुसेना में सलेक्ट हुये।
इसी गांव के श्री मनजीत सिंह ने पुलिस में एडिशनल एसपी के पद पर पहुंचने से पहले क्रिकेट में तीन दफा अंडर नाइन्टीन टीम में कूच विहार ट्रॉफी और एक दफा विजय मर्चेंट ट्रॉफी के जरिये खेल जगत में जगह बनाई तो उन्हीं के बड़े भाई कुलदीप सिंह कॉलेज में नामी भारोत्तोलक बने। बचपन से डॉक्टर बनने के सपने के साथ डॉक्टर अजीत सिंह आगे बढ़े तो राजस्थान में कोरौना के कहर के बीच सबसे बड़े संकट मोचक बने।

सहसराम का नया टोला हमारा गांव कुम्हउ

हर्षित ने सेना में मेजर बन पहचान बनाई तो छोटे भाई रक्षित ने पहली ही कोशिश में लेफ्टिनेंट बन बड़ी छलांग लगा दी। अनुष्का और पूर्वा ने सीबीएसई में नम्बरों का रिकॉर्ड बनाया तो उससे पहले भी एक नहीं ,कई बेटियां पढ़कर शिक्षक,लेक्चरर,अफसर बन गयी। लेकिन ,इन सबमें अलग थी हाशिये की ज़िंदगी से ऊपर उठ अमेरिका तक पहुंचे सॉफ्टवेयर इंजीनियर राम निंद्रा की कामयाबी। सेकंडरी मेरिट में स्थान बनाने के बाद आईआईटी मुम्बई से कम्प्यूटर साइंस में बीटेक राम तो संवेदनशील थे ही,उनकी सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ पत्नी अर्चना निद्रा भी ग्रामीण बच्चों के जीवन को सवारने अमेरिका से ठेठ गांव पहुंचने लगी है।

इस बीच पिपलाज में सड़क,स्कूल सभी सुविधाओं में इजाफा भी हुआ तो बेईमान राजनेताओं की सरपरस्ती में पनपे कुकुरमुत्तों के सहारे तमाम अवगुणों की बाढ़ शहरों की दहलीज से निकल गांव के घरों की चौखट तक पहुंच गई। बीते दशक में मनरेगा ने यहां प्रतिव्यक्ति आय के आंकड़े बदले है लेकिन साथ ही जेसीबी मशीनों से काम के खेल ने मेहनतकश हाथों को हराम की कमाई में भी रंगना शुरू कर दिया। बावजूद इसके गांव में सुकून है तो इस बात पर कि जनता सब्र के साथ जीती है और जलस्तर गिरने के बावजूद कॉमर्शियल क्रॉप्स ने किसानों की उम्मीदें नीचे नहीं होने दी।
इस बीच गांव के एक छोर पर बरसाती नाले पर बने बांध ने जमीन सरसब्ज कर दी है लेकिन बाकी हिस्से में पानी रेगिस्तान की तरह रसातल में धंसता चला गया है। पीने के पानी में नाइट्रेट और फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा बीमारियों की वजह बन गयी है तो नशे ने एक बड़ी आबादी को गिरफ्त में ले लिया है। वोट हासिल करने का एक तरीका होता है -एक बड़ी आबादी को अपाहिज बना सियासी गिरोहों पर निर्भर बना देना। अफसोस यह कि यह समस्या शहरों से निकल रेतीले मोहनवाड़ी में भी घर कर रही है तो नदी नालों से घिरे हरे भरे पिपलाज में भी।

जब भी मेरे इन दो गांवों की तरफ जाता हूं वह बचपन पीछा करता चला आता है। मोहनवाड़ी में फौजी के घर लौटने की खबर के साथ पूरा गांव दौड़ता और पिपलाज में हर राखी पर गांव के तालाब के किनारे से बरसाती नाले के उस छोर तक पानी के नारियल फेंक हम प्रतियोगिताओं का हिस्सा बनते। जीत हार किसी की भी हो नारियल फूटता तो उसकी चिटक हर एक का मुंह मीठा कर देती।
दीवाली पर हम पिपलाज में मिट्टी की बनी ‘हीड़’ (विशेष प्रकार का दीपक) ले घर-घर जाते और सभी समवेत स्वरों में गाते-“हीड़ दिवाली तेल डालो,ना डालो तो काँजी हौज़( निराश्रित पशुओं के स्थान) चालो”। नशाखोरी के अंधकार में फंसती ग्रामीण आबादी के लिए रोशनी फैलाती उस ‘हीड़’ की अब और ज्यादा जरूरत है ,लेकिन अफसोस कि वह ‘हीड़’ भी चमकदमक के इस दौर में कहीं खो सी गयी है। रोशनी फैलाती उस हीड़ की जरूरत इसलिए है ताकि यह अंधियारा भी मिटे और हक भी बना रहे।

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एकौना गांव के रग-रग में बसा हुआ है रामचरित मानस

शिक्षा ने बराबरी के हक हर किसी को दिये हैं, लेकिन ये हक गांवों से कहीं दूर छिटक सा गया है कि बुजुर्ग हक से किसी को रोकें या टोकें। हां, आस्थाओं का सिलसिला अब भी उसी रफ्तार में आगे बढ़ रहा है। मोहनवाड़ी से सटे खिरोड़ के ऋक्तिया भैरव मंदिर में मन्नत के धागे बढ़ रहे हैं और पिपलाज में हट्टू बाबा के स्थान पर पर्चा लेने भीड़ जस की तस जमा हो रही है। हट्टू बाबा हर साल किसी के डील-शरीर में आते हैं और दौड़ते हुए तालाब की पाल पर जूती फेंक आगे बढ़ जाते हैंं। जहां जूती गिरती है उससे ही ग्रामीण अंदाज़ लगा लेते हैं कि बारिश से तालाब में कितना पानी आयेगा। हट्टू बाबा ही बता देते हैं कि बारिश ज्यादा होगी कि जरूरत से कम। काश्तकार उसी से अगली फसल तय करते हैं और मेहनत में लग जाते हैं। हट्टू बाबा के प्रति हद दर्जे के विश्वास की वजह है उनसे जुड़ी एक जनश्रुति। इस जनश्रुति के मुताबिक हट्टू बाबा ने गायों को बचाने की खातिर बलिदान दिया था और गर्दन कटने के बावजूद कोई एक किलोमीटर तक दुश्मनों का तलवार हाथ में ले पीछा किया था।
(दूसरी व अंतिम कड़ी समाप्त।)

गांव के कहानी की पहली कड़ी… पढ़ें…

अजमेर के पीपलाज और झुंझुनू के मोहनवाड़ी गांव से जुड़ी हुई है स्मृतियां

 

लेखक परिचय: श्रीपाल शक्तावत
-1989 से सक्रिय पत्रकारिता ।
-रेडियो,प्रिंट,टीवी का लंबा अनुभव
-2005-6:
लिंग जांच और कन्याभ्रूण हत्या पर चार राज्यों में 140 डॉक्टरों पर किये गये खुफिया स्टिंग की देश-विदेश में चर्चा । आमिरखान के चर्चित टीवी शो-सत्यमेव जयते का पहला एपिसोड हमारे इसी काम पर ।
– 2005:
बुजुर्ग माँ पर बच्चों के अमानवीय अत्याचार पर किये गए स्टिंग के बाद बुजुर्गों के संरक्षण को लेकर राष्ट्रवापी बहस और फिर वरिष्ठ नागरिकों के हित में कानून बना ।
-1994:
राजस्थान के पुलिस थानों में थर्ड डिग्री से 47 मौतों पर रिपोर्ट । जनहित याचिका के जरिये मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा । पुलिस हिरासत में मौतों पर सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन आयी और मानवाधिकार आयोग की नींव पड़ी ।
-रेडियो लेखन के लिए तीन राष्ट्रीय और दो अंतरराष्ट्रीय पुरुस्कार
-लीक से हटकर पत्रकारिता के लिए महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय पन्नाधाय अवार्ड
-खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए कई अवार्ड

 

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