
गांव को लेकर महात्मा गांधी की कल्पना के मूल में था कि गांव को आत्मनिर्भर बनाना हैं, एक स्वायत्त इकाईं के रूप में विकसित करना है। मैं 2010 में जब मेघालय के उमसोफाई गांव में गया तो मेरे मन में यही बात थी। आदिवासी समाज में एक हद तक आत्मनिर्भरता है। बांस है उससे घर बना लेते हैं, बांस में खाना डाल कर पका भी लेते हैं। उसी बांस का बिस्तर भी बन जाता है, उसी बांस को छीलकर रस्सी भी बना ली जाती है। चावल काम भर ही उगाते हैं। जंगल में बहुत सारी ऐसी चीजें है जो हम नहीं खाते हैं, पर स्थानीय लोग उनका उपयोग करते हैं। बाजार के नियंत्रण से यह इलाका काफी हद तक बचा हुआ है। लेकिन धीरे-धीरे लोगों की आंकाक्षाएं बढ़ी है और लोगों के अंदर पहाड़ को छोडने की प्रवृति बढ़ी हैं। पहाड़ और समतल के गांव भिन्न हैं। दोनों का चरित्र अलग है। खेती अलग है, खेती करने की शैली अलग है। इन इलाकों में खेती मशीन पर निर्भर नहीं है।
सोची समझी रणनीति के तहत या फिर नासमझी में गांव-गांव में ट्रैक्टर लाकर गाय-बैल को मारा गया, पंपिग सेट लाकर कुओं को बर्बाद किया गया, मछली-तालाब को पेस्टिसाइड्स के इस्तेमाल के जरिए मारा गया। इससे गांव शहर पर निर्भर बनते गए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था खत्म हुई व पैसा शहर की ओर जाता रहा। इस तरह से गांधी की तस्वीर लगाकर गांधी के गांव की हत्या तो लगातार हो रही है। बाद में जब इस चक्र में फंस गए तो उस चक्र को उल्टा घुमाने आया नहीं। गांव में सड़क बनाने की बात हो रही है। दावा किया जा रहा है कि गांव में सड़कों का जाल बिछने से विकास होगा। लेकिन गांव में बनने वाली सड़क में गिट्टी पहाड़ से तोड़ कर आता है वह पैसा किसके पास जा रहा है। बालू वाले का, ईंट-भट्ठे वाले का पैसा तो शहर को जा रहा है, गांव को कहां मिल पा रहा है। सड़क व्यपार के लिए बनाई जाती है। क्या व्यापार में किसान की हिस्सेदारी है। क्या उसकी इतनी औकात है कि वह व्यापार संतुलन को अपने पक्ष में कर पाए। व्यवस्था तो बिचौलियों के साथ है।
उज्जवला योजना की बात बहुत हो रही है। यदि इस योजना पर गौर करें तो यह आत्मनिर्भर गांव की परिकल्पना और ग्राम स्वराज के चिंतन के साथ बड़ा मजाक है। आपने गांव को दूसरे चीजों पर तो निर्भर किया ही था, अब उनको भोजन पकाने के लिए भी बाहर के गैस पर निर्भर बना रहे हैं। पहले वे अपना भोजन गोबर के उपले, कोनाई का चूल्हा, गोहरा, गोइठा पर बना लेते थे। बाग-बगीचे के छंटाई से जो झाड़-झंखाड़ प्राप्त होता, उसका वे भोजन पकाने के लिए इंधन के रूप में इस्तेमाल करते। इसी तरह शौचालय योजना का बहुत शोर है। पूरे देश के 125 करोड़ लोग ट्वायलेट में फ्लश करने लगें तो ढ़ाई लाख करोड़ लीटर पानी एक बार के शौच के लिए चाहिए। क्या आपके पास इतना पानी है। आधुनिक शौच की व्यवस्था करना चाहते हैं तो पानी के प्रवाह के बिना शौच को बहाया नहीं जा सकता, नहीं तो कीड़े मकोड़े होंगे। कोई ऐसी पद्धति लाएं जिसमें कम पानी लगे। आपने दांत की सफाई के लिए ब्रश दे दिया। नीम व अन्य प्रकार का दांतून खत्म हो गए। गांव-गांव में रासायनिक खाद पहुंचा दिया गया। गाय को खत्म किया गया, बैल को मारा गया। गोबर उपयोगी नहीं रहा, ट्रैक्टर आया और आज आर्गेनिक की दुहाई दी जा रही है तो सवाल यह है कि विकास पहले था कि अब। गौ रक्षा और गोवंश सवर्द्धन की बात बहुत होती है लेकिन वास्तव में गांव बचाना है तो ट्रैक्टर और दूसरी गैर-जरुरी मशीनों को बैन करना होगा। उपयोगिता पर आधारित व्यवस्था बनानी होगी।
आधुनिक खेती में गांव के जानवरों और कीड़े मकोड़े की भी हत्या हुई। खेत मनुष्य के शरीर की तरह है। जिस तरह मनुष्य के शरीर में कई जीव रहते हैं, उसी तरह खेत में भी कई जीव, कीड़े-मकोड़े रहते हैं। हमलोगों ने मिट्टी के जीवन-स्रोत को समाप्त कर दिया। खेत को कोड़ने का काम अर्थवार्म कर देता था। अब खेतों से केंचुआ गायब हो गया है। हमने जिस तरह से मिट्टी के जीवन संरचना को समाप्त किया। उसी तरह पूरे गांव की संरचना को भी समाप्त कर दिया जो खेत,मिट्टी, पानी, तालाब, पौधे, मकान सबको संभाले, सहेजे रख कर अपना आत्मनिर्भर स्वरूप बनाए हुए था। पहाड़ की समस्या झूम की है। पेड़ को काटने की जरूरत नहीं है। पेड़ की खेती करने की आवष्यकता है। गांधी प्रकृति की संरचना को समझते थे। उनकी दृष्टि थी कि गांव को संपूर्ण रखो, जीवित रखो तभी सब चीजों को बचाए रख सकोगे। यदि ऐसा होता तो सब बचता। गांव भी बचता और जमीन भी बचती। मिट्टी, भोजन खराब होने से दवाईयों की जरूरत पड़ी।
पहाड़ में अभी भी कुटीर उद्योग बचे हुए हैं लेकिन उनके पास बाजार नहीं है। हमलोगों ने एनआईपी के साथ मिलकर गांवो में एग्री क्राफ्ट तैयार करना शुरू किया है। हमारी कोशिश है कि गांव में खेती का इनपुट वहीं पैदा हो, तब गांव की संपदा गांव में रहेगी। लागत मूल्य में कमी आएगी। गांव के लोगों को उसके गंवईपन पर अभिमान होना चाहिए। उसे लगना चाहिए कि मैं जो बनाता हूं, खाता हूं, जिस तरीके से रहता हूं वह श्रेष्ठ भले ही न हो लेकिन बराबर तो है ही। अभी वह आत्महीनता के दौर से गुजर रहा है और यह आत्महीनता पूंजीपति लोगों, शहरी लोगों की दी हुई है, ताकि वे उनकी तरफ आंकाक्षा से देखें, उनका सामान खरीदें, उनपर निर्भर हो जाएं।
पहाड़ों के घरों के छत टीन के बनने लगे हैं। विडंबना है कि शहर टीन छोड़ रहा है, गांव टीन की छप्परें अपना रहा है। हम कोशिश कर रहे हैं कि उसको हटाकर फूस के ब्लाॅक्स बने। बांस के फ्रेम के अंदर फूस डाल दें , कीड़े-मकोड़े से बचाने के लिए सेट्रानील डालकर उसे जोड़ने की व्यवस्था किया जाए। इसी तरह पाईप के बजाए बांस के पाईप का इस्तेमाल हो। केले के पत्ते में चावल लपेट कर चावल पकाने की व्यवस्था। यह सब गांव की व्यवस्था है। लेकिन जब यही चीज शहर उपयोग करने लगता है तो ग्रामीणों को लगता है कि अच्छा है। इस तरह से गांव का गंवईपना खो गया है, उनका अभिमान खो गया है, आत्मविश्वास खत्म हो रहा है।
हमलोग मेघालय के जिरांग विधानसभा क्षेत्र जहां 10,000 हजार मतदाता हैं उस इलाके में 3000, एकड़ भूमि पर खेती कर रहे हैं। इस कार्य में हमारे साथ आर साईमन और दीपेन संगमा हैं। भूमि पर खेती करने का अधिकार इनके पास है। हमारी भूमिका इनको संरक्षण देने की है। जिस तरह की खेती वहां होती है या जिस तरह की व्यवस्था की जरूरत है, उसको प्रोत्साहित करने का काम करते हैं। वैसे तो हल्दी, अदरक का उत्पादन ज्यादा होता है और इस काम में लगभग 500 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। गोहाटी में फैक्ट्री और कोल्डस्टोरेज भी है। लेकिन साथ ही हम दूसरे तरह का प्रयोग भी कर रहे हैं। पानी का संरक्षण, पौधारोपण, मिट्टी के अंदर और उपर खेती, मिश्रित खेती, चक्रीय खेती कर रहे हैं। साथ ही कीड़ों से बचाने के लिए कौन-सा पौधा लगाए। हम सिद्धांत में नहीं कर्म में विश्वास करते हैं। यानी देखिए, सीखिए और खुद कीजिए। हम इतना ज्यादा आगे चले गए हैं या सीधे चले गए हैं और इस तरह की कल्पना कर रहे हैं यह एक माॅडल बने जिसे अन्य लोग कर सकें।





















